Wednesday, September 30, 2026

हार मे उम्मीद

 


डेविस कप भारत के लिए हमेशा से ही पहेली की तरह रहा है। भारत इस पहेली को सुलझाने में हर बार चूक जाता है। डेविस कप एक टीम टूर्नामेंट है। इसमें सामूहिक प्रदर्शन से आगे का सफर तय होता है। भारत के लिए डेविस कप संभावनाओं वाला टूर्नामेंट रहा है। भारत इसमें 100 से भी ज्यादा वर्षों से भाग ले रहा है। तीन बार—1966] 1974 और 1987 में—भारत फाइनल तक पहुंच चुका है, परंतु एक बार भी खिताब नहीं जीत पाया। भारत उन दिनों भी फाइनल में पहुंचा है, जब भारत के सितारा खिलाड़ी एटीपी रैंकिंग में कोई ज्यादा बड़े खिलाड़ी नहीं थे। भारत हमेशा डेविस कप के विश्व ग्रुप के आसपास घूमता रहा है।

इस बार भारत का प्रदर्शन उम्मीद से भरा था, लेकिन थोड़ी सी चूक के कारण अंतिम आठ में जगह नहीं बना पाया। क्वालीफायर के दूसरे दौर में दक्षिण कोरिया से 3-1 से हार गया, लेकिन इस साल के प्रदर्शन से भारत अगले साल के लिए एक नई उम्मीद छोड़ गया है।

इस साल की शुरुआत में नीदरलैंड के विरुद्ध शानदार प्रदर्शन से भारत की उम्मीदें आसमान पर थीं। युवा खिलाड़ी दक्षिणेश्वर सुरेश के दमदार प्रदर्शन की बदौलत भारत ने नीदरलैंड को 3-2 से पराजित कर ड्रॉ जीत लिया। सुरेश ने नीदरलैंड के 88वीं वरीयता प्राप्त जेस्पर डी जोंग को हराया और अपने सभी तीनों मैच जीते। यह जीत बड़ी थी, क्योंकि नीदरलैंड को मजबूत टीम माना जाता है। ऐसे में भारत के फाइनल में जाने की संभावनाएं बढ़ गई थीं। अगला मुकाबला दक्षिण कोरिया से तय होने के बाद भारत कहीं ज्यादा उम्मीद करने लगा था।

दक्षिणेश्वर सुरेश के कमाल के प्रदर्शन से भारत की टीम मजबूत नजर आ रही थी, लेकिन क्वालीफायर-2 शुरू होने से पहले ही यूकी भांबरी के चोटिल होने से भारत के गैर-खिलाड़ी कप्तान रोहित राजपाल के माथे पर शिकन की रेखाएं खिंच गई थीं। सुमित नागल और सुरेश के चलते भारत ने उम्मीदें बांध रखी थीं।

सुमित नागल ने अपने एकल मुकाबले में जोरदार शुरुआत की थी और एक समय 4-0 से आगे थे लेकिन नागल अपने खेल में निरंतरता नहीं रख पाए और एकल मैच हार गए। सुरेश ने भी अपने एकल मैच में सुनवू क्वोन को टक्कर दी लेकिन सुनवू ने अपनी रणनीति बदलकर मैच खेला और सुरेश मैच खो बैठे।

पहले दोनों एकल हारने के बाद भारत के हौसले वैसे ही टूट गए थे और यूकी भांबरी के नहीं होने से टीम दबाव में थी। लेकिन युगल में सुरेश ने एन श्रीराम बालाजी के साथ मिलकर दक्षिण कोरिया की जोड़ी को 6-3] 3-6 और 6-3 से हराकर भारत को फिर जिंदा कर दिया। लेकिन रिवर्स सिंगल में सुमित नागल सुनवू के सामने टिक नहीं पाए और आसानी से हार गए। इस हार के साथ ही भारत यह ड्रॉ 3-1 से हार गया।

अब भारत को एक बार फिर क्वालीफायर खेलना होगा। वर्ष 2027 में एक बार फिर क्वालीफायर में भारत का मुकाबला नीदरलैंड से होगा। भारत एक बार फिर नीचे की सीढ़ी पर फिसल गया है।

दक्षिण कोरिया के विरुद्ध भारत को बहुत उम्मीद थी, लेकिन परिणाम उम्मीद के विपरीत रहा। यूकी भांबरी के चोटिल होने से भारत दबाव में आ गया था। हालांकि युगल मैच भारत ने जीता, लेकिन एकल मुकाबलों में भारतीय खिलाड़ी टिक नहीं पाए। सुमित नागल का फॉर्म नहीं पकड़ पाना भी एक कारण रहा।

सबसे बड़ा कारण मैच का दक्षिण कोरिया में होना था। इस कारण सारी परिस्थितियां उसके पक्ष में थीं। हार्ड कोर्ट पर बॉल स्लो आ रही थी, जिसका फायदा मेजबान को मिला। कोरियाई खिलाड़ियों द्वारा मैच के अनुसार रणनीति बनाना भी भारत की हार का कारण रहा। भारतीयों के खेल में निरंतरता नहीं थी। इस कारण वे मैच में अपनी मजबूत स्थिति को अंत तक नहीं बना पाए और मैच खो दिए।

दक्षिणेश्वर सुरेश अपने से ज्यादा रैंकिंग वाले कोरियाई खिलाड़ियों का दबाव कम नहीं कर पाए। गैर-खिलाड़ी कप्तान को चाहिए था कि वह टीम को मानसिक रूप से मजबूत करते। नीदरलैंड के विरुद्ध मिली जीत के हौसले को टीम में बनाए रखना जरूरी था। कप्तान को टीम के मनोबल को बनाए रखना था।

डेविस कप में भारतीय टीम का गौरवशाली इतिहास रहा है। 1974 के फाइनल में भारत का मुकाबला दक्षिण अफ्रीका से था, लेकिन दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद नीति के विरोध में भारत ने इस मैच का बहिष्कार किया, जिसके कारण दक्षिण अफ्रीका को विजेता घोषित कर दिया गया। 1987 के फाइनल में स्वीडन के विरुद्ध भी भारत एक भी मैच नहीं जीत सका और बाहर हो गया।

लिएंडर पेस भारत के सबसे सफल डेविस कप खिलाड़ियों में रहे हैं। भारत के शानदार रिकॉर्ड को देखते हुए इस बार भी भारत से उम्मीद थी, लेकिन उम्मीदें परवान नहीं चढ़ सकीं। भारत के लिए दूसरे देश की मेजबानी में उनके कोर्ट पर खेलना बहुत बड़ी चुनौती थी। दक्षिण कोरिया ने अपनी सुविधा के अनुसार कोर्ट चुने, जिसका फायदा उसे मिला।

नीदरलैंड के विरुद्ध जोरदार प्रदर्शन करने वाले सुरेश ने यहां भी प्रदर्शन ठीक किया, लेकिन एकल मैच में जीत नहीं पाए। यहां युगल में उनका प्रदर्शन सफल रहा।

अगले साल के लिए भारत को नए सिरे से रणनीति बनानी होगी। गैर-खिलाड़ी कप्तान रोहित राजपाल का कार्यकाल दिसंबर में खत्म हो रहा है। टीम भी नए सिरे से बनेगी। टेनिस प्रबंधकों को एक लक्ष्य बनाकर खिलाड़ियों को तैयार करना होगा, ताकि आने वाले मैचों में भारतीय टीम को जीतने में कोई दिक्कत न हो।

डेविस कप में भारत जीत सकता है। जरूरत है थोड़ी सामूहिक कोशिश की। दूसरे देश की मेजबानी में अपने प्रदर्शन को सुधारना होगा। इसके लिए मैच से पहले कोर्ट और विरोधी टीम के खिलाड़ियों का अध्ययन करना होगा ताकि सभी चीजें सामने होने पर रणनीति आसानी से बनाई जा सके।

फिलहाल यह ड्रॉ तो भारत चूक गया है। अब अगले साल पर लक्ष्य है और उम्मीद है कि अगला साल भारत के लिए सफलता लेकर आएगा।

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सीताराम गेट के सामने] बीकानेर
9413769053

Saturday, September 26, 2026

सुनाई देती है जिसकी धड़कन




मै हर बार की तरह इस बार मौसम की बात नहीं करूँगा। इस बार मेरी बात करूँगा।

एक अरसे बाद मैं इन पन्नों पर आपसे मुखातिब हुआ हूँ। इस दौरान बहुत कुछ बीत गया। कुछ बीते हुए को सहेजा और कुछ हाथ में आकर फिसल गया। अब मैं किसी चीज के पीछे नहीं भागता। व्हाट्सऐप के एक मैसेज की तरह अब उम्र के उस मुकाम पर खड़ा हूँ कि सामने बहुत कुछ है, पर चाहिए कुछ भी नहीं।

इन दिनों मैंने बहुत-सी कविताएँ भी लिखी हैं। लोग इसके बारे में पूछते हैं तो बता देता हूँ कि नई किताब के लिए लिख रहा हूँ, लेकिन मैं कविताएँ अपने मन में जो चल रहा है, उसको अभिव्यक्त करने के लिए लिखता हूँ। मैं किसी कवि की तरह या समाजसेवी की तरह कविता नहीं लिखता। मन में जो उठता है, उसे शब्द दे देता हूँ।

अब शब्द लोगों तक पहुँचते हैं या नहीं, इस पर मैं विचार नहीं करता, क्योंकि मैं गौरव सोलंकी की इस बात पर विश्वास करता हूँ कि मुझे कविता लिखने में आनंद आता है और मैं तब भी कविताएँ लिखूँगा, जब दुनिया का कोई भी आदमी उन्हें पढ़ना नहीं चाहेगा।


आप मेरी कविताएँ मेरे ब्लॉग या फेसबुक पर पढ़ सकते हैं।

पिछले दिनों मित्रों के साथ पुनरासर जाना हुआ। मित्र की गाड़ी में हम दोपहर में पुनरासर के लिए रवाना हुए। सहकर्मी थे, इसलिए गाड़ी में ऑफिस की बातों का पोस्टमार्टम शुरू हो गया। बातों में इतने मशगूल थे कि भूल ही गए कि पुनरासर के रास्ते पर हैं या गाड़ी किसी और रास्ते पर जा रही है।

गाड़ी की खिड़की से बाहर देखा तो पाया कि हम सही रास्ते पर हैं। एक ने कह दिया कि पुनरासर की सड़क से पहले एक प्रवेश द्वार है। सो सबकी नजरें प्रवेश द्वार पर लग गईं।

ज्यों ही प्रवेश द्वार आया, हम सबने जोर से जयकारा लगाया—

“पुनरा—स—र बाबा की जय!”

पुनरासर बाबा की मुख्य सड़क तक पहुँचते-पहुँचते शाम हो गई थी। संजय ने कहा कि जोरदार सीन है, कुछ स्नैप ले लेते हैं। सो उतरकर हर तरफ से फोटो मोबाइल में कैद की।

झाड़ियों में ढलते सूरज की रोशनी गुलामी फिल्म के गाने की तरह महसूस हो रही थी—

“मुकुंद जिहाल, मिस्किन मक़बूल बिरंजिस इजरा बिछा रही है,
सुनाई देती है जिसकी धड़कन, वो तुम्हारा दिल है या हमारा दिल...”

ऐसा ही कुछ लग रहा था।

मेरे को गाने के बोल आप जैसे ही आते हैं। ये तो लिरिक्स गूगल करके लिखे हैं।

मैंने इस गाने के लिए एक वीडियो भी बनाई। इसी जगह हमने 50 फोटो खींच डालीं और यह कहते हुए कि हमें तो फोटो का शौक नहीं है, आगे बढ़ गए।

पुनरासर पहुँचे तब तक पूरी तरह से शाम हो चुकी थी। मंदिर के दर्शन किए। पुनरासर मेले से पहले गए थे, इसलिए मंदिर में मेले की तैयारियाँ चल रही थीं।

मंदिर में प्रसाद लेने के बाद अंजनी माता के मंदिर गए। इस मंदिर में दक्षिण स्थापत्य शैली जैसे पत्थर लगे थे। इसलिए शुरू हो गए फोटो खींचने।



मंदिर के आगे-पीछे सभी ने फोटो खिंचवाई। किसी ने सिंगल तो किसी ने साथ में।

आनंददायक माहौल था। आज पूरा शनिवार पुनरासर बाबा के नाम था।

रात हो रही थी। हमने निकलना ही बेहतर समझा।

संजय ने यह कहकर और डरा दिया कि रात को पहली बार ही इस रोड पर गाड़ी चला रहा हूँ। पर हमें बाबा पर और मित्र पर विश्वास था। इसलिए मस्ती करते-करते बीकानेर पहुँच गए।

यह एक आनंददायक यात्रा थी।

हमारे यहाँ अभी मेलों का दौर खत्म हुआ है। सबसे अंत में कोडमदेसर भैरूजी का मेला होता है। इस मेले में हजारों पैदल यात्री जाते हैं।




मैं अपने भाई के साथ एक रात मेला देखने गया था। भाई साहब पैर रखने को जगह नहीं थी। इतने पैदल यात्री, उससे दुगुने बाइक वाले और फिर कार वाले—एक सड़क पर इतने लोग।

रास्ते में भंडारे और सेवाएँ इतनी थीं कि हर भंडारे और सेवा के आगे अनाप-शनाप भीड़।

पूरे रास्ते गाड़ी पाँच की स्पीड पर चल रही थी। फिर मैंने तो हाथ खड़े कर दिए और नाल पुलिए से मैं वापस मुड़ गया और घर की तरफ रवाना हो गया।

परन्तु मेले में डीजे और उसके आगे नाचते युवाओं की भीड़ आकर्षक और मनमोहक थी।

एक गाना सब जगह ही चल रहा था—

“आ तो सेब जीते...”

और दूसरा—

“ऐ तो शुभ जी जीते...”

इन दिनों एक किताब मंगवाई है—रस्किन बॉन्ड की आत्मकथा।

मुझे रस्किन बॉन्ड की आत्मकथा से मतलब नहीं है। मैं उनके लिखे शब्दों को पसंद करता हूँ। वे मसूरी और पहाड़ों का इतना जोरदार वर्णन करते हैं कि आपको पढ़ते-पढ़ते लगता है कि आपके चेहरे पर देवदार के पेड़ों की हवा आ रही है।


अभी कुछ ही पन्ने पढ़े हैं। पूरी पढ़ने पर इस पर बात करेंगे। पढ़ने में वक्त लगेगा। मैं किताब को धीरे-धीरे पढ़ता हूँ—एक सप्ताह में दस पेज।

साथ में दिव्य प्रकाश दुबे की भी नई किताब मंगवाने का विचार है। देखते हैं।

प्लान बहुत से हैं। कितने कामयाब होते हैं, समय बताएगा।

क्योंकि जो बीत रहा है, वह समय है।

आपसे फिर मिलते हैं।

Friday, April 3, 2026

गर्दिशें ठहरती हैं हम जहाँ ठहरते हैं

छुटटी का दिन है। छत्‍त पर आ गया हूं। अप्रैल की धूप छत्‍त पर बिखरी हुई है। छत्‍त पर पडी एक कुर्सी पर बैठ जाता हूं। धूप मेरी देह पर गिरती है। मै कुछ दूर धूप में बैठा रहता हूं। हर कोई इस महीने में धूप में नही बैठता है। मै अपने भीतर के ठंडेपनको सूखा लेना चाहता हूं। जैसे जैसे मेरी देह पर धूप गिरती है मुझे महसूस होता है कि मेरे भीतर की बची खुची ठंड को धूप सूखा कर आसमान में ले जा रही है। इस प्रक्रिया को मै धूप में बैठा महसूस कर सकता हूं जैसे धूप में सूखाये गये गीले कपडो में से धूप पानी को सोखती है। हिन्‍दू कलैण्‍डरो में बैशाख का महीना आ चुका है। भगवान नारायण का महिना। इस महीने में माना जाता है कि देह में गरमी आ जा जाती है परन्‍तु मेरी देह के भीतर अभी तक गरमाहट पहुंची नही है या महसूस नही हो रही है। इसलिए धूप मे बैठा हूं। नीले आसमान में सफेद बादल आ गये है। अलग अलग शक्‍लो में आकर प्रकट हो गये है। ऐसा लगता है मुझे देखकर कह रहे हो -- अज्ञानां वैशाखनंदनः, मूर्खाणां च धुरंधरः।.कर्मणा बली, बुद्धिना हन्यते। हो इसके बाद सफेद मेघ सूरज के आगे पहेरदार की तरह आकर खडे हो जाते है। मै कमरे के भीतर चला जाता हूं।

एक लंबे समय से मन के भीतर एक ऐसे लंबे रास्‍ते पर भाग रहा हूं जिसके रास्‍ते मे हरियाली, फूल, झरने और रंग बिरंगे पछी सब कुछ है परन्‍तु कुछ भी मुझे लुभा नही रहो है। मै ऐसे दौडे जा रहा हूं जैसे मेरी मंजिल बस सामने है और बस एक अदद साधन की जरूरत है। दो दिन पहले भी छुटटी का दिन था। व‍ह दिन भी मन के भीतर दौडते हुए गुजरा। उस दिन शाम को योगेन्‍द्र के साथ नाटक देखने चला गया। योगेन्‍द्र पहले चला गया और मै बाद मे गया। गंगाशहर के किसी इलाके मे था टीएम ऑटोडोरियम। काली सडको पर शुरूआती रात के वक्‍त मेरी बाईक सडक पर दौड रही थी। सडक पर समुद्र की लहरो की तरह उठती हुई रेत मेरे उपर गिर रही थी। गंगाशहर के अंदरूनी गलियो से मुख्‍स सडक पर पहुंचा जहां कुछ दूर चलकर था यह ऑटोडोरियम। मुख्‍य सडक से भी थोडा अंदर जाकर था यह। मै राहगीरो से पूछते हुए पहुंचा। शहर से दूर भीतरी ईलाके में बहुत अच्‍छा मिनी थियेटर बना हुआ था। मै पहुंचा तब तक नाटक शुरू नही हुआ था। थियेटर के बाहर लोग ईधर उधर विचरण कर रहे थे।

 कुछ लोग भीतर जाकर अपनी सीटो पर बैठ रहे थे। मै भी जाकर पीछे एक सीट बैठ गया और मोबाईल देखने लगा इतने में योगेन्‍द्र आ गया और वो मुझे आगे की सीटो पर ले गया। नाटक शुरू होने में देरी थी। मंच पर एक सूखा पेड लगाया हुआ था और दूसरी और कुछ कठपुतलियां लटकाई हुई थी। नाटक का नाम था – कठपुतलियां। योगेन्‍द्र ने मुझे अपने दोस्‍त गगन मिश्रा से मिलवाया। गगन जयपुर में बच्‍चो के नाटको पर काम करता है और यहां बच्‍चो को नाटक का प्रशिक्षण देने आया हुआ है। थोडी देर में शो शुरू हो गया।

 मंच पर कुछ महिलाऐ रो रही थी और कुछ पुरूष शमसान की ओर जा रहे थे। ऐसा लगा कि एक दुखद नाटक है। कुछ लोग अपने साथ बच्‍चो को कठपुतलियां नाम देखकर साथ लाये थे उनको निराशा हुई। हम भी ऐसी दुख भरी कहानी देखना नही चाहते थे क्‍योंकि दुख तो कभी भी कहीं भी पैदा हो सकता है, इसे देखने की जरूरत नही। हम दोनो उठकर चले गये। बाहर आयोजको मेसे एक ने पूछा क्‍या हुआ। हम गरमी का बहाना कर वहां से निकल गये।

भीतर व दौड जारी थी। दो दिन पहने की छुटटी मे मै नरेन्‍द्र ऑटोडोरियम में एक पुस्‍तक विमोचन कार्यक्रम में चला गया। लेखक से मेरे से थोडा बहुत परिचय था। उन्‍होने न्‍यौता दिया था सो चला गया। किताब का नाम था सिंजोफ्रेनिक। नाम अंग्रेजी था। समझ नही आया। वहां जाकर पता चला यह एक मानसिक बिमारी है तो लेखक को थी। लेखक ने कहानी के एक अंश का अभिनय भी किया। कहानी का नायक बार बार अकेलेपन में चला जाता है। कभी दूसरो पर अपनी खुनुस निकालता है। एक बार मुझे भी लगा कि कहीं मुझे तो यह बिमारी नही है। कार्यक्रम में क्रष्‍ण कल्‍पित  और मालचंद तिवाडी का उदबोधपन सुना। दोनो ने बहुत सुंदर उदबोधन दिया। कल्पिक राष्‍ट्रीयस्‍तर के कवि है। शाम तक मै लौट आया।

मन के भीतर की दौड जारी थी। दौडते हुए कहीं विश्राम की जगह तलाश रहा था। विश्राम मिल नही रहा था। इस सुंदर दुनिया में भी मुझे गर्दिश नजर आ रही थी। इकबाल सफीपुरी का शेर मुझे यादा आ गया - गर्दिशें ठहरती हैं हम जहाँ ठहरते हैं। जुर्म सिर्फ इतना है.............।

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Sunday, December 22, 2024

लिखे जो खत तुझे

 


 मै जब यह पढ़ रहा था तो यह कभी लगा ही नही कि मै एक खिलाड़ी को लिखे पत्र को पढ़ रहा हूं। मुझे ऐसा लगा कि किसी शास्‍त्रीय संगीत की धारा में बह रहा हूं या फिर किसी प्रतिष्ठित साहित्‍यकार की किताब को पढ़ रहा हूं। बिलकुल ऐसा ही लगा जब मै इस साल के खेलो की दुनिया में हुए दो रिटायरमेंट के बाद लिखे पत्रो को पढ़ रहा था। ऐसा लगा जैसे एक सरल सलि‍ल नदी बह रही है और उसके पानी के साथ एक शास्‍त्रीय धुन के साथ जा रहा हूं। इस साल टेनिस से रिटायर हुए रफाल नाडेल को लिखा गया उसके प्रतिद्वन्‍द्वी फेडरर का पत्र और क्रिकेट आर. अश्विन के रिटायर होने पर उसकी पत्‍नी का लिखा गया पत्र। ये दोनो पत्र किसी खेल के नही बल्कि साहित्‍य के पत्र मालूम होते है। उनके एक एक शब्‍द उन दोनो खिलाडि़यो के पूरे खेल जीवन में शीतल हवा की ठंडी बयार है।

क्रिकेट आर. अश्‍वनि ने हाल ही में आस्‍ट्रेलिया दौर के बीच में ही अपने रिटायरमेंट की घोषणा की। उन्‍होने क्‍यों घोषणा की और कैसे की यह सब क्रिकेट का विषय हो सकता है परन्‍तु उनकी पत्नि प्रीति ने अपने पति को जो पत्र लिखा उसे पढकर आपके पास भावुक होने के लिए पर्याप्‍त कारण है। वो लिखती है बड़ी जीत, प्‍लेयर ऑफ द सीरीज पुरस्‍कार, एक गंभीर मुकाबले के बाद हमारे कमरे में एकदम शांति, कभी भी शाम में खेल के बाद शॉवर की देर तक आती आवाज, सामान्‍य से अधिक दौड़ना, कागज के उपर अश्विन का लिखते हुए पेंसिल की खरोंच, जब वह गेम प्‍लान बना रहा होता है तो फुटेज वीडियो की लगातार स्‍ट्रीमिंग, प्रत्‍येक मुकाबले के लिए निकलने से पहले एक लंबी सासं लेते हुए खुद का शांत रखने की कोशिश, आराम करते हुए गाने सुनना और उसे लूप कर लगातार दोहराना....... वह समय जब हम खुशी में रोए थे – चैम्पियस ट्रॉफी फाईनल के बाद, मेलबर्न जीत के बाद, सिडनी ड्रा के बाद, गाबा की जीत, टी२० में वापसी करने के बाद..... वह समय जब हम मौन बैठे थे और वह समय जब हमारे दिल टूट गये थे। वो अपने पति को एक गर्ल फैन की तरह लिखते हुए कहती है कि प्रिय अश्विन, किट बैग कैसे रखा जाता है ये ना जानते हुए भी दुनिया भर के स्‍टेडियमो मे आपके साथ चलना, आपका समर्थन करना, आपको देखना और आपसे सीखना परमआनंददायक रहा।  वो अंत में लिखती है कि यह आपके उपर बोझ कम करने का समय है। आप अपनी शर्तो पर जीये, उन अतिरिक्‍त कैलोरिज के लिए जगह बनाऐ, अपने परिवार के लिए समय निकाले, कुछ भी न करने के लिए समय निकाले, पूरे दिन मीम्‍स साझा करे, हमारे बच्‍चो के दिमाग से गंदगी निकाले, बस यह सब करे। यह पत्र उनके पूरे क्रिकेट कैरियर पर एक ठंडी बयार है। अश्विन की पत्‍नी के ये शब्‍दो में साहित्‍य प्रभाव है। उनका यह लिख्ना कि कुछ भी न करने के लिए समय निकाले, दिल को छु गया। यह पत्र रिटायरमेंट पर एक क्रिकेटर के लिए सबसे बड़ा तोहफा है।

ऐसा ही एक रिटायरमेंट टेनिस खिलाड़ी राफेल नडाल का हुआ। नडाल के रिटायरमेंट से पूर्व उनके सबसे बड़े प्रतिद्वन्‍द्वी रोजर फेडरर जो उनसे पहले रिटायर हो चुके थे ने राफेल नडाल को जो पत्र लिखा उसे भी साहित्‍य के क्षेत्र में उच्‍च श्रेणी में रखा जायेगा। उनका पत्र पढ़कर आपको ऐसा लगेगा कि आप बादलो के बीच तैरते हुए संगीत का आनंद ले रहे हो। वेा लिखते है आपने मुझे अपने खेल की फिर से कल्‍पना करने पर मजबूर कर किया। यहां तक कि मैने अपने रैकेट के सिर का आकार भी बदल दिया ताकि किसी भी तरह की बढ़त हासिल कर सकूं। मै बहुत अंधविश्‍वासी व्‍यक्ति नही हूं, लेकिन आपने इसे अगले स्‍तर तक पहुंचा दिया। आपकी पूरी प्रक्रिया। वो सभी रस्‍मे। अपनी पानी की बोतल को खिलौने के सैनिको की तरह फॉर्मेशन में इकटठा करना, अपने बालो को ठीक करना, अपने अंडरवियर को एडजेस्‍ट करना......... ये सब तीव्रता के साथ। गुप्‍त रूप से , मुझे यह सब पसंद आया, क्‍योंकि यह बहुत अनोखा था- यह बिलकुल आपकी तरह ही था और आप जानते है कि खेल का और ज्‍यादा मजा लेने के लिए आपने प्रेरित किया।

वो इससे आगे और भावुकता के साथ लिखते है कि जब मैने नंबर 1 रैंकिंग हासिल की थी तो मुझे लगा था कि मै दुनिया में सबसे उपर हूं और मै था -दो महीने बाद तक, जब आप मियामी में अपनी लाल स्‍लीपलेस शर्ट में कोर्ट में उतरे, अपनी बाईसेप्‍स दिखाते हुए  और आपने मुझे आसानी से हरा दिया। इसके बाद वो यह भी लिखते है कि मै उन यादो के बारे में सोचता हूं जो हमने साझा की है.... साथ में खेल को बढ़ावा देना। वह मैच आधी घास, आधी मिटटी पर खेलना। दक्षिण अफ्रीका के कैप टाउन में ५०,००० से ज्‍यादा फेंस के सामने खेलना। हमेंशा एक दूसरे को हंसाते रहना। कोर्ट में एक दूसरे को थका देना और फिर कभी कभी ट्राफी समारोहो के दौरान एक दूसरे को थामना। वो यह भी लिखते है कि जब भी मै क्‍ले कोर्ट में हराने के लिए कोर्ट में उतरता तो मुझे लगता कि मै आपके आंगन मे पैर रख रहा हूं। वो लिखते है कि आपका पूराना दोस्‍त आपका हमेशा उत्‍साहवर्द्धन करता रहेगा। राफा हमेंशा शुभकामनाऐं, आपका प्रशंसंक, रोजर।

ये दोनो पत्र ऐसा भाषा शैली में लिखे गये है कि ये न केवल खेलो की बल्कि साहित्‍य की धरोहर बन गये है। अश्‍विन की पत्‍नी  प्रीति के पत्र ने अश्‍विन के रिटायरमेंट को खास बना दिया। उसने उनके खेल के दौरान जिये उन एकांत क्षणो को साझा किया है जिसे पढकर हर कोई भावुक हो जाये। यह अश्‍विन के लिए तो सचमुच बहुत भावुकता वाला क्षण होगा। ऐसा ही क्षण रोजर फेडरर का पत्र पढ़कर राफेल नडाल ने जीया होगा। ऐसे पत्र और शब्‍द आपके जीवन का भावुकता भरा विश्‍लेषण करते है।

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Sunday, September 29, 2024

हाथी घोडा पालकी..........................।

 

बादशाह की किलेबंदी कर ली गयी है। सैनिक आगे बढ चुके है। घोडे और हाथी सवारो ने अपने निशाने तय कर लिये है। भीषण युद्ध छिड चुका है परन्‍तु यह कैसा युद्ध है। इस युद्ध में कोई शोर नही है। दोनो तरफ के सैनिक आगे बढ रहे है परन्‍तु युद्ध के मैदान में कोई शोर नही है। पूरे मैदान मे पिन ड्राप साईलेंस है। एक पिन ड्रॉप करने पर उसकी आवाज को भी सुना जा सकता है। कप्‍तानो की सांसो की आवाजाही की आवाज भी आप सुन सकते हो। फिर ये कैसा युद्ध है। फिर भी युद्ध है और तनाव पैदा करने वाला युद्ध है। इस युद्ध में बादशाह, मंत्री, घुडसवार, हाथी सवार और सैनिक सबकुछ है और मारकाट भी है। फिर भी इतनी शांति । मै बात कर रहा हूं शतरंज की। शतरंज के बोर्ड पर ये सब होता है परन्‍तु खेला जाता है पिन ड्रॉप साईलेंस मे। इन्‍ही हाथी घोडो से दुश्‍मनो के बादशाहो को शह मात देकर भारत के युवा विश्‍व चैम्पियन बने है।


पिछले दिनो आपने शोर सुना होगा कि भारत ने शतरंज ओलम्पियाड जीत लिया है। शतरंज ओलम्पियाड दरअसल शतरंज की टीम प्रतियोगिता है। ९७ वर्ष पूरानी इस प्रतियोगिता को शतरंज का जन्‍म देने वाला भारत आज तक नही जीत पाया था। भारत के युवाओ ने वो कमाल कर दिया जो विश्‍व चैम्पियन विश्‍वनाथन आनंद भी नही कर पाये। आनंद भी ओलम्पियाड मे भाग ले चुके है परन्‍तु भारत को चैम्पियन नही बना पाये। भारत के बिलकुल युवा शातिरो ने दुनिया के शातिरो को धूल चटा दी। भारत के ऐसे शातिर इस ओलम्पियाड में खेलने गये थे जो आज भी अपनी मां के बिना सो नही सकते है। मेगा ईवेंट जहां दुनिया भर के शातिर मोहरे लडाते है वहां भारत के १७-२१ बरस के बच्‍चो ने कमाल कर दिया और खिताब जीत लिया। भारत की महिला टीम की वंतिका तनाव में सो नही सकती है। रात जाग कर गुजारती है परन्‍तु मां की गोद में सिर रखने के बाद सारा तनाव भूल जाती है। ओलम्पियाड में भी वंतिका के साथ उसकी मां गयी। मैच के दौरान तनाव होने के कारण रात को उसको नींद की समस्‍या रहती है परन्‍तु मां साथ होने से तनाव को बिलकुल भूल जाती है।

इसी ओलम्पियाड में अर्जुन जो कैंडिड चैस टुर्नामेंट के लिए क्‍वालिफाई नही होने के कारण घनघोर तनाव में आ गया था। वो अपने एक दोस्‍त के घर रहने लग गया। उसने तनाव ओर डिप्रेशन को कम करने का कोर्स किया। उसे लगा कि उसका कैरियर अब खत्‍म हो गया है। उसने अपना मनोबल बढाने के लिए सदगुरू की इनर इंजीनीयरिंग पढी। फिर वो ओलम्पियाड में भाग लेने गया और भारत को चैम्पियन बना कर लौटा।

भारत के ग्राण्‍ड मास्‍टर और छोटी उम्र में विश्‍व चैम्पियन को चुन्‍नौत्‍ती देने वाले प्रगनंदा अपनी बहिन के साथ ओलम्पियाड खेलने आये। बहिन भी भारत के लिए मोहरे लडा रही थी। दोनेा भाई बहिन एक दूसरे से बात करके तनाव को कम कर लेते । दोनो में भारत को स्‍वर्ण दिलाने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई। सबसे बडा रोल रहा है डी मुकेश का। छोटी सी उम्र में ग्राण्‍ड मास्‍टर बन जाने वाले मुकेश को आशातीत सफलता नही मिल रही थी। १७ वर्ष के मुकेश ने ओलम्पियाड में दिग्‍गज शातिरो को शह और मात दी। उसकी विशेषता है कि वह समय बचाता है। एक मैच के अंत में उसके पास लगभग ६० मिनिट थे जबकि उसे प्रतिद्वदन्‍द्वी के पास कुछ ही मिनट। जीत के प्रति इतना आश्‍वस्‍त की अंतिम चाल चलकर वो दूसरे बोर्ड पर मैच देखने चला गया। विरोधी शातिर ने अपनी मात स्‍वीकार कर ली। ऐसे नन्‍हे शातिरो के साथ भारत ओलम्पियाड में गया था जहां युवा शातिरो ने पूरी दुनिया को शह और मात दे दी।

हिन्‍दुस्तान ने ९७ में साल में पहली बार खिताब जीता है इससे पहले उसका बेस्‍ट तीसरा स्‍थान रहा है। भारत दो बार तीसरा स्‍थान प्राप्‍त कर चुका है परन्‍तु खिताब के बिना भारत का सफर अधूरा था। भारत के किशोरवस्‍था से निकले युवा राजकुमारो ने अपने हाथी और घोडो के साथ पूरी दुनिया को मात दे दी और भारत को विश्‍व चैम्पियन बना दिया। पूरा देश इन युवा शातिरो का स्‍वागत हाथी घोडा और पालकी के साथ कर रहा है। युवाओ ने पूरे देश को अपनी छाती को चाहे जितना चौडा करने का मौका दे दिया है। अब आनंद की विरासत की बागडोर मुकेश और प्रगनंदा ने थाम ली है। इसलिए तो अब सारा देश कह रहा है- हाथी घोडा पालकी जय देश के लालकी ।

Sunday, September 15, 2024

कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे।

 




सितम्‍बर का महीना है। नीला सा आसमान है जो धूप में चमक रहा है। एक बडा सा सफेद बादल जिसे बादल का टुकडा तो नही कहेंगे बल्कि बादल ही कहेगे, सूरज को घेर लिया है। मौसम सुहावना लगने लगा है परन्‍तु यह बादल निकलते ही धूप फिर हम लोगो की देह पर चिपक जायेगी। इस महीने ऐसे ही होता है कभी तल्‍ख धूप होती है तो अगले ही क्षण निहायत ही ठंडा मौसम। सर्दियां दस्‍तक देने लगी है। हमारा दरवाजा बार बार खड़ाखड़ रही है। सुबह सुबह वो झांक कर देख लेती है कि उसके स्‍वागत की हमने कितनी तैयारी कर रखी है। ऐसे मौसम में कहीं निकल जाने का मन करता है। चल तो हम बरसो से रहे है परन्‍तु मंजिल का पता नही है। एक गाने में कहा भी है कि मंजिले अपनी जगह है और रास्‍ते अपनी जगह। मै मंजिलो तक तो पहुंच गया हुं परन्‍तु मंजिल मुड गयी है। केवल मुडी ही नही बल्कि कई जगहो से टूट भी गयी है। कुछ लोग मेरी मंजिलो के टुकडो को उठा कर ले जा रहे है और मै उन मंजिलो के टुकडो को देख रहा हूं।


मंजिले मुड़ गयी है, टूट गयी है और सफर ने पूराने शायरो और कवियो के जुमलो को भी रौद दिया है। मै अकेला ही चला था मंजिल की ओर, अकेला ही चलता गया और अकेला ही रहता गया। लूट गये श्रंगार सभी बाग के बबलू से और हम खडे खडे बहार देखते रहे, कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे।


सितम्‍बर माह में मै अपने घर के आगे से कारवां गुजरते हुए देखता हूं। एक नही कई कारवां गुजरते है। नाचते हुए गाते हुए मानो उन्‍हाने मंजिल पा ली है। उसकी राह मंजिल पर एकदम सीधी है। मैने भी मन बनाया कि इन कारवांओ को देखने जाना चाहिए। ये लोग अपनी मस्‍ती में एक अविरल भक्ति की धारा लेते हुए बाबा रामदेव को धोक लगाने जाते है। ऐसा लगता है कि उन्‍हाने सबकुछ पीछे छोड़ दिया है। अपनी जिम्‍मेदारियों, परेशानियों और कष्‍टो को कुछ क्षणो के लिए अपनी देह से झटक दिया है। अपनी देह जो भीतर से स्‍वच्‍छ होकर सीधे बाबा के चरणो की ओर जा रही है। मै अपनेी सहकर्मी मित्रो के साथ एक शाम को निकल गया भक्‍तो के कारवां को देखकर अपनी आंखो को सुकून देने के लिए।


हम चार जने थे मै विवेक, राजेश, मुकेश और जगदीश। शुक्रिया बनता है विवेक का जिसके वाहन पर हमने इस सफर का आनंद लिया। हमारी सफर गजनेर रोड़ से शुरू हुआ। शुरूआत में ही भक्‍तो के कारवां नाचते गाते हुए मिल गये। लंबे सफर की थकान उनकी देह पर बिलकुल भी नजर नही आ रही थी मानो वे किसी उत्‍सव में भाग लेने जा रहे हो और देखने वालो को भी इस उत्‍सव में शामिल होने का निमंत्रण दे रहे हो। गजनेर टोल नाके तक पहुंचते पहुंचते सूरज की आंख मिचौली खत्‍म हो चुकी थी। सूरज किसी दूसरे देश में अपनी रोशनी बिखेरने जा चुका था। यहां अंधेरे ने दस्‍तक दे दी थी। भजनो की सुर लहरीयां संध्‍या को शुभ बना रही थी। रास्‍ते में जगह जगह कैंप लगे थे। हर कैंप पर जैसे उत्‍सव का पडाव था। एक जगह विवेक ने गाडी की रफतार कम की तो डीजे की धमक गाडी के अंदर तक मदमस्‍त कर रही थी। विवके ने गाडी रोकी तो हम गाडी से उतरे। गाडी से उतरते ही कान हमें सुर लहरियों में ले गये। जोर जोर से भजन चल रहा था – डीजे रा धमीड़ा भाई जोर सूं पडे। वाकई डीजे रा धमीडा जोर सूं पड़ रैया हा। परन्‍तु यह जोर के धमीडे पैरो को थिरकने के लिए आमंत्रित कर रहे थे। बडे से डीजे के आगे बहुत ही सुंदर कृष्‍ण बने बालक के साथ गोपियां बनी हुई दूसरे बालक आकर्षक नृत्‍य कर रहे थे। ऐसा नृत्‍य कर रहे थे जो गांव के लोकरंजन को साकार कर रहे थे । इस नृत्‍य के आगे टीवी शो के सभी डांस शो फीके नजर आ रहे थे। इस डांस का आनंद लेने के बाद विवेक ने गाडी को फिर रफतार दे दी और हमारी गाडी कोलायत जाकर ही रूकी। कोलायत में मेले में जाने वाले इन टोलियों का रात्रि ठहराव होता है। यहां चारो और जातरू ही जातरू नजर आ रहे थे। हम जातरूओ की भीड से निकलते हुए कोलायत सरोवर तक पहुंचे। सरोवर का पानी प्‍लेटफार्म पार कर चुका था। जाने को रास्‍ता नही था। राजेश दूसरे रास्‍ते से हमें मंदिर तक ले गया। यह क्‍या मंदिर तक पानी ही पानी। एक जन ने बताया कि कल तक पानी मंदिर की सीढियो तक था।  आज थोडा उतरा है। पानी ने अपनी हदे पार कर दी परन्‍तु शीघ्र ही अपनी हद में आ गया। जातरूओ को हिदायते दे रहा था कि कोई पानी में अपनी हद नही पार करे नही तो वो उसे अपने आगोश में ले लेगा। सरोवर में चक्‍कर निकाल रही लाईफ बोट यही संदेश दे रही थी। हमने सरोवर में हाथ मुंह धोये और कपिल मुनि के दर्शन को चले गये। सांख्‍य दर्शन के प्रणेता कपिल मुनी का यह दुनिया भर में प्रसिद्ध मंदिर है परन्‍तु यहां मंदिर में कही भी सांख्‍य दर्शन का जिक्र नही है और ना ही यहां सांख्‍य दर्शन का साहित्‍य मिलता है। फिर भी कपिल मुनी के दर्शन मात्र से उस परम तत्‍व साक्षात्‍कार का अनुभव कर सकते है। कपिल मुनि के दर्शन के बाद सीधे हम गाडी में बैठे और चल दिये वापसी की ओर । वापसी में एक कैप हमारे एक और साथी का था। जहां बाबा रामदेव की आरती के बाद हमने प्रसाद ग्रहण किया। प्रसाद नही वो अमृत के समान था। मन और पेट दोनो तृप्त हुए। इसके बाद हमने समय जाया नहीं करते हुए गाडी में बैठे और घर के लिए रवाना हुए क्‍योंकि आसमान में सभी तारो ने आकर डेरा डाल दिया था। जातरूओ का आना अब भी जारी था।


सितम्‍बर का महीना भक्ति भाव का महीना है। रामदेवरा का मेला देखने के दोदिन बाद ही मैं अपने भांजे और भतिजो, बच्‍चो के साथ पूनरासर में जाने वाले भक्‍तो का कारवां देखने चला गया। इन भक्‍तो की मंजिले भी एकदम साफ और स्‍पष्‍ट थी। जिनकी मंजिले मुडी हुई थी उनके साथ विश्‍वास था कि पूनरासर हनुमान जी उनकी मंजिलो को सीधा कर देगे। यहां हम अपनी बाईक पर गये थे। यहां जातरूओ की भीड बहुत ज्‍यादा थी। कैम्‍पो पर सेवा करने वालो की भीड थी। सेवा लेने वाले अनुशासन के साथ लाईन में लगे हुए थे। यह लाईने बताती है कि सेवा में मिलने वाली हर चीज पूनरासर हनुमान जी का प्रसाद है और लोग प्रेम से खा रहे है। यहां गाडो पर डीजे की धमक सुनाई दे रही थी। किसी गाडे पर हनुमान चालीसा तो किसी गाडे पर हनुमान जी के चमक दमक वाले भजन चल रहे थे। एक कैम्‍प के आगे युवाओ का हजूम डीजे के आगे थिरक रहा था। हर एक को यह थिरकन आनंद दे रही थी। हम आगे गये तो श्‍याम बाबा का मंदिर था। इस मंदिर में भी सेवा चल रही थी। लोगो का हजूम था। दूसरी तरफ महिलाऐ नत्‍य कर रही थी। हमने सेवा का प्रसाद तो नही लिया हम श्‍याम बाबा के दर्शन करने मंदिर गये। हारे का सहारा बाबा श्‍याम की दर पर भी लोगो की भीड जुटी थी। हम दर्शन करने के बाद लौट आये थे। भीड बढती जा रही थी। हमने बाईक लेकर घर लौटना उचित समझा क्‍योंकि अगले दिन हमे पूनरासर दर्शन के लिए भी निकलना था। वापसी में भी भक्‍तो के कारवें मिल रहे थे। भक्ति का ऐसा ज्‍वार सितम्‍बर माह में ही देखने को मिलता है।


मेरी मंजिले भले ही मुड गयी और टूट गयी हो परन्‍तु परम पिता परमेंश्‍वर हर की मंजिल को सुस्‍पष्‍ट और भेदने योग्‍य बनाते रहे। मेरे आगे से कारवां गुजर रहे थे। जयकारो की आवाजे आ रही थी परन्‍तु मेरा मन कह रहा था कि

गीत अश्‍क बन गये,

छंद हो हवन गये

साथ के सभी दिए, धुआं पहन पहन चले

और हम झुके झुके

मोड पर रूके रूके

उम्र के चढाव का उतार देखते रहे

कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे।

 

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Thursday, August 15, 2024

ओलंपिक का विवादो से वास्ता

 

 


खेलो का महाकुंभ पेरिस २०२४ कुछ खटटे तो कुछ मीठे अनुभवो के साथ सम्‍पन्‍न हो गया। ओलम्पिक हमेशा से ही पूरी दुनिया में किसी भी देश द्वारा खेल कौशल द्वारा अपने आपको साबित करने का सबसे बडा मंच रहा है। दुनिया भर के एथलीटो ने इस महाकुंभ को अपने रोचक खेलो के जरिये इसे रंगीन बना दिया। कई युवा खिलाडियो ने अपने खेल कौशल से अपने देश को गौरान्वित किया। कई एथलीटो हार बाद हताश हुए मैदान में लेटे हुए रोते नजर आये। यही खेल सिखाते है कि खेल के बाद एक दूसरे को बधाई दो और हारने पर अगली बार जोरदार प्रदर्शन का अपने आप से वादा करो। इन सभी रंगीन यादो के बीच पेरिस ओलम्पिक कई कडवी यादे छोड गया। हर ओलम्पिक में छोटी मोटी घटनाऐं होती है जो सावधानी बरतने के बाद भी हो ही जाती है परन्‍तु इस ओल‍िम्‍पक में ऐसे विवाद और घटनाऐं हुई जिसके लिए भी पेरिस २०२४ को कभी भुलाया नही जा सकेगा।

इस ओलम्पिक के उदघाटन समारोह से चंद घंटो पूर्व ही फ्रांस में हिसा शुरू हो गयी। कई रेलगाडियां रोक दी गयी। समाचार पत्रो के अनुसार रेल्‍वे स्‍टेशनो पर कई घंटो तक अफरातफरी मची रही। इस हिंसा के पीछे बाहर की ताकतो केा जिम्‍मेदार बताया गया। कई लोगो ने इस युक्रेन रूस युद्ध के तनाव को बताया। फ्रांस की मीडिया ने फ्रासं मे एक वर्ग की कारस्‍तानी बतायी जो पेरिस ओलम्पिक का विरोध कर रहा था। आगजनी और हिंसा से पेरिस ओलम्पिक को बदनाम करने की साजिश मानी गयी। पेरिस २०२४ के उदघाटन समारोह में प्रसिद्ध कलाकार अेयो नाकामुरा ने प्रसिद्ध दी। नाकामुरा पर रंगभेद टिप्‍पणी की गयी। एक सर्वे के अनुसार फ्रांसिस लोगो ने नाकामुरा के उदघाटन समारोह में प्रस्‍तुती को स्‍वीकार नही किया था। उदघाटन समारोह में कोरिया जैसे देशो के नाम को लेकर भी विवाद खडा हुआ। विवाद क्‍या हुआ और कैसे हुआ परन्‍तु हुआ तो ना। ओलम्पिक जैसे बडे आयोजनो में विवाद की परछाई पड जाने को भी असफलता का कारण मान लेते है वहां इतने बडे विवाद ओलम्पिक की छवि खराब करते है।

ओलम्पिक खेल जिस शहर में होते है उस शहर में एक खेल गांव बनाया जाता है जहां पूरी दुनिया के एथलीट अपने देश के एथलीटो के साथ रहते है। इस बार ओलम्पिक में ठहराने और खाने की व्‍यवस्‍था को लेकर बहुत विवाद हुआ। कई देशो के एथलीटो ने कहा कि उन्‍हे जहां ठहराया गया है वहां हवा और रोशनी पर्याप्‍त नही है। कई देशो के एथलीट ऐसी अपने साथ लाये थे। कई एथलीट खेल गांव छोडकर होटलो में जाकर रूके। खेल गांव में पानी की भी पूरी व्‍यवस्‍था नही थी। कई एथलीटस ने खेल गांव में खाने की क्‍वालिटी को सबसे घटिया बताया। एथलीटो ने कहा कि वो खेल गांव में खेल पर फोकस नही कर पा रहे है। ८०० मीटर स्‍वर्ण पदक विजेता कीली हॉंजकिसन ने आरोप लगाया कि उनको परोसी गयी मछलियों में कीडे थे। ग्रेट ब्रिटेन के एथलीटो ने शिकायत की कि उन्‍हे कच्‍चा मांस परोसा जा रहा है। बडे खेल आयोजनो में खाने जैसी शिकायत होनी चाहिए। ब्रिटिश एथलीट एडम पीटी ने कहा कि खाने के नाम पर समझौता किया जा रहा है। खबरो के अनुसार खेलगांव में एथलीट खाने और ठहराने की व्‍यवस्‍थाओ से नाराज नजर आये।

पेरिस ओलम्पिक में यही नही हुआ बल्कि लिंग विवाद भी हुआ। अल्‍जीरीया की इमान खलीफ ने अपनी बाउट में प्रतिपक्ष बॉक्‍सर को ४५ सैकेण्‍ड में हरा देने पर उसके लिंग पर शक किया गया। पूरी दुनिया में खलीफ को पुरूष मानते हुए महिला के विरूद्ध खेलने का आरोप लगाया गया। इस बात को लेकर पूरी दुनिया में पेरिस ओलम्पिक आयोजको की जमकर आलोचना हुई परन्‍तु बॉक्‍सर खलीफ ने कह दिया कि वो भी और औरतो की तरह ही औरत है। उसने कहा कि वो एक महिला की तरह ही पैदा हुई और महिला की तरह ही हूं। लोग मेरी सफलता को पचा नही पा रहे है। पेरिस ओलम्पिक के दौरान यह विवाद छाया रहा ।

खेल विवाद में भी एक विवाद और जुड गया जब भारत की विनेश फोगाट ५० केजी वर्ग में सेमिफाईनल जीतकर फाईनल में पहुंची। पूरे भारत में खुशियां मनायी जाने लगी क्‍योंकि देश का एक और पदक पक्‍का हो गया था परन्‍तु फाईनल मुकाबले से कुछ समय पूर्व ही उसे ज्‍यादा वजन होने के कारण उसे अयोग्‍य करार दे दिया गया। भारत से लेकर फ्रांस तक इस अयोग्‍यता के विरूद्ध बहुत हंगामा मचा। आखिर में विेनेश फोगाट द्वारा अपील करने पर यह गुस्‍सा थमा। इससे पूर्व आयोजन समिति ने फोगाट को दोबारा खेलाने या पदक देने से साफ इनकार कर दिया था।

इसी प्रकार जब ट्रायथलॉन में हिस्‍सा लेने वाले कनाडाई खिलाडी मिसलाचूक ने सीन नदी में तैरने के बाद लगातार दस बार उल्‍टी कर दी। यह घटना सोशल मीडिया के जरिये पूरी दुनिया में फैल गयी। कई दूसरे खिलाडियो ने भी सीन नदी के गंदे पानी को स्‍वास्‍थ्य के लिए हानिकारक बताया। ओलम्पिक जैसे आयोजनो में गंदे पानी में एथलीट को उतारना आयोजको की बहुत बडी असफलता है।

 

और अंत में ---------

इन विवादो के बीच एक विवाद ऐसा भी हुआ जिसे पढकर आपके बदन में सिहरन सी दौड जायेगी। पेरिस ओलम्पिक से एक ऐसी एथलीट को बाहर कर दिया गया जो बेहद खूबसूरत है। उसकी खूबसूरती के कारण ही उसे पेरिस ओलम्पिक से बाहर होना पडा। पैराग्‍वे की २० वर्षीय तैराक लुआना अर्लासों की खूबसूरती उसके लिए मुश्किल बन गयी। पैराग्‍वे के कई खिलाडियो ने एक बात की शिकायत अपने अधिकारियों से की थी कि लुआना की खूबसूरती के कारण हम अपने खेल पर ध्‍यान नही लगा पा रहे है। पैराग्‍वे अधिकारियों ने इस शिकायत को गंभीरता से लिया और पैराग्‍वे की एथलीट लुआना को कमरा खाली कर देश लौटने का आदेश सुना दिया गया। इस प्रकार लुआना मात्र अपनी खूबसुरती के कारण ओलम्पिक से बाहर कर दी गयी।  

पेरिस ओलम्पिक में सभी तरह के विवाद हुए परन्‍तु ठहरने, खाने पीने और लिंग विवाद जैसे विवाद ओलम्पिक की प्रतिष्‍ठा को ठेस पहु्ंचाते है। जहां खिलाडी शिकायत करते है, उसको ओलम्पिक समिति को गंभीरता से लेना चाहिए। इन विवादो के बावजूद पेरिस ओलम्पिक बेहद रोमांचक और खूबसूरत रहे जहां कईयो के सपने पूरे हुए तो कईयो ने नये सपने अपनी आंखो में देखे।