Saturday, September 30, 2017

मैं एक बार फि‍र
देर तक सोना चाहता हूूं
सूरज माथे पर चढ आये
तब तक
मां आवाजे देती रहे
मैं करवटे बदलता रहूं
अधखुली आंखो से जागूं
बि‍स्‍तर पर ही चाय ले लूं
अखबार के सारे पन्‍ने पढ् लूं
वि‍ज्ञापन भी
फि‍र लेट जाऊं और
देर तक सोता रहूं
दोपहर को पलंग पर लेटे हुए
टीवी के सारे सीरि‍यल और
थोडी देर कोई मैच देख लूूं
शाम को चला जाऊं
कि‍सी ठेले पर और
जी भर कर गोल गप्‍पे खाऊं
फि‍र कि‍सी चाय की थडी पर
मि‍त्र मंडली के साथ
थोडी क्रि‍केट की और थोडी राजनीति‍ की
चर्चा करूं
देर रात तक मि‍त्र के घर पर
उसके पलंग पर लेटा रहूं
बहुत देर रात को घर लौटूं
जब घर के सारे लोग सो जायें
और मां धीरे कदमो से दरवाजा खोले
मैं धीमे कदमो से से अपने कमरे में जाकर
बि‍स्‍तर पर लेट जाऊं
और टीवी पर लेट नार्इट मूवी देखूं
फि‍र नींद ले लूं
और देर तक सोता रहूं
क्‍योंकि‍
मैं एक बार फि‍र
देर तक सोना चाहता हूूं । 

Friday, September 29, 2017

(एक)

मैं शांत पानी होना चाहता हूं
जिसके उपर दोपहर की धूप
बिछ जाये
चिड़ियायें चहचहाट करती हुयी
मेरे उपर से निकल जाये
सन्नाटे की आवाज मेरे उपर
घूमती रहे
बकरीयो के मिमियाने की आवाज
मेरे किनारो का छुकर निकल जाये
शाम को पहाडो की लंबी छाया
मेरे उपर गिर जाये
पर
कोई कंकर में मेरे उपर
गिर न पाये
जो मेरी सतह पर
कई भंवर बनाता जाये।
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(दाे)
मेरी आत्मा
अकेला रहना चाहती है
बिलकुल अकेला
किसी से बात नहीं करना चाहती है
मन से भी नहीं
जब मेरी देह सोती है
तो आत्मा बात करती है
अपने आप से
अपने आपको देखती है
खरोंचोे से लहुलहान है
आत्मा की खरोंचो से
लहू रिस रहा है
वो कुछ नहीं कर सकती
देह के बिना
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Sunday, September 24, 2017

एक कवि‍ता

अल सुबह
सड़क पर कुछ एक वाहनो
के हाॅर्न को
स्कूल जाते बच्चो के षोर को
सडक पर झाडू बुहारती
महिलओ की बातो को
दूध वाले और अखबार वालो
की आवाजो को
अपने कानो के बिलकुल पास से
निकालते हुए
अपना चेहरा नीचे किये
कुछ बुदबुदाते हुए
तेज कदमो के साथ
सफेद साड़ी में
कुछ महिलाऐ जा रही है
सीधे आश्रम में
जहां वे अपने कान
खोल देगी
पवित्र आवाजो
के लिए ।


Saturday, September 23, 2017

रेत के टीले
पूरी तरह से
मौन है
सूरज की तपन
भी उन्हे विचलित
नहीं कर पायी है
पवन  की लहर
चलती है
टीलो के सपनो को
एक लय में उडा
ले जाती है
वे
देखते है उन्हे जाते हुए
अपने से दूर
खेजड़ी से लिपट कर
वे पवन से
संघर्श करते है
पर
वह उन्हे अपने साथ
ले जाती है
किसी और के
सपनो को पूरा करने के लिए
निर्मिषेश होकर देखते रहते है
टीले
अपने सपनो को
पवन के साथ जाते हुए
बिलकुल मौन होकर ।

Sunday, August 20, 2017

कवि‍ता
सन्‍यासि‍यों का झुण्‍ड बाते करता है

सन्‍यासि‍यों का झुण्‍ड अपने आश्रम में
गोल घेरे में बैठा हुआ
गेहरूऐं वस्‍त्रो को संभालते हुए
अपने सपाट सि‍र पर हाथ फेरते हुए
बाते कर रहा है।

गेहरूऐं वस्‍त्रो ने वि‍षय आसक्‍ति‍ से
उन्‍हे दूर कर दि‍या है
सपाट सि‍र ने उन्‍हे कर्मकाण्‍डो से
मुक्‍त कर दि‍या है
फि‍र भी
वे अपने आश्रम में एक झुण्‍ड मे
बातें कर रहे है

उनके चारो ओर शून्‍य है
बाहर भी और भीतर भी
एकाकार होना चाहते है वे शून्‍य में
अपने को वि‍लीन कर देना चाहते है
शून्‍य में
पर
कर नहीं पा रहे है वे वि‍लीन अपने आपको

कोने में आसन पर गुरू बैठे है
बि‍लकुन मौन
वो एकाकार हो गये है
बाहर से और भीतर से
इसीलि‍ए वो बातो में शामि‍ल नहीं है
परन्‍तु
सन्‍यासि‍यों का झुण्‍ड गोल घेरे में
आश्रम में बैठा हुआ

बाते कर रहा है। 

Thursday, March 20, 2014


लव डॅाट कॅाम

   

केफेटेरिया के काउण्टर पर भीड़ थी। राॅक्स ने दो चार स्टुडेण्टस के पीछे से ही हाथ लंबे कर टोकन को काउण्टर पर फेंकते हुए वेटर के हाथो से काॅफी के दोनो कप ले लिये। काफी के दोनो कपो को स्टुडेण्टस से बचाते हुए हाथ उपर किये हुए राॅक्स ज्यो ही घूमा प्रोफेसर सिन्हा से टकरा गया। सिन्हा के हाथ की काफी का कप नीचे छिटक गया। ‘ क्या हो गया है आजकल के छोकरो को । जरा भी देखकर नहीं चलते । चष्मा पहन कर हीरो बने फिरते है। कुछ भी दिखाई नहीं देता है।’ प्रोफेसर अपने कपडो को ठीक करते हुए बुदबुदाये।

    राॅक्स काफी के दोनो हाथ में कप लिये आगे निकल गया था। प्रोफसर की आवाज सुनकर उसने पीछे गर्दन घुमायी और शब्दो को लगभग प्रोफेसर की तरफ धकियाया - सर! हीरो बताने के के लिए थैक्यू और यू नो ! मेरे पीछे आंखे नहीं है ! इसलिए आपको देख नहीं पाया। सर। एक बात और बता दू। गोगल्स लगाने का मतलब आंखो पर पटटी बांधना नहीं है। इसमें से आप देख भी सकते है।

    राॅक्स प्रतिक्रिया का इंतजार किये बिना गोल टेबल्स के बीच में से कमर मटकाते हुए आगे निकल गया। नाम तो राकेष था। काॅलेज में राॅक्स नाम से ही जाना जाता था। बालो को बीच में खड़ा किये हुए, एक कान में रिंग्स, कलाई में फैषननुमा काले मोतियो की माला लपेटे हुए बिलकुल नये जमाने की जीव की तरह लग रहा था। कमर मटकाते हुए और गुनगुनाते हुए सीधे प्रीति की टेबल्स पर पहुंच गया। कोहनी टेबिल पर और सर हथेली में रखे प्रीति राॅक्स को ही देख रही थी। कंधे तक बाल। आई ब्रोे डिजायन किये हुए। आंखे जैसे पूरे चेहरे से मैच करती हुई। प्रीती राॅक्स की दोस्त है और दोनो ने इसी सालं साफट इंनीजियरिंग पूरी की है।

ये लो गरमा गरम काॅफी। कहते हुए राॅक्स बैठ गया।
क्यों उलझते हो हर एक से ।
मैं कहां उलझा। पता नहीं लोगो को क्या हो गया है।
क्या हो गया है? प्रीती ने काफी का घूंट लेते हुए कहा।
इनका मानना है कि हम लोग कुछ भी करे गलत है। हैयर स्टाइ्रल चेंज करे तो फैषन है और खुद आज भी राजेष खन्ना और देवानंद की हेयर स्टाईल मेंनटेन किये हुए है।
राॅक्स के व्यंग्य पर प्रीती मुस्कुरायी और बात बदलते हुए कहा - जाॅब ज्वाईन कर रहे हो ?


मैं तो नहीं । तुम ?
मैं तो अगले हफते ज्वाईनिंग के लिए दिल्ली जा रही हूॅ। तुम क्यों नहीं  ?
प्रीती । मै इस लफडे में नहीं पडता । साफटवेयर इंजीनियर बन कर किसी की गधा मजदूरी नहीं करूंगा। खुद क्रियेषन करूंगा। वैसे भी अभी मस्ती के दिन है। जाॅब्स के नहीं । राॅक्स ने काॅफी खत्म करते हुए कहा।
राॅक्स। सोच लो। आगे आफर मिले या नहीं ?प्रीति ने अपने बालो को आंखो के आगे से हटाते हुए सलाह दी।
प्रीती छोडो। इट इज मस्ती टाईम । अभी घर जाकर डैड से भी यही सब सुनना है। अरे हां। मुझे लैपटाप पर कुछ काम भी करना है। घर चलते है। मै तुम्हे ड्राप कर देता हू।  कहते हुए राॅक्स अपने लैपटाप के बैग को गले में लटकराते हुए खड़ा हो गया। राॅक्स ने बाईक स्टार्ट की और प्रीति झट से उसके पीछे बैठ गयी। राॅक्स की बाईक धुंआ छोडते हुए कुछ पलो में ही केफटेरिया की रोड से ओझल हो गयी। वहां खड़े लोगो तेजी से आष्चर्यचकित थे।

    राॅक्स के घर में प्रवेष करते ही पहले ड्रांईग रूम है। ड्राईग रूम में डैड अखबार  लिये बैठे थे। टीवी आॅन था। उनका ध्यान न टीवी में था और न ही न्यूजपेपर में । उनके कान तो राॅक्स के आने की आहट का इंतजार कर रहे थे। राॅक्स ने जैसे ही घर में कदम रखा, डैड का इंतजार खत्म हुआ। चेहरे के आगे से अखबार हटाये बिना ही बोल पड़े- वेलकम। सर। डैड का लहजा व्यंग्यात्मक था। राॅक्स वहीं दरवाजे पर ही खड़ा हो गया।

अंदर आओ। बैठिये सर। डैड का व्यंग्य जारी था। परन्तु राॅक्स पर कोई फर्क नहीं । गोगल्स को माथे पर करते हुए बोल पडा - डैड। मै हमेंषा की तरह सुनने के लिए तैयार हुु। कह डालिये।
हां । भई करेगा तो अपनी मर्जी की। मैने सुना है तुम जाॅब नहीं कर चाहते हो।
सही सुना है।
क्यों? पांच लाख का पैकेज है ।
डैड। मैं अभी जाॅब के चक्कर में नहीं पड़ना चाहता हू। फिलहाल मेंरा जाॅब करने का कोई ईरादा नहीं है।
मेरे सोचने और नहीं सोचने का कोई मतलब नहीं है ?
किसी के सोचने पर कोई पाबंदी नहीं है। आप किसी के बारे में सोच सकते हो ।
मतलब मेरी तुम्हारे लिए कोई वैल्यू नही है ? डैड के शब्दो में तल्खी बढ़ती जा रही थी।
किस ने कहा ? आपकी वैल्यू है। आप मेरे डैड है।
केवल कहने को ?



किसी काम को मैं कैसे करता हू। यह मेरा काम है। आपकी सोच से मैं काम नहीं कर सकता है। मुझे जो करना है । मैं करूंगा। मैं यह जाॅब नहीं करूंगा। 

डैड  न्यूजपेपर को समेटकर टेबिल पर रखते हुए खड़े हो गये। नथूने फुलाते हुए राॅक्स के बिलकुल करीब आ गये। राॅक्स के चेहरे बिलकुल करीब फुले हुए नथुनो से सांस को छोड़ते हुए डैड ने दांतो को लगभग भीचते हुए कहा - आखिर क्यों नहीं करना चाहते हो जाॅब। तुमे इंजीनीयर बनाने के लिए मैने 13 परसेंट पर लाॅन लिया था। कब तक चुकाउंगा और तुं कब तक मेरी सेलरी पर पलता रहेगा।

डैड के गुस्से पर राॅक्स की स्थिर प्रतिक्रिया था। धीरे धीरे अपने चेहरे को उठाया। डैड के नजरो से अपने आपको अलग करते हुए गर्दन को दूसरी तरफ घुमाया। डैड की आंखो के गोले आंखो के बीच में रूके हुए राॅक्स को देख रहे थे। राॅक्स ने डैड का चेहरा देखे बिना ही धीमे स्वर में कहा - मुझे मेरे खर्चे के लिए पैसे देना या नहीं देना । ये डिसीजन आप ले सकते है। जाॅब करना या नहीं करना। ये डिसीजन मुझे करना है। मैंने अपना डिसीजन कर लिया है। आप भी अपना डिसीजन ले सकते है।’ राॅक्स के शब्दो में तल्खी नहीं थी। बहुत ही धीमे स्वर में उसने अपनी बात कही। डैड ने अपने नथुनो से और जौर से सांस लेकर छोड़ी- तो ठीक है मैंने भी अपना डिसीजन कर लिया। अब अपने खर्चो के लिए मेरी तरफ मुंह नहीं ताकना। मैने सोफटवेयर इंजीनीयर बना दिया। मेरी जिम्मेदारी खत्म।

थेक्स! डैड मुझे मंजूर है।कहते हुए राॅक्स अपने कमरे की तरफ चल दिया। डैड राॅक्स को देखते रहे ।आंखे बंद कर असहाय स्थिर भाव से खड़े हो गये । 

    पैट्रोप पंप पर बहुत भीड़ थी। एक ही लड़का पैट्रोल डाल रहा था। लगता है बाकि स्टाफ छुटटी पर था। नेक्स्ट! नैक्स्ट! नैक्स्ट ! कहते लड़का जल्दी जल्दी कस्टमर निपटा रहा था। राॅक्स के डैड भी लाईन में थे। आफीस के लिए देर हो रही थी। उनके पास स्कूटर था और स्कूटर में तेल की खपत भी ज्यादे होती है। पैट्रोल का दाम भी पसीने छुडा रहा था। यही सब सोचते हुए डैड अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। बारी आने पर टंकी का ढक्कन खोलकर पैट्रोल डलवाया। पर्स से पैसे निकाल कर ज्योही लड़के की तरफ बढ़ाये। शक्ल कोई जानी पहचानी लगी। कैप और चष्मा होने के कारण एकदम से नहीं पहचान पाये। चेहरा करीब आते ही डैड के चेहरा गुस्से से तमतमा गया । ‘ राॅक्स तुम!
राॅक्स ने डैड की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया । अपने काम में फिर से जुट गया।




नैक्स्ट ! नेक्स्ट ! आवाज के साथ ही डैड को आगे सिरकना पड़ा। कानो में अभी भी नैक्स्ट नैक्स्ट की आवाजे गुुज रही थी। पंप पर रूके बिना ही स्कूटर स्टार्ट कर आफीस की तरफ चल दिये।

    आफीस में टेबिल पर अपना बैग रख अपने चेहरे पर हथेली रखकर बैठ गये। आफीस की चहल पहल डैड के लिए बेअसर थी। माथे पर सलवटे। नजरे स्थिर । तनाव को साफ तौर पर उनके चेहरे पर देखा जा सकता था। पास बैठे माथुर साब भांप गये कि गुप्ता जी कुछ परेषान है।

क्या बात है गुप्ता जी ! कुछ परेषान दिख रहे हो।
क्या बताऊं माथुर साहब। हर एक की किस्मत आप जैसी कहां। ऐसे लगा माथुर साब ने राॅक्स के डैड की दुखती रग पर हाथ रख दिया था।
क्यों । किसने कहा आपकी किस्मत खराब है।
देखो आपका लड़का दुष्यंत कितना आज्ञाकारी और होनहार । इ्रंनीनियंरिंग करते ही 25 लाख का पैकेज मिल गया। इधर हमारा राकेष यानि राॅक्स। पूछो मत।
गुप्ता जी। परेषान मत होईये। राॅक्स को भी तो पांच लाख पैकेज मिला है। चिंता क्यों करते हो। यह तो बढ़ जायेगा। माथुर साहब ने गुप्ता जी को सात्वंना दी।
माथुर साहब। इतना भी होता तो ठीक था। परन्तु साहबजादे ये जाॅब नहीं करना चाहते है। क्रियेषन करना चाहते है।

माथुर साहब ने गंभीर होते हुए पूछा - आपने राॅक्स से पूछा क्या कि वह क्या क्रियेषन करना चाहता है।
माथुर साहब क्या पूछं आज तो उसने हद कर दी। कल मैंने डांट दिया तो आज से पैट्रोल पंप पर काम करता हुआ मिला।
इसमें परेषान होने की कोई बात नहीं ?
लोग क्या सोचेगें कि गुप्ताजी के घर मं इतनी कंगाली आ गयी है कि लड़के को पैट्रोल पंप पर काम करना पड़ रहा है।
गुप्ता जी। राॅक्स नई सोच का लड़का है। यूरोप में तो अक्सर बच्चे अपने हाथ खर्चे के लिए पैट्रोल पंप पर काम करने जैसा जाॅब करते है।
माथुर साहब यह यूरोप नहीं है। इंडिया है। यहां का समाज अलग है। लोग अलग है।
आप राॅक्स से बात तो करिये । वो क्या सोचता है। यह भी तो सुनिये।
कई बार सुन लिया । बस एक ही बात । क्रियेषन करना चाहता हूू।






माथुर साहब अपनी सीट से खड़े हो गये। मामले की गंभीरता को समझते हुए गुप्ताजी की सीट के बिलकुल सामने आ गये। दोनो हथेलिया गुप्ता की टेबिल पर टिका कर कहा- गुप्ता जी। आप राॅक्स को समझिये। नहीं पूछा तो पूछिये क्या क्रियेषन करना चाहता है। मुझे नहीं लगता वो कोई गलत कर रहा होगा।

नहींजी। कुछ अच्छा नहीं कर रहा । मैंने पूछा था तो बताया एक वेबसाईट बनायी है। लव डाॅट काॅम । दावा करता है कि दुनिया की पहली लव वेबसाईट जिसमें पेरेन्टस को भी जोडा गया है। उपलब्धि बताता है कि पूरी दुनिया में पचास हजार से भी ज्यादा यूजर हो गये है। खाक वेबसाईट बनायी। वेबसाईट से पेट नहीं भरता। कर्जे नहीं चुकाये जा सकते । कहते हुए गुप्ता जी ने अपना चष्मा उतार कर टेबिल पर रख दिया और दोनो हाथ बगलो में डालकर बैठ गये। माथुर साहब अब भी आषावादी दिख रहे थे। चहलकदमी करते हुए गुप्ता की सीट के पीछे आ गये।

गुप्ता जी। आप राॅक्स को ठीक से समझो। मुझे नहीं लगता वो बिगड़ेल है। उसे कोई जिम्मेदारी सौप कर देखो।
सौपी थी। मैंने कहा अपनी मम्मी की दवाई और डौक्टर्स को दिखाने का काम किया करो।
फिर ?
जनाब। ने हां तो कर दी। लेकिन आप जानते है उसने जिम्मेदारी कैसे निभाई।
कैसे ?
उसने सारी दवाईयां उठाकर उपर रख दी। कहा मैं वैसे ही मम्मी को ठीक कर दंूगा। जैसे उसने डाॅक्टरी पढ़ी है।
तो उसने जिम्मेदारी ली ?
जिम्मेदारी क्या ली ? रोज अपनी मां को बाईक पर बैठाकर सुबह शाम पार्क ले जाने लगा।
क्या फर्क पड़ा ?
गुप्ता जी को अब डिफेंसिव होना पड़ा। लंबी सांस लेते हुए कहा - मै डाॅक्टर के पास उसकी मम्मी को चैक अप के लिये ले गया। बीपी शुगर सब नाॅर्मल था। डाॅक्टर भी संतुष्ट था। यह फर्क तो पड़ा। अब उसकी मम्मी नाॅर्मल है। नाॅर्मल क्या, काफी बेहतर  फील कर रही है।

मै यही तो कह रहा था । राॅक्स को समझो। उसकी सोच अलग है। अच्छा बताओ आपके बच्चे में लाख बुराईयां होगी परन्तु कोई अच्छाई भी तो आपको नजर आयी होगी।




हां। यह जरूर है । उसने कभी भी मेंरी बात का गुस्सा नहीं किया। कभी मेरे सामने उंची आवाज में बात नहीं की।

देटस इट! यही मैं कहता हूूं। उसकी सोच को ध्यान में रखकर उससे बात करो। सब ठीक हो जायेगा। मुझे नहीं लगता राॅक्स बुरा है। डांट वरी। बैफिक्र होकर आफिस का काम करो। विदाउट टेंषन।

 यह कहकर माथुर साहब भी अपनी सीट पर बैठ गये। गुप्ता जी सब कुछ भुलाने की कोषिष करते हुए टेबिल पर पड़ी फाईलो को खोलने लगे।

    शाम को घर पहुंचने के बाद भी गुप्ता जी टेंषन में थे। राॅक्स को पैट्रोल पंप पर काम करते देख उन्हे बहुत बुरा लगा। माथुर साहब ने लाखा समझाया होगा परन्तु राॅक्स के प्रति उनका गुस्सा सातवे आसमान पर था। उन्हे लगा कि बेटा उनके हाथ से निकल गया। राॅक्स की मम्मी ने भी समझाने की कोषिष की परन्तु उनके लिए राॅक्स अब उनकी जिंदगी में नहीं है। यह सोच कर वो टेंषन बढ़ा रहे थे कि उन्होने अपने बेटे से कितनी उम्मीदे पाली थी परन्तु नालायक निकला। फिर सोचा एक ही लड़का है उनकी पेषन, प्रोविडेंट फण्ड से उसका काम निकल जायेगा। इसी उधेड़बुन में पता ही नही चला कब रात हो गयी। राॅक्स के आने का इंतजार किये बिना ही सो गये।

    गुप्ता जी को  रात को नींद ढंग से नहीं आयी । सुबह जल्दी उठ गये। टेंषन के साथ ही उठे। सोचा मेंरा भी बीपी आज चैक करा लूंगा। फिर राॅक्स के कमरे में गये । उसके चेहरे पर कोई टेंषन नहीं । ऐसे लगा बेफिक्री से सो रहा है। गुप्ता जी सोच रहे थे ऐसी है आजकल की औलादे। उनकी श्रीमती जी भी अभी तक सो रही थी। गरमी थी। सुबह सुबह हवा ठंडी होती है। ठंडी हवा लेने के लिए वे बाहर बरामदे में आ गये। न्यूज पेपर पड़ा था। गुप्ता जी ने न्यूज पेपर उठाया ज्यों ही उसे उसे खोला । मुख पृष्ठ पर नीचे बड़ी खबर थी - इंदौर के राॅक्स की वेबसाईट लव डाॅट काॅम को 1 करोड़ में खरीदने का आफर। हेडलाईन पढ़ते ही गुप्ता जी के पूरे शरीर में झुरझुरी छुट गयी। खबर में बाॅक्स मे राॅक्स का फोटो था और नीचे लिखा था काम्याबी का श्रेय पिता को। गुप्ताजी ने अखबार को लिये एक हाथ बगल में दबाया और दूसरे हाथ की हथेली को चेहरे पर फेरते हुए खड़े हो गये। ठंडी हवा के झोंको से उनके बाल उड़ रहे थे।

Thursday, June 20, 2013

प्लेन


मैं कमरें में छवि का पासपोर्ट और वीजा ढंुढ रहा था। कल उसे जरूरत पड़ेगी। पहले से ही ढंुढ कर एक जगह रख दूं ताकि सुबह आसानी से मिल जाये। फिर रात भर शादी के कामो में वक्त नहीं मिलेगा। हमारे यहां शादी में कन्यादान घर का बड़ा करता है। मेरे घर में मेरे भाई साहब बड़े है इसलिए मेरी बेटी का कन्यादान भी भाई साहब ही करेंगे। मेरे जिम्मे शादी के दूसरे काम रहेगे । मेहमानो को अटेण्ड करना और बाकि व्यवस्थाऐ ंदेखना ।  अब बारात आने ही वाली  है। दो बार बुलावा आ गया । छवि अपने पापा को बुला रही है। अब नहीं गया तो नाराज हो जायेगी। पासपोर्ट और वीजा ढुुढकर एक लिफाफे मे आलमारी के एक कोने में रख दिया। जब पैकिंग होगी तो यह सब छवि के पर्सनल डाॅक्यूमेंटस में रख दूंगा।

छवि का कमरा खोला। कमरा खोलते हुए छवि बिलकुल सामने बैठी थी। किसी पिता को दुल्हन के रूप  में अपनी बेटी रानी ही लगती है। छवि वास्तव में रानी ही थी। आज तो दुल्हन के रूप  में बिलकुल रानी परी लग रही थी मानो परी लोक पर उसका राज हो। कभी मां के पल्लू में छिप जाने वाली छवि के सर पर आज पल्लू था। जब वह पैदा हुई थी तो डाॅक्टरो ने कह दिया था कि उसकी मां अब दोबारा मां नहीं बन सकेगी। मेरी पत्नि और परिवार रिष्तेदार बहुत दुःखी हुए। सबने सात्वनां दी। सबने अब लड़का नहीं हो सकने का दुख जताया। मुझे कोई दुख नहीं था। मेरे लिए तो छवि ही मेरी दुनिया हो गयी थी। मैंने अंगुली पकड़कर उसको चलना सिखाया।  मैं उसके लिए लड़को वाले खिलौने लाता लेकिन वो लड़कियो वाले खिलौनो की मांग करती । दरसअल वो लड़की ही रहना चाहती थी। वो गुडडे गुडियो के खेल खेलती । मै भी उसके साथ खेलने लग जाता । गुडे और गुडिया की शादी जैसे खेल में मै शरीक होता था। उसकी सहेलिया कम थी। या यों कहे मै उसे सहेलिया बनाने के लिए वक्त ही नहीं देता था। मै चाहता था कि वो ज्यादा से ज्यादा समय मेेरे साथ बिताये। कई बार तो उसकी मां भी मुझे टोक देती परन्तु मै जब भी समय मिलता छवि के साथ ही बिताता था।

बचपन में छवि अक्सर प्लेन की आवाज से डर जाया करती थी। जब भी कोई प्लेन हमारे शहर के ऊपर से गुजरता वो मां के पल्लू में जाकर छुप जाती । हमारी छत बहुत बड़ी थी। एक छोटे मैदान की तरह । मै उसके लिए कागज का प्लेन बनाता और वो उसके पकड़ने के लिए दौड़ती । इस खेल में उसका  प्लेन से डर भी जाता रहा । जब भी हम छत पर होते छवि कागज आगे कर प्लेन बनाने के लिए कहती। मै उसे सीखाता कि देख कागज का प्लेन ऐसे बनता है। वो कभी सिखने की कोषिष नहीं करती। मै उसे कहता कि छवि तुम प्लेन बनाना सीख क्यों नहीं लेती।  वो कहती पापा मै तो प्लेन बनाना सीखूंगी नहीं मैं तो प्लेन में उडकर स्विटजरलैण्ड जाउंगी। मै कहता जब तक तुं कागज का प्लेन बनाना सीखोगी नहीं मै तुम्हे प्लेन में जाने नहीं दूंगा। इस पर वो मेरे पीछे आकर गले में हाथ डालती  और कहती कि तब तो मै सीखूंगी नही क्योंकि मुझे तो मेरे पापा के साथ ही रहना है।
छवि के सर पर पल्लू और माथे पर टीका लटक रहा था। वैसे ही जैसे किसी परियों की रानी के माथे पर होता है। टीके की चमक बता रही थी कि वो दुनिया की सबसे सुंदर दुल्हन है। वैसे भी उसकी चकोचैंध में मेरा घर हमेंषा दमकता रहा । शुरू से ही होनहार थी। हमेषा अव्वल । मैंने उसको डाॅक्टरी की पढाई कराई। यहां भी वो अव्वल रही । वो पहली बार एप्रीन पहन कर घर आई तो मेरी आंखे छलकने लगी तो वो मेरा हाथ पकड़ कर आंगन में खुषी से झूमने लगी और मेरी आंखो से आंसूओ को बाहर नहीं आने दिया। मै उसके लिए आज के जमाने के लड़को वाले कपड़े खरीदता। उस समय तक लडकियो के  जींस और टी शर्ट पहनना आम हो गया था लेकिन छवि लड़कियो वाले कपड़े ही पहनती थी।

छवि की आंखो में आज भी सपने ही थे। मै उसकी आंखो में उसके सपने ढुंढा करता था  लेकिन उसकी आंखो में पापा के लिए सपने थे। पापा आप आज यह ड्रेस पहनोगे । पापा आप यह हेयरस्टाईल रखोगे। कई प्रकार से हमंषा निर्देष देती रहती थी। मेरा आलेख या कहानी जब भी अखबार में छपती वो बाजार से ले आती । मेरी लिखी किताबो और अखबारो को उसने एक आलमारी में सहेज कर रखा था। मेरे लेखन की एक पूरी लाईब्रेरी बना रखी थी। मुझे जब पहली बार साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला तो सबसे ज्यादा खुष छवि ही थी। उसकी आंखो में पिता के सम्मान का गर्व देखा जा सकता था। पर मैं तो उसकी आंखो में उसके सपनो का ढुंढा करता था। मै उसे अक्सर कहता था कि मेरे लिए तुम लड़के की तरह ही हो। तुम्हे कोई लड़का पसंद हो तो मुझे खुलकर बता देना। पर उसने कभी बताया नहीं । जब भी पूछने की कोषिष करता बात को टाल देती । सिरीष का रिष्ता आया तो परिवार और रिष्तेदारो ने मुझे बात आगे बढ़ाने से मना किया था। सिरीष न्यू जर्सी में सोफ्टेवेयर इंजीनीयर था। उसका परिवार दिल्ली में रहता था और वो न्यू जर्सी में सैटल हो गया
था। उसकी मां को भी दूरी ज्यादा लग रही थी। रिष्ता अच्छा था लेकिन एक बार तो मेरे कदम भी रूक गये। परन्तु मैने छवि की आंखो में उसके सपने का पढ़ लिया था। मैने छवि को बुलाकर पूछा । उसने सिरीष का फोटो भी नहीं देखा और बात करने पर शरमा कर अंदर चली गयी। एक बार फिर वह लड़की बन गयी। मेरे जोर देने पर भी लड़का नहीं बनी। पूरानी लड़कियो की तरह शरमा कर चली गयी। मैने उसकी मां को बात करने को कहा । उसकी मां ने बताया कि छवि राजी है।

मै छवि को देख रहा था। मेरी राजकुमारी रानी बनने जा रही थी। टयूबलाईट की सफेद रोषनी में उसकी आंखो में पानी चमक रखा रहा था। मेरे अंदर भी पानी का बहाव नीचे उठकर गले तक आ चुका था। गला भारी हो गयी था। मै जोर लगाकर आंसूओ के दरिया को पीछे धकेल रहा था। ऐसा लगा कि छवि के आंसू भी छलक कर बाहर आ जायंगे। वो उठकर खड़ी होने ही वाली थी । मै कमरे से निकल कर बाहर आ गया। अंदर के दरिया को किसी तरह से रोक दिया। काम में लग गया। बारात आ चुकी थी। सभी अपने काम में व्यस्त हो गयें। मै भी व्यवस्थाओ में लग गया।
 धीरे धीरे रात बीत गयी। अब विदाई की तैयारी हो रही थी । लगभग सब कुछ पैक हो गया था। अब विदा होने की तैयारी थी। यहां से छवि और सिरीष सीधे फलाईट से दिल्ली जायेगे और दिल्ली से न्यू जर्सी । मै ऊपर कमरे में था। दो तीन बार बुलावा आ गया था। मै जा नहीं पा रहा था। मै एक वृक्ष की तरह महसूस कर रहा था जिसकी सबसे हरी भरी डाली काटने की तैयारी हो रही हो। मुझे पता था अब छवि खुद आ जायेगी। ऐसा ही हुआ। छवि खुद आ गयी। हाथ में एक डिब्बा लिये हुए। डिब्बा मेरे हाथ में पकड़ा कर छलक पड़ी। आंखो में आंसूओ का सैलाब आ गया। मै भी अपने आंसूओ के दरिया को रोक नहीं पाया। ऐसा लग रहा था दोनो के आंसू अब नहीं रूकेंगे। पीछे पीछे सिरीष भी आ गया। वो चल कर हमारे नजदीक आया। मेरे पांव छुये। मैने आर्षीवाद दिया। उसने छवि का हाथ पकड़ा और बाहर की तरफ ले जाने लगा। छवि का हाथ मुझसे छुटता जा रहा था। ऐसो लग रहा था छवि का हर एक कदम पेड़की हरी भरी डाली पर कुल्हाड़ी का वार था। ज्यो ज्यो वो कदम बढ़ाती मैं कुल्हाड़ी के वार जैसी आवाज महसूस करता । ज्योही उसने अंतिम कदम कमरे के बाहर रखा, मुझे लगा जोरदार अंतिम वार से मेरी हरी भरी डाल काट दी गयी । मैने झटके जैसा महसूस किया। हाथ का डिब्बा छिटक कर नीचे जा गिरा। डिब्बे से कागज का प्लेन निकल फर्ष पर गिर गया था। मैने कागज का प्लेन उठाया। प्लेन पर लिखा था - ‘ पापा मैने कागज का प्लेन बनाना सीख लिया है। ’ मैं दोड़कर नीचे गया । छवि और सिरीष की गाड़ी एअरपोर्ट के लिए रवाना हो चुकी  थी।