Saturday, September 26, 2026

सुनाई देती है जिसकी धड़कन

 इस बार मौसम की तरह इस बार मौसम की बात नहीं करूँगा। इस बार मेरी बात करूँगा।

एक अरसे बाद मैं इन पन्नों पर आपसे मुखातिब हुआ हूँ। इस दौरान बहुत कुछ बीत गया। कुछ बीते हुए को सहेजा और कुछ हाथ में आकर फिसल गया। अब मैं किसी चीज के पीछे नहीं भागता। व्हाट्सऐप के एक मैसेज की तरह अब उम्र के उस मुकाम पर खड़ा हूँ कि सामने बहुत कुछ है, पर चाहिए कुछ भी नहीं।

इन दिनों मैंने बहुत-सी कविताएँ भी लिखी हैं। लोग इसके बारे में पूछते हैं तो बता देता हूँ कि नई किताब के लिए लिख रहा हूँ, लेकिन मैं कविताएँ अपने मन में जो चल रहा है, उसको अभिव्यक्त करने के लिए लिखता हूँ। मैं किसी कवि की तरह या समाजसेवी की तरह कविता नहीं लिखता। मन में जो उठता है, उसे शब्द दे देता हूँ।

अब शब्द लोगों तक पहुँचते हैं या नहीं, इस पर मैं विचार नहीं करता, क्योंकि मैं गौरव सोलंकी की इस बात पर विश्वास करता हूँ कि मुझे कविता लिखने में आनंद आता है और मैं तब भी कविताएँ लिखूँगा, जब दुनिया का कोई भी आदमी उन्हें पढ़ना नहीं चाहेगा।

आप मेरी कविताएँ मेरे ब्लॉग या फेसबुक पर पढ़ सकते हैं।

पिछले दिनों मित्रों के साथ पुनरासर जाना हुआ। मित्र की गाड़ी में हम दोपहर में पुनरासर के लिए रवाना हुए। सहकर्मी थे, इसलिए गाड़ी में ऑफिस की बातों का पोस्टमार्टम शुरू हो गया। बातों में इतने मशगूल थे कि भूल ही गए कि पुनरासर के रास्ते पर हैं या गाड़ी किसी और रास्ते पर जा रही है।

गाड़ी की खिड़की से बाहर देखा तो पाया कि हम सही रास्ते पर हैं। एक ने कह दिया कि पुनरासर की सड़क से पहले एक प्रवेश द्वार है। सो सबकी नजरें प्रवेश द्वार पर लग गईं।

ज्यों ही प्रवेश द्वार आया, हम सबने जोर से जयकारा लगाया—

“पुनरा—स—र बाबा की जय!”

पुनरासर बाबा की मुख्य सड़क तक पहुँचते-पहुँचते शाम हो गई थी। संजय ने कहा कि जोरदार सीन है, कुछ स्नैप ले लेते हैं। सो उतरकर हर तरफ से फोटो मोबाइल में कैद की।

झाड़ियों में ढलते सूरज की रोशनी गुलामी फिल्म के गाने की तरह महसूस हो रही थी—

“मुकुंद जिहाल, मिस्किन मक़बूल बिरंजिस इजरा बिछा रही है,
सुनाई देती है जिसकी धड़कन, वो तुम्हारा दिल है या हमारा दिल...”

ऐसा ही कुछ लग रहा था।

मेरे को गाने के बोल आप जैसे ही आते हैं। ये तो लिरिक्स गूगल करके लिखे हैं।

मैंने इस गाने के लिए एक वीडियो भी बनाई। इसी जगह हमने 50 फोटो खींच डालीं और यह कहते हुए कि हमें तो फोटो का शौक नहीं है, आगे बढ़ गए।

पुनरासर पहुँचे तब तक पूरी तरह से शाम हो चुकी थी। मंदिर के दर्शन किए। पुनरासर मेले से पहले गए थे, इसलिए मंदिर में मेले की तैयारियाँ चल रही थीं।

मंदिर में प्रसाद लेने के बाद अंजनी माता के मंदिर गए। इस मंदिर में दक्षिण स्थापत्य शैली जैसे पत्थर लगे थे। इसलिए शुरू हो गए फोटो खींचने।

मंदिर के आगे-पीछे सभी ने फोटो खिंचवाई। किसी ने सिंगल तो किसी ने साथ में।

आनंददायक माहौल था। आज पूरा शनिवार पुनरासर बाबा के नाम था।

रात हो रही थी। हमने निकलना ही बेहतर समझा।

संजय ने यह कहकर और डरा दिया कि रात को पहली बार ही इस रोड पर गाड़ी चला रहा हूँ। पर हमें बाबा पर और मित्र पर विश्वास था। इसलिए मस्ती करते-करते बीकानेर पहुँच गए।

यह एक आनंददायक यात्रा थी।

हमारे यहाँ अभी मेलों का दौर खत्म हुआ है। सबसे अंत में कोडमदेसर भैरूजी का मेला होता है। इस मेले में हजारों पैदल यात्री जाते हैं।

मैं अपने भाई के साथ एक रात मेला देखने गया था। भाई साहब पैर रखने को जगह नहीं थी। इतने पैदल यात्री, उससे दुगुने बाइक वाले और फिर कार वाले—एक सड़क पर इतने लोग।

रास्ते में भंडारे और सेवाएँ इतनी थीं कि हर भंडारे और सेवा के आगे अनाप-शनाप भीड़।

पूरे रास्ते गाड़ी पाँच की स्पीड पर चल रही थी। फिर मैंने तो हाथ खड़े कर दिए और नाल पुलिए से मैं वापस मुड़ गया और घर की तरफ रवाना हो गया।

परन्तु मेले में डीजे और उसके आगे नाचते युवाओं की भीड़ आकर्षक और मनमोहक थी।

एक गाना सब जगह ही चल रहा था—

“आ तो सेब जीते...”

और दूसरा—

“ऐ तो शुभ जी जीते...”

इन दिनों एक किताब मंगवाई है—रस्किन बॉन्ड की आत्मकथा।

मुझे रस्किन बॉन्ड की आत्मकथा से मतलब नहीं है। मैं उनके लिखे शब्दों को पसंद करता हूँ। वे मसूरी और पहाड़ों का इतना जोरदार वर्णन करते हैं कि आपको पढ़ते-पढ़ते लगता है कि आपके चेहरे पर देवदार के पेड़ों की हवा आ रही है।

अभी कुछ ही पन्ने पढ़े हैं। पूरी पढ़ने पर इस पर बात करेंगे। पढ़ने में वक्त लगेगा। मैं किताब को धीरे-धीरे पढ़ता हूँ—एक सप्ताह में दस पेज।

साथ में दिव्य प्रकाश दुबे की भी नई किताब मंगवाने का विचार है। देखते हैं।

प्लान बहुत से हैं। कितने कामयाब होते हैं, समय बताएगा।

क्योंकि जो बीत रहा है, वह समय है।

आपसे फिर मिलते हैं।

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