Wednesday, September 30, 2026

हार मे उम्मीद

 


डेविस कप भारत के लिए हमेशा से ही पहेली की तरह रहा है। भारत इस पहेली को सुलझाने में हर बार चूक जाता है। डेविस कप एक टीम टूर्नामेंट है। इसमें सामूहिक प्रदर्शन से आगे का सफर तय होता है। भारत के लिए डेविस कप संभावनाओं वाला टूर्नामेंट रहा है। भारत इसमें 100 से भी ज्यादा वर्षों से भाग ले रहा है। तीन बार—1966] 1974 और 1987 में—भारत फाइनल तक पहुंच चुका है, परंतु एक बार भी खिताब नहीं जीत पाया। भारत उन दिनों भी फाइनल में पहुंचा है, जब भारत के सितारा खिलाड़ी एटीपी रैंकिंग में कोई ज्यादा बड़े खिलाड़ी नहीं थे। भारत हमेशा डेविस कप के विश्व ग्रुप के आसपास घूमता रहा है।

इस बार भारत का प्रदर्शन उम्मीद से भरा था, लेकिन थोड़ी सी चूक के कारण अंतिम आठ में जगह नहीं बना पाया। क्वालीफायर के दूसरे दौर में दक्षिण कोरिया से 3-1 से हार गया, लेकिन इस साल के प्रदर्शन से भारत अगले साल के लिए एक नई उम्मीद छोड़ गया है।

इस साल की शुरुआत में नीदरलैंड के विरुद्ध शानदार प्रदर्शन से भारत की उम्मीदें आसमान पर थीं। युवा खिलाड़ी दक्षिणेश्वर सुरेश के दमदार प्रदर्शन की बदौलत भारत ने नीदरलैंड को 3-2 से पराजित कर ड्रॉ जीत लिया। सुरेश ने नीदरलैंड के 88वीं वरीयता प्राप्त जेस्पर डी जोंग को हराया और अपने सभी तीनों मैच जीते। यह जीत बड़ी थी, क्योंकि नीदरलैंड को मजबूत टीम माना जाता है। ऐसे में भारत के फाइनल में जाने की संभावनाएं बढ़ गई थीं। अगला मुकाबला दक्षिण कोरिया से तय होने के बाद भारत कहीं ज्यादा उम्मीद करने लगा था।

दक्षिणेश्वर सुरेश के कमाल के प्रदर्शन से भारत की टीम मजबूत नजर आ रही थी, लेकिन क्वालीफायर-2 शुरू होने से पहले ही यूकी भांबरी के चोटिल होने से भारत के गैर-खिलाड़ी कप्तान रोहित राजपाल के माथे पर शिकन की रेखाएं खिंच गई थीं। सुमित नागल और सुरेश के चलते भारत ने उम्मीदें बांध रखी थीं।

सुमित नागल ने अपने एकल मुकाबले में जोरदार शुरुआत की थी और एक समय 4-0 से आगे थे लेकिन नागल अपने खेल में निरंतरता नहीं रख पाए और एकल मैच हार गए। सुरेश ने भी अपने एकल मैच में सुनवू क्वोन को टक्कर दी लेकिन सुनवू ने अपनी रणनीति बदलकर मैच खेला और सुरेश मैच खो बैठे।

पहले दोनों एकल हारने के बाद भारत के हौसले वैसे ही टूट गए थे और यूकी भांबरी के नहीं होने से टीम दबाव में थी। लेकिन युगल में सुरेश ने एन श्रीराम बालाजी के साथ मिलकर दक्षिण कोरिया की जोड़ी को 6-3] 3-6 और 6-3 से हराकर भारत को फिर जिंदा कर दिया। लेकिन रिवर्स सिंगल में सुमित नागल सुनवू के सामने टिक नहीं पाए और आसानी से हार गए। इस हार के साथ ही भारत यह ड्रॉ 3-1 से हार गया।

अब भारत को एक बार फिर क्वालीफायर खेलना होगा। वर्ष 2027 में एक बार फिर क्वालीफायर में भारत का मुकाबला नीदरलैंड से होगा। भारत एक बार फिर नीचे की सीढ़ी पर फिसल गया है।

दक्षिण कोरिया के विरुद्ध भारत को बहुत उम्मीद थी, लेकिन परिणाम उम्मीद के विपरीत रहा। यूकी भांबरी के चोटिल होने से भारत दबाव में आ गया था। हालांकि युगल मैच भारत ने जीता, लेकिन एकल मुकाबलों में भारतीय खिलाड़ी टिक नहीं पाए। सुमित नागल का फॉर्म नहीं पकड़ पाना भी एक कारण रहा।

सबसे बड़ा कारण मैच का दक्षिण कोरिया में होना था। इस कारण सारी परिस्थितियां उसके पक्ष में थीं। हार्ड कोर्ट पर बॉल स्लो आ रही थी, जिसका फायदा मेजबान को मिला। कोरियाई खिलाड़ियों द्वारा मैच के अनुसार रणनीति बनाना भी भारत की हार का कारण रहा। भारतीयों के खेल में निरंतरता नहीं थी। इस कारण वे मैच में अपनी मजबूत स्थिति को अंत तक नहीं बना पाए और मैच खो दिए।

दक्षिणेश्वर सुरेश अपने से ज्यादा रैंकिंग वाले कोरियाई खिलाड़ियों का दबाव कम नहीं कर पाए। गैर-खिलाड़ी कप्तान को चाहिए था कि वह टीम को मानसिक रूप से मजबूत करते। नीदरलैंड के विरुद्ध मिली जीत के हौसले को टीम में बनाए रखना जरूरी था। कप्तान को टीम के मनोबल को बनाए रखना था।

डेविस कप में भारतीय टीम का गौरवशाली इतिहास रहा है। 1974 के फाइनल में भारत का मुकाबला दक्षिण अफ्रीका से था, लेकिन दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद नीति के विरोध में भारत ने इस मैच का बहिष्कार किया, जिसके कारण दक्षिण अफ्रीका को विजेता घोषित कर दिया गया। 1987 के फाइनल में स्वीडन के विरुद्ध भी भारत एक भी मैच नहीं जीत सका और बाहर हो गया।

लिएंडर पेस भारत के सबसे सफल डेविस कप खिलाड़ियों में रहे हैं। भारत के शानदार रिकॉर्ड को देखते हुए इस बार भी भारत से उम्मीद थी, लेकिन उम्मीदें परवान नहीं चढ़ सकीं। भारत के लिए दूसरे देश की मेजबानी में उनके कोर्ट पर खेलना बहुत बड़ी चुनौती थी। दक्षिण कोरिया ने अपनी सुविधा के अनुसार कोर्ट चुने, जिसका फायदा उसे मिला।

नीदरलैंड के विरुद्ध जोरदार प्रदर्शन करने वाले सुरेश ने यहां भी प्रदर्शन ठीक किया, लेकिन एकल मैच में जीत नहीं पाए। यहां युगल में उनका प्रदर्शन सफल रहा।

अगले साल के लिए भारत को नए सिरे से रणनीति बनानी होगी। गैर-खिलाड़ी कप्तान रोहित राजपाल का कार्यकाल दिसंबर में खत्म हो रहा है। टीम भी नए सिरे से बनेगी। टेनिस प्रबंधकों को एक लक्ष्य बनाकर खिलाड़ियों को तैयार करना होगा, ताकि आने वाले मैचों में भारतीय टीम को जीतने में कोई दिक्कत न हो।

डेविस कप में भारत जीत सकता है। जरूरत है थोड़ी सामूहिक कोशिश की। दूसरे देश की मेजबानी में अपने प्रदर्शन को सुधारना होगा। इसके लिए मैच से पहले कोर्ट और विरोधी टीम के खिलाड़ियों का अध्ययन करना होगा ताकि सभी चीजें सामने होने पर रणनीति आसानी से बनाई जा सके।

फिलहाल यह ड्रॉ तो भारत चूक गया है। अब अगले साल पर लक्ष्य है और उम्मीद है कि अगला साल भारत के लिए सफलता लेकर आएगा।

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सीताराम गेट के सामने] बीकानेर
9413769053

Saturday, September 26, 2026

सुनाई देती है जिसकी धड़कन




मै हर बार की तरह इस बार मौसम की बात नहीं करूँगा। इस बार मेरी बात करूँगा।

एक अरसे बाद मैं इन पन्नों पर आपसे मुखातिब हुआ हूँ। इस दौरान बहुत कुछ बीत गया। कुछ बीते हुए को सहेजा और कुछ हाथ में आकर फिसल गया। अब मैं किसी चीज के पीछे नहीं भागता। व्हाट्सऐप के एक मैसेज की तरह अब उम्र के उस मुकाम पर खड़ा हूँ कि सामने बहुत कुछ है, पर चाहिए कुछ भी नहीं।

इन दिनों मैंने बहुत-सी कविताएँ भी लिखी हैं। लोग इसके बारे में पूछते हैं तो बता देता हूँ कि नई किताब के लिए लिख रहा हूँ, लेकिन मैं कविताएँ अपने मन में जो चल रहा है, उसको अभिव्यक्त करने के लिए लिखता हूँ। मैं किसी कवि की तरह या समाजसेवी की तरह कविता नहीं लिखता। मन में जो उठता है, उसे शब्द दे देता हूँ।

अब शब्द लोगों तक पहुँचते हैं या नहीं, इस पर मैं विचार नहीं करता, क्योंकि मैं गौरव सोलंकी की इस बात पर विश्वास करता हूँ कि मुझे कविता लिखने में आनंद आता है और मैं तब भी कविताएँ लिखूँगा, जब दुनिया का कोई भी आदमी उन्हें पढ़ना नहीं चाहेगा।


आप मेरी कविताएँ मेरे ब्लॉग या फेसबुक पर पढ़ सकते हैं।

पिछले दिनों मित्रों के साथ पुनरासर जाना हुआ। मित्र की गाड़ी में हम दोपहर में पुनरासर के लिए रवाना हुए। सहकर्मी थे, इसलिए गाड़ी में ऑफिस की बातों का पोस्टमार्टम शुरू हो गया। बातों में इतने मशगूल थे कि भूल ही गए कि पुनरासर के रास्ते पर हैं या गाड़ी किसी और रास्ते पर जा रही है।

गाड़ी की खिड़की से बाहर देखा तो पाया कि हम सही रास्ते पर हैं। एक ने कह दिया कि पुनरासर की सड़क से पहले एक प्रवेश द्वार है। सो सबकी नजरें प्रवेश द्वार पर लग गईं।

ज्यों ही प्रवेश द्वार आया, हम सबने जोर से जयकारा लगाया—

“पुनरा—स—र बाबा की जय!”

पुनरासर बाबा की मुख्य सड़क तक पहुँचते-पहुँचते शाम हो गई थी। संजय ने कहा कि जोरदार सीन है, कुछ स्नैप ले लेते हैं। सो उतरकर हर तरफ से फोटो मोबाइल में कैद की।

झाड़ियों में ढलते सूरज की रोशनी गुलामी फिल्म के गाने की तरह महसूस हो रही थी—

“मुकुंद जिहाल, मिस्किन मक़बूल बिरंजिस इजरा बिछा रही है,
सुनाई देती है जिसकी धड़कन, वो तुम्हारा दिल है या हमारा दिल...”

ऐसा ही कुछ लग रहा था।

मेरे को गाने के बोल आप जैसे ही आते हैं। ये तो लिरिक्स गूगल करके लिखे हैं।

मैंने इस गाने के लिए एक वीडियो भी बनाई। इसी जगह हमने 50 फोटो खींच डालीं और यह कहते हुए कि हमें तो फोटो का शौक नहीं है, आगे बढ़ गए।

पुनरासर पहुँचे तब तक पूरी तरह से शाम हो चुकी थी। मंदिर के दर्शन किए। पुनरासर मेले से पहले गए थे, इसलिए मंदिर में मेले की तैयारियाँ चल रही थीं।

मंदिर में प्रसाद लेने के बाद अंजनी माता के मंदिर गए। इस मंदिर में दक्षिण स्थापत्य शैली जैसे पत्थर लगे थे। इसलिए शुरू हो गए फोटो खींचने।



मंदिर के आगे-पीछे सभी ने फोटो खिंचवाई। किसी ने सिंगल तो किसी ने साथ में।

आनंददायक माहौल था। आज पूरा शनिवार पुनरासर बाबा के नाम था।

रात हो रही थी। हमने निकलना ही बेहतर समझा।

संजय ने यह कहकर और डरा दिया कि रात को पहली बार ही इस रोड पर गाड़ी चला रहा हूँ। पर हमें बाबा पर और मित्र पर विश्वास था। इसलिए मस्ती करते-करते बीकानेर पहुँच गए।

यह एक आनंददायक यात्रा थी।

हमारे यहाँ अभी मेलों का दौर खत्म हुआ है। सबसे अंत में कोडमदेसर भैरूजी का मेला होता है। इस मेले में हजारों पैदल यात्री जाते हैं।




मैं अपने भाई के साथ एक रात मेला देखने गया था। भाई साहब पैर रखने को जगह नहीं थी। इतने पैदल यात्री, उससे दुगुने बाइक वाले और फिर कार वाले—एक सड़क पर इतने लोग।

रास्ते में भंडारे और सेवाएँ इतनी थीं कि हर भंडारे और सेवा के आगे अनाप-शनाप भीड़।

पूरे रास्ते गाड़ी पाँच की स्पीड पर चल रही थी। फिर मैंने तो हाथ खड़े कर दिए और नाल पुलिए से मैं वापस मुड़ गया और घर की तरफ रवाना हो गया।

परन्तु मेले में डीजे और उसके आगे नाचते युवाओं की भीड़ आकर्षक और मनमोहक थी।

एक गाना सब जगह ही चल रहा था—

“आ तो सेब जीते...”

और दूसरा—

“ऐ तो शुभ जी जीते...”

इन दिनों एक किताब मंगवाई है—रस्किन बॉन्ड की आत्मकथा।

मुझे रस्किन बॉन्ड की आत्मकथा से मतलब नहीं है। मैं उनके लिखे शब्दों को पसंद करता हूँ। वे मसूरी और पहाड़ों का इतना जोरदार वर्णन करते हैं कि आपको पढ़ते-पढ़ते लगता है कि आपके चेहरे पर देवदार के पेड़ों की हवा आ रही है।


अभी कुछ ही पन्ने पढ़े हैं। पूरी पढ़ने पर इस पर बात करेंगे। पढ़ने में वक्त लगेगा। मैं किताब को धीरे-धीरे पढ़ता हूँ—एक सप्ताह में दस पेज।

साथ में दिव्य प्रकाश दुबे की भी नई किताब मंगवाने का विचार है। देखते हैं।

प्लान बहुत से हैं। कितने कामयाब होते हैं, समय बताएगा।

क्योंकि जो बीत रहा है, वह समय है।

आपसे फिर मिलते हैं।

Friday, April 3, 2026

गर्दिशें ठहरती हैं हम जहाँ ठहरते हैं

छुटटी का दिन है। छत्‍त पर आ गया हूं। अप्रैल की धूप छत्‍त पर बिखरी हुई है। छत्‍त पर पडी एक कुर्सी पर बैठ जाता हूं। धूप मेरी देह पर गिरती है। मै कुछ दूर धूप में बैठा रहता हूं। हर कोई इस महीने में धूप में नही बैठता है। मै अपने भीतर के ठंडेपनको सूखा लेना चाहता हूं। जैसे जैसे मेरी देह पर धूप गिरती है मुझे महसूस होता है कि मेरे भीतर की बची खुची ठंड को धूप सूखा कर आसमान में ले जा रही है। इस प्रक्रिया को मै धूप में बैठा महसूस कर सकता हूं जैसे धूप में सूखाये गये गीले कपडो में से धूप पानी को सोखती है। हिन्‍दू कलैण्‍डरो में बैशाख का महीना आ चुका है। भगवान नारायण का महिना। इस महीने में माना जाता है कि देह में गरमी आ जा जाती है परन्‍तु मेरी देह के भीतर अभी तक गरमाहट पहुंची नही है या महसूस नही हो रही है। इसलिए धूप मे बैठा हूं। नीले आसमान में सफेद बादल आ गये है। अलग अलग शक्‍लो में आकर प्रकट हो गये है। ऐसा लगता है मुझे देखकर कह रहे हो -- अज्ञानां वैशाखनंदनः, मूर्खाणां च धुरंधरः।.कर्मणा बली, बुद्धिना हन्यते। हो इसके बाद सफेद मेघ सूरज के आगे पहेरदार की तरह आकर खडे हो जाते है। मै कमरे के भीतर चला जाता हूं।

एक लंबे समय से मन के भीतर एक ऐसे लंबे रास्‍ते पर भाग रहा हूं जिसके रास्‍ते मे हरियाली, फूल, झरने और रंग बिरंगे पछी सब कुछ है परन्‍तु कुछ भी मुझे लुभा नही रहो है। मै ऐसे दौडे जा रहा हूं जैसे मेरी मंजिल बस सामने है और बस एक अदद साधन की जरूरत है। दो दिन पहले भी छुटटी का दिन था। व‍ह दिन भी मन के भीतर दौडते हुए गुजरा। उस दिन शाम को योगेन्‍द्र के साथ नाटक देखने चला गया। योगेन्‍द्र पहले चला गया और मै बाद मे गया। गंगाशहर के किसी इलाके मे था टीएम ऑटोडोरियम। काली सडको पर शुरूआती रात के वक्‍त मेरी बाईक सडक पर दौड रही थी। सडक पर समुद्र की लहरो की तरह उठती हुई रेत मेरे उपर गिर रही थी। गंगाशहर के अंदरूनी गलियो से मुख्‍स सडक पर पहुंचा जहां कुछ दूर चलकर था यह ऑटोडोरियम। मुख्‍य सडक से भी थोडा अंदर जाकर था यह। मै राहगीरो से पूछते हुए पहुंचा। शहर से दूर भीतरी ईलाके में बहुत अच्‍छा मिनी थियेटर बना हुआ था। मै पहुंचा तब तक नाटक शुरू नही हुआ था। थियेटर के बाहर लोग ईधर उधर विचरण कर रहे थे।

 कुछ लोग भीतर जाकर अपनी सीटो पर बैठ रहे थे। मै भी जाकर पीछे एक सीट बैठ गया और मोबाईल देखने लगा इतने में योगेन्‍द्र आ गया और वो मुझे आगे की सीटो पर ले गया। नाटक शुरू होने में देरी थी। मंच पर एक सूखा पेड लगाया हुआ था और दूसरी और कुछ कठपुतलियां लटकाई हुई थी। नाटक का नाम था – कठपुतलियां। योगेन्‍द्र ने मुझे अपने दोस्‍त गगन मिश्रा से मिलवाया। गगन जयपुर में बच्‍चो के नाटको पर काम करता है और यहां बच्‍चो को नाटक का प्रशिक्षण देने आया हुआ है। थोडी देर में शो शुरू हो गया।

 मंच पर कुछ महिलाऐ रो रही थी और कुछ पुरूष शमसान की ओर जा रहे थे। ऐसा लगा कि एक दुखद नाटक है। कुछ लोग अपने साथ बच्‍चो को कठपुतलियां नाम देखकर साथ लाये थे उनको निराशा हुई। हम भी ऐसी दुख भरी कहानी देखना नही चाहते थे क्‍योंकि दुख तो कभी भी कहीं भी पैदा हो सकता है, इसे देखने की जरूरत नही। हम दोनो उठकर चले गये। बाहर आयोजको मेसे एक ने पूछा क्‍या हुआ। हम गरमी का बहाना कर वहां से निकल गये।

भीतर व दौड जारी थी। दो दिन पहने की छुटटी मे मै नरेन्‍द्र ऑटोडोरियम में एक पुस्‍तक विमोचन कार्यक्रम में चला गया। लेखक से मेरे से थोडा बहुत परिचय था। उन्‍होने न्‍यौता दिया था सो चला गया। किताब का नाम था सिंजोफ्रेनिक। नाम अंग्रेजी था। समझ नही आया। वहां जाकर पता चला यह एक मानसिक बिमारी है तो लेखक को थी। लेखक ने कहानी के एक अंश का अभिनय भी किया। कहानी का नायक बार बार अकेलेपन में चला जाता है। कभी दूसरो पर अपनी खुनुस निकालता है। एक बार मुझे भी लगा कि कहीं मुझे तो यह बिमारी नही है। कार्यक्रम में क्रष्‍ण कल्‍पित  और मालचंद तिवाडी का उदबोधपन सुना। दोनो ने बहुत सुंदर उदबोधन दिया। कल्पिक राष्‍ट्रीयस्‍तर के कवि है। शाम तक मै लौट आया।

मन के भीतर की दौड जारी थी। दौडते हुए कहीं विश्राम की जगह तलाश रहा था। विश्राम मिल नही रहा था। इस सुंदर दुनिया में भी मुझे गर्दिश नजर आ रही थी। इकबाल सफीपुरी का शेर मुझे यादा आ गया - गर्दिशें ठहरती हैं हम जहाँ ठहरते हैं। जुर्म सिर्फ इतना है.............।

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