Sunday, September 24, 2017

एक कवि‍ता

अल सुबह
सड़क पर कुछ एक वाहनो
के हाॅर्न को
स्कूल जाते बच्चो के षोर को
सडक पर झाडू बुहारती
महिलओ की बातो को
दूध वाले और अखबार वालो
की आवाजो को
अपने कानो के बिलकुल पास से
निकालते हुए
अपना चेहरा नीचे किये
कुछ बुदबुदाते हुए
तेज कदमो के साथ
सफेद साड़ी में
कुछ महिलाऐ जा रही है
सीधे आश्रम में
जहां वे अपने कान
खोल देगी
पवित्र आवाजो
के लिए ।


Saturday, September 23, 2017

रेत के टीले
पूरी तरह से
मौन है
सूरज की तपन
भी उन्हे विचलित
नहीं कर पायी है
पवन  की लहर
चलती है
टीलो के सपनो को
एक लय में उडा
ले जाती है
वे
देखते है उन्हे जाते हुए
अपने से दूर
खेजड़ी से लिपट कर
वे पवन से
संघर्श करते है
पर
वह उन्हे अपने साथ
ले जाती है
किसी और के
सपनो को पूरा करने के लिए
निर्मिषेश होकर देखते रहते है
टीले
अपने सपनो को
पवन के साथ जाते हुए
बिलकुल मौन होकर ।

Sunday, August 20, 2017

कवि‍ता
सन्‍यासि‍यों का झुण्‍ड बाते करता है

सन्‍यासि‍यों का झुण्‍ड अपने आश्रम में
गोल घेरे में बैठा हुआ
गेहरूऐं वस्‍त्रो को संभालते हुए
अपने सपाट सि‍र पर हाथ फेरते हुए
बाते कर रहा है।

गेहरूऐं वस्‍त्रो ने वि‍षय आसक्‍ति‍ से
उन्‍हे दूर कर दि‍या है
सपाट सि‍र ने उन्‍हे कर्मकाण्‍डो से
मुक्‍त कर दि‍या है
फि‍र भी
वे अपने आश्रम में एक झुण्‍ड मे
बातें कर रहे है

उनके चारो ओर शून्‍य है
बाहर भी और भीतर भी
एकाकार होना चाहते है वे शून्‍य में
अपने को वि‍लीन कर देना चाहते है
शून्‍य में
पर
कर नहीं पा रहे है वे वि‍लीन अपने आपको

कोने में आसन पर गुरू बैठे है
बि‍लकुन मौन
वो एकाकार हो गये है
बाहर से और भीतर से
इसीलि‍ए वो बातो में शामि‍ल नहीं है
परन्‍तु
सन्‍यासि‍यों का झुण्‍ड गोल घेरे में
आश्रम में बैठा हुआ

बाते कर रहा है। 

Thursday, March 20, 2014


लव डॅाट कॅाम

   

केफेटेरिया के काउण्टर पर भीड़ थी। राॅक्स ने दो चार स्टुडेण्टस के पीछे से ही हाथ लंबे कर टोकन को काउण्टर पर फेंकते हुए वेटर के हाथो से काॅफी के दोनो कप ले लिये। काफी के दोनो कपो को स्टुडेण्टस से बचाते हुए हाथ उपर किये हुए राॅक्स ज्यो ही घूमा प्रोफेसर सिन्हा से टकरा गया। सिन्हा के हाथ की काफी का कप नीचे छिटक गया। ‘ क्या हो गया है आजकल के छोकरो को । जरा भी देखकर नहीं चलते । चष्मा पहन कर हीरो बने फिरते है। कुछ भी दिखाई नहीं देता है।’ प्रोफेसर अपने कपडो को ठीक करते हुए बुदबुदाये।

    राॅक्स काफी के दोनो हाथ में कप लिये आगे निकल गया था। प्रोफसर की आवाज सुनकर उसने पीछे गर्दन घुमायी और शब्दो को लगभग प्रोफेसर की तरफ धकियाया - सर! हीरो बताने के के लिए थैक्यू और यू नो ! मेरे पीछे आंखे नहीं है ! इसलिए आपको देख नहीं पाया। सर। एक बात और बता दू। गोगल्स लगाने का मतलब आंखो पर पटटी बांधना नहीं है। इसमें से आप देख भी सकते है।

    राॅक्स प्रतिक्रिया का इंतजार किये बिना गोल टेबल्स के बीच में से कमर मटकाते हुए आगे निकल गया। नाम तो राकेष था। काॅलेज में राॅक्स नाम से ही जाना जाता था। बालो को बीच में खड़ा किये हुए, एक कान में रिंग्स, कलाई में फैषननुमा काले मोतियो की माला लपेटे हुए बिलकुल नये जमाने की जीव की तरह लग रहा था। कमर मटकाते हुए और गुनगुनाते हुए सीधे प्रीति की टेबल्स पर पहुंच गया। कोहनी टेबिल पर और सर हथेली में रखे प्रीति राॅक्स को ही देख रही थी। कंधे तक बाल। आई ब्रोे डिजायन किये हुए। आंखे जैसे पूरे चेहरे से मैच करती हुई। प्रीती राॅक्स की दोस्त है और दोनो ने इसी सालं साफट इंनीजियरिंग पूरी की है।

ये लो गरमा गरम काॅफी। कहते हुए राॅक्स बैठ गया।
क्यों उलझते हो हर एक से ।
मैं कहां उलझा। पता नहीं लोगो को क्या हो गया है।
क्या हो गया है? प्रीती ने काफी का घूंट लेते हुए कहा।
इनका मानना है कि हम लोग कुछ भी करे गलत है। हैयर स्टाइ्रल चेंज करे तो फैषन है और खुद आज भी राजेष खन्ना और देवानंद की हेयर स्टाईल मेंनटेन किये हुए है।
राॅक्स के व्यंग्य पर प्रीती मुस्कुरायी और बात बदलते हुए कहा - जाॅब ज्वाईन कर रहे हो ?


मैं तो नहीं । तुम ?
मैं तो अगले हफते ज्वाईनिंग के लिए दिल्ली जा रही हूॅ। तुम क्यों नहीं  ?
प्रीती । मै इस लफडे में नहीं पडता । साफटवेयर इंजीनियर बन कर किसी की गधा मजदूरी नहीं करूंगा। खुद क्रियेषन करूंगा। वैसे भी अभी मस्ती के दिन है। जाॅब्स के नहीं । राॅक्स ने काॅफी खत्म करते हुए कहा।
राॅक्स। सोच लो। आगे आफर मिले या नहीं ?प्रीति ने अपने बालो को आंखो के आगे से हटाते हुए सलाह दी।
प्रीती छोडो। इट इज मस्ती टाईम । अभी घर जाकर डैड से भी यही सब सुनना है। अरे हां। मुझे लैपटाप पर कुछ काम भी करना है। घर चलते है। मै तुम्हे ड्राप कर देता हू।  कहते हुए राॅक्स अपने लैपटाप के बैग को गले में लटकराते हुए खड़ा हो गया। राॅक्स ने बाईक स्टार्ट की और प्रीति झट से उसके पीछे बैठ गयी। राॅक्स की बाईक धुंआ छोडते हुए कुछ पलो में ही केफटेरिया की रोड से ओझल हो गयी। वहां खड़े लोगो तेजी से आष्चर्यचकित थे।

    राॅक्स के घर में प्रवेष करते ही पहले ड्रांईग रूम है। ड्राईग रूम में डैड अखबार  लिये बैठे थे। टीवी आॅन था। उनका ध्यान न टीवी में था और न ही न्यूजपेपर में । उनके कान तो राॅक्स के आने की आहट का इंतजार कर रहे थे। राॅक्स ने जैसे ही घर में कदम रखा, डैड का इंतजार खत्म हुआ। चेहरे के आगे से अखबार हटाये बिना ही बोल पड़े- वेलकम। सर। डैड का लहजा व्यंग्यात्मक था। राॅक्स वहीं दरवाजे पर ही खड़ा हो गया।

अंदर आओ। बैठिये सर। डैड का व्यंग्य जारी था। परन्तु राॅक्स पर कोई फर्क नहीं । गोगल्स को माथे पर करते हुए बोल पडा - डैड। मै हमेंषा की तरह सुनने के लिए तैयार हुु। कह डालिये।
हां । भई करेगा तो अपनी मर्जी की। मैने सुना है तुम जाॅब नहीं कर चाहते हो।
सही सुना है।
क्यों? पांच लाख का पैकेज है ।
डैड। मैं अभी जाॅब के चक्कर में नहीं पड़ना चाहता हू। फिलहाल मेंरा जाॅब करने का कोई ईरादा नहीं है।
मेरे सोचने और नहीं सोचने का कोई मतलब नहीं है ?
किसी के सोचने पर कोई पाबंदी नहीं है। आप किसी के बारे में सोच सकते हो ।
मतलब मेरी तुम्हारे लिए कोई वैल्यू नही है ? डैड के शब्दो में तल्खी बढ़ती जा रही थी।
किस ने कहा ? आपकी वैल्यू है। आप मेरे डैड है।
केवल कहने को ?



किसी काम को मैं कैसे करता हू। यह मेरा काम है। आपकी सोच से मैं काम नहीं कर सकता है। मुझे जो करना है । मैं करूंगा। मैं यह जाॅब नहीं करूंगा। 

डैड  न्यूजपेपर को समेटकर टेबिल पर रखते हुए खड़े हो गये। नथूने फुलाते हुए राॅक्स के बिलकुल करीब आ गये। राॅक्स के चेहरे बिलकुल करीब फुले हुए नथुनो से सांस को छोड़ते हुए डैड ने दांतो को लगभग भीचते हुए कहा - आखिर क्यों नहीं करना चाहते हो जाॅब। तुमे इंजीनीयर बनाने के लिए मैने 13 परसेंट पर लाॅन लिया था। कब तक चुकाउंगा और तुं कब तक मेरी सेलरी पर पलता रहेगा।

डैड के गुस्से पर राॅक्स की स्थिर प्रतिक्रिया था। धीरे धीरे अपने चेहरे को उठाया। डैड के नजरो से अपने आपको अलग करते हुए गर्दन को दूसरी तरफ घुमाया। डैड की आंखो के गोले आंखो के बीच में रूके हुए राॅक्स को देख रहे थे। राॅक्स ने डैड का चेहरा देखे बिना ही धीमे स्वर में कहा - मुझे मेरे खर्चे के लिए पैसे देना या नहीं देना । ये डिसीजन आप ले सकते है। जाॅब करना या नहीं करना। ये डिसीजन मुझे करना है। मैंने अपना डिसीजन कर लिया है। आप भी अपना डिसीजन ले सकते है।’ राॅक्स के शब्दो में तल्खी नहीं थी। बहुत ही धीमे स्वर में उसने अपनी बात कही। डैड ने अपने नथुनो से और जौर से सांस लेकर छोड़ी- तो ठीक है मैंने भी अपना डिसीजन कर लिया। अब अपने खर्चो के लिए मेरी तरफ मुंह नहीं ताकना। मैने सोफटवेयर इंजीनीयर बना दिया। मेरी जिम्मेदारी खत्म।

थेक्स! डैड मुझे मंजूर है।कहते हुए राॅक्स अपने कमरे की तरफ चल दिया। डैड राॅक्स को देखते रहे ।आंखे बंद कर असहाय स्थिर भाव से खड़े हो गये । 

    पैट्रोप पंप पर बहुत भीड़ थी। एक ही लड़का पैट्रोल डाल रहा था। लगता है बाकि स्टाफ छुटटी पर था। नेक्स्ट! नैक्स्ट! नैक्स्ट ! कहते लड़का जल्दी जल्दी कस्टमर निपटा रहा था। राॅक्स के डैड भी लाईन में थे। आफीस के लिए देर हो रही थी। उनके पास स्कूटर था और स्कूटर में तेल की खपत भी ज्यादे होती है। पैट्रोल का दाम भी पसीने छुडा रहा था। यही सब सोचते हुए डैड अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। बारी आने पर टंकी का ढक्कन खोलकर पैट्रोल डलवाया। पर्स से पैसे निकाल कर ज्योही लड़के की तरफ बढ़ाये। शक्ल कोई जानी पहचानी लगी। कैप और चष्मा होने के कारण एकदम से नहीं पहचान पाये। चेहरा करीब आते ही डैड के चेहरा गुस्से से तमतमा गया । ‘ राॅक्स तुम!
राॅक्स ने डैड की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया । अपने काम में फिर से जुट गया।




नैक्स्ट ! नेक्स्ट ! आवाज के साथ ही डैड को आगे सिरकना पड़ा। कानो में अभी भी नैक्स्ट नैक्स्ट की आवाजे गुुज रही थी। पंप पर रूके बिना ही स्कूटर स्टार्ट कर आफीस की तरफ चल दिये।

    आफीस में टेबिल पर अपना बैग रख अपने चेहरे पर हथेली रखकर बैठ गये। आफीस की चहल पहल डैड के लिए बेअसर थी। माथे पर सलवटे। नजरे स्थिर । तनाव को साफ तौर पर उनके चेहरे पर देखा जा सकता था। पास बैठे माथुर साब भांप गये कि गुप्ता जी कुछ परेषान है।

क्या बात है गुप्ता जी ! कुछ परेषान दिख रहे हो।
क्या बताऊं माथुर साहब। हर एक की किस्मत आप जैसी कहां। ऐसे लगा माथुर साब ने राॅक्स के डैड की दुखती रग पर हाथ रख दिया था।
क्यों । किसने कहा आपकी किस्मत खराब है।
देखो आपका लड़का दुष्यंत कितना आज्ञाकारी और होनहार । इ्रंनीनियंरिंग करते ही 25 लाख का पैकेज मिल गया। इधर हमारा राकेष यानि राॅक्स। पूछो मत।
गुप्ता जी। परेषान मत होईये। राॅक्स को भी तो पांच लाख पैकेज मिला है। चिंता क्यों करते हो। यह तो बढ़ जायेगा। माथुर साहब ने गुप्ता जी को सात्वंना दी।
माथुर साहब। इतना भी होता तो ठीक था। परन्तु साहबजादे ये जाॅब नहीं करना चाहते है। क्रियेषन करना चाहते है।

माथुर साहब ने गंभीर होते हुए पूछा - आपने राॅक्स से पूछा क्या कि वह क्या क्रियेषन करना चाहता है।
माथुर साहब क्या पूछं आज तो उसने हद कर दी। कल मैंने डांट दिया तो आज से पैट्रोल पंप पर काम करता हुआ मिला।
इसमें परेषान होने की कोई बात नहीं ?
लोग क्या सोचेगें कि गुप्ताजी के घर मं इतनी कंगाली आ गयी है कि लड़के को पैट्रोल पंप पर काम करना पड़ रहा है।
गुप्ता जी। राॅक्स नई सोच का लड़का है। यूरोप में तो अक्सर बच्चे अपने हाथ खर्चे के लिए पैट्रोल पंप पर काम करने जैसा जाॅब करते है।
माथुर साहब यह यूरोप नहीं है। इंडिया है। यहां का समाज अलग है। लोग अलग है।
आप राॅक्स से बात तो करिये । वो क्या सोचता है। यह भी तो सुनिये।
कई बार सुन लिया । बस एक ही बात । क्रियेषन करना चाहता हूू।






माथुर साहब अपनी सीट से खड़े हो गये। मामले की गंभीरता को समझते हुए गुप्ताजी की सीट के बिलकुल सामने आ गये। दोनो हथेलिया गुप्ता की टेबिल पर टिका कर कहा- गुप्ता जी। आप राॅक्स को समझिये। नहीं पूछा तो पूछिये क्या क्रियेषन करना चाहता है। मुझे नहीं लगता वो कोई गलत कर रहा होगा।

नहींजी। कुछ अच्छा नहीं कर रहा । मैंने पूछा था तो बताया एक वेबसाईट बनायी है। लव डाॅट काॅम । दावा करता है कि दुनिया की पहली लव वेबसाईट जिसमें पेरेन्टस को भी जोडा गया है। उपलब्धि बताता है कि पूरी दुनिया में पचास हजार से भी ज्यादा यूजर हो गये है। खाक वेबसाईट बनायी। वेबसाईट से पेट नहीं भरता। कर्जे नहीं चुकाये जा सकते । कहते हुए गुप्ता जी ने अपना चष्मा उतार कर टेबिल पर रख दिया और दोनो हाथ बगलो में डालकर बैठ गये। माथुर साहब अब भी आषावादी दिख रहे थे। चहलकदमी करते हुए गुप्ता की सीट के पीछे आ गये।

गुप्ता जी। आप राॅक्स को ठीक से समझो। मुझे नहीं लगता वो बिगड़ेल है। उसे कोई जिम्मेदारी सौप कर देखो।
सौपी थी। मैंने कहा अपनी मम्मी की दवाई और डौक्टर्स को दिखाने का काम किया करो।
फिर ?
जनाब। ने हां तो कर दी। लेकिन आप जानते है उसने जिम्मेदारी कैसे निभाई।
कैसे ?
उसने सारी दवाईयां उठाकर उपर रख दी। कहा मैं वैसे ही मम्मी को ठीक कर दंूगा। जैसे उसने डाॅक्टरी पढ़ी है।
तो उसने जिम्मेदारी ली ?
जिम्मेदारी क्या ली ? रोज अपनी मां को बाईक पर बैठाकर सुबह शाम पार्क ले जाने लगा।
क्या फर्क पड़ा ?
गुप्ता जी को अब डिफेंसिव होना पड़ा। लंबी सांस लेते हुए कहा - मै डाॅक्टर के पास उसकी मम्मी को चैक अप के लिये ले गया। बीपी शुगर सब नाॅर्मल था। डाॅक्टर भी संतुष्ट था। यह फर्क तो पड़ा। अब उसकी मम्मी नाॅर्मल है। नाॅर्मल क्या, काफी बेहतर  फील कर रही है।

मै यही तो कह रहा था । राॅक्स को समझो। उसकी सोच अलग है। अच्छा बताओ आपके बच्चे में लाख बुराईयां होगी परन्तु कोई अच्छाई भी तो आपको नजर आयी होगी।




हां। यह जरूर है । उसने कभी भी मेंरी बात का गुस्सा नहीं किया। कभी मेरे सामने उंची आवाज में बात नहीं की।

देटस इट! यही मैं कहता हूूं। उसकी सोच को ध्यान में रखकर उससे बात करो। सब ठीक हो जायेगा। मुझे नहीं लगता राॅक्स बुरा है। डांट वरी। बैफिक्र होकर आफिस का काम करो। विदाउट टेंषन।

 यह कहकर माथुर साहब भी अपनी सीट पर बैठ गये। गुप्ता जी सब कुछ भुलाने की कोषिष करते हुए टेबिल पर पड़ी फाईलो को खोलने लगे।

    शाम को घर पहुंचने के बाद भी गुप्ता जी टेंषन में थे। राॅक्स को पैट्रोल पंप पर काम करते देख उन्हे बहुत बुरा लगा। माथुर साहब ने लाखा समझाया होगा परन्तु राॅक्स के प्रति उनका गुस्सा सातवे आसमान पर था। उन्हे लगा कि बेटा उनके हाथ से निकल गया। राॅक्स की मम्मी ने भी समझाने की कोषिष की परन्तु उनके लिए राॅक्स अब उनकी जिंदगी में नहीं है। यह सोच कर वो टेंषन बढ़ा रहे थे कि उन्होने अपने बेटे से कितनी उम्मीदे पाली थी परन्तु नालायक निकला। फिर सोचा एक ही लड़का है उनकी पेषन, प्रोविडेंट फण्ड से उसका काम निकल जायेगा। इसी उधेड़बुन में पता ही नही चला कब रात हो गयी। राॅक्स के आने का इंतजार किये बिना ही सो गये।

    गुप्ता जी को  रात को नींद ढंग से नहीं आयी । सुबह जल्दी उठ गये। टेंषन के साथ ही उठे। सोचा मेंरा भी बीपी आज चैक करा लूंगा। फिर राॅक्स के कमरे में गये । उसके चेहरे पर कोई टेंषन नहीं । ऐसे लगा बेफिक्री से सो रहा है। गुप्ता जी सोच रहे थे ऐसी है आजकल की औलादे। उनकी श्रीमती जी भी अभी तक सो रही थी। गरमी थी। सुबह सुबह हवा ठंडी होती है। ठंडी हवा लेने के लिए वे बाहर बरामदे में आ गये। न्यूज पेपर पड़ा था। गुप्ता जी ने न्यूज पेपर उठाया ज्यों ही उसे उसे खोला । मुख पृष्ठ पर नीचे बड़ी खबर थी - इंदौर के राॅक्स की वेबसाईट लव डाॅट काॅम को 1 करोड़ में खरीदने का आफर। हेडलाईन पढ़ते ही गुप्ता जी के पूरे शरीर में झुरझुरी छुट गयी। खबर में बाॅक्स मे राॅक्स का फोटो था और नीचे लिखा था काम्याबी का श्रेय पिता को। गुप्ताजी ने अखबार को लिये एक हाथ बगल में दबाया और दूसरे हाथ की हथेली को चेहरे पर फेरते हुए खड़े हो गये। ठंडी हवा के झोंको से उनके बाल उड़ रहे थे।

Thursday, June 20, 2013

प्लेन


मैं कमरें में छवि का पासपोर्ट और वीजा ढंुढ रहा था। कल उसे जरूरत पड़ेगी। पहले से ही ढंुढ कर एक जगह रख दूं ताकि सुबह आसानी से मिल जाये। फिर रात भर शादी के कामो में वक्त नहीं मिलेगा। हमारे यहां शादी में कन्यादान घर का बड़ा करता है। मेरे घर में मेरे भाई साहब बड़े है इसलिए मेरी बेटी का कन्यादान भी भाई साहब ही करेंगे। मेरे जिम्मे शादी के दूसरे काम रहेगे । मेहमानो को अटेण्ड करना और बाकि व्यवस्थाऐ ंदेखना ।  अब बारात आने ही वाली  है। दो बार बुलावा आ गया । छवि अपने पापा को बुला रही है। अब नहीं गया तो नाराज हो जायेगी। पासपोर्ट और वीजा ढुुढकर एक लिफाफे मे आलमारी के एक कोने में रख दिया। जब पैकिंग होगी तो यह सब छवि के पर्सनल डाॅक्यूमेंटस में रख दूंगा।

छवि का कमरा खोला। कमरा खोलते हुए छवि बिलकुल सामने बैठी थी। किसी पिता को दुल्हन के रूप  में अपनी बेटी रानी ही लगती है। छवि वास्तव में रानी ही थी। आज तो दुल्हन के रूप  में बिलकुल रानी परी लग रही थी मानो परी लोक पर उसका राज हो। कभी मां के पल्लू में छिप जाने वाली छवि के सर पर आज पल्लू था। जब वह पैदा हुई थी तो डाॅक्टरो ने कह दिया था कि उसकी मां अब दोबारा मां नहीं बन सकेगी। मेरी पत्नि और परिवार रिष्तेदार बहुत दुःखी हुए। सबने सात्वनां दी। सबने अब लड़का नहीं हो सकने का दुख जताया। मुझे कोई दुख नहीं था। मेरे लिए तो छवि ही मेरी दुनिया हो गयी थी। मैंने अंगुली पकड़कर उसको चलना सिखाया।  मैं उसके लिए लड़को वाले खिलौने लाता लेकिन वो लड़कियो वाले खिलौनो की मांग करती । दरसअल वो लड़की ही रहना चाहती थी। वो गुडडे गुडियो के खेल खेलती । मै भी उसके साथ खेलने लग जाता । गुडे और गुडिया की शादी जैसे खेल में मै शरीक होता था। उसकी सहेलिया कम थी। या यों कहे मै उसे सहेलिया बनाने के लिए वक्त ही नहीं देता था। मै चाहता था कि वो ज्यादा से ज्यादा समय मेेरे साथ बिताये। कई बार तो उसकी मां भी मुझे टोक देती परन्तु मै जब भी समय मिलता छवि के साथ ही बिताता था।

बचपन में छवि अक्सर प्लेन की आवाज से डर जाया करती थी। जब भी कोई प्लेन हमारे शहर के ऊपर से गुजरता वो मां के पल्लू में जाकर छुप जाती । हमारी छत बहुत बड़ी थी। एक छोटे मैदान की तरह । मै उसके लिए कागज का प्लेन बनाता और वो उसके पकड़ने के लिए दौड़ती । इस खेल में उसका  प्लेन से डर भी जाता रहा । जब भी हम छत पर होते छवि कागज आगे कर प्लेन बनाने के लिए कहती। मै उसे सीखाता कि देख कागज का प्लेन ऐसे बनता है। वो कभी सिखने की कोषिष नहीं करती। मै उसे कहता कि छवि तुम प्लेन बनाना सीख क्यों नहीं लेती।  वो कहती पापा मै तो प्लेन बनाना सीखूंगी नहीं मैं तो प्लेन में उडकर स्विटजरलैण्ड जाउंगी। मै कहता जब तक तुं कागज का प्लेन बनाना सीखोगी नहीं मै तुम्हे प्लेन में जाने नहीं दूंगा। इस पर वो मेरे पीछे आकर गले में हाथ डालती  और कहती कि तब तो मै सीखूंगी नही क्योंकि मुझे तो मेरे पापा के साथ ही रहना है।
छवि के सर पर पल्लू और माथे पर टीका लटक रहा था। वैसे ही जैसे किसी परियों की रानी के माथे पर होता है। टीके की चमक बता रही थी कि वो दुनिया की सबसे सुंदर दुल्हन है। वैसे भी उसकी चकोचैंध में मेरा घर हमेंषा दमकता रहा । शुरू से ही होनहार थी। हमेषा अव्वल । मैंने उसको डाॅक्टरी की पढाई कराई। यहां भी वो अव्वल रही । वो पहली बार एप्रीन पहन कर घर आई तो मेरी आंखे छलकने लगी तो वो मेरा हाथ पकड़ कर आंगन में खुषी से झूमने लगी और मेरी आंखो से आंसूओ को बाहर नहीं आने दिया। मै उसके लिए आज के जमाने के लड़को वाले कपड़े खरीदता। उस समय तक लडकियो के  जींस और टी शर्ट पहनना आम हो गया था लेकिन छवि लड़कियो वाले कपड़े ही पहनती थी।

छवि की आंखो में आज भी सपने ही थे। मै उसकी आंखो में उसके सपने ढुंढा करता था  लेकिन उसकी आंखो में पापा के लिए सपने थे। पापा आप आज यह ड्रेस पहनोगे । पापा आप यह हेयरस्टाईल रखोगे। कई प्रकार से हमंषा निर्देष देती रहती थी। मेरा आलेख या कहानी जब भी अखबार में छपती वो बाजार से ले आती । मेरी लिखी किताबो और अखबारो को उसने एक आलमारी में सहेज कर रखा था। मेरे लेखन की एक पूरी लाईब्रेरी बना रखी थी। मुझे जब पहली बार साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला तो सबसे ज्यादा खुष छवि ही थी। उसकी आंखो में पिता के सम्मान का गर्व देखा जा सकता था। पर मैं तो उसकी आंखो में उसके सपनो का ढुंढा करता था। मै उसे अक्सर कहता था कि मेरे लिए तुम लड़के की तरह ही हो। तुम्हे कोई लड़का पसंद हो तो मुझे खुलकर बता देना। पर उसने कभी बताया नहीं । जब भी पूछने की कोषिष करता बात को टाल देती । सिरीष का रिष्ता आया तो परिवार और रिष्तेदारो ने मुझे बात आगे बढ़ाने से मना किया था। सिरीष न्यू जर्सी में सोफ्टेवेयर इंजीनीयर था। उसका परिवार दिल्ली में रहता था और वो न्यू जर्सी में सैटल हो गया
था। उसकी मां को भी दूरी ज्यादा लग रही थी। रिष्ता अच्छा था लेकिन एक बार तो मेरे कदम भी रूक गये। परन्तु मैने छवि की आंखो में उसके सपने का पढ़ लिया था। मैने छवि को बुलाकर पूछा । उसने सिरीष का फोटो भी नहीं देखा और बात करने पर शरमा कर अंदर चली गयी। एक बार फिर वह लड़की बन गयी। मेरे जोर देने पर भी लड़का नहीं बनी। पूरानी लड़कियो की तरह शरमा कर चली गयी। मैने उसकी मां को बात करने को कहा । उसकी मां ने बताया कि छवि राजी है।

मै छवि को देख रहा था। मेरी राजकुमारी रानी बनने जा रही थी। टयूबलाईट की सफेद रोषनी में उसकी आंखो में पानी चमक रखा रहा था। मेरे अंदर भी पानी का बहाव नीचे उठकर गले तक आ चुका था। गला भारी हो गयी था। मै जोर लगाकर आंसूओ के दरिया को पीछे धकेल रहा था। ऐसा लगा कि छवि के आंसू भी छलक कर बाहर आ जायंगे। वो उठकर खड़ी होने ही वाली थी । मै कमरे से निकल कर बाहर आ गया। अंदर के दरिया को किसी तरह से रोक दिया। काम में लग गया। बारात आ चुकी थी। सभी अपने काम में व्यस्त हो गयें। मै भी व्यवस्थाओ में लग गया।
 धीरे धीरे रात बीत गयी। अब विदाई की तैयारी हो रही थी । लगभग सब कुछ पैक हो गया था। अब विदा होने की तैयारी थी। यहां से छवि और सिरीष सीधे फलाईट से दिल्ली जायेगे और दिल्ली से न्यू जर्सी । मै ऊपर कमरे में था। दो तीन बार बुलावा आ गया था। मै जा नहीं पा रहा था। मै एक वृक्ष की तरह महसूस कर रहा था जिसकी सबसे हरी भरी डाली काटने की तैयारी हो रही हो। मुझे पता था अब छवि खुद आ जायेगी। ऐसा ही हुआ। छवि खुद आ गयी। हाथ में एक डिब्बा लिये हुए। डिब्बा मेरे हाथ में पकड़ा कर छलक पड़ी। आंखो में आंसूओ का सैलाब आ गया। मै भी अपने आंसूओ के दरिया को रोक नहीं पाया। ऐसा लग रहा था दोनो के आंसू अब नहीं रूकेंगे। पीछे पीछे सिरीष भी आ गया। वो चल कर हमारे नजदीक आया। मेरे पांव छुये। मैने आर्षीवाद दिया। उसने छवि का हाथ पकड़ा और बाहर की तरफ ले जाने लगा। छवि का हाथ मुझसे छुटता जा रहा था। ऐसो लग रहा था छवि का हर एक कदम पेड़की हरी भरी डाली पर कुल्हाड़ी का वार था। ज्यो ज्यो वो कदम बढ़ाती मैं कुल्हाड़ी के वार जैसी आवाज महसूस करता । ज्योही उसने अंतिम कदम कमरे के बाहर रखा, मुझे लगा जोरदार अंतिम वार से मेरी हरी भरी डाल काट दी गयी । मैने झटके जैसा महसूस किया। हाथ का डिब्बा छिटक कर नीचे जा गिरा। डिब्बे से कागज का प्लेन निकल फर्ष पर गिर गया था। मैने कागज का प्लेन उठाया। प्लेन पर लिखा था - ‘ पापा मैने कागज का प्लेन बनाना सीख लिया है। ’ मैं दोड़कर नीचे गया । छवि और सिरीष की गाड़ी एअरपोर्ट के लिए रवाना हो चुकी  थी।

Sunday, March 3, 2013


सुनील गावस्‍कर की अंतिम टेस्‍ट पारी का साहित्‍यक अंदाज में संस्‍मरण

सूखे पत्ते

मार्च के महीने के मध्य तक प्रकृति पर यौवन पूरी तरह छा जाता है। बसंत की शुरूआत में खिले फूल अपने सौंदर्य और खूशूबू में अपने शिखर पर होते है। इन निदो लगने वाली फूलो की प्रर्दशनियों में लोग इसके सौंदर्य को निहारने के लिए उमड़ पड़ते है। इन्ही फूलो की डालियों के बीच पूराने पत्ते जो बसंत आते आते पूरी तरह झड़ जाते है परन्तु फिर भी कुछ एक पत्ते इन्ही डालियों पर लटके हुए तेज हवा के साथ अपने होने का अहसास कराते है। मार्च में ये पत्ते भी झड़ जाते है। 1987 के मार्च में क्रिकेटर सुनील गावस्कर भी युवा क्रिकेटरो के बीच अपने आपको डाली का सूखा पत्ता ही महसूस कर रहे थे। दुनिया प्रकृति की नई कोपालो की दीवानी हो रही थी सुनील गावस्कर के मन में बैचेनी थी। भारत और पाकिस्तान के बीच चल रही पांच टेस्ट मैचो की सीरीज के साथ ही दुनिया  गाावस्कर और टेस्ट क्रिकेट दोनो को अलविदा कर देना चाहती थी।

डालियों के सूखे पत्ते तेज हवा के साथ हिलते हुए गिरने के इंतजार में थे। गावस्कर को गिराया जा रहा था। मजबूत पकड़ को ढीला किया जा रहा था। उसकी जिंदगी में जो चमक थी वो अब किताबो का हिस्सा थी। सब कुछ भुलाया जा चुका था। गावस्कर की नियति तय की जा चुकी थी। पाकिस्तान के विरूद्ध अतिम और पांचवे टेस्ट मैच से पहले होटल के कमरे की दीवारे फलेशब्लैक चला रही थी। प्रशंसको का शोर यादो में ही था परन्तु सुनील के चेहरे पर मुस्कान के लिए काफी था। कपिल देव और अजहरूददीन की युवा पौध के पीछे भागती भीड़ ने सुनील का बिलकुल अकेला कर दिया गया। उसे जाना ही था। वेा तय नहीं करता तो दुनिया द्वारा विदाई तय कर दी जाती। पांच टेस्ट मैचो की सीरीज के पहले चार टेस्ट ड्रा हो गये। वनडे की आंधी में दुनिया टेस्ट मैच को भी खत्म कर देना चाहती थी। गावस्कर और टेस्ट मैच दोनो निशाने पर थे।

पांचवा टेस्ट 13 मार्च 1987 को बेगलुरू में शुरू हुआ। पाकिस्तान ने टाॅस जीतकर पहले बल्लेबाजी का फैसला किया। भारतीय टीम बीच मैदान में जा रही थी। गावस्कर अंतिम बार टेस्ट खेलने मैदान में उतर रहा था। कप्तान कपिलदेव के लिए पूरा स्टेडियम गुंजायमान था। गावस्कर के लिए अब वो दीवानापन नहीं था। सबसे पीछे चलते हुए उसकी नजरे साथी खिलाडि़यो के पैरो की तरफ थी। सूखी घास जूतो से दब जाने के बाद वापिस खड़ी नहीं हो रही थी जबकि ताजी घास वापिस पूर्ववत स्थिति में आ रही थी। गावस्कर स्वयं महसूस कर रहा था कि अब उसकी सारी चमक युवाओ द्वारा रौदी जा चुकी है। उसे विदा होना ही था। पाकिस्तान की टीम जन्दी ही भारत के युवा फिरकी गेंदबाज मनिनंदरसिंह के जाल में फंस गया और पहली पारी मात्रा 116 रन पर सिमटी गयी।

‘ यह तो बिका हुआ है ’ मेरे पीछे बैठे एक दर्शक ने बावस्कर को मैदान मे आते देखकर कहा। ‘ लास्ट मैच है मोटा माल लिया होगा।’ दूसरे ने भी वही राग अलापा । मैने घ्यान नहीं दिया । मैच देखने में मशगूल हो गया। भारत की पारी शुरू हो चुकी थी। तनाव और दबाव गावस्कर पर साफ नजर आ रहा था। जल्दी ही जोरदार अपील । ‘नाॅट आउट’ अंपायर ने सिर हिलाया।
‘ बीवी इंतजार कर रही है। रोहन का लंच बाॅक्स ले जाना है। जल्दी कर। ’ किसी दर्शक ने फब्तियां कसते हुए आवाज लगायी। कुछ ही देर में श्रीकांत आउट। बावस्कर मैदान पर डटा था। दर्शको की फब्तियां कम हो गयी थी। लेकिन दर्शको कोई उम्मीद नहीं थी। जल्दी ही एक बार फिर जोरदार अपील। और ........आउट! गावस्कर आउट मात्रा 21 रन पर । संभवत अंतिम पारी। दस्ताने खोलते हुए संुनील गावस्कर पैवेलियन लौट रहे थे। लग रहा था सब कुछ खत्म । बाावस्कर की चमक इतिहास की बात चुकी थी।  कुछ दर्शक शेम शेम की हूटिंग कर रहे थे। गावस्कर पवेलयिन लौट चुके थे। बिना किसी से बात किये मैच देख रहे थे।

सब ने मान लिया था कि अब क्रिकेट में गावस्कर के लिए कुछ नहीं बचा था परन्तु टेस्ट मैच का रोमांच फिर उभर कर आया था। दूसरी पारी में पाकिस्तान ने रमीजा राजा और सलीम युसुफ की मदद से 249 रन बना लिये। भारत को ढाई दिन में जीतने के लिए 121 रन बनाने थे। बावस्कर और श्रीकांत फिर बल्लेबाजी के लिए उतर रहे थे। बाावस्कर अपने जीवन की अंतिम टेस्ट पारी खेलने जा रहे थे जब हर किसी ने उनको खारिज कर दिया था। पत्नि मार्शनील उनके सुनहरे युग की साक्षी थी। बेटे रोहन ने पापा के स्वर्णिम काल का सुना ही था। गावस्कर को दुनिया ने भले ही खारिज कर दिया परन्तु परिवार ने खारिज नहीं किया था। बेटे और पत्नि का विश्वास जीतना था। गावस्कर जानता था कि वो अंतिम पारी में चल नहीं पाया तो दुनिया भले ही उसे धिक्कारे लेकिन परिवार उसका हमेंशा साथ देगा। अपने बेटे और पत्नि की आंखो में गावस्कर अपने बल्ले से चमक लाना चाहता था।

सूखे पत्ते अंतिम बार डाली पर लहलहा रहे थे। हवा की रफतार तेज हो चुकी थी। स्टेडियम में आये एक हवा के झौके से गावस्कर को महसूस हुआ होगा कि सब कुछ अब हवा में उड़ गया। भारत के सामने दो ही चुन्नौति 121 रन बनाये या ढाई दिन बिताये। भारत की पारी शुरू हुई। शुरूआत में ही गावस्कर के बल्ले के नजदीक से गेंद गयी। जोरदार अपील..........! आउट...दै......ट!
‘ नाॅट आउट ’ अंपायर ने सिर हिलाया।
‘ ओह! बच गया! भारत को  इस पूरानी मशीन से निजात मिल जाती। - मेरे पीछे बेठे दर्शक ने कहा। क्रिकेट प्रेमियो के मन में गावस्कर खटकने लगा था। फटाफट क्रिकेट में इस धीमे अंदाज के बल्लेबाज को क्रिकेट प्रेमी क्रिकेट का दुश्मन मानने लगे थे। बहराल मैच जारी था। हर दो गेंद बाद जोरदार अपील। जल्दी ही भारत के दो विकेट गिर गये। भारत का स्कोर था। 15 रन पर दो विकेट। दूसर छोर पर सुनील गावस्कर ने मौर्चा संभाल लिया था। गावस्कर ने पाकिस्तान गेंदबाजो के आगे दीवार बन कर खड़ा हो गया। दूसरी और भारत का हर बल्लेबाज हाथो हाथ लौट रहा था। क्रीज पर अधिकांश समय गावस्कर व्यतीत कर रहा था। अब सूखो पत्तो में जान आ गयी थी। सूरज के आगे बदली आने से मैदान में ठंडक हो गयी थी।  तीसरे दिन का खेल खत्म होने पर भारत का स्कोर 4 विकेट पर 99 रन था। बावस्कर 51 रन पर नाॅट आउट।
अगला दिन विश्राम का था। गावस्कर पर फब्तियां कसने वाले अब उसकी लंबी पारी की दुआ करने लगे। युवाओ ने अपने हाॅस्टलो के कमरो में कपिलदेव और अजहरूददीन के स्थान पर गावस्कर के पोस्टर चिपका लिये थे। लोगो के लिए विश्राम का दिन काटना लंबा हो गया। भारत को अभी भी 122 रन बनाने थे और दो दिन बाकि थे।
विश्रााम के बाद 17 मार्व 1987 को चैथे दिन का खेल शुरू हुआ । युवा अजहर ने बावस्कर का खूब साथ दिया। बाावस्कर ने पारी को संभाले रखा। पाकिस्तान के सितारा गेंदबाज ईकबाल कासिम ने हर प्रकार की गेंद फेंक कर देख ली परन्तु गावस्कर को नहीं डिगा सके। 123 रन पर अजहरूददन भी आउट। स्कोर 5 विकेट पर 123 रन। दिन ढल रहा था। सारी उम्मीदे बावस्कर पर टिकी। ट्रांजिस्टर पर आंखो देखा हाल सुन रहे लाखो लोग गावस्कर को उम्मीद की पतवार मान चुके थे। उत्साही युवा गावस्कर के फोटो की पूजा करने लगे । रवि शास्त्राी के साथ मिलकर बावस्कर ने पारी को फिर आगे बढ़ाया। गावस्कर द्वारा खेली गयी हर गेंद भारत की उम्मीद बढ़ा रही थी। पूराने पत्तो में जान आ चुकी थी। स्टेडियम में चल रही ठंडी बयार बीत रहे मौसम का अहसास करा रही थी। सुनील गावस्कर क्र्रीज पर रवि शास्त्राी को मौके पर कम दे रहे थे। पाकिस्तान के गेंदबाज बावस्कर पर बेअसर थे।

जल्दी रवि शास्त्राी भी पाकिस्तानी फिरकी में उलझ गये और आउट हो कर पवेलियन चलते बने । स्कोर 6 विकेट पर 155 रन । अब युवा हदय सम्राट कपिल देव मैदान में उतरे । स्टेडियम में गड़गड़ाहट से गुंजायमान हो गया था। वनडे विश्वकप जीतने के बाद लोगो के हदय में गावस्कर का स्थान कपिल देव ने ले लिया था। कपिल देव की चमक में गावस्कर की चमक धुंधला गयी थी। स्टेडियम में तालियो की गड़गड़ाहट इसका गवाह थी। ऐसा लग रहा था कि मैदान में भी कपिल की चमक के आगे गावस्कर की चमक धुंधला जायेगी। कपिल देव ने जोरदार बल्ला घुमाया । गेंद बल्ले और पैड के बीच में से निकलते हुए सीधे विकेटो में जा गिरी और कपिल देव आउट .........। स्टेडियम में पूरी तरह शांति। भारत का स्कोर 7 विकेट के नुकसान पर 161 रन।

अब गावस्कर और टेस्ट मैच दोनो ही पूरी तरह उबर चूके थे। दोनो ने ही पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। लोग दफतरो में अपना काम छोड़कर ट्रांजिस्टर पर इस संघर्षपूर्ण टेस्ट मैच का आंखो देखा हाल सुनने लगे। गावस्कर एक एक गेंद से लड़ रहे थे। बल्ले और गेंद का कठोरतम संघर्ष था। शिवलाल यादव से पुछल्ले बल्लेबाज के साथ भी गावस्कर भारत के लिए लड़ रहे थे। जिंदगी उनका जादू खींच कर वापिस बंगलौर के रामास्वामी स्टेडियम में ले आयी थी।  जिंदगी जीत रही थी। पूरे देश का ध्यान सुनील गावस्कर पर केन्द्रित हो गया। एक एक गेंद गावस्कर के बल्ले से टकराकर खिलाडि़यो के पास चली जाती। पाकिस्तानी अपने माथे का पसीना पौछते हुए गावस्कर नाम की पहेली का हल खोज रहे थे। दिन बीत रहा था। उम्मीदे बढ़ रही थी। भारत का स्कोर 180 रन पहुंच गया था। गावस्कर 96 रनो पर खेल रहे थे । मंजिल सामने नजर आ रही थी। मुश्किल थी  परन्तु गावस्कर की मौजूदगी से ये आसान लगने लगी। पूरे मैच में इतने रन बनाने वाला एकमात्रा बल्लेबाज। बाावस्कर शतक के करीब। आंखो में खुशी। पर मैच जीतकर इसे बढ़ाना चाहते थे। लगभग डेढ दिन से बल्लेबाजी कर रहे थे गावस्कर। लोगो की उम्मीदे सातवें आसमान पर थी। इकबाल कासिम एक बार फिर बावस्कर को गेंद फेंक रहे थे। दर्शक शतक के लिए तालियां बजा रहे थे। कासिम ने गेंद फेंकी।................................आउट।..............................गावस्कर ..............आउट..........................। नजदीक फिल्डर रिजवान ने लगभग गिरते हुए गेंद को लपक लिया। भारत का स्कोर 8 विकेट पर 180 रन। भारत की उम्मीदे खत्म। बाावस्कर 96 रन बनाकर पवेलियन लौट रहे थे। पूरे स्ेटेडियम में दर्शक, साथी खिलाड़ी, पाकिस्तानी खिलाड़ी खड़े होकर इस महान खिलाड़ी का अभिवादन कर रहे थे। भारत मैच हार गया लेकिन गावस्कर जीत गया। सांय सायं करती हवाओ के बीच कुछ सूखे पत्ते उड़ते हुए हमारी दीर्घा में आकर गिरे । मैने उठा लिये।
पीले पड़े पत्तो में बीच हरे रंग पर मेरी नजरे टिक गयी। तालियों की गड़गड़ाहट से मेरा ध्यान भंग हुआ। बावस्कर बीच मैदान में मैन आफ द मैच का पुरस्कार ग्रहण कर रहे थे।



Tuesday, September 6, 2011

सोनि‍या




ट्रेन अपनी तेज रफतार के साथ दौड़ रही थी। ठंडी हवा के झौंके गर्म हवा मे बदल रहे थे। उड़ रही धूल यह अहसास करा रही थी कि‍ ट्रेन उतरांखड के ठंडे मौसम से मरूस्‍थली राजस्‍थान में प्रवेश कर रही ही है। खि‍ड़की पर अपनी गर्दन टि‍का कर आशीष बैठा था। उसने अपना ऐनक उतारा और उसके कांच साफ कि‍ये और वापि‍स पहन लि‍या। ऐनक लगाये हुए उसके चेहरे में कि‍सी इन्‍टेलैक्‍चुअल व्‍यक्‍ति‍त्‍व की झलक दि‍खाई दे रही थी। टी शर्ट और पेंट पर जमी रेत का हाथो से साफ कर वापि‍स खि‍डकी से सि‍र को सटाकर बैठ गया। आस पास के सहयात्रि‍यों में उसकी रूचि‍ प्रतीत नहीं हो रही थी। धड़ाम धड़ाम ट्रेन की आवाज उसे अतीत की यादो में खींच रही थी। उडती हुई रेत सहयात्रि‍यों के लि‍ए परेशानी का कारण हो सकती थी। उसे तो इस रेत की छुअन अपने गांव का अहसास करा रही थी। रेत के सुनहरे धोरो उसकी यादो में लहरा रहे थे। गांव के इन्‍ही धोरो पर शाम को स्‍कूल की छुटटी होने के बाद सोनि‍या लेट जाती थी। स्‍कूल की यूनि‍फॉर्म पहने हुए। बैग को एक कि‍नारे पटक कर। ढलते सूरज के साथ अपनी गरमाहट कम करते हुए धोरे अपनी ठंडी होती रेत की छुअन से पन्‍द्रह साल की सोनि‍या को धीमी आंच में परि‍पक्‍वता को पका रहे थे। एकदम शांत । आस पास कोई नहीं । तेज हवा का झोंका उसके पूरे बदन पर रेत बि‍खेर देता। उसके शरीर में कोई हलचल नहीं होती । वो शायद अपने जीवन के मायने तलाशती। नि‍ढाल पडी । अपने जीवन को पढती। रेत से सने हुए बाल और चेहरा । उसे कोई फर्क नहीं पड़ता।

      एक दि‍न शाम ऐसे ही धोरो पर लेटी हुई थी। कि‍सी ने आवाज दी सोनि‍या............।  तेरा भाई भगत मंदि‍र के पास गि‍र गया। रो रहा है। आवाज के साथ ही सोनि‍या उठ खडी हुई। एक हाथ में बैग उठाकर धोरो पर फर्लांगे मारते हुए दौड पडी। धोरो पर शायद इतना तेज उंट भी नहीं चल पाये। धोरो में धंसते पैरो को तेजी नि‍कालते हुए उसने दौडने की रफतार बनाये रखी। मंदि‍र के पास अपने भाई को रोते हुए देखते ही अपना बैग एक और फेंक कर भगत के सामने बैठकर पूछा- कि‍सने गि‍राया । भगत बता कि‍सने गि‍राया अपनी आंखो को मलते हुए भगत ने वहां खड़ी एक लड़के की ओर ईशारा कर दि‍या । फि‍र क्‍या था। सोनि‍या ने अपनी चप्‍पल उतारी और लडके को चटाक चटाक धुनाई कर दी। मरूस्‍थल में आये धतूलि‍ये (एक जगह रेत का तेज हवा के साथ उडना) की तरह सोनि‍या उस लडके पर टूट पडी। वहां खड़े कुछ लोगो ने दौडकर बीच बचाव कि‍या। लेकि‍न सोनि‍या की आंखे एकदम लाल। हाथ में चप्‍पल लि‍ये । जैसे आज वो सबसे लड़ लेगी। भगत भी डर गया। दौडकर अपनी बहि‍न के लि‍पट गया। ऐसी ही थी । सोनि‍या अपने भाई के लि‍ए मर मि‍टने को तैयार।
गांव में आशीष के घर से थोडी दूर पर ही रहती थी सोनि‍या। दुनि‍या में कोई नहीं । भाई के सि‍वा। गांव में अपने मामा और मामी  के साथ रहती थी। मामा मामी के कोई औलाद नहीं थी। पर जैसा कहानियों में होता है। दोनो भाई बहि‍न को मामा से स्‍नेह ज्‍यादा मि‍लता था। ट्रेन की धड़ धड़ की आवाज आशीष के मन को लपेट कर ठेठ गांव में ले गई।
आसू तुं फि‍र आ गया । सोनि‍या ने धोरे  पर लेटे हुए कहा। सोनि‍या को अक्‍सर धोरो पर अकेला लेटा देख कर आशीष भी वहां पहुंच जाया करता था।
मैं देखने आया हू। तुम यहां लेटे हुए क्‍या सोचती हो।
      देखकर पता लगा लेगा।
      लगा लि‍या है।
      तो बता।
      तुम अपने मां बाउजी से बात करती हो। आशीष की इस बात को सूनते ही सोनि‍या उठकर बैठ गई। चेहरे पर आ गये बालो को हाथो से पीछे कर गर्दन घूमा कर आशीष की ओर देखा। फि‍र नजरे धोरो पर टि‍का दी। आंखो में आंसूओ की परत चमक रही थी। आंसूओ को आंखो से बाहर नहीं आने देने की जुगत करते हुए उसने कहा आसू । याद करके दुख होता है। इसलि‍ए कभी याद नहीं करती । बस । सोचती हू। भगत को डाक्‍टर बनाना । कैसे बनाना है।
अभी बहुत वक्‍त है। अभी वह बहुत छोटा है।
आसू । वक्‍त मेंरे पास कम है।
अच्‍छा। बता। भगत को डाक्‍टर बना देगी। पर तुं क्‍या बनेगी। वि‍श्‍व सुंदरी। धूल से सनी हुई। बि‍खरे बालो वाली वि‍श्‍व सुंदरी। यह कहते हुए  आशीष वहां से उठ कर भागा।
  ठहर । अभी बताती हू। कहते हुए धोरो पर फर्लागे मारती हुए सोनि‍या हंसते हुए उसके पीछे दौड पडी।
बाबूजी । चाय । चाय वाले ने जोर से आशीष के नजदीक आकर कहा। यादो की श्रंखला टूट गई। शायद कोई स्‍टेशन आया होगा। अब गांव ज्यादा दूर नहीं है। दो चार घंटे में ट्रेन गांव के स्‍टेशन पहुंच जायेगी। चाय की चुस्‍कि‍यो के साथ आशीष के दि‍माग में फि‍र से सोनि‍या दौड़ने लगी। मानो सोनि‍या के पैर रेत के धोरो मेंनहीं धंस रहे हो, उसके दि‍माग में धंस कर यादो को ताजा कर रहे हो। हमेंशा स्‍कूल की यूनि‍फार्म में इधर उधर दौड़ती रहती। आवाज इतनी तेज की ऐसा लगता गांव में केवल एक सोनि‍या ही है। आशीष ने कॉलेज और आगे की पढाई के लि‍ए गांव छोड़ा तो सोनि‍या अपने पढाई छोड भगत का पढाने के लि‍ए जी जान से जूट गई। अपनी मामी से झगडते हुए वह देख सकता था । जब भी आशीष बीच बचाव की बात करता सोनि‍या कह देती । आसू । मेरे और भगत के मामले में कुछ मत बोलना। आशीष शहर आकर कब आसू से आशीष बन गया । उसे अहसास ही नहीं हुआ। नौकरी लगने के बाद पहली बार गांव आया तो दौड़कर धोरो पर गया। यहीं लेटी होगी सोनि‍या हमेंशा की तरह। परन्‍तु वहां कोई और बैठी थी। स्‍कूल की यूनि‍फार्म भी नहीं थी। आशीष पहचान नहीं पाया। नजदीक गया।
कौन हो तुम।
वि‍श्‍व सुंदरी।
हो हो सोनि‍या। बहुत बदल गई। वाकई वि‍श्‍व सुंदरी लग रही हो।
मजाक  कर रहे हो।
गूंथे हुए बाल। रंग बि‍रंगी घाघरा कुर्ता पहने हुए। हाथ में एक ति‍नका लि‍ये हुए। जि‍से अपने दांतो से कुतर रही थी। आशीष नजदीक गया और हाथ से ति‍नका छि‍न कर नीचे फेकते हुए कहा मैं तो मात खा गया। तुमने मुझे पहचान लि‍या। तुम्‍हे पता है । शहर में मेरी नौकरी लग गई है। मां बाउजी को लेन आया हू। खूशी के साथ सोनि‍या को एक साथ सब बता दि‍या। सोनि‍या अपने हाथो से घाधरे को पकड कर धोरे पर बैठते हुए कहा बस । बता दि‍या। और कुछ।
सोचता हू। तुम्‍हे भी ले जाउं।
क्‍यों?’
ब्‍याह करके।
मैं ब्‍याह नहीं करूंगी। खासकर तुमसे।
क्‍यों । मैं बुरा हू।
मैं भगत के डाक्‍टर बनने तक ब्‍याह नहीं करूंगी और तब तक तुम्‍हे इंतजार नहीं करना चाहि‍ए। यहां आते ही आशीष नि‍राश हो गया। कुछ नहीं कह पाया। घर जाकर रवानगी की तैयारी में जुट गया। मां बाउजी के साथ सारा सामान भी ले जाना था। शहर में सरकारी क्‍वाटर जो मि‍ल गया था। दो दि‍न में सारी तैयारी कर ली। रवानगी का वक्‍त भी आ गया। सारा सामान तांगे में रख लि‍या था। अचानक दौडकर सोनि‍या के घर गया। सोचा सोनि‍या के मामा- मामी से बात कर लूं। घर की चौखट पर पहुंचा ही था, अंदर से आ रही आवाजे उसके कानो से टकराने लगी।
मै कुछ नहीं समझती। मेरे बाउजी जो 2लाख रूपये छोड गये है मुझे चाहि‍ए।
ऐ छोरी । बडी आई हि‍साब करने वाली । तेरे को रोटि‍यां खि‍लाने में खर्चा नहीं लगा।
मैं उसकी एक एक पाई चुका दुगी। परन्‍तु इन पैसो पर मेरे भाई का हक है। बडी मुश्‍कि‍ल से उसका डाक्‍टरी में दाखि‍ला हुआ है। मै यह पैसे लेकर छोडूगी। उसकी फीस इसी पैसे से जमा होगी।
मै भी देखती हुं। कैसे लेती है तु पैसे।
इस क्‍लेश को सुनकर आशीष तय नहीं कर पा रहा था। अंदर जाये या नहीं । इतने में उसे बाउजी ने आवाज लगा दी। ट्रेन का वक्‍त हो रहा था। वह लौट गया। गांव में उसकी यह आखि‍र शाम थी। उसके बाद वो गांव नहीं गया। नहीं कोई खबर ली। शहर में अपने कामो में व्‍यस्‍त हो गया।
      ट्रेन के रूकते ही एक बार फि‍र यादो का सि‍लसि‍ला थम गया। शायद गांव नजदीक था। हां । अगला स्‍टोपेज आशीष का गांव ही था। आशीष ने अपना सामान नीचे उतारा। सामान क्‍या। एक सूटकेस था। उठाकर वह दरवाजे के नजदीक खडा हो गया। ट्रेन चल पडी । अब दस-पन्‍द्रह मि‍नट का सफर था। दरवाजे के बाहर ट्रेन के गति‍ पकडने के साथ ही आशीष के आंखो के सामने झाडि‍या और रेत के धोरे सब दौड़ रहे थे। धड़ धड़ की आवाज फि‍र उसे यादो में खींच रही थी। पूरे चार साल के बाद सोनिया से मि‍लने जा रहा है। भगत डॉक्‍टर बन गया होगा। मामी ने जरूर सोनि‍या की शादी कर दी होगी। वो तो चाहती थी कि‍ सोनि‍या से उसका पीछा जल्‍दी छूटे। देखे । गांव में जाकर क्‍या हुआ । आशीष अपने ही मन से कहता है। मैंने नहीं की तो। उसने भी शादी नहीं की होगी। गांव के कुंए पर पानी भरती हुई। धोरो पर धीमे धीमे चलती हुई। सोनि‍या। उसे मालूम ही नहीं था कि‍ वो खूबसूरत है। उसने तो अपने भाई के लि‍ए अपने आप को तपाया। आशीष के दि‍माग में चि‍त्र ईधर उधर दौड़ रहे थे। रेउसर ..... रेउसर .........। आवाजो से आशीष का ध्‍यान टूटा। ट्रेन रूकी हुई थी। उसका गांव आ गया ।
      सूटकेस लेकर प्‍लेटफार्म पर पैर रखते ही ट्रेन आगे रवाना होगई। आशीष ने सूटकेस नीचे रखकर आसमान की ओर देखा और अपने दोनो हाथ फैला दि‍ये । अपने गांव की आबो हवा। शरीर से टकरा कर मानो दुलार करना चाह रही हो। एक उर्जा भर देती है अपने गांव की हवा। अब आशीष के पैरो में बचपन वाली तेजी नहीं थी। चाल में मैच्‍योरि‍टी आ गई थी। स्‍टेशन से बाहर आकर सोचा। धोरो की ओर से नि‍कल लूं। सोनि‍या गांव में ही है तो वहीं मि‍ल जायेगी। सूटकेस हाथ में लि‍ये हुए धोरो पर चल पड़ा । कोई नहीं बि‍लकुल सुनसान। रेत में धंसते हुए पैरो को कि‍सी तरह बाहर नि‍काल कर चलता हुआ। तेज हवा के साथ धोरो से रेत की चादर उड़ कर आशीष के आंखो के आगे छा गई। हाथो को हि‍ला कर आंखो के आगे से रेत को हटाया। फि‍र भी कोई दि‍खाई नहीं दि‍या। तेज हवा के साथ एक लय में उड़ती हुई रेत में संगीत सी झनझनहाट उसे महसूस नहीं हो रही थी। हर एक झौंका सूनेपन का अहसास दे रहा था। वो यहां नहीं है। मन कुछ ठीक नहीं है। अच्‍छा नहीं लग रहा है। मन में दुवि‍धा है। वह यहां क्‍यो आया है। सोनि‍या से मि‍लने । शादी करने । हालचाल जानने। कुछ पता नहीं । सूटकेस को नीचे रखा। दोनो हाथो की अंगुलि‍यो बालो में डालकर आगे से पीछे ले गया। रूमाल नि‍काल कर अपना ऐनक साफ कि‍या। फि‍र चल पड़ा। अपने मकान को संभालने की बजाय पहले सोनि‍या के घर की ओर गया। मामा जी बाहर ही खड़े थे।
पायं लागू।
अरे । आसू तुम। खुश रहो । चलो चलो अंदर चलो। मामाजी के शब्‍दो में उत्‍साह नहीं था। वह उनके पीछे हो लि‍या। ड्रांईग में जाकर बैठ गया। मामीजी चाय पानी रखकर चली गई। दोनो कुछ देर खामोश बैठे रहे ।
कैसे हो। मां बाउजी कैसे है। मामाजी ने बात शुरू की।
ठीक है। परन्‍तु आप बताओ सोनि‍या दि‍खाई नहीं दे रही है।
खामोशी। मामा ने सांस अंदर खींची और एक साथ छोड़ दी। सोनि‍या के नाम से ही आंखे गलगली हो गई। लगो  उनके पूरे शरीर में सि‍हरन दौड़ गई। दोनो हथेलि‍यो को कंधो पर फेरते हुए  नजरे दरवाजे पर टि‍का कर कहा आसू। तुम्‍हारे जाने के बाद भगत चंडीगढ में डाक्‍टरी की पढाई करने लगा। सोनि‍या मजदूरी भी करने लगी थी। जि‍दगी चल रही थी। मामी के साथ खटपट रहती थी। पर जिदगी रूकी नहीं चलती रही। अभी हाल ही में भगत डॉक्‍टरी पूरी करके गांव में आने वाला ही था। बहुत तैयारी कर रही थी। भाई के स्‍वागत की । दुलार की। कि‍सी ने आवाज लगाई । भगत आ गया है। दौड़ते हुए बाहर की ओर गई। थोड़ी दूर ही चल पाई थी कि‍..........। मामा का गला रूंघ गया । आवाज भर्राने लगी। आशीष मामा के पास जाकर बैठगया। कंधे पर हाथ रखकर कहा बताओ मामाजी क्‍या हुआ ।
आसू। बस सोनि‍या वही गि‍र पड़ी। मुंह से खून आने लगा। भगत दौड़ कर आये। गांव के अस्‍पताल ले गया। उसने एक बार आंखे खोली । भगत को देखा। फि‍र उसने आंख नहीं खोली। भगत की गोद में ही दम तोड़ दि‍या। डाक्‍टरो ने बताया उसे कैंसर था।
आशीष बि‍लकुल सुन्‍न हो गया। जैसे रेत के धोरो पर सन्‍नाटा पसरा हो। बूत की तरह बैठा था।