Sunday, August 21, 2022

लूण जी का गैरेज


आज से कई साल पहले संचार का माध्‍यम डाक था। हम दूर बैठे दोस्‍तो, रिश्‍तेदारो का हाल चिटठी पत्री के जरिये ही जानते थे। मै अपने डाक का पत्‍ता यही लिखता था कि लूणजी के गैरेज के पीछे वाली गली। लूण जी का गैरेज हमारे लिए पत्‍ते का निशान ही नहीं था बल्कि उसके इर्दगिर्द हमारी दुनिया घूमती थी। स्‍कूल से कोई दोस्‍त मिलने आता तो मै यही कहता था कि लूण जी के गैरेज पर आकर किसी को पूछ लेना हर कोई मेरा घर बता देगा। मां भी कभी कभार कह देती कि तेरे पापा देर से आयेगे तु दौडकर लूण जी के गैरेज से सब्‍जी ले आ। मै दौडकर लूण जी के गैरेज से सब्‍जी ले आता। हम बच्‍चे गली में आंख मिचौली खेलते तो कोई बच्‍चा छिपने के लिए लूण जी के गैरेज चला जाता और फिर वह हमे मिलता ही नहीं। फिर वही जीत जाता। आंख मिचौली खेलते समय हमे यह नियम बनाना पडता कि कोई भी लूण जी के गैरेज तक छिपने के लिए नहीं जायेगा। वैसे तो पत्‍ते की निशानी के लिए हमारे यहां दूसरी बडी चीजे भी थी परन्‍तु पत्‍ते की निशानी के लिए लोग लूण जी का गैरेज ही इस्‍तेमाल करते थे। हमारे यहां शहर का प्रसिद्ध जस्‍सूसर दरवाजा भी है फिर भी लोग पत्‍ते के लिए लूणजी के गैरेज का ही इस्‍तेमाल करते थे। एक बार मेरे मामाजी का लडका खो गया था। मेरे मामा जी गंगाशहर में रहा करते थे। उस समय मोबाईल नही थे। ढुढने के लिए स्‍वयं ही निकलना पडता था। मेरे पापाजी, चाचाजी और मामाजी ने साईकिल पर पूरा शहर छान मारा लेकिन मामाजी का लडका कहीं नहीं मिला। फिर थक हारकर पापाजी ने कहा लूण जी के गैरेज चलते है वहां कोई रास्‍ता निकलेगा। पापाजी और मामाजी लूण जी के गैरेज गये तो वहां वो एक दुकान पर खडा मिल गया। लूण जी के गैरेज पर भीड इतनी रहती थी कि कोई अपनी खोयी हुई चीज ढुंढने वहां आ जाता था। 

लूण जी का गैरेज दरअसल हमारे लिए बहुत महत्‍वपूर्ण स्‍थान था। आपके दिमाग में आ रहा होगा कि वो कोई गैरेज होगा जहां बहुत सारी गाडिया खडी रहती होगी यहां कोई गाडिया ठीक करने का कारखाना होगा जहां लोग दूर दूर से गाडी ठीक कराने आते होगे। यह भी सोच लिया होगा कि गाडियो के स्‍पयेर पार्टस वहां मिलते होगें। आप यह भी सोच सकते है कि गाडिया रूकने का स्‍टोपेज होगा जहां गाडिया और टेक्सियां आकर रूकती होगी। मै जब छोटा था तो मेरे को भी पता नहीं था कि उस जगह का नाम लूण जी का गैरेज क्‍यो है। मै भी और लोगो की तरह कहने लग गया लूण जी का गैरेज। मेरी मां कभी बडे बाजार जाती तो तांगा लूणजी के गैरेज से ही करती। बडे बाजार से वापसी का तांगा करती तो तांगे वाले को यही कहती कि लूण जी का गैरेज छोड देना। लूण जी गैरेज आप जैसा सोच रहे वैसा बिलकुल भी नहीं था। हमारे घर से थोडी दूर पर एक चौराहा था जहां से एक सडक सीधे पूगल रोड तक जाती थी। वह सडक शहर के दूर स्‍थानो पर जाने के लिए संपर्क सडक थी। सडक के दोनो और सब्‍जी के ठेले, पान की दुकान और कई छोटी छोटी दुकाने लगी रहती थी। सडक के बायीं ओर दुकानो के पीछे था लूण जी का गैरेज। गैरेज में मैने कभी कोई गाडी खडी नहीं देखी। जगह ऐसी थी कि कभी कोई गाडी वहां खडी हो ही नहीं सकती। दुकान के पीछे एक टूटी फुटी दीवार थी जिसको लोगो ने सार्वजनिक मुत्रालय बना रखा था। दीवार की सीमेंट लगभग उतर चुकी थी। ईंटे दिखाई दे रही थी। नीचे कई ईंटे तो टुट गयी थी। वहां बडे बडे छेद हो गये था जिनसे लूण जी के गैरेज के अंदर झांक सकते थे। लेकिन लूण जी के गैरेज में झांकने की जरूरत ही नहीं थी। आगे की तरफ की दीवार थी बाकि दोनो ओर की दीवार टूट चुकी थी। लूण जी के गैरेज में एक पूराना पेड था। जिस पर खेलते खेलते हम चढ जाते थे। कई बार बैर तोड्ने के लिए हम किसी को चढा देते थे। पूगल जाने वाली एक प्राइवेट बस वहां रूकती थी। वहां के दुकानदारो की अधिकांश बिक्री इसी बस से होती थी। गांव के लोग शहरो की चीजे यहीं से खरीदते थे। बस ज्‍योंही लूण जी के गैरेज पर आकर रूकती। दुकानदार हाथ में चने के पैकेट, टाफी के पैकेट, ठंडे की बोतले लेकर बस में चढ जाते थे।

पूगल की बस वहां आकर रूकती तो लूण जी के गैरेज की रौनक बढ जाती। बस से यात्री चाय पानी पीने के लिए उतरते । दुकानदारो की आवाजे शुरू हो जाती। पैकेट दो रूपया------- दो रूपया-------। आज का अखबार------- आज का अखबार । मै स्‍कूल से आता तो कई बार वहां खडा हो जाता और यह सब देखता। एक जवान सा बच्‍चा हाथ में चने के दो चार पैकेट लिए घूमता। बस में भी जाता। वह कुछ बोलता नहीं था। कोई उससे पूछता तो ईशारे से ही बता देता। वो बस आने पर दो चार पेकेट बेच लेता। उसका वहां खोखा था जिसमें चने और मूंगफली बेचता था। मै एक बार उससे मूंगफली लेने गया तो मेरे को पता चला कि वो बोल नहीं सकता है। वो बोल भले नहीं सकता था परन्‍तु वह सुंदर बहुत था। सुबह उसके पिताजी दुकान पर बैठते थे और दोपहर बाद वो बैठता था। दुकान में एक रेडियो रखा हुआ था जिस पर  दोपहर में आल इण्डिया रेडियो की उर्दू सर्विस चलती थी। इतनी भीड भाड में रेडियो के गाने उसके खोखे पर ही साफ सुनाई नहीं देते थे। परन्‍तु दोपहर को उस रेडियो् पर आल इण्डिया रेडियो की उर्दू सर्विस जरूर बजती।

लूण जी के गैरेज के थोडा आगे ही उसका खोखा लगा था। बिलकुल सडक के किनारे पर । उसका खोखा मौके पर लगा था। बस उसके खोखे के आगे ही आकर रूकती। मेरे को कभी चना या मूगफली लेनी होती तो मै उसी लडके की दुकान से लेता। हम खेलते हुए उसके पास पहुंच जाते तो वो मुस्‍कुरा देता। हम भी उसके ईशारे समझने लगे थे। पानी के लिए वो खोखे पर बादला रखता था। बादला खाली होता तो हम लोग उसे भरकर ला देते थे। लूण जी के गैरेज पर दोपहर में भीड बहुत होती थी क्‍योंकि दोपहर में ही पूगल वाली बस आकर रूकती थी। शाम को सब्जियो के ठेलो पर भीड होती थी। सडक के किनारे दुकाने लगी होने से सडक बहुत छोटी हो गयी थी। सडक पर वाहनो के आने जाने और पैदल जाने वालो के लिए बहुत कम जगह बचती थी। शाम को उस लडके की दुकान पर भीड नहीं होती थी तो कई हम बच्‍चे उसकी दुकान पर चले जाते । हम उस लडके से बाते करते तो वो सुनता रहता। कोई जवाब नहीं देता। कोई बात उसे पसंद आती तो वो मुस्‍कुरा देता। कुछ हम लोग पूछते तो ईशारे से बता देता। वो हमारे बहुत घनिष्‍ठ हो गया था या यों कहे हम बच्‍चो का दोस्‍त बन गया था। सडक पर कोई वाहन निकलता तो वो ईशारे से हमे किनारे होने के लिए कहता। मैने उसको अपने बर्थडे पर बुलाया था परन्‍तु वो नहीं आया। उसने ईशारो में बताया था कि वो खोखा छोडकर नहीं आ सकता । हम लोगो को उसका बर्थडे भी पता लग गया था। कल ही था उसका बर्थ डे । हम सब लोग मिलकर उसे गिफट देने वाले थे। हम उसके लिए एक रेडियो लाये थे। नया रेडियो। उसका रेडियो पूराना हो चुका था। हम बच्‍चो में बहुत उत्‍साह था कि हम उसे बर्थ डे पर रेडियो गिफट मे देगे। हमारे लिए अब अगले दिन की दोपहर का इंतजार हो रहा था। हम सोच रहे थे कि हम ज्‍योहि रेडियो उसे गिफट मे देंगे। उसकी आंखो में चमक आ जायेगी।

अगली सुबह हम स्‍कूल गये। स्‍कूल से आकर हम रेडियो लेकर सीधे लूणजी के गैरेज गये। वहां कुछ नहीं था। कोई दुकान और खोखा नहीं था। सडक बिलकुल खाली थी। एक खडे लोग बात कर रहे थे। सरकार ने सभी खोखो और दुकानो को हटा दिया। सरकार सडक चौडी करेगी। हम गिफट हाथ में लिये थे। उस लडके के खोखे वाली जगह देख रहे थे। अब वहां खोखा नहीं था । सामने लूण जी का गैरेज दिखाई दे रहा था।

---

Sunday, July 31, 2022

धुली हुई धूप

 

सावन और भादो में धूप धुली हुई होती है। बिलकुल सफेद और चमकती हुयी। बरसात के दिनो में हम घर से बाहर बाजार में आते है तो सडक पर इकटठे हुए थोडे से पानी पर धूप गिरती है तो बहुत सारी चमक पैदा कर देती है। उसकी चमक सीधे हमारी आंखो पर आती है। आंखे चूंधियाने लगती है। बरसात से गीली हुई सडक पर गिरी हुई धूप सडक पर चांदी की परत सा अहसास कराती है। मेरे घर से कुछ दूर निकलते ही बाजार है। बाजार में दुकानो के आगे कई तरह के ठेले लाईन से लगे रहते है। इनमें ज्‍यादातर ठेले खाने पीने की चीजो के होते है। हर ठेले का अपना स्‍थान होता है परन्‍तु होते सारे एक पंक्ति मे है। उनके ठेलो पर खाने पीने की चीजो के नीचे फॅाईल पेपर लगा होता है। इन दिनो इन पर धूप गिरने से ऐसा लगता है कि सबने खाने पीने की चीजो के नीचे कोई बडी सी जलती हुई टार्च रख दी हो। यहां सडक पर आपको धूप की सफेदी दिखाई नहीं देती है। यहां पर आपको धूप चीजो को पॉलिश कर चमकाती हुई दिखती है। आप थोडा और आगे जाओ जहां सडक बिलकुल साफ हो। जहां बिलकुल भी पानी न हो। वहां जब इन दिनो धूप गिरती है तो आपकेा बिलकुल सफेद और धुली हुई धूप दिखाई देती है। इतनी साफ और सफेद धूप आपको और किसी मौसम मे नहीं मिलेगी1 कुछ देर जमीन पर गिरी होने के बाज ज्‍यो ही मैली होने लगती है वह फिर बादलो के पीछे चली जाती है। बादलो में धुल कर फिर जमीन पर आकर फैल जाती है।

सावन और भादो मे धूप का आना जाता लगा रहता है। एक क्षण के लिए धूप होती है और अगले ही क्षण छाया। मुझे याद आता है कि जब में बिलकुल छोटा था। अपने बचपन में। मै कोई दस बारह साल का रहा होंउंगा। सावन के दिनो में मै मां के साथ हर सोमवार को मेले जाया करता था। मारकण्‍डेश्‍वर महादेव मंदिर परिसर में सावन के प्रत्‍येक सोमवार मेला लगता था। शायद अब भी लगता है। हमारे घर से 5 से 7 किलोमीटर दूर पडता है। मै मां के साथ पैदल मंदिर तक जाता था। रास्‍ते में मुझे दूर धूप दिखाई देती थी। हम लोग छांव मे चल रहे होते । मेरे लिए आश्‍चर्य की बात होती कि दूर सामने धूप है और जहां हम चल रहे है वहां छाया। मां का ईशारा पाकर मै दौडकर धूप में जाता परन्‍तु मै जब धूप में पहुंचता तो धूप पीछे चली जाती । मेरे लिए यह खेल हो जाता। सावन भादो में धूप ऐसी ही आंख मिचौली करती है।


आफिस में काम करते करते जब थक जाता हूं तो नयी उर्जा भरने के लिए मै बाहर आकर खडा हो जाता हूं। बाहर पोर्च में लगी कुर्सियो पर गांव के बुढे लोग ऊंघ रहे होते है। बिलकुल सफेद कपडो में। मै बादलो को देखकर वहां खडा हो जाता हूं। फिर थोडी देर में बादलो की ओट से सूरज निकल कर आता है। इस समय जो धूप अपने शरीर पर पडती है तो वो जलाती नहीं है। गर्मियो में हमारे शरीर पर धूप पडती है जो शरीर को जला देती है। शरीर को सेकने लगती है। सावन भादो की धूप ठंड मिला हुआ ताप देती है। हमारी देह पर धूप गिरती है तो गरम तो लगता है परन्‍तु देह अंदर से शीतल होती है। इस कारण धूप में खडे रह सकते है। सर्दी और गर्मी की बीच की धूप होती है ये। यह एक दिव्‍य अहसास होता है जो आप इस धूप मे खडे रहकर ही महसूस कर सकते हो।

सावन भादो के दिनो मे ही मै एक बार अपने मित्र के खेत गया। उसके खेतो में बहुत से पेड भी लगे थे। बरसात के पानी से पेडो के पत्‍तो पर एक दो बूंद पानी रह जाता है। जब इन पर धूप गिरती है तो ऐसा लगता है कि इन पत्‍तो पर सफेद हीरे के नग रखे है। इस समय धूप गिरने से रेत के धारे सोने जैसे चमकते है। बरसात के बाद गीले हुए धोरो पर सफेद धूप गिरती है तो अहसास होता है कि कुदरत ने सारी जमीन पर सोने की परत बिछा दी है। यह कुदरत का करिश्‍मा है कि सडको पर यह धूप चांदी का अहसास कराती है वहीं धोरो पर सोने का। धूप स्‍वयं होती है बिलकुल सफेद। कोई रंग नहीं । कोई आकार नहीं । बिलकुल धुली हुई। जब यह मनुष्‍यो के चेहरो पर गिरती है तो चेहरो पर मुसकुराहट ला देती है। एक बारगी ताजगी भर देती है। यह धूप धुल कर जो आती है। कुदरत की धुली हुई धूप। सब कुछ धुल जाने का अहसास कराती हुई।

Sunday, July 24, 2022

कहानी - हुक्‍म का गुलाम




वह एक बहुत लंबा पुल था परन्‍तु संकरा था। संकरा होने के बावजूद खूबसूरत था। पुल पर विन्‍टेज रोड लाईटे लगी थी। पुल के बीचो बीच किनारे पर एक रेस्‍टोरेंट था। पुल पर कोई रेस्‍टोरेंट होता नहीं है। परन्‍तु इस पुल के किनारे रास्‍ता बनाकर बनाया हुआ था। पुल के देानेा ओर जगह बहुत कम छोडी हुई थी। दोनो ओर मकान और दुकान पुल के बिलकुल पास थी। अनुराग पुल पर खडा था। वह वहां  खडा इंतजार कर रहा था। पुल के सामने उपर पूरा आसमान दिखाई देता था। नीले आसमान पर एक बडा सा बादल का टुकडा आया हुआ था। बहुत सुंदर द़श्‍य दिखाई दे रहा था। वो खडा खडा नीचे पटरियो को देख रहा था। शाम का वक्‍त था सूरज भी ढल रहा था। पुल से सूरज पूरा ढलता हुआ दिखाई देता है। इतनी अच्‍छी शाम का लुत्‍फ उठाने लोग इस पुल पर आते थे। पुल पर शाम को आवागमन रहता है परन्‍तु आज छुटटी का दिन होने से आवागमन कम था। पास के लैम्‍प पोस्‍ट के नीचे दो चार लड्के खडे थे। वे सिगरेट पीते हुए धुंआ छोड रहे थे। शाम की धूप में धूंऐ के छल्‍ले मेरे उपर से निकल रहे थे। वो एक दो कस लगाते और जोर जोर से ठहठहाकर हंसते थे। उसका ध्‍यान उन पर बिलकुल नहीं था। उसकी निगाहे तो उसके आने पर थी । लडके जिस लैम्‍प पोस्‍ट के नीचे खडे थे वह रेस्‍टोरेंट से थोडी दूरी पर था। लडके किसी को तंग नहीं कर रहे थे परन्‍तु चारो एक साथ सिगरेट पी रहे थे उससे बहुत सारा धुंआ हवा में उडता हुआ निकल रहा था। उन चारो में एक हैट पहनी हुयी थी। 

लडके जिस लैम्‍प पोस्‍ट के नीचे खडे थे। उनके ठहाके लगाने से उसका ध्‍यान उस लैम्प पोस्‍ट पर जा रहा था। लैम्‍प पोस्‍ट से उसे याद आया कि उसने शादी से पहले यहीं उसका इंतजार किया था। उसने यहीं खडा रहकर उसका इंतजार किया था। वह बहुत देर से आयी थी। वो जब देर से आने का कारण बता रही थी तो रेल बहुत जोर से हॉर्न बजाते हुए पुल के बिलकुल नीचे से निकली। वो बोलती रही अनुराग को कुछ सुनाई नही दिया। रेल के गुजरने के बाद वो चुप हो गयी। उसने अनुराग की तरफ देखा फिर वो जोर से हंस पडी। उसकी हंसी उस नीले आसमान मे फैल गयी। अनुराग को अपने लिए वो परफेक्‍ट लगी। अनुराग ने उसी समय उससे शादी करने का फैसला कर लिया था।


रेस्‍टोरेंट पर कांच का दरवाजा था। बाहर की आवाज अंदर सुनाई नहीं देती थी। रेस्‍टोरेंट का मैनेजर हाथ में चाय का कप लिए रेस्‍टोरेंट से बाहर आया। चाय से धुआं निकल रहा था। धुआं मैनेजर के चेहरे के आगे निकल हुए जा रहा था। मैनेजर ने लैम्‍प पोस्‍ट के नीचे खडे लडको पर निगाहे डाली। लडको की ठहाको की आवाज धीमी हो गयी थी। मैनेजर के लगतार देखने से लडके वहां से चल दिये। अब सभी लैम्‍प पोस्‍ट अब खाली थे सिवाय एक लैम्‍प पोस्‍ट के जिसके नीचे वो खडा था। मैनेजर चाय खत्‍म करने के बाद भी वहीं खडा था। चाय का कप अंदर से बैरा आकर ले गया। शादी के बाद पहली बार वो लोग बाहर चाय पीने यहीं आये थे। उस दिन भी मैनेजर बाहर खडा चाय पी रहा था। रेस्‍टोरेंट के आगे टीन का शेड था। उस दिन बारिश हो रही थी। मैनेजर टीन शैड के नीचे चाय पीते हुए बारिश्‍ का आनंद ले रहा था। वो चाहती थी कि वे भी यहीं चाय पीये परन्‍तु मैनेजर ने मना कर दिया था। अनुराग को बुरा लगा था। उसका मन था किसी और रेस्‍टोरेंट में चला जाय परन्‍तु वो चाहती थी कि यहीं ठीक है। पुल के नीचे ट्रेन की शंटिग हो हो रही थी1 उसके शोर से वह यादो से बाहर आ गया। रेल्‍वे स्‍टेशन पुल से ज्‍यादा दूर नहीं है। शंटिग पुल के नीचे ही होती है। शंटिग होने के बाद  ट्रेन के कुछ डिब्‍बे पुल के नीचे एक पटरी पर ही रह गये और  ट्रेन दूसरी पटरी से हॉर्न बजाते हुए निकल गयी। शादी के बाद उनके बीच सब कुछ ठीक चल रहा था। कभी ऐसा नहीं लगा कि उनके बीच कोई मतभेद और मनमुटाव होगा। सब कुछ ठीक था। ठीक ही नहीं उनके बीच बहुत प्रेम था। वो अपना समय टीवी के आगे नहीं बाते करने में ज्‍यादा बिताते थे। उसे ताश खेलने का बहुत शौक था। वो दोनो रोज रात को सोने से पहले ताश खेलते थे। वो हमेशा जीतती थी। अनुराग कभी जीत नहीं पाया। उसके पास हमेशा हुक्‍म का गुलाम कम रह जाता था। हुक्‍म का गुलाम हमेंशा उसकी पत्‍नी के पास ही आता था। वो ताश की खिलाडी थी। ताश हमेंशा वो ही फेंटती थी। फेंटने के बाद तीन गुलाम अनुराग के पास आते और हुक्‍म का गुलाम उसके पास ही जाता। वो जीतने के बाद जोर से हंसती थी। अनुराग उसे हंसते हुए देखता रहता था। वो कहता कि जिस दिन हुक्‍म का गुलाम उसे मिल जायेगा वो जीत जायेगा। वो कहती हुक्‍त का गुलाम तुम्‍हे कभी नहीं मिलेगा। उसने पूछा वो इसे कैसे हासिल कर सकता है। उसने कहा कि यदि मै किसी दिन तुम्‍हे छोडकर जांउगी तो हुक्‍म का गुलाम तुम्‍हे देकर जाउंगी। ऐसा कहने पर वो उदास हो जाता । वो जोर से हंसकर कहती कि मै तो मजाक कर रही थी।


पुल के नीचे से ट्रेन निकल चुकी थी। अब अंधेरा हो चुका था। पुल पर अनुराग अकेला आदमी ही दिखाइ दे रहा था। पुल पर वाहनो की रेलमपेल कम हो चुकी थी। सारे लैम्‍पपोस्‍ट जल चुके थे। रेस्‍टोरेंट का मैनेजर उसे घूर रहा था। उसे लगा कि वो जाकर मैनजर को कह दे कि वो किसी का इंतजार कर रहा है। मैनेजर अभी भी उसे घूर रहा था। अब वो खडा रहने में असहज हो गया था। वो मैनेजर की ओर जाने लगा। मैनेजर रेस्‍टोरेंट का दरवाजा खोलकर अंदर चला गया। वो फिर जाकर लैम्‍प पोस्‍ट ने नीचे खडा हो गया। वो अभी तक नहीं आयी थी। आज उसे फैसला सुनाना था। शादी के बाद उनके बीच ऐसा कुछ नहीं था। वो बहुत खुश थे। उसे पता नहीं था कि एक छोटी सी बात के लिए मामला इस हद तक चला जायेगा। उसने कभी भी उस पर कोई पाबंदी नहीं लगायी। वह महिलाओ की आजादी का हिमायती था। वो चाहता था कि वह इसी शहर में जॉब करे। उसके पास मल्‍टी नेश्‍नल कंपनी का आफर था। नोयडा में जॉब आफर थी। बहुत बडा पैकेज था। अनुराग ने उसे मना कर दिया। इस बात को लेकर दोनो के बीच कभी एकमत नहीं हो पाया। दोनो अपनी जिद पर अडे थे। अनुराग इस मामले को सुलझा लेना चाहता था। अनुराग ने उसे बता दिया कि वो तय करले क्‍या करना है। उसे नोयडा जाना है तो उसे अनुराग को छोडना होगा। वो कतई नहीं चाहता था कि वो छोडकर जाने का फैसला करे। सामने के लैम्‍प पोस्‍ट के उपर पूर्णमासी का चांद दिखाई दे रहा था। वो लैम्‍प पोस्‍ट से दूर आसमान में था परन्‍तु लैम्‍प पोस्‍ट पर टंगा हुआ महसूस हो रहा था। उसके इंतजार का तीसरा घंटा था। इतना इंतजार उसने शादी से पहले भी नहीं किया था। उसे लगा था कि वो नहीं आयेगी। आज फैसला नहीं हो पायेगा। वो कई दिनो से अपनी मां के घर रह रही है। आज उसने अपना फैसला बताने का तय किया था। अनुराग उसे छोडना नहीं चाहता था। वो चाहता था कि वो रूक जाये। अनुराग उसका नोयडा जाना भी स्‍वीकार नहीं चाहता था। रात के वक्‍त रेस्‍टोरेंट में भीड थोडी बढ जाती है। ज्‍यादा लोगो की आवाजाही से वो असहज महसूस करने लगा था। रेस्‍टोरेंट में जाने वालो में से एक महिला निकल कर उसकी ओर आ रही थी। अंधेरे में चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था। नजदीक आने पर पता चला था वो ही है। वो चुपचाप लैम्‍प पोस्‍ट पर आकर खडी हो गयी। दोनो चुप थे। उनके बीच में लैम्‍प पोस्‍ट था और नीचे दो पटरियां जो अलग अलग दिशा में जा रही थी। उसने अनुराग की ओर कम और पटरिया की ओर ज्‍यादा देखा। कुछ देर अनुराग भी चुपचाप खडा रहा । फिर अनुराग ने उसकी तरफ देखे बिना कहा – फैसला कर लिया। इस पर उसने कोई जवाब नही दिया। उसने अपने बैग मे से लिफाफा निकाला और अनुराग को देते हुए कहा- इसमें मेरा फैसला है और यही अंतिम फैसला है। यह कहकर वह निकल गयी। अनुराग चाहता था कि रेस्‍टोरेंट में उसके साथ एक चाय पी जाये। लेकिन वो हैरान था उसके हाथ में लिफाफा था और वो जा रही थी। वो आंखो से ओझल हो गयी तो अनुराग ने लिफाफा खोला। लिफाफे में कोई चिटठी नहीं थी। लिफाफ में सिर्फ ताश का पता था – हुक्‍म का गुलाम।

---------------- 

Sunday, July 10, 2022

एना कैथरीन

ठंडे प्रदेशो में और समुद्रो के किनारे रहने वालो को हमेंशा यही लगता है कि रेगिस्‍तान में खूबसूरती नहीं होती है। पहाडो पर रहने वाले कभी रेगिस्‍तान में गांव की कल्‍पना भी नहीं कर पाते है। बडे शहर वालो को लगता है कि रेगिस्‍तान में गांव की खूबसूरती तो दूर वे जीवन के बारे में भी नहीं सोच पाते है परन्‍तु रेगिस्‍तान के गांवो में न सिर्फ जीवन होता है बल्कि प्रक़ति की खूबसूरती भी होती है। कॉलेज में आने तक मेरा भी यही ख्‍याल था। कॉलेज के दिनो में मुझे मेरे शहर के पास के गांव में एक आवासीय शिविर में जाने को मौका मिला तो मैने पाया कि रेगिस्‍तान के गांव की खूबसूरती तो देखते ही बनती है। भोर में नाचते हुए मोर आपके दिल में रंग भर देते है।

कॉलेज में समाज सेवा का शिविर अटेण्ड करना जरूरी होता है। इस बार शिविर के इंजार्च भी सख्‍त थे इसलिए शिविर को बंक भी करना संभव नहीं था। मैं भी एडवेंचर के लिए शिविर चला गया। मेरे शहर के बिलकुल नजदीक सागर गांव में शिविर था। जहां शिविर था वहां एक बडा खुला मैदान था । वहां हम सब लोगो के टैंण्ट लगे थे। हमें एक सप्‍ताह टैण्‍ट में ही बिताना था। दस टीमे बनायी गयी थी और एक टीम में पांच सदस्‍य थे। हमारे ग्रुप का लीडर देवा था। हमारा टैण्‍ट सबसे अंत में था। टैण्‍ट के बाद एक खूबसूरत सी झौपडी बनी हुई थी। झौपडी के नजदीक ही बडा सा पीपल का पेड था। पीपल का पेड बहुत पूराना लगता था। बहुत घना और फैला हुआ था। शाम का वक्‍त था तो बहुत सारे पक्षी उस पेड पर चहचहा रहे थे। पक्षियो की चहचहाट से लगता था कि शाम हो गयी है। झोपडी के आगे सफाई अच्‍छी थी। झौपडी के बारह एक लकडी की टेबिल और दो कुर्सिया रखी हुर्इ थी। कुल मिलाकर पूरे मैदान में झौपडी सबसे खूबसूरत थी बाकि हमारे टैण्‍ट थे।

मै दौड कर स्‍टोर से ग्रुप के लिए जो सामान मिलना था ले आया। खाना हमे खुद ही बनाना था और खाना था। हम में से किसी को खाना बनाना आता नहीं था। हम एक दूसरे की ओर देख रहे थे। हमारे लीडर देवा ने कहा कि रोटियां तो मै बना लूंगा। सब्‍जी का क्‍या करें। देवा ने अधपक्‍की और कुछ गोल व कुछ चपटी रोटिया जैसे तैसे बनायी। हम सभी रसोई के काम में इतने व्‍यस्‍त हो गये कि पता नहीं चला कि हमारे टैण्ट के बाहर क्‍या हो रहा है। मैने सुझाव दिया कि पापड् की सब्‍जी बना लेते है। सबके यह आयडिया जंच गया। हमने पापड की सब्‍जी के लिए तपेला चूल्‍हे पर चढाया। पानी, तेल और पापड डालने के बाद तपेले में से धुंआ ही धुआ निकला। सारा तपेला जल गया। अंदर से काला काला हो गया। अब हम सारे टैण्‍ट के बाहर बैठ गये। मेरी नजर पास वाली झौपडी पर पडी। बाहर कुर्सी पर एक लडकी बैठी थी। लडकी विदेशी लग रही थी। उसकी पीठ हमारी तरफ थी और चेहरा पीपल के पेड की तरफ था। अंधेरा हो चुका था। झौंपडी में रोशनी में थी। हमें तो पंचलैट जलाना था जो देवा ने चार बार कोशिशो के बाद जला लिया। अब खाना समस्‍या थी। अधपक्‍की रोटिया खायें कैसे। मै खडा होकर टैण्‍ट के किनारे झौपडी तक गया। मैने आवाज दी – हैलो। पीछे से साथियो ने मुझे खींचा। मैने उनसे हाथ छुडाया और एक बार और आवाज दी – हैलो। उस लडकी ने कॉफी का कप हाथ में लिये पीछे मुडकर देखा। मुडकर देखने से बाल उसके चेहरे पर आ गये थे। उसने बाल चेहरे से हटाते हुए हमारी तरफ देखा। मैने फिर कहा – मे यू हैल्‍प अस टू प्रीपेयर समथिंग टू ईट।

उसने काफी का कप टेबिल पर रखते हुए जवाब दिया- व्‍हाई नाट। श्‍योर। यहां आओ।

मै चक्‍क्‍र में पड गया। यूरोपियन दिखने वाली लडकी हिन्‍दी कैसे बोल रही है। मैने फिर पूछा तो फिर जवाब हिन्‍दी में आया। मैं गोबर के लेप से बनी अस्‍थाई दीवार फांद कर झौपडी के आगे चला आया। वो अपने बाल पीछे करते हुए बोली – आप बिना पूछे दीवार फांदकर आ गये हो।

मैने सॉरी बोला। फिर कुछ देर चुप रहा । मेरे मन में बहुत सारे सवाल उठ रहे थे। वो चुपचाप मुझे देखती रही । मैने पुछ ही लिया- मैम आपका नाम ।

‘मेरा नाम एना कैथरीन है।‘

आप शक्‍ल से तो यूरोपियन लगती है परन्‍तु हिन्‍दी अच्‍छी बोल लेती है। ‘

उसने काफी का कप एक बार फिर टेबिल पर रखा और अपने दोनो हाथ टैबिल पर समेट कर रखते हुए बोली- हूं । यह बात तो है। आप बताओ । क्‍या मदद चाहिए।‘

उसने मदद के बारे मे पूछ लिया परन्‍तु उसके हिन्‍दी बोलने के आश्‍चर्य से मैं अभी भी बाहर नहीं निकला। अभी भी मै स्‍त्‍ब्‍ध था। मैने फिर पूछा – ‘आपने बताया नहीं कि आप हिन्‍दी कैसे बोल लेती है।‘

वो अपने हाथो की अंगुलियो से बाल पीछे करते हुए जोर से हंसते हुए बोली – मैं इंडिया में दो साल से सोशल वर्क पर कोर्स कर रही हूं। अपने कोर्स के प्रैक्टिल के लिए यहां हूं। अब दो साल पूरे हो रहे हे। इन दो सालो में लोगो को समझने के लिए मुझे हिन्‍दी सीखनी पडी। हो गया। अब बताओ आपको क्‍या मदद चाहिए।

मैने अपने बालो में अंगुलिया डालकर माथे को खुजाया। फिर बोला- हमें थोडी सी सब्‍जी चाहिए। हमें किसी को सब्‍जी बनानी नहीं आती है।

‘बनानी तो तुम्‍हे खुद चाहिए।‘

’ पर मैम वो क्‍या है ना। बनायी तो थी परन्‍तु सारी जल गयी।‘

मेरी मासूमयित से उसे हंसी आ गयी। वो उठकर अंदर गयी। वो करेले का अचार लेकर आयी। उसने अचार का डिब्‍बा मुझे देते हुए कहा – यह मैने अभी दो दिन पहले सीखा है और बनाया है। मै तो खाती नहीं। आपके काम आ जायेगा। परन्‍तु कल से तुम्‍हे खुद ही बनाना होगा।

मैं वो डिब्‍बा लेकर आ गया। उस शाम तो हमारी अच्‍छी पार्टी हो गयी। हमने रात को पंचलैट बंद किया और हमारी गानो की महफिल सजी। हमने जोर जोर से फिल्‍मी गाने गाये। ठंडी ठंडी बयार के बीच गुनगुनाकर सभी मस्‍ती कर रहे थे। मेरी नजर पडोस की झौपडी पर थी। ऐना दो ती बार बाहर आयी और हमें देखकर चली गयी। मैने देवा से कहा अब हमें सो जाना चाहिए। रात बहुत हो चुकी है।

सुबह मेरे कानो में आवाज पडी- जो सोवत है वो खोवत है। जो जागत है वो पावत है। अब रैन कहां जो सोवत है। ‘ यह गीत गाते हुए मेरे टैण्‍ट के आगे से प्रभात फेरी निकल रही थी। मेरे टैण्‍ट मे मै ही सो रहा था। मैने चददर हटाकर अपनी गर्दन बाहर निकालकर देखा। प्रभातफेरी में आगे आगे एना चल रही थी। पीछे बाकि सारे लोग जिसमें हमारा लीडर देवा भी था। मैं उठकर खडा हुआ। जल्‍दी से दैनिक कार्य निपटाये। हैण्‍ड पम्‍प से पानी निकाल कर नहाया और तैयार हो गया। एना प्रभात फेरी से आ गयी थी। उसकी झौपडी के आगे दो मोर घूम रहे थे। ऐना उनको दाने खिला रही थी। पीछे पीपल का पेड था। यह बहुत खूबसूरत तस्‍वीर थी। हम नाश्‍ते के लिए चले गये।

फिर दोपहर में हमारी क्‍लास थी। क्‍लास ऐना ले रही थी। ऐना अपने सोशल वर्क के अनुभव बता रही थी। उसने बताया कि यह उसका अंतिम कैम्‍प है। इसके बाद वापिस फ्रांस चली जायेगी। उसका पढाने का तरीका बहुत प्रभावी था। वो मोटिवेशनल स्‍पीकर की तरह क्‍लास लेती थी।

हमारा कैम्‍प ऐसे ही चला दोपहर में ऐना की क्‍लास होती थी। फिर शाम को फिल्‍ड में काम करते। रात को खाना और मस्‍ती । मै ऐना के बारे में सोचा करता था कि वो हजारो मील दूर एक गांव में कैसे जीवन गुजारती है। वो शाम को साईकिल पर गांव में जाती। गांव से कुछ सामान लाती और लोगो से बाते करके आती। शाम को बाहर कुर्सी पर बैठकर काफी पीती। एक सप्‍ताह कैसे निकल गया पता ही नहीं चला। कल अंतिम दिन था। आज सुबह हमने सोचा एक बार फिर एना से करेले का स्‍वादिष्‍ट आचार ले लेते है। दरअसल करेले की सब्‍जी कडवी होती है परन्‍तु आचार स्‍वादिष्‍ट था। ऐचा आचार मैने पहले कभी नहीं खाया था तो एक बार फिर तलब हो गयी। मैने पहले तो संकोच किया। फिर मन बना लिया। मै सीधे रास्‍ते से ऐना की झोपडी पर गया। दरवाजे के बाहर खडा होकर दरवाजे को खटखटाया। ऐना झौपडी में लेटी हुई एक किताब पढ रही थी। दरवाजे पर मेरी खटखटाहट सुन कर वो बाहर आयी। उसने मुझे पूछा –कैसे आये हो। मैने बता दिया – मैम । कल अंतिम दिन है तो सोचा एक बार आपके हाथ का करेले का आचार खा लिया जावे। ऐना मुझे देखती रही। उसने इस बार श्‍योर नहीं कहा । वो मेरे सामने खडी रही। फिर कुछ सोच कर बोली – मैने थोडा सा बनाया है। अभी देती हूं। मै तो वैसे भी नहीं खाती हुं। वो अंदर जाकर आचार के डिब्‍बे को उठा लायी और मुझे दे दिया। मैने उसे थैक्‍स कहा और अपने टैण्‍ट में चला आया। हमने मस्‍ती से खाना खाया। ऐना यूरोपियन होकर जबरदस्‍त आचार बनाती थी। मै इस बात से भी आश्‍चर्यचकित था कि वो करेला पसंद नहीं करती थी फिर भी करेले का आचार बनाती थी। आज शाम का खाना और था अगले दिन सुबह तो कैम्‍प प्रशासन से खाना मिलना था। वैसे हम पांच दिनो में काम चलाउ खाना बनाना सीख गये थे।

शाम को ऐना झौपडी की सफाई करके बाहर टेबिल पर बैठी थी। थोडी देर बैठती फिर उठकर मैदान के गेट पर जाती और फिर आकर बैठ जाती। मै समझ नहीं पाया कि वो ऐसा क्‍यो कर रही है। शायद किसी का इंतजार कर रही है। शायद उसका मंगेतर आने वाला हो। थोडी देर टेबिल पर बैठी रहने के बाद वो उत्‍साह से उठ खडी हुयी। मैने सामने देखा। मैदान के दरवाजे से एक अंग्रेज युवा हाथ में एक बैग लिये दौडता आ रहा था। झौपडी के नजदीक आते ही ऐना भी दौड पडी। दोनो ने एक दूसरे को पकड लिया। वो झोपडी के नजदीक आते आते अपनी आंखे बंदकरके बोल रहा था- व्‍हेअर इज माई स्‍पाईसी बीटर गोर्ड (करेला)। आई एम हियर फार यॉर स्‍पाईसी बीटर गोर्ड नॉट फार यू। देट इज माई मोस्‍ट अवेटिंग डिश। व्‍हैअर देट इज।‘

यह सब बाते झोपडी के बाहर हो रही थी। हमे स्‍पष्‍ट सुनायी दे रही थी। ऐना कुछ बोल नहीं रही थी। उसके मुंह पर जैसे ताला लग गया हो। मै डस्‍टबिन में हमारे द्वारा फेके गये खाली करेले के आचार के डिब्‍बे को देख रहे थे। हमारे कानो में आवाजे आ रही थी – वहेअर इज माई इंडियन गिफट । वहैअर ।

सारी आवाजे उसके मंगेतर की थी। ऐना की कोई आवाज नहीं थी। वो निर्दोष अपराधी की तरह उसको सुन रही थी। हम यह सब देख रहे थे।

Saturday, June 11, 2022

स्ट्रॉबेरी

 


बसंत के दिन थे।कहीं से कोई आवाज नहीं आ रही थी। इन दिनो चलने वाली हवा का शोर ही सुनाई दे रहा था खासकर पास के पीपल के पेड़ के हिलने का। घर के पास पीपल का पेड़ था जिससे पत्‍ते गिर गिर कर घर के बरामदे में आ रहे थे। बरामदे में दोपहर तक काफी सूखे पत्‍ते आ गये थे। हवा के झोंको के साथ सूखे पत्‍तो के खनकने की आवाज आती। और कोई आवाज मुझे सुनाई नहीं दी। कभी कभार गाय के रंभाने की आवाज कानो में जरूर पड़ती। घर में घूसते ही बडा सा हॉल था। जिसमें एक डायनिंग टेबिल लगी थी। बुढि़या उस डायनिंग टेबिल पर अपने हाथ रखे हुए बैठी थी। उसके ठीक सामने एक खिड़की थी। उसकी नजरे उस खिड़की पर थी। मैं नहाकर आ चुका था। मुझे उपर की बालकानी से बुढि़या दिखाई दे रही थी। मैने कपड़े पहने और फिर बालकानी की ओर आया। बुढिया वैसे ही बैठी थी। मैं जब से आया हू बुढिया वैसे ही बैठी है। मैं बाल बना रहा था तो नीचे से बुढिया की आवाज आयी- खाना तैयार है। मैं दौड्कर नीचे गया  और डायनिंग टेबिल पर बैठ गया। बुढिया एक प्‍लेट में खाना लेकर आयी और मेरे आगे रख दिया। खाने में दाल चावल थे। मैने पूछा- आप घर में अकेली हो। बुढिया की नजरे अभी भी सामने वाली खिड़की पर थी। काफी देर तक बुढिया का कोई जवाब नहीं आया। मुझे लगा उसने मेरी बात को अनसुना कर दिया। कुछ देर बाद वो मेरी तरफ मुंह किए बिना बोली- तुम खाना खाओ। तुम्‍हे कोई तकलीफ नहीं होगी।‘ मैं खाना खाने लग गया। बुढिया लगातार उस खिड़की की ओर देखती रही। मैने बात करने की कोशिश की लेकिन मेरी किसी बात का जवाब नहीं दिया। मैने खाना खाया और उपर चला आया अपने कमरे में।

आज मेरा उदयपुर में पहला दिन था। अखबार में एक एड को देखकर यहां बुढिया के यहां पेईग गेस्‍ट के लिए संपर्क किया था। फोन पर संपर्क किया था तो एक अंकिल बोल रहे थे परन्‍तु यहां मुझे आंटी ही दिखाई दी। उपर छत्‍त पर मेरा अकेले का कमरा है बाकि सारी छत्‍त खाली है। आधी छत्‍त को धूप ने घेर लिया है। इस घर के आस पास दस बारह सरकारी बंगलेनुमा घर है। घर के सामने वाली सड़क पर ईक्‍का दुक्‍का लोग चलते नजर आते है। आदमियों की आवाज तो न के बराबर सुनाई देती है। पीपल के पेड़ो की और गायो के रंभाने की आवाजे कानो में पड़ती रहती है। मेरे को एक महीना यहां रहना है। उपर की बालकानी से नीचे का हाल दिखाई देता है। हाल में बुढिया डायनिंग टेबिल पर हाथ रखे हुए बैठी है। कभी अपने हाथो पर ठुडी रख लेती है। कई बार उठकर दरवाजा खोलती है और बरामदे जाती है। बाहर की ओर कुछ देर देखती है और फिर वापिस आकर डायनिंग टेबिल पर बैठ जाती है। शाम की चाय के लिए बुढिया ने आवाज दी। मै नीचे गया तो एक कप चाय और स्‍नेक्‍स की प्‍लेट मुझे पकड़ा दी। मेरे को बात करने का मौका ही नहीं दिया। मैने कुछ पूछा तो भी कोई जवाब नहीं दिया। अब शाम को चुकी थी। मैने नीचे की ओर देखा बुढिया वैसे ही बैठी थी। मै अपनी किताबे संभालने लगा। बाहर अंधेरा हो चुका था। पहले गर्म हवा आ रही थी परन्‍तु अब हवा में शीतलता आ गयी है। बाहर कोई ज्‍यादा रोशनी नहीं है। रोड़ लाईटो की रोशनी घर तक आ नहीं पाती है। घर के बाहर एक बल्‍ब जल रहा है। बुढिया ने खाने के लिए आवाज लगायी तो मै एक बार फिर नीचे डायनिंग टेबिल पर जाकर बैठ गया। मैने एक बार फिर बात करने की कोशिश करते हुए पूछा- अंकिल कहां है।‘ बुढिया ने खाने की प्‍लेट मेरे आगे रखते हुए बोली- मैने कहा था ना। तेरे को कोई तकलीफ नहीं होगी। तुम खाना खाओ। ‘ मैने आगे बात करना उचित नहीं समझा। मै खाना खाने लग गया। खाने में शाम को भी पुलाव ही बनाये थे। मैने खाने पर कोई टिप्‍पणी किये बिना खाना खा लिया। खाना खाने के बाद मै उपर चला गया। मुझे सफर की थकावट हो रही थी। इसलिए नींद आ रही थी। मैने सोने से पहले नीचे हॉल में देखा। बुढिया वहीं डायनिंग टेबिल पर बैठी थी। बैठे बैठे उठकर दरवाजे पर गयी। दरवाजा खोला और बरामदे मे कुछ देर खडी रही । फिर वापिस आ गयी। मेरा मन तो बहुत हो रहा था कि बुढिया से उसकी चिंता के बारे में पूछूं परन्‍तु बुढिया कुछ भी बताना नहीं चाहती थी। मुझे नींद आ रही थी। मै सोने के लिए बिस्‍तर पर चला गया।

रात को मेरी आंख खुली। सोचा बुढिया को देख लूं। सोयी है या वैसे ही बैठी है। मैने बालकानी से हाल में देखा। बुढिया डायनिंग टेबिल पर नहीं थी। इस बार वो अपनी कुर्सी खिड़की के पास लगाकर बैठी थी। हॉल में अंधेरा था। खिड़की से बाहर सड़क पर मद्धम रोशनी पड़ रही थी। सड़क पर आवाजाही नहीं थी। हवा का शोर था। हवा के साथ कभी सड़क से धूल उड़कर आती थी। सोचा नीचे बुढिया को जाकर सोने के लिए कहूं परन्‍तु बुढिया के व्‍यवहार को देखकर पांव रूक गये। वापिस सोने के लिए चला गया। सुबह देर से आंख खुली। घर पर उठते ही बिस्‍तर पर ही चाय लेता हूं। आज चाय के लिए किसी ने आवाज नहीं थी। बाद में ख्‍याल आया कि मै तो उदयपुर में पेंईग गेस्‍ट हूं। उठकर नीचे हाल मे गया। बुढिया खिड़की में रात की तरह ही बैठी थी। शायद कुर्सी पर बैठे बैठे ही उसे नींद आ गयी। मैने बुढिया को जगाया नहीं। मै कीचन में गया और चाय बनाने लगा। सामान को ढुंढने में थोडी परेशानी हुई परन्‍तु मैने चाय बना ली। एक चाय मेरे लिए और एक बुढिया के लिए बनायी। मैने चाय के दोनो कप डायनिंग टेबिल पर रखे। मै बुढिया को उठाने के लिए उसके नजदीक गया। मैने ज्‍योही उसकी कुर्सी को छुआ उसकी आंख खुल गयी। मैने उससे कुछ नहीं कहा। मैने उसका हाथ पकड़ा और उसे उठाया। हाथ पकड़कर उसे डायनिंग टेबिल पर लाया। मै उसके पास बैठ गया। उसकी नजरे उस खिड़की पर थी। मैने उससे पूछने के लिए मुंह खोला ही था कि उसकी आंखो से आंसूओ की धारा निकल गयी। उसने अपने पल्‍लू से आंसू पोंछे। फिर भी आंसू रूके नहीं। मै उठकर एक गिलास में पानी लाया। बुढिया ने मना नहीं किया और पानी पी लिया। मैने कहा- क्‍या हुआ आंटी।‘ वो कुछ बोली नहीं। अपने आंसू अपने पल्‍लू से पोंछती रही। मैने फिर कहा- आंटी । कुछ तो बोलो। शायद मै आपके कुछ काम आ सकूं’। बुढिया ने एक बार फिर आंसूओ को पोंछा और बोली- ‘बेटा । तुम्‍हारे अंकिल कल सुबह से नहीं लौटे है’। मैने पूछा- ‘कहां गये थे’।

‘कल सुबह हम दोनो में झगड़ा हुआ था। झगड़े में उन्‍होने कहा मै घर छोड़कर चला जाउंगा। मैने कहा चले जाओ। वो उसी समय घर से निकल गये। वैसे तो हर बार झगडे के बाद शाम तक लौट आते है। आज दूसरा दिन हो गया है। अभी तक नहीं आये है’। बुढिया ने उम्‍मीद देखते हुए कहा।

’आंटी आप चाय पीओ। मेरे को बाजार से कुछ सामान लाना है। मेरे को बताओ अंकिल कहां कहां जाते है। मै उन सब जगह देखकर आता हूं। वो जरूर आ जायेंगे। किसी रिश्‍तेदार के यहां रूक गये होंगे। आप चिंता मत करो । मैं उन्‍हे ढुंढने जाउंगा’। मैने बुढिया को दिलासा दिया।

बुढिया ने बताया कि उनका फोन भी कल से बंद आ रहा है। उसने मुझे बताया कि अंकिल कहां कहां जा सकते है। मै चाय नाश्‍ता करके बाहर निकल गया। बुढिया ने बताया था कि अंकिल पान खाने जरूर जाते है। तो सबसे पहले मै पान की दुकान पर गया। पान की दुकान घर से काफी दूर है। कॉलोनी से बाहर निकलने के बाद भी दो किलोमीटर दूर है। पान की दुकान के पास चहल पहल थी। यहां लग रहा था कि मै किसी शहर मे हुं वहां तो लग रहा था कि किसी जंगल में बैठा हूं। पान वाले से अंकिल के बारे में पूछा तो पान वाले ने बताया कि अंकिल दो दिन से पान खाने नहीं आ रहे है। पान वाले से उनके दोस्‍तो के बारे मे जानकारी ली। उसके बाद अंकिल के सब दोस्‍तो के घर भी गया परन्‍तु अंकिल का कोई पता नहीं चला। मुझे बाजार से कुछ सामान भी लेना था परन्‍तु ज्‍यो ज्‍यों अहसास होने लगा कि अंकिल नहीं मिलेंगे मन दुखी हो गया। मै कुछ भी खरीद नहीं पाया। मैं थके कदमो के साथ घर आ गया। घर पहुंचते ही बुढिया ने पूछा- ‘कुछ पता चला’। मैने कहा – ‘नहीं। परन्‍तु जल्‍दी ही चल जायेगा।मै कुछ लोगो से बात करके आया हूं। शाम तक इंतजार करते है। नहीं तो पुलिस थाने मे रपट लिखायेंगे’।

‘नहीं । रपट नहीं लिखायेंगे। ऐसे ही आ जायेगे’। दोपहर का खाना मै कुछ खा नहीं सका। मेरे को भी अंकिल की चिंता होने लगी थी। मै अपने कमरे में चला गया। मै बीच बीच में उठकर नीचे बुढिया को देखता। वो अंकिल के इंतजार में डायनिंग टेबिल पर बैठी थी। उठकर बरामदे में जाती और सड़क को दूर दूर तक देखती। फिर लौटकर डायनिंग टेबिल पर बैठ जाती। शाम हो चुकी थी। बुढिया वैसे ही अंकिल के इंतजार में बैठी थी। खाने का समय हो चुका था। मुझे भूख भी लग रही थी परन्‍तु मैने बुढिया को खाने के लिए कहना ठीक नहीं समझा। अब तो रात हो रही थी। मै नीचे गया। बुढिया के पास बैठ गया। मैने कहा’ ‘थाने में रपट लिखा आये’। उसने कहा- नहीं’। मैने पुछा- क्‍यों’।

‘हम दोनो प्राय झगड़ते है परन्‍तु कभी भी झगड़ा पुलिस थाना तो दूर की बात है कभी किसी दूसरे व्‍यक्ति रिश्‍तेदार के पास भी लेकर नहीं गये। हमारी कॉलोनी में भी किसी को पता नहीं है कि हम झगड़ते है। मै उनका इंतजार करूंगी जब तक वो स्‍वयं नहीं आ जाते’।

‘इतना विश्‍वास है’।

’हां’।

’कैसे’।

’ हमारे बीच जब भी झगड़ा होता है। वो मुझ से नाराज होकर चले जाते है। फिर लौटकर आते मेरी फेविरिट चीज लेकर’।

‘आपकी फेविरिट चीज क्‍या है’।

स्ट्रॉबेरी

। जब भी नाराज होते है और फिर लौटकर आते है तो स्ट्रॉबेरी लाते है’। वो मेरे से बात करते करते पूरानी यादो में खो गयी। फिर उसे ख्‍याल आया कि इस बार अंकिल आये नहीं। हर बार तो शाम को लौट आते है। आज दूसरा दिन है आये नहीं है। वो चुप हो गयी। मैने भी खाना नहीं खाया। उपर चला गया। उसने खाने के बारे मे पूछा भी नहीं । रात गहराने लगी थी। बाहर सड़क पर भी एक दो रोड लाईट की रोशनी थी। पेडो के सांय सांय करने की आवाजे आ रही थी। मैने बुढिया को देखा। बुढिया वहीं डायनिंग टेबिल पर बैठी थी। मुझे लगा कि वो ऐसे ही जागती रही तो उसकी तबीयत भी खराब हो सकती है। वो अपनी आंखो पल्‍लू से पोंछती और नजरे खिड़की पर गढा देती। सड़क पर कोई राहगीर दिखता तो वो खिड़की पर जाती। उस राह‍गीर को देखकर वापिस डायनिंग टेबिल पर लौट आती। अब बारह बज रहे थे। मेरा मन आशंकाओ से भर गया था। आशंकाऐं बुढिया के मन में भी रही होगी। ठीक बाहर बजे दरवाजे की बैल बजी। मै दौडकर नीचे गया। बुढिया मुझ से पहले ही दरवाजे तक पहुंच चुकी थी। मै बुढिया के पीछे था। बुढिया ने दरवाजा खोला। खोलते ही सामने बुजुर्ग खड़े थे। बुढिया कुछ नहीं बोली। वहीं खड़ी रही। उस बुजुर्ग को देखती रही। बुजुर्ग भी बुढिया को एक टक देखता रहा। बाहर हवा से पीपल के पेड के पत्‍ते उड़कर उस अंकिल पर गिर रहे थे। हम तीनो के बीच कोई आवाज नहीं थी। हवा के सांय सांय की आवाज आ रही थी। रोशनी इतनी ही थी कि दोनो के चेहरे दिखाई दे। सफेद बालो वाले अंकिल कुछ नहीं बोले वे बुढिया को देखते रहे। बुढिया भी कुछ नहीं बोली । चुपचाप देखती रही। मैने भी कुछ बोलना ठीक नहीं समझा। कुछ देर बाद अंकिल ने अपने पीछे किऐ हुए हाथ आगे लाये। उनके हाथ में स्ट्रॉबेरी का बडा सा डिब्‍बा था। उस डिब्‍बे मेसे लाल लाल स्ट्रॉबेरी दिखाई दे रहे थे। अंकिल ने डिब्‍बा बुढिया के आगे करके कहा- ‘इस बार मुझे याद है। आज तुम्‍हारा जन्‍म दिन है। हैप्‍पी बर्थडे’। अब बुढिया की आंखो से नहीं रूकने वाला पानी बहने लगा। मैने दोनो को पकड़ा और डायनिंग टेबिल पर लाकर बैठाया। दोनो एक दूसरे के सामने बैठे थे। हॉल में अंधेरा था। खिड़की से रोड लाईट की रोशनी आ रही थी जो सीधे स्ट्रॉबेरी पर गिर रही थी। उनके बीच में पड़े लाल लाल रंग की स्ट्रॉबेरी के गुच्‍छे चमक रहे थे।

Saturday, June 4, 2022

नानाजी के प्रयोग

 

मै जब दसवीं में पढता था तो मेरे नानाजी रिटायर हो गये थे। मै सोचता था कि नानाजी रिटायर होने के बाद क्‍या करेंगे। यह सोचना नानाजी का काम था परन्‍तु मेरे मन में जिज्ञासा थी क्‍योकि नानाजी बिना काम कभी बैठते नहीं थे। रिटायरमेंट के बाद कुछ दिन तो वे अपने आफिस किसी न किसी काम से जाते रहे परन्‍तु बाद में वो भी बंद हो गया। हमारे शहर मे उन दिनो यूनिवर्सिटी खुली थी। मेरे नानाजी फिर उस यूनिवर्सिटी में काम करने के लिए जाने लग गये। नानाजी साईकिल पर रोज यूनिवर्सिटी जाते थे। मैं अपने दूसरे भाईयो के साथ ननिहाल ही रहता था। रात को नानाजी हम बच्‍चो से बारी बारी से पैर दबवाते थे। नाना जी की मौसी भी वहीं रहती थी। उन दिनो आज की तरह न तो मोबाईल था और ना ही टीवी। नानाजी की मौसी रात को हम सब बच्‍चो को कहानियां सुनाती थी। रात को आंगन में नानी मौसी की खाट लगी रहती थी। उस खाट के आस पास हम सभी बच्‍चे बैठ जाते थे और नानी मौसी कहानी सुनाती थी। आज के टीवी शो की तरह हम में से कोई भी बच्‍चा कहानी छोडना नहीं चाहता था। नानाजी का कमरा सामने ही था। जब कभी पैर दबाने की मेरी बारी आती तो मुझे कहानी छोडने का बडा अफसोस होता क्‍योंकि नानी मौसी ठीक उसी समय कहानी सुनाती थी। मै पैर दबाते दबाते अपनी गर्दन उंची करके कमरे के बाहर झांकता। नानाजी आंखे बंद किये मेरे को डांट देते तो मै फिर पैर दबाने मे लग जाता। कई बार नानी मौसी देख लेती तो वो नानाजी को मुझे भेजने के लिए कह देती। मैं दौडकर कहानी सुनने आ जाता।

नानाजी का यूनिवर्सिटी जाने का सिलसिला ज्‍यादा नहीं चला। फिर वो दिनभर घर में ही कुछ न कुछ करते रहते। कभी अपनी आफीस की पूरानी फाईले देखते तो कभी कोई किताब पढ्ते। रविवार को विशेष पूजा करते । मेरे से प्रसाद के लिए बाजार से लडडू मंगवाते। हम सब बच्‍चे नानाजी पूजा करते तो पीछे बैठ जाते । नानाजी पूजा करने में तीन-चार घंटे लगाते । हम तीन चार घंटे लगातार इंतजार करते लडडू खाने के लिए। नानाजी पाठ करते हुए कई बार पीछे झांक कर देखते। हम पीछे बैठे होते। नानाजी समझ जाते कि हम सब लडडू के लिए बैठे है परन्‍तु नानाजी पूजा में कोई कसर नहीं छोडते थे। पूरे चार घंटे पूजा करते थे। उसके बाद वो लडडू हम सब में बांटते और हम बडे चाव से प्रसाद का लडडू खाते।

नानाजी हम बच्‍चो में घुलेमिले तो नहीं थे परन्‍तु हमारी बातो में रूचि बहुत लेते थे। खासकर हम अपनी पढाई के ईतर जो भी करते उसमें नानाजी पूरी रूचि लेते थे मसलन मेरे भाई को पेंटिग का बहुत शौक था तो वे उसे पेंटिंग के नये नये आयडिया देते थे। मै कोई कविता लिखता तो उसमें बताते ये ऐसे होनी चाहिए थी। अच्‍छी कविता अखबारो में छपवाने के आयडिया भी देते थे। अब रिटायरमेंट के बाद नानाजी के पास कोई काम नहीं था तो भी वे कोई न कोई काम निकाल लेते थे। नानी और नानी मौसी दोपहर को सत्‍संग में जाती तो पीछे घर में हम बच्‍चे और नाना रह जाते। नानाजी फिर हमारे साथ नये नये प्रयोग करते । एक बार तो नानाजी ने कहा कि चलो घर पर भूजिये बनाते है। मेरे को कह दिया कि स्‍टोव जला। पहले गैस वगैराह की सुविध आम नहीं थी। हमारे यहां भी गैस नहीं थी। हम केरोसीन वाला स्‍टोव जलाते थे। दूसरो को बेसन घोलने और दूसरे काम के लिए कहते। कढाई स्‍टोव पर चढाने के बाद उस पर झारी लगाकर उससे भूजिया निकालते । भूजिये बनते देख नानाजी के चेहरे पर खुशी आ जाती। नानी आने के बाद गुस्‍सा होती परन्‍तु चाय के साथ नानी भी भुजियो के मजे लेती। कई बार तो कोई मिठाई बनाने के लिए पूरे घर भर को लगा देते। बाजार से मावा और दूध लाते । मेरी मां, मौसी और मामी भी इसी काम में लग जाते। कई बार तो मिठाई बन जाती और कई बार खराब हो जाती। परन्‍तु हम सब इस काम का आनंद लेते ।

एक बार दोपहर को मेरे को कहा कि स्‍टोव जला। मैने स्टोव जलाया। फिर उस पर कढाई चढाने को कहा। फिर नानाजी ने जैसा कहा करता गया। उसमे तेल डाला, बेसन डाला, चीनी डाली और नींबू डाला। मैने नानाजी से कहा हम क्‍या बना रहे है तो नानाजी ने कहा देखते जाओ क्‍या बनता है। कुछ देर बाद नानाजी उसको पका कर नीचे उतारा और मेरे से कहा चखो – कैसा बना है। मैने पूछा- नानाजी हमने क्‍या बनाया है। नानाजी ने कहा – पहले चखो। फिर नाम रखते है। मैने चखा। मैने अपना मुंह बनाते हुए कहा कि – अजीब सा स्‍वाद है। कुछ खटटा है कुछ मीठा है और थोडा थोडा तीखा भी है। नानाजी कहा बन गया। यह हमारी नयी डिश है। अब इसको बडे स्‍तर पर बनायेगे। मैं कुछ समझ नहीं पाया और खेलने चला गया।

गरमीयो में हमारे स्‍कूल की छुटिया थी। नानाजी ने हमे नया टास्‍क दे दिया। उन्‍होने दोपहर को हम सबको बुलाया और कहा कि चलो कुछ नया करते है। उन्‍होने पूराने अखबार मंगवाये। फिर कहा कि हम लिफाफे बनाते है। नानाजी ने अखबार काटकर हम सबको लिफाफा बनाना सिखाया। लिफाफा चिपकाने के लिए उन्‍होने गोंद का प्रयोग नहीं किया। उन्‍होने हमे आटे से लई बनानी सिखाई। बहुत सारी लई बना लेते फिर उससे हम लिफाफे चिपकाते। यह लिफाफे उन दिनो दुकान वाले काम में लेते थे। दस – पन्‍द्र लिफाफे बनाने के बाद मुझ से कहा कि सामने दुकानदार से पूछ कर आओ कि इस प्रकार के लिफाफे उसके काम आ जायेंगे क्‍या। मै उससे पूछ कर आया और उसने हां कर दी। फिर क्‍या था नानाजी ने बडे स्‍तर पर यह काम शुरू कर दिया। हमे सुबह से शाम तक इसी में लगाकर रखते। अलग अलग नाप के लिफाफे हमसे बनवाते। लिफाफो की पहली खेप तैयार हो गयी तो मै सामने वाले दुकानदार को दे आया। उसको पसंद भी आ गये। अब नानाजी का हौसला और बढ गया। उन्‍होने एक सप्‍ताह में बहुत सारे लिफाफे तैयार करवा दिये। हमारा ननिहाल बाजार के बीच में था। ननिहाल के चारा ओर दुकाने ही दुकान थी।

एक सप्‍ताह में जितने लिफाफे तैयार होते । मै साईकिल लेकर निकलता हर एक दुकान में देता जाता। लगभग हर दुकान वाला ऐसे लिफाफे खरीद लेता। सामने दुकानदार के बगल में ही एक लकडी की टाल थी। फोग की लकडियो की दुकान को हमारे यहां टाल कहा जाता है। पहले अधिकांश घरो में ईधन के रूप में फोग की लकडियो का ही प्रयोग होता था। उस टाल पर एक युवा लड्का अशोक बैठा रहता। केवल कच्‍छा पहने हुए बाकि सारे बदन पर कुछ नहीं होता था। सरदी और गरमी में वह ऐसे ही रहता था। उसके टाल के आगे से मै निकलता तो वो दो चार लिफाफे खींच लेता था। मेरे को बहुत गुस्‍सा आता था परन्‍तु वो मुझ से बडा था तो मै कुछ  कह नहीं पाता था।

शाम को नानाजी हिसाब करते । जितने भी पैसे आते वो सब हम बच्‍चो के गुल्‍लक में डाल दिये जाते। मै नानाजी को बताता कि वो टाल वाला लडका लिफाफे खींच लेता है। नानाजी कहते – वो बेवकूफ है। नंगा बैठा रहता। मैने कहा नानाजी वो ऐसा क्‍यों है। नानाजी बताते कि उसकी शादी नहीं हो रही है। क्‍योंकि वो लकडी की टाल पर बैठता है। इसीलिए वो पागलो जैसी हरकते करता है। तुम पर उस ध्‍यान नहीं दिया करो।

मै और मेरा भाई दोनो साईकिल पर रोज लिफाफे दुकानदारो को देने जाते और रोज वहीं टाल वाला लडका अशोक लिफाफे खींच लेता। वो लिफाफे उसके कुछ काम नहीं आते क्‍योंकि लकडिया तो लिफाफो में तोलकर दी नहीं जा सकती परन्‍तु छेडखानी के हिसाब से वो यह सब करता। हमे तो नानाजी ने समझाया हुआ था कि हमे उससे उलझना नहीं है। इसलिए हम कभी दो चार लिफाफे खींच लेने पर विरोध नहीं करते और आगे निकल जाते। ऐसे ही हमारी गरमियों की छुटिटयां बीत गयी। आज छुटिटयों का अंतिम दिन था। हमारे लिफाफे बेचने का भी अंतिम दिन था। आज हम साईकिल लेकर दुकानो पर लिफाफे देते हुए निकल रहे थे। लकडियो की टाल पर आज किसी ने लिफाफे नहीं खींचे। हमने मुडकर देखा। अशोक कपडे पहने हुए मुंह चिकना किए हुए बैठे मुस्‍कुरा रहा था। हम आश्‍चर्य करते हुए निकल गये। आश्‍चर्य इसलिए हुआ कि पूरे महीने उसने लिफाफे खींचे और आज उसने कुछ नहीं किया।

शाम को नानाजी को बताया। नानाजी ने भी आश्‍चर्य किया। नानाजी को भी चैन नहीं था। उन्‍होने बाहर निकल कर पडोसी दुकानदार से पूछा तो उसने बताया बाउजी । खुशी की बात है। अशोक की शादी तय हो गयी है। इसीलिए वो सीधा बनकर बैठा है। नानाजी ने अंदर आकर कहा – अपने तो छुटिटया खत्‍म हो गयी। पर कोई बात नहीं अशोक की तो शादी तय हो गयी। हम भी उठकर चले गये और अपनी किताबे बस्‍ते तैयार करने लग गये।

 

--------------

Sunday, May 29, 2022

रेत की छुअन

मैदानी इलाको में गरमी बहुत तेज पडती है। भीषण गरमी में मैदानी ईलाको के लोग ठंडे स्‍थानो की ओर घूमने निकल जाते है। खासकर रेगिस्‍तानी इलाको के लोग भीषण गरमी से राहत पाने के लिए पहाडो की ओर जाते है। ऐसे मौसम में यदि बर्फ मिल जाये तो सोने पे सुहागा हो जाय। वहां बर्फ की छुअन रेगिस्‍तान की गरमी को कुछ क्षणो के लिए भुला देती है। वहां पहाडो पर गिरी हुई बर्फ को उठाकर एक दूसरे पर मारते है तो उसकी छुअन देह की सारी गरमी को सोख लेती है। ऐसे कोमल अहसास के लिए ही रेगस्तिानी लोग पहाडो का रूख करते है। रेगिस्‍तान में गांवो में आप जाकर देखो तो आपको पीले पीले टीले ही नजर आते है और गरमीयो की धूप में तो सोने जैसे चमकते है। आपको चारो ओर रेत के टीले ही टीले दिखते है और कहीं भी कोई पेड पौधा नहीं। आपको कहीं पेड दिखेगा भी तो खेजडी का। दूर दूर तक जहां तक आपकी नजर जाती है रेत के टीले ही टीले दिखाई देते है। गरमीयो की तपती धूप में इन टीलो पर आपको पानी जैसी भ्रमजाल वाली आक़ति दिखाई देती है। जिसे देखकर प्‍यासे राहगीर को पानी का अहसास होता है परन्‍तु वह पानी होता नहीं है। रेत के टीलो में आपके पसीने से टपकने वाला ही पानी होता है और कहीं पानी नहीं होता है।

मैं गरमीयो के कई बार ऐसे टीलो के बीच गया हूं। मैं तपती दोपहर में शौक से टीलो पर नहीं गया बल्कि सरकारी काम से जाना पडा। सरकारी काम से एक तहसील से दूसरी तहसील जाते है तो आपको टीलो में से गुजरना होता है। एक यही कारण है जिससे मुझे भरी दोपहरी में कई बार इन टीलो में जाना पडा। एक बार मेरे मामा के मि्त्र मुझसे मिलने मेरे आफीस आये तो रेत के टीलो के बारे मे उनकी बात सुनकर मै दंग रह गया। वैसे तो उनका नाम जयशंकर था परन्‍तु प्रेम का नाम चौपाया था। चौपाया मामा ने बताया कि मै और मेरा भाई दोपहरी में नंगे पैर रोही में चले जाते है। रेगिस्‍तानी इलाको को गांव और शहर के बाहर के इलाके को रोही कहा जाता है जो प्राय जंगल होता है। मैने पूछ लिया दोपहर में आप रोही में क्‍या करते हो। उन्‍होने कहा कि हम दोनो नंगे पैर जाते है और टीलो पर जाकर लेट जाते है। तपती हुई धूप हमारी देह को छुती है तो हमे बडा आनंद आता है और हमारी देह विषाक्‍त किटाणुओ से मुक्‍त हो जाती है। गरमीयों में टीलो पर रेत इतनी गरम होती है कि आप पापड सेक सकते हो। ऐसी धूप में वे दोनो टीलो पर लेट जाते थे। उन्‍होने बताया कि जब धूप ढलने लगती तो हम घर को लौटते। मै जब चौपाया मामा के बारे में सोचता हूं तो मेरी आंखे आश्‍चर्य से फटी रह जाती । इतनी धूप में उनका बदन पूरी तरह सिक जाता होगा परन्‍तु उनके चेहरे और देह पर किसी जलन का चिन्‍ह दिखाई नहीं देता था। उनका चेहरा पूरी तरह लाल दिखाई देता था।

रेत की छुअन का अहसास तो मैने भी किया है परन्‍तु चौपाया मामा जैसा नहीं । रेत जैसे दिन में तपती है राज को उतनी ही जल्‍दी ठंडी हो जाती है। मै बचपन में एक बार अपने मोहल्‍ले के ताउजी के साथ बजरंग धोरा गया था। बरसात के बाद के दिन थे जब थोडी थोडी ठंड शुरू हो जाती है। वहां एक बडा सा टीला था। हम सभी मित्र वहां टीले पर खूब घूमे। बिना चप्‍पल हम रेत पर घूम रहे थे। ठंडी ठंडी छुअन हमे रोमांचित कर रही थी। इस छुअन को शब्‍दो में बयां नहीं किया जा सकता था। हमने एक बडा गडडा खोद एक मित्र को खडा कर उसमें रेत डाल दी। मित्र आधा रेत के अंदर था। ऐसा हम सभी ने बारी बारी से किया। रेत से भरे गढढे में रेत की छुअन पूरे बदन को कोमलता का अहसास देती थी। ऐसी छुअन बर्फ में भी नहीं होती है। भरी गरमीयों में रात को आपको रेत इतनी ही ठंडी मिलेगी। यहां जन्‍मे साहित्‍यकारो ने तो ठंडी रात में रेत के टीलो से दिखाई दे रहे चांद पर बहुत सारा काव्‍य लिखा है।

ठंड के दिनो में तो रात को रेत बर्फ जैसी ठंडी हो जाती है। उस पर नंगे पांव रखना भी मुश्‍किल हो जाता है। एक बार ठंड में मैं हमारे शहर के नजदीक पुनरासर धाम गया । वहां भी बहुत सारे रेत के टीले है। रात और सुबह तो वहां पैर रखा ही नहीं जा रहा था। जैसे ही धूप निकली रेत में गरमी आने लगी। सुबह की धूप मे हम सब टीलो पर लेट गये। ऐसा धूप सेवन मैने एक बार समुद्र के किनारे किया था। वहां लोग धूप में समुद्र के किनारे पर लेटे हुए थे। हम जब पुनरासर में लेटे हुए थे तो हम वो अहसास हो रहा था जो बिरलो को ही मिलता है। रेत ठंडी से गरम हो रही थी और उसकी छुअन हमारी देह में रोमांच पैदा कर रही थी। सुबह हम जब रेत के टीले पर लेटे हुए थे तो उस समय धूप कम थी तो टीले पर एक कीट जैसा जानवर गोबर के ढेले को लुढकाता हुआ ले जा रहा था। यह रेगिस्‍तान के टीलो में पाया जाता है। हम सब की नजरे उसी कीट पर थी। वो उसे लुढकाता हुआ टीले के उस पार ले गया। यह द़श्‍य कैमरे में कैद करने लायक था। हमने कैद भी किया। मै रेत की छुअन की वो याद हमेशा संजोये रखता हूं।

बचपन में तो रेत ही हमारी मित्र थी। उन दिनो शहर के गली मोहल्‍लो में सडके नहीं हुआ करती थी। घरो के आगे मोहल्‍लो में रेत ही रेत थी। टीले तो नहीं कह सकते परन्‍तु चलते थे तो रेत उडती थी। संडे वाले दिन हम सुबह से घर के आगे रेत में खेलते रहते थे। एक छोटा सा गढढा करके कंचे खेलते थे। खेलते हुए हमारे घुटनो से लेकर चेहरे तक मिटटी चिपक जाती थी। हमारे घुटनो पर कोई छोटी मोटी चोट लगती तो मां दवाई नहीं लगाती थी। कहती थी मिटटी लगाले ठीक हो जायेगी। रेत खेलते हुए मिटटी चोट पर गिरती और कुछ ही दिनो में चोट ठीक हो जाती। रेत से इतने सने हुए होते थे कि नहाते वक्‍त हमे साबुन की जरूरत ही नहीं पडती थी। हमे नहलाकर कमरे में बिठा दिया जाता और निर्देश दिया जाता कि अब कोई मिटटी में खेलने नहीं जायेगा। शाम को हम फिर मिटटी में खेलने चले जाते । मिटटी पर खेलते हुए घास से भी ज्‍यादा कोमलता का अहसास होता।

बचपन में तो जानबुझ कर रेत और मिटटी में खेलते थे परन्‍तु एक बार तो हम वैसे ही रेत में नहाये जा रहे थे। हमारे शहर मे एक बार पांच दिन तक लगातार धूल भरी आंधी आयी। आंधी ऐसी कि पांच दिन में एक क्षण के लिए भी नहीं रूकी। रात को छत्‍त पर सोते तो सुबह धूल से सने हुए होते। चाय भी हमे कमरो में छिपकर पीनी पडती थी ताकि चाय मे रेत न गिर जाये। नहाने के कुछ देर बाद ही हम सब रेत से सने हुए भूत जैसे दिखाई देते थे। बालो से लेकर चेहरे और कपडो में रेत ही रेत हो जाती थी। घर साफ करते थे तो झाडू से रेत हटते ही वापिस बिछ जाती। जहां झाडू नहीं लगाया वहां तो रेत के छोटे छोटे टीले बन गये। हम लोग ने उस आंधी को रोकने के लिए कई तरह के टोटके भी किए। किसी ने सुबह सुबह घर के आगे लोटे से पानी गिराया। हमारे पडोसी ने तो अपने छोटे बच्‍चे को नंगा करके छत्‍ पर घूमाया।  मंदिर के पुजारी जी ने बडे वाला शंख् शाम को बजाया परन्‍तु आंधी लगातार चलती रही। पांचवे दिन जब सुबह उठे तो हवा बंद थी तो सबने राहत की सांस ली।

रेगिस्‍तान में रेत की छुअन का अहसास रूमानी होता है। और किसी के लिए रेत परेशानी का सबब हो सकती है परन्‍तु यहां के लोगो के लिए तो वह संगिनी है। वो जीवन के साथ साथ चलती है। आप उसे लाख बुरा मान सकते हो परन्‍तु आप उसकी उपेक्षा नहीं कर सकते हो। वो आपको अपनी उपस्थिती का अहसास कराती रहेगी।   

--------