Friday, April 3, 2026

गर्दिशें ठहरती हैं हम जहाँ ठहरते हैं

छुटटी का दिन है। छत्‍त पर आ गया हूं। अप्रैल की धूप छत्‍त पर बिखरी हुई है। छत्‍त पर पडी एक कुर्सी पर बैठ जाता हूं। धूप मेरी देह पर गिरती है। मै कुछ दूर धूप में बैठा रहता हूं। हर कोई इस महीने में धूप में नही बैठता है। मै अपने भीतर के ठंडेपनको सूखा लेना चाहता हूं। जैसे जैसे मेरी देह पर धूप गिरती है मुझे महसूस होता है कि मेरे भीतर की बची खुची ठंड को धूप सूखा कर आसमान में ले जा रही है। इस प्रक्रिया को मै धूप में बैठा महसूस कर सकता हूं जैसे धूप में सूखाये गये गीले कपडो में से धूप पानी को सोखती है। हिन्‍दू कलैण्‍डरो में बैशाख का महीना आ चुका है। भगवान नारायण का महिना। इस महीने में माना जाता है कि देह में गरमी आ जा जाती है परन्‍तु मेरी देह के भीतर अभी तक गरमाहट पहुंची नही है या महसूस नही हो रही है। इसलिए धूप मे बैठा हूं। नीले आसमान में सफेद बादल आ गये है। अलग अलग शक्‍लो में आकर प्रकट हो गये है। ऐसा लगता है मुझे देखकर कह रहे हो -- अज्ञानां वैशाखनंदनः, मूर्खाणां च धुरंधरः।.कर्मणा बली, बुद्धिना हन्यते। हो इसके बाद सफेद मेघ सूरज के आगे पहेरदार की तरह आकर खडे हो जाते है। मै कमरे के भीतर चला जाता हूं।

एक लंबे समय से मन के भीतर एक ऐसे लंबे रास्‍ते पर भाग रहा हूं जिसके रास्‍ते मे हरियाली, फूल, झरने और रंग बिरंगे पछी सब कुछ है परन्‍तु कुछ भी मुझे लुभा नही रहो है। मै ऐसे दौडे जा रहा हूं जैसे मेरी मंजिल बस सामने है और बस एक अदद साधन की जरूरत है। दो दिन पहले भी छुटटी का दिन था। व‍ह दिन भी मन के भीतर दौडते हुए गुजरा। उस दिन शाम को योगेन्‍द्र के साथ नाटक देखने चला गया। योगेन्‍द्र पहले चला गया और मै बाद मे गया। गंगाशहर के किसी इलाके मे था टीएम ऑटोडोरियम। काली सडको पर शुरूआती रात के वक्‍त मेरी बाईक सडक पर दौड रही थी। सडक पर समुद्र की लहरो की तरह उठती हुई रेत मेरे उपर गिर रही थी। गंगाशहर के अंदरूनी गलियो से मुख्‍स सडक पर पहुंचा जहां कुछ दूर चलकर था यह ऑटोडोरियम। मुख्‍य सडक से भी थोडा अंदर जाकर था यह। मै राहगीरो से पूछते हुए पहुंचा। शहर से दूर भीतरी ईलाके में बहुत अच्‍छा मिनी थियेटर बना हुआ था। मै पहुंचा तब तक नाटक शुरू नही हुआ था। थियेटर के बाहर लोग ईधर उधर विचरण कर रहे थे।

 कुछ लोग भीतर जाकर अपनी सीटो पर बैठ रहे थे। मै भी जाकर पीछे एक सीट बैठ गया और मोबाईल देखने लगा इतने में योगेन्‍द्र आ गया और वो मुझे आगे की सीटो पर ले गया। नाटक शुरू होने में देरी थी। मंच पर एक सूखा पेड लगाया हुआ था और दूसरी और कुछ कठपुतलियां लटकाई हुई थी। नाटक का नाम था – कठपुतलियां। योगेन्‍द्र ने मुझे अपने दोस्‍त गगन मिश्रा से मिलवाया। गगन जयपुर में बच्‍चो के नाटको पर काम करता है और यहां बच्‍चो को नाटक का प्रशिक्षण देने आया हुआ है। थोडी देर में शो शुरू हो गया।

 मंच पर कुछ महिलाऐ रो रही थी और कुछ पुरूष शमसान की ओर जा रहे थे। ऐसा लगा कि एक दुखद नाटक है। कुछ लोग अपने साथ बच्‍चो को कठपुतलियां नाम देखकर साथ लाये थे उनको निराशा हुई। हम भी ऐसी दुख भरी कहानी देखना नही चाहते थे क्‍योंकि दुख तो कभी भी कहीं भी पैदा हो सकता है, इसे देखने की जरूरत नही। हम दोनो उठकर चले गये। बाहर आयोजको मेसे एक ने पूछा क्‍या हुआ। हम गरमी का बहाना कर वहां से निकल गये।

भीतर व दौड जारी थी। दो दिन पहने की छुटटी मे मै नरेन्‍द्र ऑटोडोरियम में एक पुस्‍तक विमोचन कार्यक्रम में चला गया। लेखक से मेरे से थोडा बहुत परिचय था। उन्‍होने न्‍यौता दिया था सो चला गया। किताब का नाम था सिंजोफ्रेनिक। नाम अंग्रेजी था। समझ नही आया। वहां जाकर पता चला यह एक मानसिक बिमारी है तो लेखक को थी। लेखक ने कहानी के एक अंश का अभिनय भी किया। कहानी का नायक बार बार अकेलेपन में चला जाता है। कभी दूसरो पर अपनी खुनुस निकालता है। एक बार मुझे भी लगा कि कहीं मुझे तो यह बिमारी नही है। कार्यक्रम में क्रष्‍ण कल्‍पित  और मालचंद तिवाडी का उदबोधपन सुना। दोनो ने बहुत सुंदर उदबोधन दिया। कल्पिक राष्‍ट्रीयस्‍तर के कवि है। शाम तक मै लौट आया।

मन के भीतर की दौड जारी थी। दौडते हुए कहीं विश्राम की जगह तलाश रहा था। विश्राम मिल नही रहा था। इस सुंदर दुनिया में भी मुझे गर्दिश नजर आ रही थी। इकबाल सफीपुरी का शेर मुझे यादा आ गया - गर्दिशें ठहरती हैं हम जहाँ ठहरते हैं। जुर्म सिर्फ इतना है.............।

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