Thursday, March 20, 2014


लव डॅाट कॅाम

   

केफेटेरिया के काउण्टर पर भीड़ थी। राॅक्स ने दो चार स्टुडेण्टस के पीछे से ही हाथ लंबे कर टोकन को काउण्टर पर फेंकते हुए वेटर के हाथो से काॅफी के दोनो कप ले लिये। काफी के दोनो कपो को स्टुडेण्टस से बचाते हुए हाथ उपर किये हुए राॅक्स ज्यो ही घूमा प्रोफेसर सिन्हा से टकरा गया। सिन्हा के हाथ की काफी का कप नीचे छिटक गया। ‘ क्या हो गया है आजकल के छोकरो को । जरा भी देखकर नहीं चलते । चष्मा पहन कर हीरो बने फिरते है। कुछ भी दिखाई नहीं देता है।’ प्रोफेसर अपने कपडो को ठीक करते हुए बुदबुदाये।

    राॅक्स काफी के दोनो हाथ में कप लिये आगे निकल गया था। प्रोफसर की आवाज सुनकर उसने पीछे गर्दन घुमायी और शब्दो को लगभग प्रोफेसर की तरफ धकियाया - सर! हीरो बताने के के लिए थैक्यू और यू नो ! मेरे पीछे आंखे नहीं है ! इसलिए आपको देख नहीं पाया। सर। एक बात और बता दू। गोगल्स लगाने का मतलब आंखो पर पटटी बांधना नहीं है। इसमें से आप देख भी सकते है।

    राॅक्स प्रतिक्रिया का इंतजार किये बिना गोल टेबल्स के बीच में से कमर मटकाते हुए आगे निकल गया। नाम तो राकेष था। काॅलेज में राॅक्स नाम से ही जाना जाता था। बालो को बीच में खड़ा किये हुए, एक कान में रिंग्स, कलाई में फैषननुमा काले मोतियो की माला लपेटे हुए बिलकुल नये जमाने की जीव की तरह लग रहा था। कमर मटकाते हुए और गुनगुनाते हुए सीधे प्रीति की टेबल्स पर पहुंच गया। कोहनी टेबिल पर और सर हथेली में रखे प्रीति राॅक्स को ही देख रही थी। कंधे तक बाल। आई ब्रोे डिजायन किये हुए। आंखे जैसे पूरे चेहरे से मैच करती हुई। प्रीती राॅक्स की दोस्त है और दोनो ने इसी सालं साफट इंनीजियरिंग पूरी की है।

ये लो गरमा गरम काॅफी। कहते हुए राॅक्स बैठ गया।
क्यों उलझते हो हर एक से ।
मैं कहां उलझा। पता नहीं लोगो को क्या हो गया है।
क्या हो गया है? प्रीती ने काफी का घूंट लेते हुए कहा।
इनका मानना है कि हम लोग कुछ भी करे गलत है। हैयर स्टाइ्रल चेंज करे तो फैषन है और खुद आज भी राजेष खन्ना और देवानंद की हेयर स्टाईल मेंनटेन किये हुए है।
राॅक्स के व्यंग्य पर प्रीती मुस्कुरायी और बात बदलते हुए कहा - जाॅब ज्वाईन कर रहे हो ?


मैं तो नहीं । तुम ?
मैं तो अगले हफते ज्वाईनिंग के लिए दिल्ली जा रही हूॅ। तुम क्यों नहीं  ?
प्रीती । मै इस लफडे में नहीं पडता । साफटवेयर इंजीनियर बन कर किसी की गधा मजदूरी नहीं करूंगा। खुद क्रियेषन करूंगा। वैसे भी अभी मस्ती के दिन है। जाॅब्स के नहीं । राॅक्स ने काॅफी खत्म करते हुए कहा।
राॅक्स। सोच लो। आगे आफर मिले या नहीं ?प्रीति ने अपने बालो को आंखो के आगे से हटाते हुए सलाह दी।
प्रीती छोडो। इट इज मस्ती टाईम । अभी घर जाकर डैड से भी यही सब सुनना है। अरे हां। मुझे लैपटाप पर कुछ काम भी करना है। घर चलते है। मै तुम्हे ड्राप कर देता हू।  कहते हुए राॅक्स अपने लैपटाप के बैग को गले में लटकराते हुए खड़ा हो गया। राॅक्स ने बाईक स्टार्ट की और प्रीति झट से उसके पीछे बैठ गयी। राॅक्स की बाईक धुंआ छोडते हुए कुछ पलो में ही केफटेरिया की रोड से ओझल हो गयी। वहां खड़े लोगो तेजी से आष्चर्यचकित थे।

    राॅक्स के घर में प्रवेष करते ही पहले ड्रांईग रूम है। ड्राईग रूम में डैड अखबार  लिये बैठे थे। टीवी आॅन था। उनका ध्यान न टीवी में था और न ही न्यूजपेपर में । उनके कान तो राॅक्स के आने की आहट का इंतजार कर रहे थे। राॅक्स ने जैसे ही घर में कदम रखा, डैड का इंतजार खत्म हुआ। चेहरे के आगे से अखबार हटाये बिना ही बोल पड़े- वेलकम। सर। डैड का लहजा व्यंग्यात्मक था। राॅक्स वहीं दरवाजे पर ही खड़ा हो गया।

अंदर आओ। बैठिये सर। डैड का व्यंग्य जारी था। परन्तु राॅक्स पर कोई फर्क नहीं । गोगल्स को माथे पर करते हुए बोल पडा - डैड। मै हमेंषा की तरह सुनने के लिए तैयार हुु। कह डालिये।
हां । भई करेगा तो अपनी मर्जी की। मैने सुना है तुम जाॅब नहीं कर चाहते हो।
सही सुना है।
क्यों? पांच लाख का पैकेज है ।
डैड। मैं अभी जाॅब के चक्कर में नहीं पड़ना चाहता हू। फिलहाल मेंरा जाॅब करने का कोई ईरादा नहीं है।
मेरे सोचने और नहीं सोचने का कोई मतलब नहीं है ?
किसी के सोचने पर कोई पाबंदी नहीं है। आप किसी के बारे में सोच सकते हो ।
मतलब मेरी तुम्हारे लिए कोई वैल्यू नही है ? डैड के शब्दो में तल्खी बढ़ती जा रही थी।
किस ने कहा ? आपकी वैल्यू है। आप मेरे डैड है।
केवल कहने को ?



किसी काम को मैं कैसे करता हू। यह मेरा काम है। आपकी सोच से मैं काम नहीं कर सकता है। मुझे जो करना है । मैं करूंगा। मैं यह जाॅब नहीं करूंगा। 

डैड  न्यूजपेपर को समेटकर टेबिल पर रखते हुए खड़े हो गये। नथूने फुलाते हुए राॅक्स के बिलकुल करीब आ गये। राॅक्स के चेहरे बिलकुल करीब फुले हुए नथुनो से सांस को छोड़ते हुए डैड ने दांतो को लगभग भीचते हुए कहा - आखिर क्यों नहीं करना चाहते हो जाॅब। तुमे इंजीनीयर बनाने के लिए मैने 13 परसेंट पर लाॅन लिया था। कब तक चुकाउंगा और तुं कब तक मेरी सेलरी पर पलता रहेगा।

डैड के गुस्से पर राॅक्स की स्थिर प्रतिक्रिया था। धीरे धीरे अपने चेहरे को उठाया। डैड के नजरो से अपने आपको अलग करते हुए गर्दन को दूसरी तरफ घुमाया। डैड की आंखो के गोले आंखो के बीच में रूके हुए राॅक्स को देख रहे थे। राॅक्स ने डैड का चेहरा देखे बिना ही धीमे स्वर में कहा - मुझे मेरे खर्चे के लिए पैसे देना या नहीं देना । ये डिसीजन आप ले सकते है। जाॅब करना या नहीं करना। ये डिसीजन मुझे करना है। मैंने अपना डिसीजन कर लिया है। आप भी अपना डिसीजन ले सकते है।’ राॅक्स के शब्दो में तल्खी नहीं थी। बहुत ही धीमे स्वर में उसने अपनी बात कही। डैड ने अपने नथुनो से और जौर से सांस लेकर छोड़ी- तो ठीक है मैंने भी अपना डिसीजन कर लिया। अब अपने खर्चो के लिए मेरी तरफ मुंह नहीं ताकना। मैने सोफटवेयर इंजीनीयर बना दिया। मेरी जिम्मेदारी खत्म।

थेक्स! डैड मुझे मंजूर है।कहते हुए राॅक्स अपने कमरे की तरफ चल दिया। डैड राॅक्स को देखते रहे ।आंखे बंद कर असहाय स्थिर भाव से खड़े हो गये । 

    पैट्रोप पंप पर बहुत भीड़ थी। एक ही लड़का पैट्रोल डाल रहा था। लगता है बाकि स्टाफ छुटटी पर था। नेक्स्ट! नैक्स्ट! नैक्स्ट ! कहते लड़का जल्दी जल्दी कस्टमर निपटा रहा था। राॅक्स के डैड भी लाईन में थे। आफीस के लिए देर हो रही थी। उनके पास स्कूटर था और स्कूटर में तेल की खपत भी ज्यादे होती है। पैट्रोल का दाम भी पसीने छुडा रहा था। यही सब सोचते हुए डैड अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। बारी आने पर टंकी का ढक्कन खोलकर पैट्रोल डलवाया। पर्स से पैसे निकाल कर ज्योही लड़के की तरफ बढ़ाये। शक्ल कोई जानी पहचानी लगी। कैप और चष्मा होने के कारण एकदम से नहीं पहचान पाये। चेहरा करीब आते ही डैड के चेहरा गुस्से से तमतमा गया । ‘ राॅक्स तुम!
राॅक्स ने डैड की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया । अपने काम में फिर से जुट गया।




नैक्स्ट ! नेक्स्ट ! आवाज के साथ ही डैड को आगे सिरकना पड़ा। कानो में अभी भी नैक्स्ट नैक्स्ट की आवाजे गुुज रही थी। पंप पर रूके बिना ही स्कूटर स्टार्ट कर आफीस की तरफ चल दिये।

    आफीस में टेबिल पर अपना बैग रख अपने चेहरे पर हथेली रखकर बैठ गये। आफीस की चहल पहल डैड के लिए बेअसर थी। माथे पर सलवटे। नजरे स्थिर । तनाव को साफ तौर पर उनके चेहरे पर देखा जा सकता था। पास बैठे माथुर साब भांप गये कि गुप्ता जी कुछ परेषान है।

क्या बात है गुप्ता जी ! कुछ परेषान दिख रहे हो।
क्या बताऊं माथुर साहब। हर एक की किस्मत आप जैसी कहां। ऐसे लगा माथुर साब ने राॅक्स के डैड की दुखती रग पर हाथ रख दिया था।
क्यों । किसने कहा आपकी किस्मत खराब है।
देखो आपका लड़का दुष्यंत कितना आज्ञाकारी और होनहार । इ्रंनीनियंरिंग करते ही 25 लाख का पैकेज मिल गया। इधर हमारा राकेष यानि राॅक्स। पूछो मत।
गुप्ता जी। परेषान मत होईये। राॅक्स को भी तो पांच लाख पैकेज मिला है। चिंता क्यों करते हो। यह तो बढ़ जायेगा। माथुर साहब ने गुप्ता जी को सात्वंना दी।
माथुर साहब। इतना भी होता तो ठीक था। परन्तु साहबजादे ये जाॅब नहीं करना चाहते है। क्रियेषन करना चाहते है।

माथुर साहब ने गंभीर होते हुए पूछा - आपने राॅक्स से पूछा क्या कि वह क्या क्रियेषन करना चाहता है।
माथुर साहब क्या पूछं आज तो उसने हद कर दी। कल मैंने डांट दिया तो आज से पैट्रोल पंप पर काम करता हुआ मिला।
इसमें परेषान होने की कोई बात नहीं ?
लोग क्या सोचेगें कि गुप्ताजी के घर मं इतनी कंगाली आ गयी है कि लड़के को पैट्रोल पंप पर काम करना पड़ रहा है।
गुप्ता जी। राॅक्स नई सोच का लड़का है। यूरोप में तो अक्सर बच्चे अपने हाथ खर्चे के लिए पैट्रोल पंप पर काम करने जैसा जाॅब करते है।
माथुर साहब यह यूरोप नहीं है। इंडिया है। यहां का समाज अलग है। लोग अलग है।
आप राॅक्स से बात तो करिये । वो क्या सोचता है। यह भी तो सुनिये।
कई बार सुन लिया । बस एक ही बात । क्रियेषन करना चाहता हूू।






माथुर साहब अपनी सीट से खड़े हो गये। मामले की गंभीरता को समझते हुए गुप्ताजी की सीट के बिलकुल सामने आ गये। दोनो हथेलिया गुप्ता की टेबिल पर टिका कर कहा- गुप्ता जी। आप राॅक्स को समझिये। नहीं पूछा तो पूछिये क्या क्रियेषन करना चाहता है। मुझे नहीं लगता वो कोई गलत कर रहा होगा।

नहींजी। कुछ अच्छा नहीं कर रहा । मैंने पूछा था तो बताया एक वेबसाईट बनायी है। लव डाॅट काॅम । दावा करता है कि दुनिया की पहली लव वेबसाईट जिसमें पेरेन्टस को भी जोडा गया है। उपलब्धि बताता है कि पूरी दुनिया में पचास हजार से भी ज्यादा यूजर हो गये है। खाक वेबसाईट बनायी। वेबसाईट से पेट नहीं भरता। कर्जे नहीं चुकाये जा सकते । कहते हुए गुप्ता जी ने अपना चष्मा उतार कर टेबिल पर रख दिया और दोनो हाथ बगलो में डालकर बैठ गये। माथुर साहब अब भी आषावादी दिख रहे थे। चहलकदमी करते हुए गुप्ता की सीट के पीछे आ गये।

गुप्ता जी। आप राॅक्स को ठीक से समझो। मुझे नहीं लगता वो बिगड़ेल है। उसे कोई जिम्मेदारी सौप कर देखो।
सौपी थी। मैंने कहा अपनी मम्मी की दवाई और डौक्टर्स को दिखाने का काम किया करो।
फिर ?
जनाब। ने हां तो कर दी। लेकिन आप जानते है उसने जिम्मेदारी कैसे निभाई।
कैसे ?
उसने सारी दवाईयां उठाकर उपर रख दी। कहा मैं वैसे ही मम्मी को ठीक कर दंूगा। जैसे उसने डाॅक्टरी पढ़ी है।
तो उसने जिम्मेदारी ली ?
जिम्मेदारी क्या ली ? रोज अपनी मां को बाईक पर बैठाकर सुबह शाम पार्क ले जाने लगा।
क्या फर्क पड़ा ?
गुप्ता जी को अब डिफेंसिव होना पड़ा। लंबी सांस लेते हुए कहा - मै डाॅक्टर के पास उसकी मम्मी को चैक अप के लिये ले गया। बीपी शुगर सब नाॅर्मल था। डाॅक्टर भी संतुष्ट था। यह फर्क तो पड़ा। अब उसकी मम्मी नाॅर्मल है। नाॅर्मल क्या, काफी बेहतर  फील कर रही है।

मै यही तो कह रहा था । राॅक्स को समझो। उसकी सोच अलग है। अच्छा बताओ आपके बच्चे में लाख बुराईयां होगी परन्तु कोई अच्छाई भी तो आपको नजर आयी होगी।




हां। यह जरूर है । उसने कभी भी मेंरी बात का गुस्सा नहीं किया। कभी मेरे सामने उंची आवाज में बात नहीं की।

देटस इट! यही मैं कहता हूूं। उसकी सोच को ध्यान में रखकर उससे बात करो। सब ठीक हो जायेगा। मुझे नहीं लगता राॅक्स बुरा है। डांट वरी। बैफिक्र होकर आफिस का काम करो। विदाउट टेंषन।

 यह कहकर माथुर साहब भी अपनी सीट पर बैठ गये। गुप्ता जी सब कुछ भुलाने की कोषिष करते हुए टेबिल पर पड़ी फाईलो को खोलने लगे।

    शाम को घर पहुंचने के बाद भी गुप्ता जी टेंषन में थे। राॅक्स को पैट्रोल पंप पर काम करते देख उन्हे बहुत बुरा लगा। माथुर साहब ने लाखा समझाया होगा परन्तु राॅक्स के प्रति उनका गुस्सा सातवे आसमान पर था। उन्हे लगा कि बेटा उनके हाथ से निकल गया। राॅक्स की मम्मी ने भी समझाने की कोषिष की परन्तु उनके लिए राॅक्स अब उनकी जिंदगी में नहीं है। यह सोच कर वो टेंषन बढ़ा रहे थे कि उन्होने अपने बेटे से कितनी उम्मीदे पाली थी परन्तु नालायक निकला। फिर सोचा एक ही लड़का है उनकी पेषन, प्रोविडेंट फण्ड से उसका काम निकल जायेगा। इसी उधेड़बुन में पता ही नही चला कब रात हो गयी। राॅक्स के आने का इंतजार किये बिना ही सो गये।

    गुप्ता जी को  रात को नींद ढंग से नहीं आयी । सुबह जल्दी उठ गये। टेंषन के साथ ही उठे। सोचा मेंरा भी बीपी आज चैक करा लूंगा। फिर राॅक्स के कमरे में गये । उसके चेहरे पर कोई टेंषन नहीं । ऐसे लगा बेफिक्री से सो रहा है। गुप्ता जी सोच रहे थे ऐसी है आजकल की औलादे। उनकी श्रीमती जी भी अभी तक सो रही थी। गरमी थी। सुबह सुबह हवा ठंडी होती है। ठंडी हवा लेने के लिए वे बाहर बरामदे में आ गये। न्यूज पेपर पड़ा था। गुप्ता जी ने न्यूज पेपर उठाया ज्यों ही उसे उसे खोला । मुख पृष्ठ पर नीचे बड़ी खबर थी - इंदौर के राॅक्स की वेबसाईट लव डाॅट काॅम को 1 करोड़ में खरीदने का आफर। हेडलाईन पढ़ते ही गुप्ता जी के पूरे शरीर में झुरझुरी छुट गयी। खबर में बाॅक्स मे राॅक्स का फोटो था और नीचे लिखा था काम्याबी का श्रेय पिता को। गुप्ताजी ने अखबार को लिये एक हाथ बगल में दबाया और दूसरे हाथ की हथेली को चेहरे पर फेरते हुए खड़े हो गये। ठंडी हवा के झोंको से उनके बाल उड़ रहे थे।

Thursday, June 20, 2013

प्लेन


मैं कमरें में छवि का पासपोर्ट और वीजा ढंुढ रहा था। कल उसे जरूरत पड़ेगी। पहले से ही ढंुढ कर एक जगह रख दूं ताकि सुबह आसानी से मिल जाये। फिर रात भर शादी के कामो में वक्त नहीं मिलेगा। हमारे यहां शादी में कन्यादान घर का बड़ा करता है। मेरे घर में मेरे भाई साहब बड़े है इसलिए मेरी बेटी का कन्यादान भी भाई साहब ही करेंगे। मेरे जिम्मे शादी के दूसरे काम रहेगे । मेहमानो को अटेण्ड करना और बाकि व्यवस्थाऐ ंदेखना ।  अब बारात आने ही वाली  है। दो बार बुलावा आ गया । छवि अपने पापा को बुला रही है। अब नहीं गया तो नाराज हो जायेगी। पासपोर्ट और वीजा ढुुढकर एक लिफाफे मे आलमारी के एक कोने में रख दिया। जब पैकिंग होगी तो यह सब छवि के पर्सनल डाॅक्यूमेंटस में रख दूंगा।

छवि का कमरा खोला। कमरा खोलते हुए छवि बिलकुल सामने बैठी थी। किसी पिता को दुल्हन के रूप  में अपनी बेटी रानी ही लगती है। छवि वास्तव में रानी ही थी। आज तो दुल्हन के रूप  में बिलकुल रानी परी लग रही थी मानो परी लोक पर उसका राज हो। कभी मां के पल्लू में छिप जाने वाली छवि के सर पर आज पल्लू था। जब वह पैदा हुई थी तो डाॅक्टरो ने कह दिया था कि उसकी मां अब दोबारा मां नहीं बन सकेगी। मेरी पत्नि और परिवार रिष्तेदार बहुत दुःखी हुए। सबने सात्वनां दी। सबने अब लड़का नहीं हो सकने का दुख जताया। मुझे कोई दुख नहीं था। मेरे लिए तो छवि ही मेरी दुनिया हो गयी थी। मैंने अंगुली पकड़कर उसको चलना सिखाया।  मैं उसके लिए लड़को वाले खिलौने लाता लेकिन वो लड़कियो वाले खिलौनो की मांग करती । दरसअल वो लड़की ही रहना चाहती थी। वो गुडडे गुडियो के खेल खेलती । मै भी उसके साथ खेलने लग जाता । गुडे और गुडिया की शादी जैसे खेल में मै शरीक होता था। उसकी सहेलिया कम थी। या यों कहे मै उसे सहेलिया बनाने के लिए वक्त ही नहीं देता था। मै चाहता था कि वो ज्यादा से ज्यादा समय मेेरे साथ बिताये। कई बार तो उसकी मां भी मुझे टोक देती परन्तु मै जब भी समय मिलता छवि के साथ ही बिताता था।

बचपन में छवि अक्सर प्लेन की आवाज से डर जाया करती थी। जब भी कोई प्लेन हमारे शहर के ऊपर से गुजरता वो मां के पल्लू में जाकर छुप जाती । हमारी छत बहुत बड़ी थी। एक छोटे मैदान की तरह । मै उसके लिए कागज का प्लेन बनाता और वो उसके पकड़ने के लिए दौड़ती । इस खेल में उसका  प्लेन से डर भी जाता रहा । जब भी हम छत पर होते छवि कागज आगे कर प्लेन बनाने के लिए कहती। मै उसे सीखाता कि देख कागज का प्लेन ऐसे बनता है। वो कभी सिखने की कोषिष नहीं करती। मै उसे कहता कि छवि तुम प्लेन बनाना सीख क्यों नहीं लेती।  वो कहती पापा मै तो प्लेन बनाना सीखूंगी नहीं मैं तो प्लेन में उडकर स्विटजरलैण्ड जाउंगी। मै कहता जब तक तुं कागज का प्लेन बनाना सीखोगी नहीं मै तुम्हे प्लेन में जाने नहीं दूंगा। इस पर वो मेरे पीछे आकर गले में हाथ डालती  और कहती कि तब तो मै सीखूंगी नही क्योंकि मुझे तो मेरे पापा के साथ ही रहना है।
छवि के सर पर पल्लू और माथे पर टीका लटक रहा था। वैसे ही जैसे किसी परियों की रानी के माथे पर होता है। टीके की चमक बता रही थी कि वो दुनिया की सबसे सुंदर दुल्हन है। वैसे भी उसकी चकोचैंध में मेरा घर हमेंषा दमकता रहा । शुरू से ही होनहार थी। हमेषा अव्वल । मैंने उसको डाॅक्टरी की पढाई कराई। यहां भी वो अव्वल रही । वो पहली बार एप्रीन पहन कर घर आई तो मेरी आंखे छलकने लगी तो वो मेरा हाथ पकड़ कर आंगन में खुषी से झूमने लगी और मेरी आंखो से आंसूओ को बाहर नहीं आने दिया। मै उसके लिए आज के जमाने के लड़को वाले कपड़े खरीदता। उस समय तक लडकियो के  जींस और टी शर्ट पहनना आम हो गया था लेकिन छवि लड़कियो वाले कपड़े ही पहनती थी।

छवि की आंखो में आज भी सपने ही थे। मै उसकी आंखो में उसके सपने ढुंढा करता था  लेकिन उसकी आंखो में पापा के लिए सपने थे। पापा आप आज यह ड्रेस पहनोगे । पापा आप यह हेयरस्टाईल रखोगे। कई प्रकार से हमंषा निर्देष देती रहती थी। मेरा आलेख या कहानी जब भी अखबार में छपती वो बाजार से ले आती । मेरी लिखी किताबो और अखबारो को उसने एक आलमारी में सहेज कर रखा था। मेरे लेखन की एक पूरी लाईब्रेरी बना रखी थी। मुझे जब पहली बार साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला तो सबसे ज्यादा खुष छवि ही थी। उसकी आंखो में पिता के सम्मान का गर्व देखा जा सकता था। पर मैं तो उसकी आंखो में उसके सपनो का ढुंढा करता था। मै उसे अक्सर कहता था कि मेरे लिए तुम लड़के की तरह ही हो। तुम्हे कोई लड़का पसंद हो तो मुझे खुलकर बता देना। पर उसने कभी बताया नहीं । जब भी पूछने की कोषिष करता बात को टाल देती । सिरीष का रिष्ता आया तो परिवार और रिष्तेदारो ने मुझे बात आगे बढ़ाने से मना किया था। सिरीष न्यू जर्सी में सोफ्टेवेयर इंजीनीयर था। उसका परिवार दिल्ली में रहता था और वो न्यू जर्सी में सैटल हो गया
था। उसकी मां को भी दूरी ज्यादा लग रही थी। रिष्ता अच्छा था लेकिन एक बार तो मेरे कदम भी रूक गये। परन्तु मैने छवि की आंखो में उसके सपने का पढ़ लिया था। मैने छवि को बुलाकर पूछा । उसने सिरीष का फोटो भी नहीं देखा और बात करने पर शरमा कर अंदर चली गयी। एक बार फिर वह लड़की बन गयी। मेरे जोर देने पर भी लड़का नहीं बनी। पूरानी लड़कियो की तरह शरमा कर चली गयी। मैने उसकी मां को बात करने को कहा । उसकी मां ने बताया कि छवि राजी है।

मै छवि को देख रहा था। मेरी राजकुमारी रानी बनने जा रही थी। टयूबलाईट की सफेद रोषनी में उसकी आंखो में पानी चमक रखा रहा था। मेरे अंदर भी पानी का बहाव नीचे उठकर गले तक आ चुका था। गला भारी हो गयी था। मै जोर लगाकर आंसूओ के दरिया को पीछे धकेल रहा था। ऐसा लगा कि छवि के आंसू भी छलक कर बाहर आ जायंगे। वो उठकर खड़ी होने ही वाली थी । मै कमरे से निकल कर बाहर आ गया। अंदर के दरिया को किसी तरह से रोक दिया। काम में लग गया। बारात आ चुकी थी। सभी अपने काम में व्यस्त हो गयें। मै भी व्यवस्थाओ में लग गया।
 धीरे धीरे रात बीत गयी। अब विदाई की तैयारी हो रही थी । लगभग सब कुछ पैक हो गया था। अब विदा होने की तैयारी थी। यहां से छवि और सिरीष सीधे फलाईट से दिल्ली जायेगे और दिल्ली से न्यू जर्सी । मै ऊपर कमरे में था। दो तीन बार बुलावा आ गया था। मै जा नहीं पा रहा था। मै एक वृक्ष की तरह महसूस कर रहा था जिसकी सबसे हरी भरी डाली काटने की तैयारी हो रही हो। मुझे पता था अब छवि खुद आ जायेगी। ऐसा ही हुआ। छवि खुद आ गयी। हाथ में एक डिब्बा लिये हुए। डिब्बा मेरे हाथ में पकड़ा कर छलक पड़ी। आंखो में आंसूओ का सैलाब आ गया। मै भी अपने आंसूओ के दरिया को रोक नहीं पाया। ऐसा लग रहा था दोनो के आंसू अब नहीं रूकेंगे। पीछे पीछे सिरीष भी आ गया। वो चल कर हमारे नजदीक आया। मेरे पांव छुये। मैने आर्षीवाद दिया। उसने छवि का हाथ पकड़ा और बाहर की तरफ ले जाने लगा। छवि का हाथ मुझसे छुटता जा रहा था। ऐसो लग रहा था छवि का हर एक कदम पेड़की हरी भरी डाली पर कुल्हाड़ी का वार था। ज्यो ज्यो वो कदम बढ़ाती मैं कुल्हाड़ी के वार जैसी आवाज महसूस करता । ज्योही उसने अंतिम कदम कमरे के बाहर रखा, मुझे लगा जोरदार अंतिम वार से मेरी हरी भरी डाल काट दी गयी । मैने झटके जैसा महसूस किया। हाथ का डिब्बा छिटक कर नीचे जा गिरा। डिब्बे से कागज का प्लेन निकल फर्ष पर गिर गया था। मैने कागज का प्लेन उठाया। प्लेन पर लिखा था - ‘ पापा मैने कागज का प्लेन बनाना सीख लिया है। ’ मैं दोड़कर नीचे गया । छवि और सिरीष की गाड़ी एअरपोर्ट के लिए रवाना हो चुकी  थी।

Sunday, March 3, 2013


सुनील गावस्‍कर की अंतिम टेस्‍ट पारी का साहित्‍यक अंदाज में संस्‍मरण

सूखे पत्ते

मार्च के महीने के मध्य तक प्रकृति पर यौवन पूरी तरह छा जाता है। बसंत की शुरूआत में खिले फूल अपने सौंदर्य और खूशूबू में अपने शिखर पर होते है। इन निदो लगने वाली फूलो की प्रर्दशनियों में लोग इसके सौंदर्य को निहारने के लिए उमड़ पड़ते है। इन्ही फूलो की डालियों के बीच पूराने पत्ते जो बसंत आते आते पूरी तरह झड़ जाते है परन्तु फिर भी कुछ एक पत्ते इन्ही डालियों पर लटके हुए तेज हवा के साथ अपने होने का अहसास कराते है। मार्च में ये पत्ते भी झड़ जाते है। 1987 के मार्च में क्रिकेटर सुनील गावस्कर भी युवा क्रिकेटरो के बीच अपने आपको डाली का सूखा पत्ता ही महसूस कर रहे थे। दुनिया प्रकृति की नई कोपालो की दीवानी हो रही थी सुनील गावस्कर के मन में बैचेनी थी। भारत और पाकिस्तान के बीच चल रही पांच टेस्ट मैचो की सीरीज के साथ ही दुनिया  गाावस्कर और टेस्ट क्रिकेट दोनो को अलविदा कर देना चाहती थी।

डालियों के सूखे पत्ते तेज हवा के साथ हिलते हुए गिरने के इंतजार में थे। गावस्कर को गिराया जा रहा था। मजबूत पकड़ को ढीला किया जा रहा था। उसकी जिंदगी में जो चमक थी वो अब किताबो का हिस्सा थी। सब कुछ भुलाया जा चुका था। गावस्कर की नियति तय की जा चुकी थी। पाकिस्तान के विरूद्ध अतिम और पांचवे टेस्ट मैच से पहले होटल के कमरे की दीवारे फलेशब्लैक चला रही थी। प्रशंसको का शोर यादो में ही था परन्तु सुनील के चेहरे पर मुस्कान के लिए काफी था। कपिल देव और अजहरूददीन की युवा पौध के पीछे भागती भीड़ ने सुनील का बिलकुल अकेला कर दिया गया। उसे जाना ही था। वेा तय नहीं करता तो दुनिया द्वारा विदाई तय कर दी जाती। पांच टेस्ट मैचो की सीरीज के पहले चार टेस्ट ड्रा हो गये। वनडे की आंधी में दुनिया टेस्ट मैच को भी खत्म कर देना चाहती थी। गावस्कर और टेस्ट मैच दोनो निशाने पर थे।

पांचवा टेस्ट 13 मार्च 1987 को बेगलुरू में शुरू हुआ। पाकिस्तान ने टाॅस जीतकर पहले बल्लेबाजी का फैसला किया। भारतीय टीम बीच मैदान में जा रही थी। गावस्कर अंतिम बार टेस्ट खेलने मैदान में उतर रहा था। कप्तान कपिलदेव के लिए पूरा स्टेडियम गुंजायमान था। गावस्कर के लिए अब वो दीवानापन नहीं था। सबसे पीछे चलते हुए उसकी नजरे साथी खिलाडि़यो के पैरो की तरफ थी। सूखी घास जूतो से दब जाने के बाद वापिस खड़ी नहीं हो रही थी जबकि ताजी घास वापिस पूर्ववत स्थिति में आ रही थी। गावस्कर स्वयं महसूस कर रहा था कि अब उसकी सारी चमक युवाओ द्वारा रौदी जा चुकी है। उसे विदा होना ही था। पाकिस्तान की टीम जन्दी ही भारत के युवा फिरकी गेंदबाज मनिनंदरसिंह के जाल में फंस गया और पहली पारी मात्रा 116 रन पर सिमटी गयी।

‘ यह तो बिका हुआ है ’ मेरे पीछे बैठे एक दर्शक ने बावस्कर को मैदान मे आते देखकर कहा। ‘ लास्ट मैच है मोटा माल लिया होगा।’ दूसरे ने भी वही राग अलापा । मैने घ्यान नहीं दिया । मैच देखने में मशगूल हो गया। भारत की पारी शुरू हो चुकी थी। तनाव और दबाव गावस्कर पर साफ नजर आ रहा था। जल्दी ही जोरदार अपील । ‘नाॅट आउट’ अंपायर ने सिर हिलाया।
‘ बीवी इंतजार कर रही है। रोहन का लंच बाॅक्स ले जाना है। जल्दी कर। ’ किसी दर्शक ने फब्तियां कसते हुए आवाज लगायी। कुछ ही देर में श्रीकांत आउट। बावस्कर मैदान पर डटा था। दर्शको की फब्तियां कम हो गयी थी। लेकिन दर्शको कोई उम्मीद नहीं थी। जल्दी ही एक बार फिर जोरदार अपील। और ........आउट! गावस्कर आउट मात्रा 21 रन पर । संभवत अंतिम पारी। दस्ताने खोलते हुए संुनील गावस्कर पैवेलियन लौट रहे थे। लग रहा था सब कुछ खत्म । बाावस्कर की चमक इतिहास की बात चुकी थी।  कुछ दर्शक शेम शेम की हूटिंग कर रहे थे। गावस्कर पवेलयिन लौट चुके थे। बिना किसी से बात किये मैच देख रहे थे।

सब ने मान लिया था कि अब क्रिकेट में गावस्कर के लिए कुछ नहीं बचा था परन्तु टेस्ट मैच का रोमांच फिर उभर कर आया था। दूसरी पारी में पाकिस्तान ने रमीजा राजा और सलीम युसुफ की मदद से 249 रन बना लिये। भारत को ढाई दिन में जीतने के लिए 121 रन बनाने थे। बावस्कर और श्रीकांत फिर बल्लेबाजी के लिए उतर रहे थे। बाावस्कर अपने जीवन की अंतिम टेस्ट पारी खेलने जा रहे थे जब हर किसी ने उनको खारिज कर दिया था। पत्नि मार्शनील उनके सुनहरे युग की साक्षी थी। बेटे रोहन ने पापा के स्वर्णिम काल का सुना ही था। गावस्कर को दुनिया ने भले ही खारिज कर दिया परन्तु परिवार ने खारिज नहीं किया था। बेटे और पत्नि का विश्वास जीतना था। गावस्कर जानता था कि वो अंतिम पारी में चल नहीं पाया तो दुनिया भले ही उसे धिक्कारे लेकिन परिवार उसका हमेंशा साथ देगा। अपने बेटे और पत्नि की आंखो में गावस्कर अपने बल्ले से चमक लाना चाहता था।

सूखे पत्ते अंतिम बार डाली पर लहलहा रहे थे। हवा की रफतार तेज हो चुकी थी। स्टेडियम में आये एक हवा के झौके से गावस्कर को महसूस हुआ होगा कि सब कुछ अब हवा में उड़ गया। भारत के सामने दो ही चुन्नौति 121 रन बनाये या ढाई दिन बिताये। भारत की पारी शुरू हुई। शुरूआत में ही गावस्कर के बल्ले के नजदीक से गेंद गयी। जोरदार अपील..........! आउट...दै......ट!
‘ नाॅट आउट ’ अंपायर ने सिर हिलाया।
‘ ओह! बच गया! भारत को  इस पूरानी मशीन से निजात मिल जाती। - मेरे पीछे बेठे दर्शक ने कहा। क्रिकेट प्रेमियो के मन में गावस्कर खटकने लगा था। फटाफट क्रिकेट में इस धीमे अंदाज के बल्लेबाज को क्रिकेट प्रेमी क्रिकेट का दुश्मन मानने लगे थे। बहराल मैच जारी था। हर दो गेंद बाद जोरदार अपील। जल्दी ही भारत के दो विकेट गिर गये। भारत का स्कोर था। 15 रन पर दो विकेट। दूसर छोर पर सुनील गावस्कर ने मौर्चा संभाल लिया था। गावस्कर ने पाकिस्तान गेंदबाजो के आगे दीवार बन कर खड़ा हो गया। दूसरी और भारत का हर बल्लेबाज हाथो हाथ लौट रहा था। क्रीज पर अधिकांश समय गावस्कर व्यतीत कर रहा था। अब सूखो पत्तो में जान आ गयी थी। सूरज के आगे बदली आने से मैदान में ठंडक हो गयी थी।  तीसरे दिन का खेल खत्म होने पर भारत का स्कोर 4 विकेट पर 99 रन था। बावस्कर 51 रन पर नाॅट आउट।
अगला दिन विश्राम का था। गावस्कर पर फब्तियां कसने वाले अब उसकी लंबी पारी की दुआ करने लगे। युवाओ ने अपने हाॅस्टलो के कमरो में कपिलदेव और अजहरूददीन के स्थान पर गावस्कर के पोस्टर चिपका लिये थे। लोगो के लिए विश्राम का दिन काटना लंबा हो गया। भारत को अभी भी 122 रन बनाने थे और दो दिन बाकि थे।
विश्रााम के बाद 17 मार्व 1987 को चैथे दिन का खेल शुरू हुआ । युवा अजहर ने बावस्कर का खूब साथ दिया। बाावस्कर ने पारी को संभाले रखा। पाकिस्तान के सितारा गेंदबाज ईकबाल कासिम ने हर प्रकार की गेंद फेंक कर देख ली परन्तु गावस्कर को नहीं डिगा सके। 123 रन पर अजहरूददन भी आउट। स्कोर 5 विकेट पर 123 रन। दिन ढल रहा था। सारी उम्मीदे बावस्कर पर टिकी। ट्रांजिस्टर पर आंखो देखा हाल सुन रहे लाखो लोग गावस्कर को उम्मीद की पतवार मान चुके थे। उत्साही युवा गावस्कर के फोटो की पूजा करने लगे । रवि शास्त्राी के साथ मिलकर बावस्कर ने पारी को फिर आगे बढ़ाया। गावस्कर द्वारा खेली गयी हर गेंद भारत की उम्मीद बढ़ा रही थी। पूराने पत्तो में जान आ चुकी थी। स्टेडियम में चल रही ठंडी बयार बीत रहे मौसम का अहसास करा रही थी। सुनील गावस्कर क्र्रीज पर रवि शास्त्राी को मौके पर कम दे रहे थे। पाकिस्तान के गेंदबाज बावस्कर पर बेअसर थे।

जल्दी रवि शास्त्राी भी पाकिस्तानी फिरकी में उलझ गये और आउट हो कर पवेलियन चलते बने । स्कोर 6 विकेट पर 155 रन । अब युवा हदय सम्राट कपिल देव मैदान में उतरे । स्टेडियम में गड़गड़ाहट से गुंजायमान हो गया था। वनडे विश्वकप जीतने के बाद लोगो के हदय में गावस्कर का स्थान कपिल देव ने ले लिया था। कपिल देव की चमक में गावस्कर की चमक धुंधला गयी थी। स्टेडियम में तालियो की गड़गड़ाहट इसका गवाह थी। ऐसा लग रहा था कि मैदान में भी कपिल की चमक के आगे गावस्कर की चमक धुंधला जायेगी। कपिल देव ने जोरदार बल्ला घुमाया । गेंद बल्ले और पैड के बीच में से निकलते हुए सीधे विकेटो में जा गिरी और कपिल देव आउट .........। स्टेडियम में पूरी तरह शांति। भारत का स्कोर 7 विकेट के नुकसान पर 161 रन।

अब गावस्कर और टेस्ट मैच दोनो ही पूरी तरह उबर चूके थे। दोनो ने ही पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। लोग दफतरो में अपना काम छोड़कर ट्रांजिस्टर पर इस संघर्षपूर्ण टेस्ट मैच का आंखो देखा हाल सुनने लगे। गावस्कर एक एक गेंद से लड़ रहे थे। बल्ले और गेंद का कठोरतम संघर्ष था। शिवलाल यादव से पुछल्ले बल्लेबाज के साथ भी गावस्कर भारत के लिए लड़ रहे थे। जिंदगी उनका जादू खींच कर वापिस बंगलौर के रामास्वामी स्टेडियम में ले आयी थी।  जिंदगी जीत रही थी। पूरे देश का ध्यान सुनील गावस्कर पर केन्द्रित हो गया। एक एक गेंद गावस्कर के बल्ले से टकराकर खिलाडि़यो के पास चली जाती। पाकिस्तानी अपने माथे का पसीना पौछते हुए गावस्कर नाम की पहेली का हल खोज रहे थे। दिन बीत रहा था। उम्मीदे बढ़ रही थी। भारत का स्कोर 180 रन पहुंच गया था। गावस्कर 96 रनो पर खेल रहे थे । मंजिल सामने नजर आ रही थी। मुश्किल थी  परन्तु गावस्कर की मौजूदगी से ये आसान लगने लगी। पूरे मैच में इतने रन बनाने वाला एकमात्रा बल्लेबाज। बाावस्कर शतक के करीब। आंखो में खुशी। पर मैच जीतकर इसे बढ़ाना चाहते थे। लगभग डेढ दिन से बल्लेबाजी कर रहे थे गावस्कर। लोगो की उम्मीदे सातवें आसमान पर थी। इकबाल कासिम एक बार फिर बावस्कर को गेंद फेंक रहे थे। दर्शक शतक के लिए तालियां बजा रहे थे। कासिम ने गेंद फेंकी।................................आउट।..............................गावस्कर ..............आउट..........................। नजदीक फिल्डर रिजवान ने लगभग गिरते हुए गेंद को लपक लिया। भारत का स्कोर 8 विकेट पर 180 रन। भारत की उम्मीदे खत्म। बाावस्कर 96 रन बनाकर पवेलियन लौट रहे थे। पूरे स्ेटेडियम में दर्शक, साथी खिलाड़ी, पाकिस्तानी खिलाड़ी खड़े होकर इस महान खिलाड़ी का अभिवादन कर रहे थे। भारत मैच हार गया लेकिन गावस्कर जीत गया। सांय सायं करती हवाओ के बीच कुछ सूखे पत्ते उड़ते हुए हमारी दीर्घा में आकर गिरे । मैने उठा लिये।
पीले पड़े पत्तो में बीच हरे रंग पर मेरी नजरे टिक गयी। तालियों की गड़गड़ाहट से मेरा ध्यान भंग हुआ। बावस्कर बीच मैदान में मैन आफ द मैच का पुरस्कार ग्रहण कर रहे थे।



Tuesday, September 6, 2011

सोनि‍या




ट्रेन अपनी तेज रफतार के साथ दौड़ रही थी। ठंडी हवा के झौंके गर्म हवा मे बदल रहे थे। उड़ रही धूल यह अहसास करा रही थी कि‍ ट्रेन उतरांखड के ठंडे मौसम से मरूस्‍थली राजस्‍थान में प्रवेश कर रही ही है। खि‍ड़की पर अपनी गर्दन टि‍का कर आशीष बैठा था। उसने अपना ऐनक उतारा और उसके कांच साफ कि‍ये और वापि‍स पहन लि‍या। ऐनक लगाये हुए उसके चेहरे में कि‍सी इन्‍टेलैक्‍चुअल व्‍यक्‍ति‍त्‍व की झलक दि‍खाई दे रही थी। टी शर्ट और पेंट पर जमी रेत का हाथो से साफ कर वापि‍स खि‍डकी से सि‍र को सटाकर बैठ गया। आस पास के सहयात्रि‍यों में उसकी रूचि‍ प्रतीत नहीं हो रही थी। धड़ाम धड़ाम ट्रेन की आवाज उसे अतीत की यादो में खींच रही थी। उडती हुई रेत सहयात्रि‍यों के लि‍ए परेशानी का कारण हो सकती थी। उसे तो इस रेत की छुअन अपने गांव का अहसास करा रही थी। रेत के सुनहरे धोरो उसकी यादो में लहरा रहे थे। गांव के इन्‍ही धोरो पर शाम को स्‍कूल की छुटटी होने के बाद सोनि‍या लेट जाती थी। स्‍कूल की यूनि‍फॉर्म पहने हुए। बैग को एक कि‍नारे पटक कर। ढलते सूरज के साथ अपनी गरमाहट कम करते हुए धोरे अपनी ठंडी होती रेत की छुअन से पन्‍द्रह साल की सोनि‍या को धीमी आंच में परि‍पक्‍वता को पका रहे थे। एकदम शांत । आस पास कोई नहीं । तेज हवा का झोंका उसके पूरे बदन पर रेत बि‍खेर देता। उसके शरीर में कोई हलचल नहीं होती । वो शायद अपने जीवन के मायने तलाशती। नि‍ढाल पडी । अपने जीवन को पढती। रेत से सने हुए बाल और चेहरा । उसे कोई फर्क नहीं पड़ता।

      एक दि‍न शाम ऐसे ही धोरो पर लेटी हुई थी। कि‍सी ने आवाज दी सोनि‍या............।  तेरा भाई भगत मंदि‍र के पास गि‍र गया। रो रहा है। आवाज के साथ ही सोनि‍या उठ खडी हुई। एक हाथ में बैग उठाकर धोरो पर फर्लांगे मारते हुए दौड पडी। धोरो पर शायद इतना तेज उंट भी नहीं चल पाये। धोरो में धंसते पैरो को तेजी नि‍कालते हुए उसने दौडने की रफतार बनाये रखी। मंदि‍र के पास अपने भाई को रोते हुए देखते ही अपना बैग एक और फेंक कर भगत के सामने बैठकर पूछा- कि‍सने गि‍राया । भगत बता कि‍सने गि‍राया अपनी आंखो को मलते हुए भगत ने वहां खड़ी एक लड़के की ओर ईशारा कर दि‍या । फि‍र क्‍या था। सोनि‍या ने अपनी चप्‍पल उतारी और लडके को चटाक चटाक धुनाई कर दी। मरूस्‍थल में आये धतूलि‍ये (एक जगह रेत का तेज हवा के साथ उडना) की तरह सोनि‍या उस लडके पर टूट पडी। वहां खड़े कुछ लोगो ने दौडकर बीच बचाव कि‍या। लेकि‍न सोनि‍या की आंखे एकदम लाल। हाथ में चप्‍पल लि‍ये । जैसे आज वो सबसे लड़ लेगी। भगत भी डर गया। दौडकर अपनी बहि‍न के लि‍पट गया। ऐसी ही थी । सोनि‍या अपने भाई के लि‍ए मर मि‍टने को तैयार।
गांव में आशीष के घर से थोडी दूर पर ही रहती थी सोनि‍या। दुनि‍या में कोई नहीं । भाई के सि‍वा। गांव में अपने मामा और मामी  के साथ रहती थी। मामा मामी के कोई औलाद नहीं थी। पर जैसा कहानियों में होता है। दोनो भाई बहि‍न को मामा से स्‍नेह ज्‍यादा मि‍लता था। ट्रेन की धड़ धड़ की आवाज आशीष के मन को लपेट कर ठेठ गांव में ले गई।
आसू तुं फि‍र आ गया । सोनि‍या ने धोरे  पर लेटे हुए कहा। सोनि‍या को अक्‍सर धोरो पर अकेला लेटा देख कर आशीष भी वहां पहुंच जाया करता था।
मैं देखने आया हू। तुम यहां लेटे हुए क्‍या सोचती हो।
      देखकर पता लगा लेगा।
      लगा लि‍या है।
      तो बता।
      तुम अपने मां बाउजी से बात करती हो। आशीष की इस बात को सूनते ही सोनि‍या उठकर बैठ गई। चेहरे पर आ गये बालो को हाथो से पीछे कर गर्दन घूमा कर आशीष की ओर देखा। फि‍र नजरे धोरो पर टि‍का दी। आंखो में आंसूओ की परत चमक रही थी। आंसूओ को आंखो से बाहर नहीं आने देने की जुगत करते हुए उसने कहा आसू । याद करके दुख होता है। इसलि‍ए कभी याद नहीं करती । बस । सोचती हू। भगत को डाक्‍टर बनाना । कैसे बनाना है।
अभी बहुत वक्‍त है। अभी वह बहुत छोटा है।
आसू । वक्‍त मेंरे पास कम है।
अच्‍छा। बता। भगत को डाक्‍टर बना देगी। पर तुं क्‍या बनेगी। वि‍श्‍व सुंदरी। धूल से सनी हुई। बि‍खरे बालो वाली वि‍श्‍व सुंदरी। यह कहते हुए  आशीष वहां से उठ कर भागा।
  ठहर । अभी बताती हू। कहते हुए धोरो पर फर्लागे मारती हुए सोनि‍या हंसते हुए उसके पीछे दौड पडी।
बाबूजी । चाय । चाय वाले ने जोर से आशीष के नजदीक आकर कहा। यादो की श्रंखला टूट गई। शायद कोई स्‍टेशन आया होगा। अब गांव ज्यादा दूर नहीं है। दो चार घंटे में ट्रेन गांव के स्‍टेशन पहुंच जायेगी। चाय की चुस्‍कि‍यो के साथ आशीष के दि‍माग में फि‍र से सोनि‍या दौड़ने लगी। मानो सोनि‍या के पैर रेत के धोरो मेंनहीं धंस रहे हो, उसके दि‍माग में धंस कर यादो को ताजा कर रहे हो। हमेंशा स्‍कूल की यूनि‍फार्म में इधर उधर दौड़ती रहती। आवाज इतनी तेज की ऐसा लगता गांव में केवल एक सोनि‍या ही है। आशीष ने कॉलेज और आगे की पढाई के लि‍ए गांव छोड़ा तो सोनि‍या अपने पढाई छोड भगत का पढाने के लि‍ए जी जान से जूट गई। अपनी मामी से झगडते हुए वह देख सकता था । जब भी आशीष बीच बचाव की बात करता सोनि‍या कह देती । आसू । मेरे और भगत के मामले में कुछ मत बोलना। आशीष शहर आकर कब आसू से आशीष बन गया । उसे अहसास ही नहीं हुआ। नौकरी लगने के बाद पहली बार गांव आया तो दौड़कर धोरो पर गया। यहीं लेटी होगी सोनि‍या हमेंशा की तरह। परन्‍तु वहां कोई और बैठी थी। स्‍कूल की यूनि‍फार्म भी नहीं थी। आशीष पहचान नहीं पाया। नजदीक गया।
कौन हो तुम।
वि‍श्‍व सुंदरी।
हो हो सोनि‍या। बहुत बदल गई। वाकई वि‍श्‍व सुंदरी लग रही हो।
मजाक  कर रहे हो।
गूंथे हुए बाल। रंग बि‍रंगी घाघरा कुर्ता पहने हुए। हाथ में एक ति‍नका लि‍ये हुए। जि‍से अपने दांतो से कुतर रही थी। आशीष नजदीक गया और हाथ से ति‍नका छि‍न कर नीचे फेकते हुए कहा मैं तो मात खा गया। तुमने मुझे पहचान लि‍या। तुम्‍हे पता है । शहर में मेरी नौकरी लग गई है। मां बाउजी को लेन आया हू। खूशी के साथ सोनि‍या को एक साथ सब बता दि‍या। सोनि‍या अपने हाथो से घाधरे को पकड कर धोरे पर बैठते हुए कहा बस । बता दि‍या। और कुछ।
सोचता हू। तुम्‍हे भी ले जाउं।
क्‍यों?’
ब्‍याह करके।
मैं ब्‍याह नहीं करूंगी। खासकर तुमसे।
क्‍यों । मैं बुरा हू।
मैं भगत के डाक्‍टर बनने तक ब्‍याह नहीं करूंगी और तब तक तुम्‍हे इंतजार नहीं करना चाहि‍ए। यहां आते ही आशीष नि‍राश हो गया। कुछ नहीं कह पाया। घर जाकर रवानगी की तैयारी में जुट गया। मां बाउजी के साथ सारा सामान भी ले जाना था। शहर में सरकारी क्‍वाटर जो मि‍ल गया था। दो दि‍न में सारी तैयारी कर ली। रवानगी का वक्‍त भी आ गया। सारा सामान तांगे में रख लि‍या था। अचानक दौडकर सोनि‍या के घर गया। सोचा सोनि‍या के मामा- मामी से बात कर लूं। घर की चौखट पर पहुंचा ही था, अंदर से आ रही आवाजे उसके कानो से टकराने लगी।
मै कुछ नहीं समझती। मेरे बाउजी जो 2लाख रूपये छोड गये है मुझे चाहि‍ए।
ऐ छोरी । बडी आई हि‍साब करने वाली । तेरे को रोटि‍यां खि‍लाने में खर्चा नहीं लगा।
मैं उसकी एक एक पाई चुका दुगी। परन्‍तु इन पैसो पर मेरे भाई का हक है। बडी मुश्‍कि‍ल से उसका डाक्‍टरी में दाखि‍ला हुआ है। मै यह पैसे लेकर छोडूगी। उसकी फीस इसी पैसे से जमा होगी।
मै भी देखती हुं। कैसे लेती है तु पैसे।
इस क्‍लेश को सुनकर आशीष तय नहीं कर पा रहा था। अंदर जाये या नहीं । इतने में उसे बाउजी ने आवाज लगा दी। ट्रेन का वक्‍त हो रहा था। वह लौट गया। गांव में उसकी यह आखि‍र शाम थी। उसके बाद वो गांव नहीं गया। नहीं कोई खबर ली। शहर में अपने कामो में व्‍यस्‍त हो गया।
      ट्रेन के रूकते ही एक बार फि‍र यादो का सि‍लसि‍ला थम गया। शायद गांव नजदीक था। हां । अगला स्‍टोपेज आशीष का गांव ही था। आशीष ने अपना सामान नीचे उतारा। सामान क्‍या। एक सूटकेस था। उठाकर वह दरवाजे के नजदीक खडा हो गया। ट्रेन चल पडी । अब दस-पन्‍द्रह मि‍नट का सफर था। दरवाजे के बाहर ट्रेन के गति‍ पकडने के साथ ही आशीष के आंखो के सामने झाडि‍या और रेत के धोरे सब दौड़ रहे थे। धड़ धड़ की आवाज फि‍र उसे यादो में खींच रही थी। पूरे चार साल के बाद सोनिया से मि‍लने जा रहा है। भगत डॉक्‍टर बन गया होगा। मामी ने जरूर सोनि‍या की शादी कर दी होगी। वो तो चाहती थी कि‍ सोनि‍या से उसका पीछा जल्‍दी छूटे। देखे । गांव में जाकर क्‍या हुआ । आशीष अपने ही मन से कहता है। मैंने नहीं की तो। उसने भी शादी नहीं की होगी। गांव के कुंए पर पानी भरती हुई। धोरो पर धीमे धीमे चलती हुई। सोनि‍या। उसे मालूम ही नहीं था कि‍ वो खूबसूरत है। उसने तो अपने भाई के लि‍ए अपने आप को तपाया। आशीष के दि‍माग में चि‍त्र ईधर उधर दौड़ रहे थे। रेउसर ..... रेउसर .........। आवाजो से आशीष का ध्‍यान टूटा। ट्रेन रूकी हुई थी। उसका गांव आ गया ।
      सूटकेस लेकर प्‍लेटफार्म पर पैर रखते ही ट्रेन आगे रवाना होगई। आशीष ने सूटकेस नीचे रखकर आसमान की ओर देखा और अपने दोनो हाथ फैला दि‍ये । अपने गांव की आबो हवा। शरीर से टकरा कर मानो दुलार करना चाह रही हो। एक उर्जा भर देती है अपने गांव की हवा। अब आशीष के पैरो में बचपन वाली तेजी नहीं थी। चाल में मैच्‍योरि‍टी आ गई थी। स्‍टेशन से बाहर आकर सोचा। धोरो की ओर से नि‍कल लूं। सोनि‍या गांव में ही है तो वहीं मि‍ल जायेगी। सूटकेस हाथ में लि‍ये हुए धोरो पर चल पड़ा । कोई नहीं बि‍लकुल सुनसान। रेत में धंसते हुए पैरो को कि‍सी तरह बाहर नि‍काल कर चलता हुआ। तेज हवा के साथ धोरो से रेत की चादर उड़ कर आशीष के आंखो के आगे छा गई। हाथो को हि‍ला कर आंखो के आगे से रेत को हटाया। फि‍र भी कोई दि‍खाई नहीं दि‍या। तेज हवा के साथ एक लय में उड़ती हुई रेत में संगीत सी झनझनहाट उसे महसूस नहीं हो रही थी। हर एक झौंका सूनेपन का अहसास दे रहा था। वो यहां नहीं है। मन कुछ ठीक नहीं है। अच्‍छा नहीं लग रहा है। मन में दुवि‍धा है। वह यहां क्‍यो आया है। सोनि‍या से मि‍लने । शादी करने । हालचाल जानने। कुछ पता नहीं । सूटकेस को नीचे रखा। दोनो हाथो की अंगुलि‍यो बालो में डालकर आगे से पीछे ले गया। रूमाल नि‍काल कर अपना ऐनक साफ कि‍या। फि‍र चल पड़ा। अपने मकान को संभालने की बजाय पहले सोनि‍या के घर की ओर गया। मामा जी बाहर ही खड़े थे।
पायं लागू।
अरे । आसू तुम। खुश रहो । चलो चलो अंदर चलो। मामाजी के शब्‍दो में उत्‍साह नहीं था। वह उनके पीछे हो लि‍या। ड्रांईग में जाकर बैठ गया। मामीजी चाय पानी रखकर चली गई। दोनो कुछ देर खामोश बैठे रहे ।
कैसे हो। मां बाउजी कैसे है। मामाजी ने बात शुरू की।
ठीक है। परन्‍तु आप बताओ सोनि‍या दि‍खाई नहीं दे रही है।
खामोशी। मामा ने सांस अंदर खींची और एक साथ छोड़ दी। सोनि‍या के नाम से ही आंखे गलगली हो गई। लगो  उनके पूरे शरीर में सि‍हरन दौड़ गई। दोनो हथेलि‍यो को कंधो पर फेरते हुए  नजरे दरवाजे पर टि‍का कर कहा आसू। तुम्‍हारे जाने के बाद भगत चंडीगढ में डाक्‍टरी की पढाई करने लगा। सोनि‍या मजदूरी भी करने लगी थी। जि‍दगी चल रही थी। मामी के साथ खटपट रहती थी। पर जिदगी रूकी नहीं चलती रही। अभी हाल ही में भगत डॉक्‍टरी पूरी करके गांव में आने वाला ही था। बहुत तैयारी कर रही थी। भाई के स्‍वागत की । दुलार की। कि‍सी ने आवाज लगाई । भगत आ गया है। दौड़ते हुए बाहर की ओर गई। थोड़ी दूर ही चल पाई थी कि‍..........। मामा का गला रूंघ गया । आवाज भर्राने लगी। आशीष मामा के पास जाकर बैठगया। कंधे पर हाथ रखकर कहा बताओ मामाजी क्‍या हुआ ।
आसू। बस सोनि‍या वही गि‍र पड़ी। मुंह से खून आने लगा। भगत दौड़ कर आये। गांव के अस्‍पताल ले गया। उसने एक बार आंखे खोली । भगत को देखा। फि‍र उसने आंख नहीं खोली। भगत की गोद में ही दम तोड़ दि‍या। डाक्‍टरो ने बताया उसे कैंसर था।
आशीष बि‍लकुल सुन्‍न हो गया। जैसे रेत के धोरो पर सन्‍नाटा पसरा हो। बूत की तरह बैठा था।


Saturday, August 20, 2011

अभय


जेठ की तपती दुपहरी ढलान की ओर थी। कैफेटेरिया के लान में भी तपती धूप की जगह छाया ने ले ली थी। लान के किनारे लगे पेड़ो की छाया के नीचे बनी कुर्सी पर दोनो चुपचाप बैठे थे। कभी हवा के झोंके से पेड़ो की पतितयों की सरसराट खामोशी तोड़ रही थी। कैफेटेरिया में भी ग्राहको की आवक शुरू होने से युवाओ के पैरो की आवाजे लान तक पहुंच रही थी। उन दोनो को कोई भी आवाज या फुसफुसाट विचलित नहीं कर रही थी। अभय की आंखे बिना पलक झपकाये सामने लान में लगी झाडि़यों पर टिकी थी। उन झाडि़यों में ऐसा कुछ खास नहीं था कि कोई उसे एक टक देखे। एक हाथ बगल में और एक चेहरे पर निकली हल्की दाड़ी पर। माथे पर पड़ी सलवटे अभय के मन की सलवटे जाहिर कर रही थी।

' क्यो? अभय । फिर कुछ हुआ क्या ? ' पास बैठे सुनील ने उसकी तरफ गर्दन घुमाकर तिरछी नजर करते हुए खामोशी को तोड़ा। सुनील के प्रश्‍न पर अभय के अंगो में कुछ हरकत हुई। उसने अपनी चुभती दाड़ी से हाथ हटाकर दोनो हाथ मुटठी बंद कर बगल में रख लिये । अपने दोनो होठो को अंदर की तरफ दाबते हुए उसने आसमान की ओर नजरे की और फिर होठो को दाबमुक्त करते हुए कहा -' सुनील । आज जितना दु:ख मुझे हुआ , कभी नहीं हुआ।  नजरे वापिस ठीक सामने रखते हुए कहना जारी रखा - आज लगा मेरी दुनिया खत्म हो गई। मेरे जीवन का कोर्इ मतलब नहीं है। अब पता नहीं जीवन कैसे चलेगा। मुझे लगता है सब कुछ खत्म । सब कुछ ।
' नहीं अभय । ऐसा नहीं है। पहले मुझे बताओ । आखिर हुआ क्या ।
सुनील को जवाब देने के लिए अभय खड़ा हो गया। दोनो हाथ अपनी जींस पेंट के आगे वाली पाकेट में डालते हुए आंखे बंद कर फिर गर्दन उपर की ओर करते हुए गहरी सांस ली। ' सुनील । मुझे इतना दु:ख उस समय भी नहीं हुआ था। जब पापा ने मुझे घर से निकालते हुए अलग रहने का फरमान सुना दिया था। तुम्हे याद होगा । उस दिन मै तुम्हारे पास बैठकर कितना रोया था। मैं अपने पापा से दूर नहीं रहना चाहता था। बार बार मिन्नते करने के बाद भी पापा का दिल नहीं पिघला। मां ने भी नजरे फेर ली थी। फिर भी जीवन चलने लगा था। परन्तु आज तो .............। बस । मैं  टूट गया। सुनील अब और आगे हिम्मत नहीं है।

सुनील खड़ा होकर अभय के पास गया। पीछे से उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा -' मैं सब जानता हू। पर धीरज से बताओ । क्या हुआ।
अभय ने अपना एक हाथ सुनील के हाथ पर रख दिया मानो सुनील के हाथ से कोई उर्जा अभय के शरीर मे संचारित हो रही हो। अपने होठ अंदर कर फिर बाहर कर बोलना शुरू किया - सुनील। आज सुबह मैं काम पर निकल रहा था। अचानक सड़क पर देखा बहुत भीड़ थी। मैंने अपनी बाईक रोकी। लोग बात कर रहे थे किसी वृद्ध का एक्सीडेंट हो गया। मैं भीड़ चीरकर अंदर गया। स्कूटर किनारे गिरा हुआ था। मैं देखकर कांप उठा। पापा नीचे गिर हुए दर्द से कहरा रहे थे। उनके पैरो में चोट आई थी। कुछ लोग उन्हे उठाने की कोशि‍श कर रहे थे। मैं दोड़कर पापा के नजदीक गया। परन्तु पापा ने वहीं  खरी खोटी सुनानी शुरू कर दी।  अभय की आंखो में आ रहे पानी को वह आंखे चौड़ी करके रोकने की कोशि‍श कर रहा था। अपनी अंगुलियों को आंखे पर फेर कर साफ करते हुए उसने कहना जारी रखा - और तो और मैने उन्हे उठाना चाहा तो उन्होने हाथ लगाने मना कर दिया। फिर भी भीड़ ने मुझे धक्का देकर किनारे कर दिया। सुनील। मैं पापा को बहुत चाहता हूू। मैं पापा को बहुत चाहता हू।  अभय ने पूरी हथेली से चेहरे को पौछते हुए कहा।
' अब पापा कैसे है। कुछ पता चला।
' हां । मैंने भैया को फोन किया था। वो हास्पीटल पहुंच गये थे। अब ठीक है। एक पैर मे हल्का फैक्चर है।
' अभय। चिंता मत करो । मै शाम को हास्पीटल हो आउंगा।  सुनील ने अभय के सामने आकर उसके चेहरे को अपने हाथ से अपनी तरफ करते हुए आष्वासन दिया।

अभय सुनील के आष्वासन से संतुष्ट था। पर चेहरे पर अभी भी गंभीरता की छाया थी। दोनो हाथ जींस के आगे वाली पाकेटस में डालकर सुनील के दूसरी तरफ चहलकदमी करते हुए अभय की आंखो में पूराने मंजर उभर रहे थे - सुनील । तुम बचपन से मेरे साथ हो। तुम्हे याद है । मै कितना टैलेण्टेड था। मुझे इस बात का गर्व कभी नहीं रहा कि मैं टैलेण्टेड था बलिक इस बात का गर्व था कि इससे पापा मुझ से कितना खुश थे। तुम्हे याद है जब मैंने पांचवी कक्षा में स्कूल टाप किया था। मैं जैसे ही स्कूल से रिजल्ट लेकर बाहर आया । पापा ने मुझे गोद में उठा लिया। पापा की आंखो की खुशी ने मेरे अंदर जादुई तरंगे भर दी। मानो सारा संसार मुझ से खुश है। उसके बाद पापा का अपनी साईकिल के आगे बैठाकर घूमाने ले जाते थे। पापा की खुषी साईकिल की गति में झलकती थी। मुझे ऐसा लगता था कि ऐसा सुख भगवान कृष्ण को भी नहीं मिला होगा। बाजार से मन पसंद खिलौने दिलाते थे। बड़े भाई की नाकाम्याबी पर मां मुझसे नाराज होती थी । मैनें कभी बुरा नहीं माना। पापा के प्यार में सब कुछ सिमट गया। पापा की अंगुली पकड़ कर चलता था तो ऐसा लगता था कि मैं दुनिया का सबसे धनवान बच्चा हू। मेरे पैसे वाले दोस्तो के पापा की नई माडल की कारे मुझे मेरे पापा की अंगुली के आगे बहुत छोटी लगती थी। मुझे लगता था कि पापा की अंगुली पकड़ पर चलने में जो आनंद है वो मंहगी कारो की गददेदार सीटो पर भी नहीं है और आज भी मुझे ऐसा ही लगता है।

अभय के चेहरे के आगे अतीत लौटकर आ रहा था। पापा के साथ बिताये खुशी के पल याद आते ही उसके चेहरे और आंखो में खुशी झलक रही थी। उसने चेहरे पर हलकी मुस्कान के साथ कहना जारी रखा -  सुनील तुम्हे याद होगा। हायर सैकेण्डरी में जब पूरे जिले मेें अव्वल आया था तो मानो पापा हवा में उड़ने लगे। मानो झूम रहे थे। हर एक को गर्व से बता रहे थे कि मैरा बेटा पूरे जिले में अव्वल आया है। खुशी इतनी कि उन्हे कोई बड़ा खजाना मिल गया हो। लोगो की बधाई स्वीकार करते हुए उनका सीना गर्व से चौड़ा हो रहा था। कैसे उन्होने मेरी फोटो वाले अखबार को दीवार पर सजाकर रखा। पापा ने मुझे उस दिन साईकिल पर खूब घुमाया । जब तुम्हारे पापा ने कहा कि शर्मा जी आज आप अभय को साईकिल पर घूमा रहे हो एक दिन यह आपको हवाई जहाज मेे घूमाऐगा तो पापा की आंखे गर्व से दमकने लगी। सुनील । मेरे लिए पापा मेरी सबसे बड़ी पूंजी है। मुझे आज भी याद है जब मैं एमबीए के एग्जाम देने के लिए बाहर जाता था वो मेरे साथ चलते थे। कैसे मेरी एक एक चीज का ख्याल रखते थे। वो मुझ में एक उम्मीद देखते थे। जो वो नही कर पाये । वो मुझ में देखते थे। 

चेहरे के रंग अतीत की यादो के मंजर के साथ बदलते है। ऐसा ही अभय के साथ था। अब अभय के चेहरे पर फिर से गंभीरता हावी थी। अपनी हथेली से पूरे चहेरे पर हाथ फेरते हुए उसने कहना जारी रखा - सुनील । मुझे दुख है कि मै पापा की उम्मीदो पर खरा उतर नहीं पाया। परन्तु इसमे मेरी क्या गल्ती है ? एमबीए करने के बाद भी मुझे जाब नहीं मिला तो , मैं क्या कर सकता हू। सिविल सर्विसेज में टाप में रहने के बाद भी चयन नहीं हो पाया तो मेरी क्या कर सकता हू। मैंने हर जगह अपनी किस्मत आजमायी। र्इमानदारी से कोशि‍श की । उसके बावजूद थोड़े फासले से मंजिल दूर रह गर्इ तो मै क्या करूं। पेणिटग शौक तक सीमित थी। लेकिन हर तरफ नाकाम्याबी मिली तो मैने उसे व्यवसाय बनाया। उसके बावजूद वहां भी काम्याबी नहीं मिली  तो मेरा दोष क्या है।? भैया मेरे टेलैण्ट से काफी पीछे थे इसके बावजूद उन्हे बिजनेस में काम्याबी मिल गर्इ तो मैं भी बिजनेस करू । यह जरूरी तो नहीं । भैया की आय छ: अंको में है और मेरी चार अंको में तो यह मेरी किस्मत है। परन्तु मै अपने प्रति ईमानदार हूं । मैं जितनी मदद हो सकती थी। घर मेे करता था। लेकिन पापा ने मुझे घर से अलग होने का फरमान जारी कर दिया। अपनी पतिन और बच्चो को लेकर मैं घर ढुंढता रहा। सब कुछ बदल गया। मै पापा की उम्मीदो को पूरा नहीं कर पाया सुनील ।

सुनील ने अभय को ढांढस बंधाने उसके नजदीक गया और कहा --' देखो । अभय । तुम्हारे पापा आज भी तुम्हे उतना ही चाहते है। तुम्हे घर से अलग इसीलिए किया कि तुम एकाग्रता से प्रयास कर काम्याबी हासिल कर सको। इसमें भी तुम्हारा भला ही सोचा था।

' सुनील। जानता हू। पापा ने मेरे भले के लिए मुझ से अलग किया। लेकिन मेरे उपर तो नाकाम्याबी का ठप्पा लग चुका है। पापा को यह बात कितनी चुभती होगी। जिस बेटे पर उन्हे इतना गर्व था आज वो अपना पेट पालने लायक भी नहीं कमा पा रहा है। दुनिया भूल चूकी है कि अभय नाम का कोर्इ टैलेण्टेड लड़का था। तुम्हे राजा याद होगा। वहीं जिसने दसवी कक्षा पांच बार पढ़ी। आज वो एक बड़ा आर्ट डीलर है। दो दिल पहले एक कलाकारो का कार्यक्रम था। कार्यक्रम समापित के बाद मैने उसके पास जाकर हाथ मिलाने के लिए अपना हाथ आगे किया तो वह दूसरी तरफ निकल गया। मैं अपना हाथ मलता गया। वह उन लोगो की पेंटिग्स बड़े दामो में खरीद रहा था जिन्हे कभी अपना नाम ठीक ढंग से लिखना नहीं आया। मैं समझ नहीं पाया कि आज टेलेण्ट और कला नहीं काम्याबी देखी जाती है। यह मेरे पास नहीं है। शायद मैं दुनिया का सबसे नाकाम्याब इंसान हू। अब तो  मैने भी मान लिया है कि मै बिलकुल नाकाम्याब हू  और मुझे जीवन चलाने के लिए पूरी जिंदगी संघर्ष करना पड़ेगा। मै इसके लिए किसी को दोष नहीं दे सकता।

सुनील सुनते हुए भांप गया कि मामला गंभीरता पकड़ता जा रहा है। इस बहाव को रोका नहीं गया तो अभय के जीवन से यह बहुत कुछ बहा ले जायेगा। सुनील  अभय से कुछ कदमो की दूरी पर खड़ा था। सुनील ने वहीं खडे़ खड़े कहा - ' अभय। भाभी के बारे में तो सोचो । वो तुम्हे कितना सपोर्ट करती होगी। उसे ही उम्मीद मान लो। उसके लिए इस निराषा को छोड़ दो और आगे बढ़ो।
सुनील की इस बात ने अभय के चेहरे पर और चिंता बढ़ा दी । उसने नीचे गिरी हुई पेड़ की छोटी टहनी हाथ में उठाते हुए कहा - ' सुनील। तेरी भाभी से मुझे कोर्इ शि‍कायत नही है। वो भोली है। मेरे व मुन्ने का पूरा ख्याल रखती है। जितने पैसे मैं लाता हू उसमें एडजेस्ट कर लेती है। लेकिन कहीं न कहीं उसने भी मान लिया है कि मैं नाकाम्याब हू। मेरे बस में कुछ नहीं है। कुछ दिन पहले की ही बात है । मै घर पर आया तो देखा कि मेरी बनार्इ पेंटिग पर सब्जी बिखेर रखी थी। मेंरा बनाया एक स्केच एक कचरे के डिब्बे में पड़ा था। मैं उसे कुछ कह नहीं पाया। मैने भी मान लिया कि मै कुछ नहंी कर सकता। इसके लिए मैं तेरी भाभी को दोष नहीं दे सकता । जैसा सारी दुनिया मानती है उसने भी मान लिया कि मैं समय बर्बाद कर रहा हूं। मैं तो कभी मुन्ने को भी बताने की हिम्मत नहीं कर पाया कि मैं अव्वल छात्र था, अव्वल कि्रकेटर था और अव्वल चित्रकार था। मुझे नहीं लगता कि उसका बालमन भी इस बात को मानेगा। मुझे पापा की बात मानकर भैया के बिजनेस में काम कर लेना चाहिए। पापा गलत कैसे हो सकते है। पापा सही है। भैया के बिजनेस में कोई काम मिलेगा । मुझे करना चाहिए। मैं सब कुछ छोड़ दूंगा। पापा की बात मानूंगा।

अभय पूरी तरह से निराश और थका हुआ दिखाई दे रहा था। आत्मबल पूरी तरह निर्बलता के कगार पर था। सुनील ने धीरे धीरे कदमो को आगे बढ़ाया। वह समझ गया था कि सुनील को अब कुछ भी कहना उसके दर्द को और बढ़ाना होगा। उसने एक बार फिर उसके कंधो पर हाथ रखा और कहा - अभय। चलो पास के मैदान में चलते है। मैं जब भी उदास होता हू । वहीं जाता हूू। बच्चो को खेलते देख मन हल्का हो जाता है। चलो ।  अभय का हाथ पकड़ कर सुनील चलने लगा। अभय सुनील को मना नहीं कर सका। सड़क के उसपर हल्के हल्के कदमो से चलते हुए मैदान में आ गये। हरा भरा मैदान था। मैदान के एक कोने मे बच्चे खेल रहे थे। सुनील अभय के साथ बच्चो के नजदीक जा रहा था। बच्चो के कुछ नजदीक पहुंच कर वे घास पर बैठने ही वाले थे कि विकेटो के बीच में दो बच्चे बहस कर रहे थे। एक कह रहा था कि सचिन तुम बनना । मै तो अपने पापा जैसा बनूंगा। मेरे पापा बहुत अच्छे कि्रकेट खेलते थे। मेरे पापा तो क्रि‍केट और पढाई दोनो में अव्वल थे। मेंरे पापा बहुत अच्छे चित्रकार है। मेरे पापा की फोटो भी अखबार में छपती है। मैं सचिन नहीं मेरे पापा जैसा बनूंगा।  उसकी बाते सुनकर दोनो उस बच्चे के नजदीक गये। बच्चे ने जैसे ही गर्दन घूमार्इ ।  पापा! यह कहते हुए अभय से लिपट गया। यह तो मुन्ना ही था। अभय ने आंखे बंद कर ली। कुछ देर में आंखे खोलकर मुन्ने से पूछा- ' यह सब तुम्हे किसने बताया।   मुन्ने ने बहुत ही मासूमियत से कह दिया - मम्मी ने। आप घर पर नहीं होते हो तो मम्मी आपके बारे में बहुत अच्छी अच्छी बाते बताती है। अभय ने सुनील की ओर देखा। फिर आसमान की ओर ।  उम्मीद के आंसू उसकी आंखो की गीला कर रहे थे। ठंडी हवा के झोंके बारिश आने के संकेत दे रहे थे।

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Thursday, December 23, 2010

कहानी - मीण्‍डी बुआ

यही नाम था उसका मीण्‍डी बुआ । बहुत अजीब नाम है । परन्‍तु जब से मैने समझ पकड़ी मैं भी और की तरह उसे इसी नाम से जानता था। यह भी नहीं जानता था कि दादी की उम्र की औरत को क्‍यो सभी लोग बुआ कहते है। मैं हमेंशा उसके नाम के मायने तलाशता रहता । तेरी दादी लगती है क्‍या। अपनी पढ़ाई में ध्‍यान लगा । बेकार के प्रंपच में मत पड़। ये उत्‍तर मेरे प्रश्‍न को मारने की कोशिश भर से ज्‍यादा कुछ नहीं होते थे। पर मेरा प्रश्‍न मरता नहीं था। यह प्रश्‍न क्‍या कोई भी प्रश्‍न मेरे मन में खत्‍म नहीं होता था। उसे मेरे मन से आक्‍सीजन मिलती रहती । इसी आक्‍सीजन से मिली उर्जा मीण्‍डी बुआ के नाम के मायने तलाश करने में लगा देता। बहुत मुश्किल इस अजीब नाम के मायने ढुंढना। किसी को भी न तो मीण्‍डी बुआ के नाम के अनुसंधान में रूचि  थी न ही उसके जीवन में। पर मैं हमेंशा इस नाम के मायने खोजता रहता ।

      जब भी अकेला बैठता हू मीण्‍डी बुआ का करेक्‍टर विस्‍मृति में से बाहर निकल आता है। बचपन की मेरी जितनी यादे है उनके इस करेक्‍टर को भूल पाना मेरे लिए आसान नहीं है। मुझे मीण्‍डी बुआ से कोई लगाव नहीं था। मैं तो किसी ड्रामे के दर्शक की तरह उसे देखता मात्र था। जब भी मै जीसा की दुकान पर बैठता तो पैर सड़क पर रगड़ते हुए लाठी के सहारे चलते हुए मीण्‍डी बुआ दुकान तक आती। वह अपना हाथ फैलाती उससे पहले ही जीसा उसके हाथ में सुपारी का टुकड़ा रख देते। मैं उसे घूर कर देखता । बड़ी बड़ी आंखे जैसे कई हादसो को देखकर उसे न झपकने की आदत पड़ गई और हादसो को देखकर किसी बड़े दर्रे में तब्‍दील हो गई हो। चेहरे और हाथो की लटकी हुई सलवटो भरी चमड़ी बता रही थी कि वो कितना अनुभव इस झोले में समेटे हुए है। सुपारी को मुंह रखती और अपना मुंह चबाने लगती। बिना दांतो के चलता हुआ उसका मुंह ऐसा लगता जैसे वो कई गमो को सीधे निगल रही हो।  बड़ी बड़ी आंखो की पुतलियां मेरी और स्थिर भाव से घूमाती और फिर चप्‍पल को सड़क से रगड़ते हुए लाठी के सहारे आगे निकल जाती। मै अपने साथी बच्‍चो के साथ घर के आगे खुले चौक में खेलने लग जाता । घर के आगे बहुत बड़ा चौक था। शाम को बच्‍चो के शोरगुल से चौक आबाद रहता। बच्‍चो का शोरगुल उस चौक में एक उर्जा भरता था । बच्‍चो की चीं पों शाम को जंगल में पक्षीओ की चहचहाट सा अहसास देती थी। और जीसा की एक मात्र दुकान थी जो दुकान से ज्‍यादा बहस का मंच ज्‍यादा था। जीसा का भी नाम सार्वभौमिक जीसा था। उस व्‍यक्ति के लिए सब इसी आदरसूचक शब्‍द का प्रयोग करते थे। उनकी भूमिका भी हर मामले में बिलकुल तटस्‍थ थी। यह अपने आपको एक संत भर साबित करने की कोशिश लगती थी।

      उस दिन हमेंशा की तरह मैं अपने साथियो के साथ खेल रहा था। मैंने अपने आपको कपिलदेव मानते हुए गेंद फेंकी और जोगिया ने सचिनिया स्‍टाईल में  बल्‍ले को घूमा दिया । गेंद सीधे मीण्‍डी बुआ की लाठी से जा टकराई।‍ जिस सड़क को रोज अपने चप्‍पलो से रगड़ रही थी उसी पर गिर पड़ी। सचिन के शॉट को भी मैदान में इनकी उत्‍सुकता से नहीं देखा जाता होगा जितना जोगिया के शॉट को देखा गया। बिलकुल शांति । चारो तरफ पिन ड्राप साईलेंस। लाठी के गिरने की आवाज दूर दूर तक सुनाई दी। मैं सकपका गया। घबराहट से मेरी आंखो की पुतलिया जल्‍दी जल्‍दी चारो घूमने लगी। औरो की तरह मैं भी पास की गली जाकर छिप गया। जोगिया वहीं खड़ा रहा । कटी फटी हाफ पेंट पहने हुए जिसके बटन नहीं थे और एक रस्‍सी डालकर उसे कमर बांधा हुआ था और अनगिनत छेदो वाली बनियान जो केवल यह बताने के लिए थी कि उसे कुछ पहना हुआ है। घुंघराले बाल पूरी तरह से धूल से सने हुए। चेहरे पर कोई खौफ नहीं ।

      अरे छोरो । ये कोई मैदान है। कितनी बार कहा है मैदान में जाकर खेला करो। जीसा के इन शब्‍दो में बच्‍चो के लिए डांट कम और मीण्‍डी बुआ के लिए सांत्‍वना ज्‍यादा थी। उन्‍होने दौड़कर मीण्‍डी बुआ को उठाया। लाठी उठाकर दी। तब तक जोगिया गेंद लेने के लिए मीण्‍डी बुआ के नजदीक आ चुका ।
      कर्मजले। जा इस लकड़े से अपनी मां के पैरो पर मार । अपनी मां के घुटने तोड़। उसे तो सजा मिलनी चाहिए कि कैसे अपने पिल्‍ले को बाहर भटकने के लिए छोड़ दिया। कीड़े पड़ेगे तेरे और तेरी मां के पेट में । सड़ सड़ मरोगे। मीण्‍डी बुआ ने लाठी को सड़क पर बजाते हुए जोगिया पर गालियो की बौछार कर दी। परन्‍तु गालियो के बाण तो जोगिया के उपर से ही निकल रहे थे। वो तो मुस्‍कुरा हुआ गेंद ले उड़ा। क्‍यों मीण्‍डी बुआ को परेशान करता है जोगिया। चल भाग यहां से। मारूंगा एक । जीसा ने एक बार फिर शब्‍दो का संतुलन साधते हुए मीण्‍डी बुआ को रवाना किया। चाल वहीं पूरानी । जिम जाने वाले युवा भी ऐसी बॉडी को तरसते होगे। 80 बरस की उम्र की बुढि़या के गिरने के बाद भी उसकी बॉडी पर कोई फर्क नहीं । वो तो वैसे ही सड़क को सजा देती हुई आराम से निकल गई।


      फटे हाल 15 बरस के जोगिया के लिए संभवत: मीण्‍डी बुआ मनोरंजन का साधन थी। दिन भर नंगे पांव ईधर दौड़ता रहता था। स्‍‍कूल जैसी चीज का नाम तो उसके लिए तपते दौरो में पानी के सपने की तरह थी। उसके लिए यह पैसो वालो की चीज से बढ़कर कुछ नहीं था। मां मजदूरी करके इतना ही कमा पाती कि सुबह शाम के निवाले का जुगाड़ हो जाये। कभी कभी तो इसके भी लाले पड़ जाते । उसके लिए जोगिया का इतना ही दुलार था कि उसे मजदूरी नही करने देती । जब भी मौको मिलता जोगिया मीण्‍डी बुआ को छेड़कर अपना मन बहला लेता। मीण्‍डी बुआ की कर्कश आवाज मे गालियो को सुनने के लिए संभवत: सीने में कोई कवच होगा या फिर पिछले जन्‍म में कोई संत रहा होगा। मीण्‍डी बुआ की हर गाली उसके चेहरे पर मुस्‍कान लाती । उस दिन तो मैं अवाक रह गया। जोगिया अकेला मंदिर की चौकी पर बैठा किसी उदंडता की खोज में था। मीण्‍डी बुआ वहीं से पैरो को सड़क से लड़ाते हुए निकल रही थी। जोगिया ने आवाज दी- मीण्‍डी बुआ । आमलेट लाया हु। यहीं खायेगी या घर पहुंचा दु।
      जोगिया बेटा । आज मैं गोश्‍त खाउंगी। तेरी मां के टुकड़े टुकड़े कर के ला। हम दोनो बैठकर खायेंगे। आया आमलेट खिलाने वाला । मीण्‍डी बुआ की इन कर्कश शब्‍दबाणो की सरसराराट मेंरे भी दिल तक गई।किसी अनहोनी से मन फड़फड़ा उठा।  परन्‍तु जोगिया तो कोई संत का दिल लेकर पैदा हुआ होगा। इस पर भी मुस्‍कुराते हुए मीण्‍डी बुआ के पास आ गया। जीसा ने फिर बीच बचाव कर उसे भगाया। और कोई होता तो इस पर खून खराबा हो जाता। यह नहीं है कि जोगिया समझता नहीं है। 15बरस का किशोर ऐसे शब्‍दो का मतलब अच्‍छी तरह समझता है। ऐसी गालियो से तो संत का मन में भी क्रोध की ज्‍वाला भड़क जाये। पर जो‍गिया के मन पर नहीं । मीण्‍डी बुआ के मुंह से स्‍टेनगन की गोलियो की तरह निकली गालिया जोगिया को छु भी नहीं सकी और उसके स्‍वभाव रूपी कवच ने उसे दिल तक नहीं पहुंचने दिया।  मेरे लिए क्‍या । सबके लिए यह बच्‍चा अचरज हो सकता है।

      मेरे को याद नहीं है कि मैंने कभी मीण्‍डी बुआ को मुस्‍कुराते हुए देखा। जब भी किसी से बात करती रूखे शब्‍दो में । जोगिया से तो मानो उसका गालियो का ही रिश्‍ता था और जोगिया के पास शायद इन गालियो के लिए कवच था जो इनको दिल तक नहीं जाने देता था। जोगिया की मां को भी मैने कभी मीण्‍डी बुआ से उलझते हुए नहीं देखा। जीसा दुकान में  अपनी गददी पर बैठे बही मे हिसाब में खोये हुए थे। बही में आंखे गढ़ाए जीसा को डिस्‍टर्ब करने का साहस जुटा रहा था। सुनी दोपहर,सड़क पर कोई नहीं, इस सुनेपन ने मेरे अंदर साहस भर दिया। जीसा। मीण्‍डी बुआ यहां कब से रह ही है। मेरी बात सुन कर जीसा ने बही को नीचे रखा और पेन को ठीक बही के बीच मे। अपने चश्‍में को उतार कर आंखो को मला। फिर गर्दन को थोड़ा उंचाकर दुकान की छत की ओर नजर करते हुए कहा मीण्‍डी बुआ । इस मोहल्‍ले में आई सन 65 में । पाण्‍डे जी के साथ । पाण्‍डे जी हैड पोस्‍टमास्‍टर से रिटायर होकर आये थे। उनके कोई औलाद नहीं थी। आगे पीछे भी कोई नहीं था। यहां आने के कुछ ही साल में पाण्‍डे जी का देहांत हो गया। तब से मीण्‍डी बुआ उस कोने वाले घर में अकेली रहती है।
इसका खर्चा कैसे चलता है।
पाण्‍डे जी की पेंशन से। महीने की पहली तारीख को पोस्‍ट ओफिस पेंशन लेने जाती है।
रोज शाम को मीण्‍डी बुआ कहां जाती है।
मंदिर। भैरूजी के मंदिर । बहुत मानती है भैरूंजी को । और कहीं नहीं जाती है।
मेरे लिया इतना जानना काफी था। मेरी इससे ज्‍यादा उत्‍सुकता भी नहीं थी।
तुं इसके मुंह नहीं लगना। समझाने के लिहाज से मुझे बताते हुए चश्‍मा वापिस आंखो पर रखकर जीसा बही के हिसाब में जुट गये। मेरा मन कुछ प्रश्‍न गुंथ रहा था। प्रश्‍नो के उलझाव से कोई एक प्रश्‍न नहीं निकल कर  आ रहा था। मेंरी मंद पड़ी उत्‍सुकता पर जैसे मेरी मां आटे को जिस प्रकार मुक्‍को से गोंदती है वैसे ही मेरा मन मेरे उलझाव को मुक्‍को से गोंद रहा था। ये इतनी कर्कश क्‍यों है। कभी मन स्‍वयं उतर दे देता । संभवत: अकेलेपन के कारण होगी। मन यह तय नहीं कर पा रहा था कि मीण्‍डी बुआ को और खोजू या मूक दर्शक बना रहूं। इतनी देर में मेरी मां आटे को गुंथ लेती है परन्‍तु मेरे मन में प्रश्‍नो का उलझाव गीले बिना गुंथे आटे की तरह पसरा था। हथेली को पूरे चेहरा पर फेरा और दोनो हाथ बगलो में दबाकर बैठ गया। सड़क पर चप्‍पल रगड़ते हुए लाठी के सहारे चलकर आती हुई मीण्‍डी बुआ ने मन के उलझाव को एक बार रोक दिया। हमेंशा की तरह जीसा के पास आई और सुपारी को मुंह में रखा। बड़ी बड़ी आंखो की पुतलिया बीचो बीच आ गई । दोनो पुतलियां मेरे पर टिकी थी। अपने हाथ को सिर तक ले गई।
जोशी है क्‍या ।
हां। बोलो मीण्‍डी बुआ।
जोगिया दिखाई नहीं दिया कई दिनों से ।
बुआ । वो बीमार है। कई दिनों से बुखार में है।
मरेगा जल्‍दी। धरती का बोझ कम होगा। कमीने को जल्‍दी मौत आये तो अच्‍छा। यह कहते हुए मीण्‍डी बुआ लाठी के सहारे अपने रास्‍ते पर चल दी। रबड़ की चप्‍पल सड़क पर चटाक चटाक की आवाज कर रही थी। यह आवाज मेरे गाल पर तमाचे की तरह लग रही थी। कुर्सी के हत्‍थे को पूरी तरह अपनी मुटठी में मैंने भींच लिया। शब्‍द अंदर से निकल कर हलक तक आकर रह गये। दिल ने जोर से गुलाची खाई और मीण्‍डी बुआ के लिए मन में थोड़ी बहुत हमदर्दी बची तो वो भी इस गुलाची से खत्‍म हो गई। मीण्‍डी बुआ के लिए दिल में नफरत का दरिया बह निकला ।नफरत की पूरी शब्‍दावली मन में एक जगह आ टिकी । मीण्‍डी बुआ के लिए नफरत रूपी सवाल मेरे मन में पूरी तरह कौंधते रहे। झटके साथ कुर्सी को छोड़ दिया। कुर्सी दुकान  के दरवाजे से जा टकरायी। इसने सुनी दोपहर की खामोशी को कुछ देर के लिए तोड़ा।  मन के अंदर नफरत पर सीमेंट कर परत चढ़ाता हुआ घर की तरफ चल दिया।

       बारहवीं के इम्‍तहान सिर पर थे । देर रात तक छत पर बने कमरे में पढ़ता था। किताबे खोलकर बिस्‍तर पर लेटा था। मन अभी भी मीण्‍डी बुआ पर मंथन कर रहा था। मन स्‍वयं ही प्रश्‍न गढ रहा था और स्‍वयं ही उत्‍तर दे रहा था। शायद इसे ही सठियाना कहा जाता होगा। वास्‍तव में बुढिया सठिया गई है। एक बच्‍चे से बिना वजह दुश्‍मनी। बीमारी में मरने की दुआ करना। घोर पाप। मेरे मन में एक बार फिर धृणा का ज्‍वार उठा। पर इस धृणा पर अंतिम मुहर नही लग पा रही थी। माथे में विचार सड़क पर बेवजह दौड़ रही मोटर गाडि़यो की तरह दौड़ रह थे। एकदम से खड़ा हुआ बालकानी में आ गया। जोर की हवा चल रही थी। पास के नीम के पेड़ के जोर से हिलने से पत्तियो की सरसराहट रात के पहले पहर की खामोशी में उपस्थिति दर्ज करा रही थी। मैंने बालो में हाथ फेर कर माथे पर विचारो के ट्रेफिक को नियंत्रित करने का प्रयास किया । सब बेकार। उम्र के इस पड़ाव पर मीण्‍डी बुआ को सबके लिए अच्‍छा सोचना चाहिए। अपने स्‍वभाव के कारण ही ये अकेली सजा भोग रही है। सचमुच नफरत करनी चाहिए इस औरत से। किसी गरीब बच्‍चे की मौत की दुआ। कितना निर्दयी विचार। ओह। सोच कर भी घिन्‍न आती है। इस बुढि़या के बारे में । माथे विचारो के ट्रैफिक के मुकाबले सड़क पर बिलकुट सन्‍नाटा। जीसा अपनी दुकान बंद कर अभी गये ही है। हवा से सड़क पर उड़ रही धूल सर्राट की आवाज के साथ मानो मेरे मन में मीण्‍डी बुआ के लिए बची खुची श्रद्धा को खत्‍म कर  रही थी। ये क्‍या सड़क पर ये कौन है। मीण्‍डी बुआ लगती है। रात को कहां जा रही है। कहीं गिरेगी। कोई गाय बैल चोट लगा देगा। नफरत को रौंदते हुए ये विचार मेरे म‍न से मस्तिक तक गये। तुरंत दौड़कर नीचे गया। घर का मेन गेट धीरे से  बंद किया । कहीं कोई जाग न जाये। किसी को पता चल गया तो मेरी शामत नहीं । दौड़कर सीधा मीण्‍डी बुआ के पास गया।
कहां जा रही हो बुआ।
कौन। जोशी।
हां।
कहां जा रही हो ,मैं छोड़ देता हू।
जरूरत नही है।
नहीं । कहीं कोई गाय बैल गिरा देगा। यह कहते हुए मैने मीण्‍डी बुआ का हाथ पकड़ लिया। मना करने के बाद भी साथ हो लिया। उसने भी संभवत रात को देखते हुए प्रतिरोध नहीं किया। गली में घूमते ही मीण्‍डी बुआ रूक गई। यह तो जोगिया का घर था। घर क्‍या । गोबर से लेप किये हुए एक कच्‍चा कमरा था। लकड़ी का टुटा हुआ दरवाजा। पड़ोस में डाक्‍टर के घर से खींचा हुआ तार जिसकी मेहरबानी से कमरे मे रोशनी थी। मीण्‍डी बुआ के दरवाजा खटखटाने पर जोगिया की मां ने दरवाजा खोला। तु यही ठहर। कह कर मीण्‍डी बुआ कमरे के अंदर चली गई और दरवाजा बंद कर लिया। मन किसी अनहोनी से डरने लगा। कुछ बात हो गई तो घर में मेरी खैर नहीं । मै किस प्र‍पंच में पड़ गया । एक विचार खत्‍म होने से पहले दूसरा विचार जन्‍म ले रहा था। मन की उत्‍सुकता दरवाज के पास ले आई। टुटे दरवाजे मेसे कमरे के अंदर देखा जा सकता था।
      तुं मां है या बच्‍चे की दुश्‍मन।बच्‍चा बुखार से तप रहा है। तुं हाथ पर हाथ धरे बैठी है। मीण्‍डी बुआ के प्रश्‍न पर जोगिया की मां कई जगह से छेदो वाली साड़ी से मुह को छिपाते हुए जल्‍दी जल्‍दी सांस भरते हुए बोली- आज मजदूरी पर भी नहीं गई। एक निवाले के भी पैसे नहीं है। उपर वाले के ही भरोसे हू। अब तीन लोको का नाथ ही मेरे बेचे की रक्षा करेगा। अश्रुधारा आंखो से गालो पर नदी बनाते हुए निकल आई। मीण्‍डी बुआ ने जोगिया की मां के माथे पर हाथ रखा और फिर दूसरे हाथ की मुटटी खोली । ले ये कुछ पैसे है । कल दवा  और खाने के लिए कुछ ले आना। ये घासा मैंने बनाया है। इसे पानी के साथ इसे दे दे । अभी बुखार उतर जायेगा। कहते हुए मीण्‍डी बुआ जोगिया की तरफ घूम गई। टूटी हुई चारपाई पर लेटा। सांस के साथ पेट के उपर पसलिया बार बार उभर कर आ रही थी। लगा अभी पेट से निकल कर बाहर आ जायेगी। उसकी आखे खोलने तक ही शक्ति थी। उसने आंखे खोली। कुछ बोलने की स्थित में नहीं था। बुआ ने उसके सिर पर हाथ फेरा और कहा- जल्‍दी ठीक हो जा। मैं फिर गालिया किसे निकालूंगी। तु ही जो सुनता है और कौन सुनता है.......। कहते कहते उसने पल्‍लू मुंह में दाब लिया। पलक झपकने के साथ कुछ बुंद दर्रे जैसी गहरी और बड़ी आंखो में से निकल  कर जमीन पर गिर रही थी। मानो बरसो से कोई बर्फ पिघली हो। बिना बोले, पल्‍लु को मुंह मे दबाए। दरवाजे तक आ गई।
      मैं एकदम सन्‍न। शरीर में खून का बहाव एक तरफ हो चला। जैसे समुद्र की लहर सब कुछ बहा कर ले गई हो । मन से एक बड़ी लहर के साथ सब कुछ साफ हो गया। आंखो में पलको तक आई पानी की परत मीण्‍डी बुआ के आंसूओ के साथ कदम ताल करने को मचल रही थी। मैंने उसे बाहर आने से रोकने के लिए गम के उदवेग को गले तक रोक लिया। हलक में इस उदवेग ने दर्द पैदा कर दिया। आंखो को भींच कर पलको के साथ एकदम अंदर तक ले गया। आंसू बन कर बाहर आने को आतुर पानी को मैंने तितर बितर कर दिया।
      पता ही नहीं चला मैं कब मीण्‍डी बुआ का हाथ पकड़ कर उसको छोड़ने के लिए रवाना हो गया। मैं मीण्‍डी बुआ के नाम की तरह उसके स्‍वभाव को भी नहीं समझ पाया। जोगिया और मीण्‍डी बुआ के रिश्‍ते को भी नहीं समझ नहीं पाया। उस पत्‍थर हो चले बूढ़ शरीर के अंदर एक कोने में छिपी कोमलता अहसास करते हुए शरीर के अंग स्थित रह जाते है और दिल इस अहसास को अनुभव करता है।
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Sunday, October 3, 2010

बी.के. स्‍कूल की कचौरी

कुछ स्‍कूले खास होती है और उनकी पहचान भी खास होती है। दून स्‍कूल   और ऐसे कई स्‍कूल है जो अपनी खास पहचान रखते है। मै जिस स्‍कूल में पढ़ा उस स्‍कूल की भी खास पहचान है। दून स्‍कूल पढ़ाई के लिए जाना जाता होगा परन्‍तु मेंरा स्‍कूल कचौरियों के लिए जाना जाता है। मेरे शहर की कचौरियां वैसे ही बहुत प्रसिद्ध है परन्‍तु उसमें भी बी.के. स्‍कूल की कचौरी की विशेष महिमा है। जी हां । मेंरा स्‍कूल कचौरियों के लिए आज भी जाना जाता है। बीकानेर में किसी मेंहमान के लिए कचौरियों की मेहमानवाजी खास लोगो के लिए की जाती है । उसमें भी बी.के. स्‍कूल की कचौरी की मेहमानवाजी आपने कर दी तो मेहमान खुश होकर ही जायेगे। अपने बॉस को खुश करने के लिए भी लोग बी.के. स्‍कूल की कचौरियां ले जाते रहे है। आपके खास मेहमानो की खातेदारी में आपने बी.के. स्‍कूल की कचौरी नही परोसी तो वे नाराज भी हो सकते है। बीकानेर के बाहर भी जब बीकानेरी स्‍वाद के चर्चे होते है तो बी.के. स्‍कूल की चर्चा सबसे पहले होती है।

      इसका मतलब ये कतई नहीं कि मेरे पिताजी ने मुझे हलवाई की स्‍कूल में भर्ती करवाया या मेरी स्‍कूल में कचौरियां बनाने की कोई ट्रेनिंग दी जाती थी। ऐसा बिलकुल नहीं है। मेंरा स्‍कूल सौ साल से भी ज्‍यादा पूराना है। संभवत: मेंरे शहर का सबसे पूराना स्‍कूल है। इस स्‍कूल में सिर्फ बणिये के बच्‍चो को ही प्रवेश दिया जाता था। उसके बाद जगह बचती तो ब्राहम्‍णो को प्रवेश दिया जाता । मेंरे पिताजी ने बहुत जतन से इस बी.के. स्‍कूल में मेंरा दाखिला करवाया। मेरे स्‍कूल की एक ओर खास बात थी कि इस स्‍कूल में लड़कियो और महिलाओ का प्रवेश प्रतिबन्धित था। इस मामले में इतनी सख्‍ती थी कि किसी महिला का चित्र भी स्‍कूल में नहीं लगाया जाता था चाहे वो किसी महिला समाज सुधारक या नेता का ही क्‍यो न हो। स्‍कूल का कोई भी सोच रहा होगा परन्‍तु हमें जरूर महसूस होता था कि महिला शायद कोई आफत की पुडि़या का नाम है।

      यह प्रश्‍न भी उठना स्‍वभाविक है कि जो स्‍कूल पढ़ाई के लिए इतना जाना जाता हो तो उसकी पहचान कचौरी से कैसे होने लगी। दरअसल हमारी स्‍कूल के नीचे एक कचौरी की दुकान थी। हलवाई के हाथों में जादू था। जब वो कचौरी बनाता था तो उसकी खूशूब आस-पास के मोहल्‍लो तक जाती थी। यहां तक कि हमारी क्‍लास तक भी आती थी। यह अलग बात थी कि इस बाधा को रोकने के  लिए हमारे मास्‍टरजी कुछ नहीं कर सकते थे। जब लंच टाईम हो रहा हो और ऐसे खूशूब आ रही हो तो कि मास्‍टरजी के शब्‍द बाण सिर के  उपर से ही निकलते थे। लंच टाईम में हम लोगो को घर जाकर खाना खाने की छुट थी। लंच टाईम में बाहर निकलते ही कचौरी की दुकान पर जबरदस्‍त भीड़ देखी जा सकती थी। बच्‍चो के बराबर कचौरी खाने वालो की भीड़ होती थी। कुछ को कचौरी मिल जाती तो कुछ को ऐसे ही लौटना पड़ता था। हमारी स्‍कूल के बीच कुछ बच्‍चे भी लंच में कचौरी चट करते । लंच टाईम तीस मिनट का होता था और हमे घर जाने की जल्‍दी होती थी इसलिए कचौरी की दुकान पर नजर भर हम देख ही पाते थे। हमारे शहर में बणियों को आर्थिक रूप से मजबूत माना जाता था। बणियो के बच्‍चो को लंच टाईम में कचौरी की दुकान पर देखा जा सकता था। हमें यह सिखाया गया कि ठेले पर या दुकान पर खड़े होकर कुछ खाना अच्‍छी आदत नहीं होती है। इसलिए मै और मेंरे दोस्‍त सीधे घर चले जाते और खाना खाकर लौट आते । घर पर भी कभी बहुत खास मेहमान आने पर हमारे घर पर भी बी.के. स्‍कूल की कचौरी आती परन्‍तु यहां भी हमारा नाक हमारी जीभ के मुकाबले फायदे में रहता । हम सिर्फ खूशूबू ही ले पाते थे। उस समय ठेले या दुकान पर खड़े होकर खाने को अच्‍छी आदत नहीं समझते थे परन्‍तु ये नहीं जानते थे कि ऐसी सीख मध्‍यमवर्गीय मजबूरियों के चलते ही दी जाती थी।

      बच्‍चे का मन तो कच्‍चा होता है। घर वालो की सीख पर मैं ज्‍यादा अडिग नहीं रह पाया। घर से मिलने वाले पांच दस पैसे इस उम्‍मीद में इकटठे करने शुरू किये कि जब भी यह एक रूपया बनेगा , मैं भी बी.के. स्‍कूल की कचौरी खाउंगा। पैसे मिलने की रफतार इतनी मंद थी कि इसमें एक साल भी लग सकता था। परन्‍तु मन में था विश्‍वास कि जब भी एक रूपया होगा ,बी.के. स्‍कूल की कचौरी खाउंगा। पैसे जमा करता गया । पचहत्‍तर पैसे हो चुके थे। रूपया होना ज्‍यादा दूर नहीं था। पर एक दिन स्‍कूल से निकलते ही मैंने देखा कि कचौरी की दुकान के पास ही एक ठेला लगा है जिस पर लिखा है बी.के. स्‍कूल की कचौरी पचहत्‍तर पैसे में। दुकान में वहीं दाम था एक रूपया परन्‍तु ठेले वाले दुकान के ग्राहको में सेंध लगाने के उद्धेश्‍य से यह ठेला लगाया। मुझ से रहा न गया। मैं अपने पचहत्‍तर पैसे ले आया और बी.के. स्‍कूल की कचौरी का मजा लिया। ठेले वाले ने कोई एमबीए नहीं किया था परन्‍तु वो मार्केटिंग के गुण अच्‍छी तरह से जानता था। जल्‍दी ही उसके ठेले पर भी भीड़ लगने लग गयी। जो एक रूपया खर्च नहीं कर पाते थे वो ठेले वाले से कचौरी लेते थे। परन्‍तु बणियो के बच्‍चे दुकान वाली ही कचौरी खाते । मैं जब पचहत्‍तर पैसे होते ठेले से कचौरी खा लेता ।
 मन में टीस थी कि कचौरी तो बी.के. स्‍कूल के दुकान की ही खानी है। मैं बणियो से कम थोड़े ही हू। इस बार मैंने सोच लिया कि पूरा एक रूपया इकटठा करूंगा। इस बार मन को पूरी तरह से कंट्रोल में रखा । पचहत्‍तर पैसे होने के बाद समय कठिनता से गुजरा परन्‍तु अहिस्‍ता अहिस्‍ता मैने एक रूपया कर ही लिया। आज सुबह एक रूपया लेकर स्‍कूल गया। लंच टाईम मे बाहर निकला। कचौरी की दुकान पर गया। मन में बहुत उत्‍साह था कि आज वास्‍तव में बी.के. स्‍कूल की कचौरी खाउंगा। परन्‍तु जैसे ही मैंने नजरे उपर उठाई, दुकान पर एक सूचना लगी थी तेल मंहगा होने के कारण आज से कचौरी 1.25 पैसा। फिर मैंने नजर घुमाई ठेले पर तो वहां पर्दा लटक रहा था आज से कचौरी 1.00 रूपया। मेंरे मन ने 25 पैसे का और इंतजार करने से मना कर दिया और मेंरे कदम ठेले की ओर चल पडे। मैंने ठेले से कचोरी खाई। ऐसा चलता रहा। जब दुकान पर 1.50 की कचौरी हुई तो ठेले पर 1.25 पैसे की । मैं साल में तीन या चार कचौरी खाता परन्‍तु 25 पैसे के अंतर को कभी पाट नहीं पाया।

      समय चक्र घूमा । मेंरी स्‍कूल की पढ़ाई पूरी हुई मैंने कॉलेज में दाखिला ले लिया । मेरे पिताजी ने शहर के सबसे अच्‍छे कॉलेज में दाखिला दिलाया। मैं पिताजी की मजबूरियो को समझता । परन्‍तु मैं जब अव्‍वल नंबरो से पास होता तो मेरे पिताजी की सारी चिंताऐ दूर हो जाया करती थी। पिताजी ने अब मुझे महीने की पॉकेट मनी भी देना शुरू कर दिया था। महीने के पांच रूपये मुझे मिलते थे । एक बार महीना खत्‍म होने का था । मेरे पास तीन रूपये बचे थे। सोचा आज बी.के. स्‍कूल की कचौरी खा ली जाय। मैं अकेला ही अपनी पूरानी स्‍कूल पहुंचा। दुकान के नजदीक पहुचा तो देखा तो पाया कि दुकान पर वही ठेले वाला बैठा है। पूछने पर मालूम हुआ कि उसने वो दुकान खरीद ली है। बातचीत के बाद कचौरी का ऑर्डर देने वाला ही था कि मेरी नजरे एक बार फिर दुकान के सूचना पटट पर थी जहां लिखा था कचौरी 3.25 रूपये । मैने फिर नजरे घुमाई वहां एक और ठेला लगा था जहां पर्दा हवा में लहरा रहा था । लिखा था कचौरी 3.00 रूपये। आज फिर 25 पैसे का अंतर में नहीं पाट पाया और ठेले से कचौरी खाई।

      फिर लंबे समय तक मैं कचौरी खाने वहां नहीं गया। कुछ ही दिनो बाद मैंने एमबीए की प्रवेश परीक्षा दी। अव्‍वल अंको के साथ मेंरा सलेक्‍शन हो गया। मेरे पिताजी की खुशी का ठिकाना नहीं था। उनको आंखे भी खुशी से नम हो गई थी। जब आगे की फार्मेलिटीज की बारी आई तो देखा कि नंबर एक इंस्‍टीयूट में केवल डोनेशन देने वालो को ही प्रवेश मिलेगा बाकि को सरकारी कॉलेज में । मैंने पिताजी को कह दिया था कि मैं सरकारी कॉलेज में ही दाखिला लूंगा। पिताजी नंबर एक इंस्‍टीटयूट में मेरा दाखिला चाहते थे। मेंरे मार्कस भी इस लायक थे। परन्‍तु डोनेशन बहुत ज्‍यादा था। मैंने सरकारी कॉलेज की हां करके पिताजी की मुश्किल आसान कर दी। सरकारी कॉलेज में दाखिला लेने का गम मुझे नहीं था। मुझे मेरे टेलेंट पर भरोसा था। बहुत खुश था। आज जेब में दस रूपये डालकर गया कि खुशी में बी.के. स्‍कूल की कचौरी खाउंगा ।
      आज बी.के. स्‍कूल पहुंच कर  सीधे दुकान गया। आज सूचना पद्ट मैंने नहीं देखा था। हांलांकि कचौरी की कीमत 6 रूपये हो चूकी थी। मैंने ऑर्डर दे दिया। मन में सोचने लग अब मंजिल मिल गई। एमबीए करने के बाद घर की सारी मुश्किले हल हो जायेगी। आज मैंने 25 पैसे का अंतर पाट दिया है। दुकानदार ने कचौरी कागज पर रखी और उस पर दही उड़ेला। वह उसमें मसाला डाल कर मेरी ओर हाथ किया । मेरी नजर दुकान के बाहर पड़ी। बाहर एक बच्‍चा जो ज्‍यादा गरीब तो दिखाई नहीं दे रहा था लेकिन ऐसा जरूर लग रहा था कि उसे आर्थिक हालात ठीक नहीं है। लोगो द्वारा कचौरी खाकर फेंके हुए कागजो को चाट रहा था। किसी में उसे कचौरी का टुकड़ा मिल जाता । कुछ को वो वैसे ही चट कर जाता था। दुकानदार ने जैसे ही मेरे हाथ में कचौरी दी। मैं तुरंत उठा और दुकान से बाहर निकल कर उस बच्‍चे को कचौरी दे दी। वो शायद भूखा था। उसे वो जल्‍दी जंल्‍दी खा रहा था। मैंने दुकानदान को 6 रूपये का भुगतान किया। चार रूपये लेकर बाहर आ गया। वहां कुछ और ठेले लग गये थे। एक ठेले पर परदा लहलहा रहा था कचौरी चार रूपये । मेरे कदम उस तरह मुड़ गये। मेरे कदमो की चाल बता रही थी कि 25 पैसे का अंतर अब दो रूपये हो गया है।