Sunday, September 24, 2017

एक कवि‍ता

अल सुबह
सड़क पर कुछ एक वाहनो
के हाॅर्न को
स्कूल जाते बच्चो के षोर को
सडक पर झाडू बुहारती
महिलओ की बातो को
दूध वाले और अखबार वालो
की आवाजो को
अपने कानो के बिलकुल पास से
निकालते हुए
अपना चेहरा नीचे किये
कुछ बुदबुदाते हुए
तेज कदमो के साथ
सफेद साड़ी में
कुछ महिलाऐ जा रही है
सीधे आश्रम में
जहां वे अपने कान
खोल देगी
पवित्र आवाजो
के लिए ।


Saturday, September 23, 2017

रेत के टीले
पूरी तरह से
मौन है
सूरज की तपन
भी उन्हे विचलित
नहीं कर पायी है
पवन  की लहर
चलती है
टीलो के सपनो को
एक लय में उडा
ले जाती है
वे
देखते है उन्हे जाते हुए
अपने से दूर
खेजड़ी से लिपट कर
वे पवन से
संघर्श करते है
पर
वह उन्हे अपने साथ
ले जाती है
किसी और के
सपनो को पूरा करने के लिए
निर्मिषेश होकर देखते रहते है
टीले
अपने सपनो को
पवन के साथ जाते हुए
बिलकुल मौन होकर ।

Sunday, August 20, 2017

कवि‍ता
सन्‍यासि‍यों का झुण्‍ड बाते करता है

सन्‍यासि‍यों का झुण्‍ड अपने आश्रम में
गोल घेरे में बैठा हुआ
गेहरूऐं वस्‍त्रो को संभालते हुए
अपने सपाट सि‍र पर हाथ फेरते हुए
बाते कर रहा है।

गेहरूऐं वस्‍त्रो ने वि‍षय आसक्‍ति‍ से
उन्‍हे दूर कर दि‍या है
सपाट सि‍र ने उन्‍हे कर्मकाण्‍डो से
मुक्‍त कर दि‍या है
फि‍र भी
वे अपने आश्रम में एक झुण्‍ड मे
बातें कर रहे है

उनके चारो ओर शून्‍य है
बाहर भी और भीतर भी
एकाकार होना चाहते है वे शून्‍य में
अपने को वि‍लीन कर देना चाहते है
शून्‍य में
पर
कर नहीं पा रहे है वे वि‍लीन अपने आपको

कोने में आसन पर गुरू बैठे है
बि‍लकुन मौन
वो एकाकार हो गये है
बाहर से और भीतर से
इसीलि‍ए वो बातो में शामि‍ल नहीं है
परन्‍तु
सन्‍यासि‍यों का झुण्‍ड गोल घेरे में
आश्रम में बैठा हुआ

बाते कर रहा है।