Thursday, December 23, 2010

कहानी - मीण्‍डी बुआ

यही नाम था उसका मीण्‍डी बुआ । बहुत अजीब नाम है । परन्‍तु जब से मैने समझ पकड़ी मैं भी और की तरह उसे इसी नाम से जानता था। यह भी नहीं जानता था कि दादी की उम्र की औरत को क्‍यो सभी लोग बुआ कहते है। मैं हमेंशा उसके नाम के मायने तलाशता रहता । तेरी दादी लगती है क्‍या। अपनी पढ़ाई में ध्‍यान लगा । बेकार के प्रंपच में मत पड़। ये उत्‍तर मेरे प्रश्‍न को मारने की कोशिश भर से ज्‍यादा कुछ नहीं होते थे। पर मेरा प्रश्‍न मरता नहीं था। यह प्रश्‍न क्‍या कोई भी प्रश्‍न मेरे मन में खत्‍म नहीं होता था। उसे मेरे मन से आक्‍सीजन मिलती रहती । इसी आक्‍सीजन से मिली उर्जा मीण्‍डी बुआ के नाम के मायने तलाश करने में लगा देता। बहुत मुश्किल इस अजीब नाम के मायने ढुंढना। किसी को भी न तो मीण्‍डी बुआ के नाम के अनुसंधान में रूचि  थी न ही उसके जीवन में। पर मैं हमेंशा इस नाम के मायने खोजता रहता ।

      जब भी अकेला बैठता हू मीण्‍डी बुआ का करेक्‍टर विस्‍मृति में से बाहर निकल आता है। बचपन की मेरी जितनी यादे है उनके इस करेक्‍टर को भूल पाना मेरे लिए आसान नहीं है। मुझे मीण्‍डी बुआ से कोई लगाव नहीं था। मैं तो किसी ड्रामे के दर्शक की तरह उसे देखता मात्र था। जब भी मै जीसा की दुकान पर बैठता तो पैर सड़क पर रगड़ते हुए लाठी के सहारे चलते हुए मीण्‍डी बुआ दुकान तक आती। वह अपना हाथ फैलाती उससे पहले ही जीसा उसके हाथ में सुपारी का टुकड़ा रख देते। मैं उसे घूर कर देखता । बड़ी बड़ी आंखे जैसे कई हादसो को देखकर उसे न झपकने की आदत पड़ गई और हादसो को देखकर किसी बड़े दर्रे में तब्‍दील हो गई हो। चेहरे और हाथो की लटकी हुई सलवटो भरी चमड़ी बता रही थी कि वो कितना अनुभव इस झोले में समेटे हुए है। सुपारी को मुंह रखती और अपना मुंह चबाने लगती। बिना दांतो के चलता हुआ उसका मुंह ऐसा लगता जैसे वो कई गमो को सीधे निगल रही हो।  बड़ी बड़ी आंखो की पुतलियां मेरी और स्थिर भाव से घूमाती और फिर चप्‍पल को सड़क से रगड़ते हुए लाठी के सहारे आगे निकल जाती। मै अपने साथी बच्‍चो के साथ घर के आगे खुले चौक में खेलने लग जाता । घर के आगे बहुत बड़ा चौक था। शाम को बच्‍चो के शोरगुल से चौक आबाद रहता। बच्‍चो का शोरगुल उस चौक में एक उर्जा भरता था । बच्‍चो की चीं पों शाम को जंगल में पक्षीओ की चहचहाट सा अहसास देती थी। और जीसा की एक मात्र दुकान थी जो दुकान से ज्‍यादा बहस का मंच ज्‍यादा था। जीसा का भी नाम सार्वभौमिक जीसा था। उस व्‍यक्ति के लिए सब इसी आदरसूचक शब्‍द का प्रयोग करते थे। उनकी भूमिका भी हर मामले में बिलकुल तटस्‍थ थी। यह अपने आपको एक संत भर साबित करने की कोशिश लगती थी।

      उस दिन हमेंशा की तरह मैं अपने साथियो के साथ खेल रहा था। मैंने अपने आपको कपिलदेव मानते हुए गेंद फेंकी और जोगिया ने सचिनिया स्‍टाईल में  बल्‍ले को घूमा दिया । गेंद सीधे मीण्‍डी बुआ की लाठी से जा टकराई।‍ जिस सड़क को रोज अपने चप्‍पलो से रगड़ रही थी उसी पर गिर पड़ी। सचिन के शॉट को भी मैदान में इनकी उत्‍सुकता से नहीं देखा जाता होगा जितना जोगिया के शॉट को देखा गया। बिलकुल शांति । चारो तरफ पिन ड्राप साईलेंस। लाठी के गिरने की आवाज दूर दूर तक सुनाई दी। मैं सकपका गया। घबराहट से मेरी आंखो की पुतलिया जल्‍दी जल्‍दी चारो घूमने लगी। औरो की तरह मैं भी पास की गली जाकर छिप गया। जोगिया वहीं खड़ा रहा । कटी फटी हाफ पेंट पहने हुए जिसके बटन नहीं थे और एक रस्‍सी डालकर उसे कमर बांधा हुआ था और अनगिनत छेदो वाली बनियान जो केवल यह बताने के लिए थी कि उसे कुछ पहना हुआ है। घुंघराले बाल पूरी तरह से धूल से सने हुए। चेहरे पर कोई खौफ नहीं ।

      अरे छोरो । ये कोई मैदान है। कितनी बार कहा है मैदान में जाकर खेला करो। जीसा के इन शब्‍दो में बच्‍चो के लिए डांट कम और मीण्‍डी बुआ के लिए सांत्‍वना ज्‍यादा थी। उन्‍होने दौड़कर मीण्‍डी बुआ को उठाया। लाठी उठाकर दी। तब तक जोगिया गेंद लेने के लिए मीण्‍डी बुआ के नजदीक आ चुका ।
      कर्मजले। जा इस लकड़े से अपनी मां के पैरो पर मार । अपनी मां के घुटने तोड़। उसे तो सजा मिलनी चाहिए कि कैसे अपने पिल्‍ले को बाहर भटकने के लिए छोड़ दिया। कीड़े पड़ेगे तेरे और तेरी मां के पेट में । सड़ सड़ मरोगे। मीण्‍डी बुआ ने लाठी को सड़क पर बजाते हुए जोगिया पर गालियो की बौछार कर दी। परन्‍तु गालियो के बाण तो जोगिया के उपर से ही निकल रहे थे। वो तो मुस्‍कुरा हुआ गेंद ले उड़ा। क्‍यों मीण्‍डी बुआ को परेशान करता है जोगिया। चल भाग यहां से। मारूंगा एक । जीसा ने एक बार फिर शब्‍दो का संतुलन साधते हुए मीण्‍डी बुआ को रवाना किया। चाल वहीं पूरानी । जिम जाने वाले युवा भी ऐसी बॉडी को तरसते होगे। 80 बरस की उम्र की बुढि़या के गिरने के बाद भी उसकी बॉडी पर कोई फर्क नहीं । वो तो वैसे ही सड़क को सजा देती हुई आराम से निकल गई।


      फटे हाल 15 बरस के जोगिया के लिए संभवत: मीण्‍डी बुआ मनोरंजन का साधन थी। दिन भर नंगे पांव ईधर दौड़ता रहता था। स्‍‍कूल जैसी चीज का नाम तो उसके लिए तपते दौरो में पानी के सपने की तरह थी। उसके लिए यह पैसो वालो की चीज से बढ़कर कुछ नहीं था। मां मजदूरी करके इतना ही कमा पाती कि सुबह शाम के निवाले का जुगाड़ हो जाये। कभी कभी तो इसके भी लाले पड़ जाते । उसके लिए जोगिया का इतना ही दुलार था कि उसे मजदूरी नही करने देती । जब भी मौको मिलता जोगिया मीण्‍डी बुआ को छेड़कर अपना मन बहला लेता। मीण्‍डी बुआ की कर्कश आवाज मे गालियो को सुनने के लिए संभवत: सीने में कोई कवच होगा या फिर पिछले जन्‍म में कोई संत रहा होगा। मीण्‍डी बुआ की हर गाली उसके चेहरे पर मुस्‍कान लाती । उस दिन तो मैं अवाक रह गया। जोगिया अकेला मंदिर की चौकी पर बैठा किसी उदंडता की खोज में था। मीण्‍डी बुआ वहीं से पैरो को सड़क से लड़ाते हुए निकल रही थी। जोगिया ने आवाज दी- मीण्‍डी बुआ । आमलेट लाया हु। यहीं खायेगी या घर पहुंचा दु।
      जोगिया बेटा । आज मैं गोश्‍त खाउंगी। तेरी मां के टुकड़े टुकड़े कर के ला। हम दोनो बैठकर खायेंगे। आया आमलेट खिलाने वाला । मीण्‍डी बुआ की इन कर्कश शब्‍दबाणो की सरसराराट मेंरे भी दिल तक गई।किसी अनहोनी से मन फड़फड़ा उठा।  परन्‍तु जोगिया तो कोई संत का दिल लेकर पैदा हुआ होगा। इस पर भी मुस्‍कुराते हुए मीण्‍डी बुआ के पास आ गया। जीसा ने फिर बीच बचाव कर उसे भगाया। और कोई होता तो इस पर खून खराबा हो जाता। यह नहीं है कि जोगिया समझता नहीं है। 15बरस का किशोर ऐसे शब्‍दो का मतलब अच्‍छी तरह समझता है। ऐसी गालियो से तो संत का मन में भी क्रोध की ज्‍वाला भड़क जाये। पर जो‍गिया के मन पर नहीं । मीण्‍डी बुआ के मुंह से स्‍टेनगन की गोलियो की तरह निकली गालिया जोगिया को छु भी नहीं सकी और उसके स्‍वभाव रूपी कवच ने उसे दिल तक नहीं पहुंचने दिया।  मेरे लिए क्‍या । सबके लिए यह बच्‍चा अचरज हो सकता है।

      मेरे को याद नहीं है कि मैंने कभी मीण्‍डी बुआ को मुस्‍कुराते हुए देखा। जब भी किसी से बात करती रूखे शब्‍दो में । जोगिया से तो मानो उसका गालियो का ही रिश्‍ता था और जोगिया के पास शायद इन गालियो के लिए कवच था जो इनको दिल तक नहीं जाने देता था। जोगिया की मां को भी मैने कभी मीण्‍डी बुआ से उलझते हुए नहीं देखा। जीसा दुकान में  अपनी गददी पर बैठे बही मे हिसाब में खोये हुए थे। बही में आंखे गढ़ाए जीसा को डिस्‍टर्ब करने का साहस जुटा रहा था। सुनी दोपहर,सड़क पर कोई नहीं, इस सुनेपन ने मेरे अंदर साहस भर दिया। जीसा। मीण्‍डी बुआ यहां कब से रह ही है। मेरी बात सुन कर जीसा ने बही को नीचे रखा और पेन को ठीक बही के बीच मे। अपने चश्‍में को उतार कर आंखो को मला। फिर गर्दन को थोड़ा उंचाकर दुकान की छत की ओर नजर करते हुए कहा मीण्‍डी बुआ । इस मोहल्‍ले में आई सन 65 में । पाण्‍डे जी के साथ । पाण्‍डे जी हैड पोस्‍टमास्‍टर से रिटायर होकर आये थे। उनके कोई औलाद नहीं थी। आगे पीछे भी कोई नहीं था। यहां आने के कुछ ही साल में पाण्‍डे जी का देहांत हो गया। तब से मीण्‍डी बुआ उस कोने वाले घर में अकेली रहती है।
इसका खर्चा कैसे चलता है।
पाण्‍डे जी की पेंशन से। महीने की पहली तारीख को पोस्‍ट ओफिस पेंशन लेने जाती है।
रोज शाम को मीण्‍डी बुआ कहां जाती है।
मंदिर। भैरूजी के मंदिर । बहुत मानती है भैरूंजी को । और कहीं नहीं जाती है।
मेरे लिया इतना जानना काफी था। मेरी इससे ज्‍यादा उत्‍सुकता भी नहीं थी।
तुं इसके मुंह नहीं लगना। समझाने के लिहाज से मुझे बताते हुए चश्‍मा वापिस आंखो पर रखकर जीसा बही के हिसाब में जुट गये। मेरा मन कुछ प्रश्‍न गुंथ रहा था। प्रश्‍नो के उलझाव से कोई एक प्रश्‍न नहीं निकल कर  आ रहा था। मेंरी मंद पड़ी उत्‍सुकता पर जैसे मेरी मां आटे को जिस प्रकार मुक्‍को से गोंदती है वैसे ही मेरा मन मेरे उलझाव को मुक्‍को से गोंद रहा था। ये इतनी कर्कश क्‍यों है। कभी मन स्‍वयं उतर दे देता । संभवत: अकेलेपन के कारण होगी। मन यह तय नहीं कर पा रहा था कि मीण्‍डी बुआ को और खोजू या मूक दर्शक बना रहूं। इतनी देर में मेरी मां आटे को गुंथ लेती है परन्‍तु मेरे मन में प्रश्‍नो का उलझाव गीले बिना गुंथे आटे की तरह पसरा था। हथेली को पूरे चेहरा पर फेरा और दोनो हाथ बगलो में दबाकर बैठ गया। सड़क पर चप्‍पल रगड़ते हुए लाठी के सहारे चलकर आती हुई मीण्‍डी बुआ ने मन के उलझाव को एक बार रोक दिया। हमेंशा की तरह जीसा के पास आई और सुपारी को मुंह में रखा। बड़ी बड़ी आंखो की पुतलिया बीचो बीच आ गई । दोनो पुतलियां मेरे पर टिकी थी। अपने हाथ को सिर तक ले गई।
जोशी है क्‍या ।
हां। बोलो मीण्‍डी बुआ।
जोगिया दिखाई नहीं दिया कई दिनों से ।
बुआ । वो बीमार है। कई दिनों से बुखार में है।
मरेगा जल्‍दी। धरती का बोझ कम होगा। कमीने को जल्‍दी मौत आये तो अच्‍छा। यह कहते हुए मीण्‍डी बुआ लाठी के सहारे अपने रास्‍ते पर चल दी। रबड़ की चप्‍पल सड़क पर चटाक चटाक की आवाज कर रही थी। यह आवाज मेरे गाल पर तमाचे की तरह लग रही थी। कुर्सी के हत्‍थे को पूरी तरह अपनी मुटठी में मैंने भींच लिया। शब्‍द अंदर से निकल कर हलक तक आकर रह गये। दिल ने जोर से गुलाची खाई और मीण्‍डी बुआ के लिए मन में थोड़ी बहुत हमदर्दी बची तो वो भी इस गुलाची से खत्‍म हो गई। मीण्‍डी बुआ के लिए दिल में नफरत का दरिया बह निकला ।नफरत की पूरी शब्‍दावली मन में एक जगह आ टिकी । मीण्‍डी बुआ के लिए नफरत रूपी सवाल मेरे मन में पूरी तरह कौंधते रहे। झटके साथ कुर्सी को छोड़ दिया। कुर्सी दुकान  के दरवाजे से जा टकरायी। इसने सुनी दोपहर की खामोशी को कुछ देर के लिए तोड़ा।  मन के अंदर नफरत पर सीमेंट कर परत चढ़ाता हुआ घर की तरफ चल दिया।

       बारहवीं के इम्‍तहान सिर पर थे । देर रात तक छत पर बने कमरे में पढ़ता था। किताबे खोलकर बिस्‍तर पर लेटा था। मन अभी भी मीण्‍डी बुआ पर मंथन कर रहा था। मन स्‍वयं ही प्रश्‍न गढ रहा था और स्‍वयं ही उत्‍तर दे रहा था। शायद इसे ही सठियाना कहा जाता होगा। वास्‍तव में बुढिया सठिया गई है। एक बच्‍चे से बिना वजह दुश्‍मनी। बीमारी में मरने की दुआ करना। घोर पाप। मेरे मन में एक बार फिर धृणा का ज्‍वार उठा। पर इस धृणा पर अंतिम मुहर नही लग पा रही थी। माथे में विचार सड़क पर बेवजह दौड़ रही मोटर गाडि़यो की तरह दौड़ रह थे। एकदम से खड़ा हुआ बालकानी में आ गया। जोर की हवा चल रही थी। पास के नीम के पेड़ के जोर से हिलने से पत्तियो की सरसराहट रात के पहले पहर की खामोशी में उपस्थिति दर्ज करा रही थी। मैंने बालो में हाथ फेर कर माथे पर विचारो के ट्रेफिक को नियंत्रित करने का प्रयास किया । सब बेकार। उम्र के इस पड़ाव पर मीण्‍डी बुआ को सबके लिए अच्‍छा सोचना चाहिए। अपने स्‍वभाव के कारण ही ये अकेली सजा भोग रही है। सचमुच नफरत करनी चाहिए इस औरत से। किसी गरीब बच्‍चे की मौत की दुआ। कितना निर्दयी विचार। ओह। सोच कर भी घिन्‍न आती है। इस बुढि़या के बारे में । माथे विचारो के ट्रैफिक के मुकाबले सड़क पर बिलकुट सन्‍नाटा। जीसा अपनी दुकान बंद कर अभी गये ही है। हवा से सड़क पर उड़ रही धूल सर्राट की आवाज के साथ मानो मेरे मन में मीण्‍डी बुआ के लिए बची खुची श्रद्धा को खत्‍म कर  रही थी। ये क्‍या सड़क पर ये कौन है। मीण्‍डी बुआ लगती है। रात को कहां जा रही है। कहीं गिरेगी। कोई गाय बैल चोट लगा देगा। नफरत को रौंदते हुए ये विचार मेरे म‍न से मस्तिक तक गये। तुरंत दौड़कर नीचे गया। घर का मेन गेट धीरे से  बंद किया । कहीं कोई जाग न जाये। किसी को पता चल गया तो मेरी शामत नहीं । दौड़कर सीधा मीण्‍डी बुआ के पास गया।
कहां जा रही हो बुआ।
कौन। जोशी।
हां।
कहां जा रही हो ,मैं छोड़ देता हू।
जरूरत नही है।
नहीं । कहीं कोई गाय बैल गिरा देगा। यह कहते हुए मैने मीण्‍डी बुआ का हाथ पकड़ लिया। मना करने के बाद भी साथ हो लिया। उसने भी संभवत रात को देखते हुए प्रतिरोध नहीं किया। गली में घूमते ही मीण्‍डी बुआ रूक गई। यह तो जोगिया का घर था। घर क्‍या । गोबर से लेप किये हुए एक कच्‍चा कमरा था। लकड़ी का टुटा हुआ दरवाजा। पड़ोस में डाक्‍टर के घर से खींचा हुआ तार जिसकी मेहरबानी से कमरे मे रोशनी थी। मीण्‍डी बुआ के दरवाजा खटखटाने पर जोगिया की मां ने दरवाजा खोला। तु यही ठहर। कह कर मीण्‍डी बुआ कमरे के अंदर चली गई और दरवाजा बंद कर लिया। मन किसी अनहोनी से डरने लगा। कुछ बात हो गई तो घर में मेरी खैर नहीं । मै किस प्र‍पंच में पड़ गया । एक विचार खत्‍म होने से पहले दूसरा विचार जन्‍म ले रहा था। मन की उत्‍सुकता दरवाज के पास ले आई। टुटे दरवाजे मेसे कमरे के अंदर देखा जा सकता था।
      तुं मां है या बच्‍चे की दुश्‍मन।बच्‍चा बुखार से तप रहा है। तुं हाथ पर हाथ धरे बैठी है। मीण्‍डी बुआ के प्रश्‍न पर जोगिया की मां कई जगह से छेदो वाली साड़ी से मुह को छिपाते हुए जल्‍दी जल्‍दी सांस भरते हुए बोली- आज मजदूरी पर भी नहीं गई। एक निवाले के भी पैसे नहीं है। उपर वाले के ही भरोसे हू। अब तीन लोको का नाथ ही मेरे बेचे की रक्षा करेगा। अश्रुधारा आंखो से गालो पर नदी बनाते हुए निकल आई। मीण्‍डी बुआ ने जोगिया की मां के माथे पर हाथ रखा और फिर दूसरे हाथ की मुटटी खोली । ले ये कुछ पैसे है । कल दवा  और खाने के लिए कुछ ले आना। ये घासा मैंने बनाया है। इसे पानी के साथ इसे दे दे । अभी बुखार उतर जायेगा। कहते हुए मीण्‍डी बुआ जोगिया की तरफ घूम गई। टूटी हुई चारपाई पर लेटा। सांस के साथ पेट के उपर पसलिया बार बार उभर कर आ रही थी। लगा अभी पेट से निकल कर बाहर आ जायेगी। उसकी आखे खोलने तक ही शक्ति थी। उसने आंखे खोली। कुछ बोलने की स्थित में नहीं था। बुआ ने उसके सिर पर हाथ फेरा और कहा- जल्‍दी ठीक हो जा। मैं फिर गालिया किसे निकालूंगी। तु ही जो सुनता है और कौन सुनता है.......। कहते कहते उसने पल्‍लू मुंह में दाब लिया। पलक झपकने के साथ कुछ बुंद दर्रे जैसी गहरी और बड़ी आंखो में से निकल  कर जमीन पर गिर रही थी। मानो बरसो से कोई बर्फ पिघली हो। बिना बोले, पल्‍लु को मुंह मे दबाए। दरवाजे तक आ गई।
      मैं एकदम सन्‍न। शरीर में खून का बहाव एक तरफ हो चला। जैसे समुद्र की लहर सब कुछ बहा कर ले गई हो । मन से एक बड़ी लहर के साथ सब कुछ साफ हो गया। आंखो में पलको तक आई पानी की परत मीण्‍डी बुआ के आंसूओ के साथ कदम ताल करने को मचल रही थी। मैंने उसे बाहर आने से रोकने के लिए गम के उदवेग को गले तक रोक लिया। हलक में इस उदवेग ने दर्द पैदा कर दिया। आंखो को भींच कर पलको के साथ एकदम अंदर तक ले गया। आंसू बन कर बाहर आने को आतुर पानी को मैंने तितर बितर कर दिया।
      पता ही नहीं चला मैं कब मीण्‍डी बुआ का हाथ पकड़ कर उसको छोड़ने के लिए रवाना हो गया। मैं मीण्‍डी बुआ के नाम की तरह उसके स्‍वभाव को भी नहीं समझ पाया। जोगिया और मीण्‍डी बुआ के रिश्‍ते को भी नहीं समझ नहीं पाया। उस पत्‍थर हो चले बूढ़ शरीर के अंदर एक कोने में छिपी कोमलता अहसास करते हुए शरीर के अंग स्थित रह जाते है और दिल इस अहसास को अनुभव करता है।
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Sunday, October 3, 2010

बी.के. स्‍कूल की कचौरी

कुछ स्‍कूले खास होती है और उनकी पहचान भी खास होती है। दून स्‍कूल   और ऐसे कई स्‍कूल है जो अपनी खास पहचान रखते है। मै जिस स्‍कूल में पढ़ा उस स्‍कूल की भी खास पहचान है। दून स्‍कूल पढ़ाई के लिए जाना जाता होगा परन्‍तु मेंरा स्‍कूल कचौरियों के लिए जाना जाता है। मेरे शहर की कचौरियां वैसे ही बहुत प्रसिद्ध है परन्‍तु उसमें भी बी.के. स्‍कूल की कचौरी की विशेष महिमा है। जी हां । मेंरा स्‍कूल कचौरियों के लिए आज भी जाना जाता है। बीकानेर में किसी मेंहमान के लिए कचौरियों की मेहमानवाजी खास लोगो के लिए की जाती है । उसमें भी बी.के. स्‍कूल की कचौरी की मेहमानवाजी आपने कर दी तो मेहमान खुश होकर ही जायेगे। अपने बॉस को खुश करने के लिए भी लोग बी.के. स्‍कूल की कचौरियां ले जाते रहे है। आपके खास मेहमानो की खातेदारी में आपने बी.के. स्‍कूल की कचौरी नही परोसी तो वे नाराज भी हो सकते है। बीकानेर के बाहर भी जब बीकानेरी स्‍वाद के चर्चे होते है तो बी.के. स्‍कूल की चर्चा सबसे पहले होती है।

      इसका मतलब ये कतई नहीं कि मेरे पिताजी ने मुझे हलवाई की स्‍कूल में भर्ती करवाया या मेरी स्‍कूल में कचौरियां बनाने की कोई ट्रेनिंग दी जाती थी। ऐसा बिलकुल नहीं है। मेंरा स्‍कूल सौ साल से भी ज्‍यादा पूराना है। संभवत: मेंरे शहर का सबसे पूराना स्‍कूल है। इस स्‍कूल में सिर्फ बणिये के बच्‍चो को ही प्रवेश दिया जाता था। उसके बाद जगह बचती तो ब्राहम्‍णो को प्रवेश दिया जाता । मेंरे पिताजी ने बहुत जतन से इस बी.के. स्‍कूल में मेंरा दाखिला करवाया। मेरे स्‍कूल की एक ओर खास बात थी कि इस स्‍कूल में लड़कियो और महिलाओ का प्रवेश प्रतिबन्धित था। इस मामले में इतनी सख्‍ती थी कि किसी महिला का चित्र भी स्‍कूल में नहीं लगाया जाता था चाहे वो किसी महिला समाज सुधारक या नेता का ही क्‍यो न हो। स्‍कूल का कोई भी सोच रहा होगा परन्‍तु हमें जरूर महसूस होता था कि महिला शायद कोई आफत की पुडि़या का नाम है।

      यह प्रश्‍न भी उठना स्‍वभाविक है कि जो स्‍कूल पढ़ाई के लिए इतना जाना जाता हो तो उसकी पहचान कचौरी से कैसे होने लगी। दरअसल हमारी स्‍कूल के नीचे एक कचौरी की दुकान थी। हलवाई के हाथों में जादू था। जब वो कचौरी बनाता था तो उसकी खूशूब आस-पास के मोहल्‍लो तक जाती थी। यहां तक कि हमारी क्‍लास तक भी आती थी। यह अलग बात थी कि इस बाधा को रोकने के  लिए हमारे मास्‍टरजी कुछ नहीं कर सकते थे। जब लंच टाईम हो रहा हो और ऐसे खूशूब आ रही हो तो कि मास्‍टरजी के शब्‍द बाण सिर के  उपर से ही निकलते थे। लंच टाईम में हम लोगो को घर जाकर खाना खाने की छुट थी। लंच टाईम में बाहर निकलते ही कचौरी की दुकान पर जबरदस्‍त भीड़ देखी जा सकती थी। बच्‍चो के बराबर कचौरी खाने वालो की भीड़ होती थी। कुछ को कचौरी मिल जाती तो कुछ को ऐसे ही लौटना पड़ता था। हमारी स्‍कूल के बीच कुछ बच्‍चे भी लंच में कचौरी चट करते । लंच टाईम तीस मिनट का होता था और हमे घर जाने की जल्‍दी होती थी इसलिए कचौरी की दुकान पर नजर भर हम देख ही पाते थे। हमारे शहर में बणियों को आर्थिक रूप से मजबूत माना जाता था। बणियो के बच्‍चो को लंच टाईम में कचौरी की दुकान पर देखा जा सकता था। हमें यह सिखाया गया कि ठेले पर या दुकान पर खड़े होकर कुछ खाना अच्‍छी आदत नहीं होती है। इसलिए मै और मेंरे दोस्‍त सीधे घर चले जाते और खाना खाकर लौट आते । घर पर भी कभी बहुत खास मेहमान आने पर हमारे घर पर भी बी.के. स्‍कूल की कचौरी आती परन्‍तु यहां भी हमारा नाक हमारी जीभ के मुकाबले फायदे में रहता । हम सिर्फ खूशूबू ही ले पाते थे। उस समय ठेले या दुकान पर खड़े होकर खाने को अच्‍छी आदत नहीं समझते थे परन्‍तु ये नहीं जानते थे कि ऐसी सीख मध्‍यमवर्गीय मजबूरियों के चलते ही दी जाती थी।

      बच्‍चे का मन तो कच्‍चा होता है। घर वालो की सीख पर मैं ज्‍यादा अडिग नहीं रह पाया। घर से मिलने वाले पांच दस पैसे इस उम्‍मीद में इकटठे करने शुरू किये कि जब भी यह एक रूपया बनेगा , मैं भी बी.के. स्‍कूल की कचौरी खाउंगा। पैसे मिलने की रफतार इतनी मंद थी कि इसमें एक साल भी लग सकता था। परन्‍तु मन में था विश्‍वास कि जब भी एक रूपया होगा ,बी.के. स्‍कूल की कचौरी खाउंगा। पैसे जमा करता गया । पचहत्‍तर पैसे हो चुके थे। रूपया होना ज्‍यादा दूर नहीं था। पर एक दिन स्‍कूल से निकलते ही मैंने देखा कि कचौरी की दुकान के पास ही एक ठेला लगा है जिस पर लिखा है बी.के. स्‍कूल की कचौरी पचहत्‍तर पैसे में। दुकान में वहीं दाम था एक रूपया परन्‍तु ठेले वाले दुकान के ग्राहको में सेंध लगाने के उद्धेश्‍य से यह ठेला लगाया। मुझ से रहा न गया। मैं अपने पचहत्‍तर पैसे ले आया और बी.के. स्‍कूल की कचौरी का मजा लिया। ठेले वाले ने कोई एमबीए नहीं किया था परन्‍तु वो मार्केटिंग के गुण अच्‍छी तरह से जानता था। जल्‍दी ही उसके ठेले पर भी भीड़ लगने लग गयी। जो एक रूपया खर्च नहीं कर पाते थे वो ठेले वाले से कचौरी लेते थे। परन्‍तु बणियो के बच्‍चे दुकान वाली ही कचौरी खाते । मैं जब पचहत्‍तर पैसे होते ठेले से कचौरी खा लेता ।
 मन में टीस थी कि कचौरी तो बी.के. स्‍कूल के दुकान की ही खानी है। मैं बणियो से कम थोड़े ही हू। इस बार मैंने सोच लिया कि पूरा एक रूपया इकटठा करूंगा। इस बार मन को पूरी तरह से कंट्रोल में रखा । पचहत्‍तर पैसे होने के बाद समय कठिनता से गुजरा परन्‍तु अहिस्‍ता अहिस्‍ता मैने एक रूपया कर ही लिया। आज सुबह एक रूपया लेकर स्‍कूल गया। लंच टाईम मे बाहर निकला। कचौरी की दुकान पर गया। मन में बहुत उत्‍साह था कि आज वास्‍तव में बी.के. स्‍कूल की कचौरी खाउंगा। परन्‍तु जैसे ही मैंने नजरे उपर उठाई, दुकान पर एक सूचना लगी थी तेल मंहगा होने के कारण आज से कचौरी 1.25 पैसा। फिर मैंने नजर घुमाई ठेले पर तो वहां पर्दा लटक रहा था आज से कचौरी 1.00 रूपया। मेंरे मन ने 25 पैसे का और इंतजार करने से मना कर दिया और मेंरे कदम ठेले की ओर चल पडे। मैंने ठेले से कचोरी खाई। ऐसा चलता रहा। जब दुकान पर 1.50 की कचौरी हुई तो ठेले पर 1.25 पैसे की । मैं साल में तीन या चार कचौरी खाता परन्‍तु 25 पैसे के अंतर को कभी पाट नहीं पाया।

      समय चक्र घूमा । मेंरी स्‍कूल की पढ़ाई पूरी हुई मैंने कॉलेज में दाखिला ले लिया । मेरे पिताजी ने शहर के सबसे अच्‍छे कॉलेज में दाखिला दिलाया। मैं पिताजी की मजबूरियो को समझता । परन्‍तु मैं जब अव्‍वल नंबरो से पास होता तो मेरे पिताजी की सारी चिंताऐ दूर हो जाया करती थी। पिताजी ने अब मुझे महीने की पॉकेट मनी भी देना शुरू कर दिया था। महीने के पांच रूपये मुझे मिलते थे । एक बार महीना खत्‍म होने का था । मेरे पास तीन रूपये बचे थे। सोचा आज बी.के. स्‍कूल की कचौरी खा ली जाय। मैं अकेला ही अपनी पूरानी स्‍कूल पहुंचा। दुकान के नजदीक पहुचा तो देखा तो पाया कि दुकान पर वही ठेले वाला बैठा है। पूछने पर मालूम हुआ कि उसने वो दुकान खरीद ली है। बातचीत के बाद कचौरी का ऑर्डर देने वाला ही था कि मेरी नजरे एक बार फिर दुकान के सूचना पटट पर थी जहां लिखा था कचौरी 3.25 रूपये । मैने फिर नजरे घुमाई वहां एक और ठेला लगा था जहां पर्दा हवा में लहरा रहा था । लिखा था कचौरी 3.00 रूपये। आज फिर 25 पैसे का अंतर में नहीं पाट पाया और ठेले से कचौरी खाई।

      फिर लंबे समय तक मैं कचौरी खाने वहां नहीं गया। कुछ ही दिनो बाद मैंने एमबीए की प्रवेश परीक्षा दी। अव्‍वल अंको के साथ मेंरा सलेक्‍शन हो गया। मेरे पिताजी की खुशी का ठिकाना नहीं था। उनको आंखे भी खुशी से नम हो गई थी। जब आगे की फार्मेलिटीज की बारी आई तो देखा कि नंबर एक इंस्‍टीयूट में केवल डोनेशन देने वालो को ही प्रवेश मिलेगा बाकि को सरकारी कॉलेज में । मैंने पिताजी को कह दिया था कि मैं सरकारी कॉलेज में ही दाखिला लूंगा। पिताजी नंबर एक इंस्‍टीटयूट में मेरा दाखिला चाहते थे। मेंरे मार्कस भी इस लायक थे। परन्‍तु डोनेशन बहुत ज्‍यादा था। मैंने सरकारी कॉलेज की हां करके पिताजी की मुश्किल आसान कर दी। सरकारी कॉलेज में दाखिला लेने का गम मुझे नहीं था। मुझे मेरे टेलेंट पर भरोसा था। बहुत खुश था। आज जेब में दस रूपये डालकर गया कि खुशी में बी.के. स्‍कूल की कचौरी खाउंगा ।
      आज बी.के. स्‍कूल पहुंच कर  सीधे दुकान गया। आज सूचना पद्ट मैंने नहीं देखा था। हांलांकि कचौरी की कीमत 6 रूपये हो चूकी थी। मैंने ऑर्डर दे दिया। मन में सोचने लग अब मंजिल मिल गई। एमबीए करने के बाद घर की सारी मुश्किले हल हो जायेगी। आज मैंने 25 पैसे का अंतर पाट दिया है। दुकानदार ने कचौरी कागज पर रखी और उस पर दही उड़ेला। वह उसमें मसाला डाल कर मेरी ओर हाथ किया । मेरी नजर दुकान के बाहर पड़ी। बाहर एक बच्‍चा जो ज्‍यादा गरीब तो दिखाई नहीं दे रहा था लेकिन ऐसा जरूर लग रहा था कि उसे आर्थिक हालात ठीक नहीं है। लोगो द्वारा कचौरी खाकर फेंके हुए कागजो को चाट रहा था। किसी में उसे कचौरी का टुकड़ा मिल जाता । कुछ को वो वैसे ही चट कर जाता था। दुकानदार ने जैसे ही मेरे हाथ में कचौरी दी। मैं तुरंत उठा और दुकान से बाहर निकल कर उस बच्‍चे को कचौरी दे दी। वो शायद भूखा था। उसे वो जल्‍दी जंल्‍दी खा रहा था। मैंने दुकानदान को 6 रूपये का भुगतान किया। चार रूपये लेकर बाहर आ गया। वहां कुछ और ठेले लग गये थे। एक ठेले पर परदा लहलहा रहा था कचौरी चार रूपये । मेरे कदम उस तरह मुड़ गये। मेरे कदमो की चाल बता रही थी कि 25 पैसे का अंतर अब दो रूपये हो गया है।