Sunday, January 2, 2022

साल का पहला दिन


 आज एक लंबे अरसे बाद ब्लॉग लिख रहा हूं.पिछले साल मैने बहुत कम किताबे पढ़ी. जब मै पढ़ नही पाता हूं तो लिख ही नही पाता हूं परन्तु जब से व्लॉग शुरू किया है. ब्लॉग लिखने का मन हो गया है. साल के पहले दिन सहकर्मियों के साथ नये साल की पार्टी मे शामिल हुआ. पार्टी मे पूराने और नये साथियो से मुलाकात हुई. कुछ यादे ताजा हुई.

आफिसो मे भी और बाहर भी लोगो मे एक चीज कॉमन होती है. उनके वोकल होने और न होने की विशेषता.  पार्टी मे कुछ लोग बहुत वोकल थे. खुलकर अपने विचार लोगो से शेयर कर रहे थे और कुछ लोग कम वोकल थे. वे अपने विचार अपने निजात साथियो के साथ ही शेयर कर रहे थे. आप एक बड़ी पार्टी मे इस प्रकार लोगों को आसानी के साथ आप दो भागों मे बांट सकते है परन्तु इन दो प्रकार के लोगो मे एक चीज सामान्य थी. एक दूसरे के प्रति सहयोग और प्रेम जो सबको एक दूसरे से बांधे रखता है. पार्टी मे सर्दीयो वाला सदाबहार खाना था जिसका जमकर लुत्फ उठाया गया. गाने के शौकिन कार्मिको ने गाने गाकर गला साफ किया.
पार्टी समाप्त होते ही हम चार पांच साथी श्री पूनरासर धाम के दर्शन के लिए निकल गये. रास्ते मे सोच रहे थे कि कोरोना के चलते दर्शन होगे या नही. रास्ते मे आने वाले सरसो के खेत मन मोह रहे थे. हमने तय किया लौटते वक्त इन खेतो मे फोटो शूट करेगे. पूनरासर धाम पहुंचने पर देखा कि यहां तो खूब भीड़ थी. लोगो नये साल के पहले दिन बाबे के दर्शन को आये हुए थे. साथी विवेक ने जगह देखकर गाड़ी पार्क की. मंदिर मे भी भीड़ थी. हम भीड़ मे पीछे काफी देर खड़े रहे. भीड़ सरक ही नही रही थी. काफी देर बाद भीड़ सरकने लगी तो हमने बाबा के और जोत के दर्शन किए. दर्शन के बाद चाय पी और पूनरासर धाम से निकल लिए.

लौटते वक्त पहले अंजनी माता मंदिर दर्शन करने गये. भीड़ यहां भी कम नही थी. बहुत खूबसूरत मंदिर है. यहां काफी देर तक फोटोग्राफी करते रहे. 

अब शाम हो रही थी तो घर के लिए रवाना हो गये. रास्ते मे पीले फूलों के लहलहाते सरसो के खेत मे फोटोशूट के लिए रूके. खेत के मालिक की अनुमति के बाद एक अच्छे से खेत मे गये. सरसों का पीला पीला खेत देखकर डीडीएलजे फिल्म की यादे ताजा हो गयी. पीले फूलों के बीच शाहरुख और काजोल दौड़ते कल्पना मे नजर आ रहे थे. हम सब ने जमकर फोटोग्राफी की. सब ने दिल खोलकर अलग अलग पोज मे फोटो खिंचवाई. 

अब धूप हल्की हो रही थी. अब हमने चलने का निश्चय किया, अंधेरा होने से पहले हम लोग घर पहुंच गये. नये साल का पहला दिन पूरी तरीके से मस्ती भरा रहा.

Saturday, June 5, 2021

गौरेया






मेरे को बागवानी का शौक है. इस शौक को पूरा करने के लिए मै किसी बगीचे मे नही जाता. किसी बगीचे मे क्या मै कही नही जाता. मेरे घर के आगे भी खाली जमीन नही है जहां मै अपना यह शौक पूरा कर सकूँ. फिर भी शौक है और शौक है तो कहीं न कही पूरा होता ही है. मैने अपना शौक पूरा करने के लिए गमले मे पौधे लगा रखे है. अपनी छत्त पर मैने नर्सरी बना रखी है. नर्सरी का आप इसे पूरा बगीचा ही समझिए. मैने बहुत सारे पौधे गमलो मे लगा रखे है. मेरे पास तुलसी के तीन चार पौधे है. एक गमले मे तो तुलसी घनी लगी है बाकि दोनो पौधो मे घनी नही तो कम भी नही है. एक मीठे नीम का  पौधा है जो छोटा पेड़ लग रहा है. इसमे से हम सब्जी मे डालने के लिए पत्ते तोड़ भी लेते है. एक पौधा केले का भी है. यह केले लगने जितना बड़ा तो नही है परन्तु मेरे बगीचे की शोभा इसी पौधे से है. एक गुलाब का पौधा है परन्तु इस पर एक बार भी गुलाब नही लगे हालांकि इसके पत्ते हमेशा हरे रहते है. मेरे बगीचे मे फूल गेंदे मे लगते है. मेरे पास तीन चार गेंदे के पौधे है. उनमे अच्छे अच्छे फूल आते है. ये गेंदे के फूल ही मेरे बगीचे की शान है.

बागवानी का शौक कोई आसान शौक नही है. पौधो की देखभाल बच्चो की तरह करनी पड़ती है. रोज सुबह उठकर मै सभी पौधो मे पानी देता. तेज गर्मी मे तेज धूप आने पर उनको मै उठाकर छाया मे रखता. उनकी निराई गुड़ाई भी समय पर करता. मेरे पौधो पर पंछी नही आते थे पर एक तितली जरूर आती थी. सुनहरे रंग की तितली आकर गेंदे के फूलो पर बैठती तो बहुत मन भाति. यह तितली मेरे छोटे से बगीचे का गहना थी. वो एक फूल से दूसरे फूल पर घूमती रहती. मुझे अच्छे पंछीयों की भी आस थी परन्तु कोई पक्षी मेरे गमलो वाले बगीचे मे नही आता. एक बार सुबह की बात है कुछ गौरेया मेरे पौधो पर बैठी थी. मै तीन चार गौरया देखकर बहुत खुश हुआ. मै इनके नजदीक गया  तो वे उड़ गयी बस एक को छोड़कर. एक गौरया मीठे नीम के पौधे पर बैठी रही. ऐसे लगा जैसे वो मेरे कौ जानती है परन्तु ज्यादा नजदीक जाने पर वह उड़ गयी. अब वो रोज सूबह आकर नीम के पौधे पर बैठ जाती. उसकी मिठी चहचहाट मेरे बगीचे  की आवज बनती. मुझे उसकी चहचहाट बहुत पसंद आती. फिर मै उसके लिए दाने भी लाने लगा. वो दाने चुभती फिर उड़ जाती. धीरे धीरे वो मेरी मित्र बन गयी. सर्दियो मे जब सुबह मै धूप मे अखबार पढ़ता तो वह मेरे कंधे पर आकर बैठ जाती. मै अखबार पढ़ता रहता वो मेरे कंधे पर बैठी रहती. कंधे पर बैठे वो चहकती तो मुझे और अच्छा लगता. वो भी रोज नियम से आती. उसने एक दिन भी आने मे चूक नही की. एक दिन मै हमेशा की तरह धूप मे अखबार पढ़ रहा था और वो मेरे कंधे पर बैठी थी. वो मेरे कंधे पर बैठी जोर जोर से चहकने लगी. मुझे अजीब सा लगा मैने गर्दन घुमाकर गौरेया को देखा. वो मेरे कंधे पर आगे पीछे हो रही थी. फिर मैने सामने की दीवार पर देखा तो बिल्ली बैठी थी

 मैने बिली को भगा दिया.गौरेया की चहचहाट फिर रिदम मे आ गयी. बिल्ली  अब कहां पीछा छोड़ने वाली थी. वो रोज आती मै उसे भगा देता. इससे गौरेया का विश्वास बढ़ जाता. एक दो बार मैने उसे गमले के नजदीक से भगाया. अब गौरेया बिल्ली से बेफिक्र हो गयी. उसे विश्वास हो गया कि अब जब भी बिल्ली आयेगी मै उसे भगा दूंगा. एक दिन सुबह धूप मे बैठा मै अखबार पढ़ रहा था. गौरेया नीम के पौधे पर बैठी चहक रही थी. मै अखबार पढ़ता बीच मे उसे देख लेता. आज बिल्ली भी दिख नही रही थी इसीलिए आज गौरेया बेफिक्र से चहक रही थी. वो उड़कर मेरे कंधे की ओर आ रही थी. कही पीछे बिल्ली उछलते हुवे निकली. गौरेया को मेरे कंधे पर पहुंचने से पूर्व ही उसने गौरेया को अपने मुंह मे दबोच लिया और भाग गयी. मै अवाक सा देखता रहा. मै कुछ देर आंखे फाड़े हुए स्थिर रहा

 कुछ क्षण स्थिर रहने के बाद मैने गमलो की ओर देखा. तितली गेंदो के फूलो पर मंडरा रही थी. अब वो ही मेरी उम्मीद की किरण थी.

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Wednesday, April 21, 2021

कल रात की बारिश





रात को बारिश हुई थी. मौसम गरमी का है और इस समय बारिश होना  प्रकृति का सरप्राईज है. रात की बारिश के बाद सुबह भी धुली हुई है. सब कुछ धुला हुआ लग रहा है. सुबह छत्त पर गया और धुली हुई सुबह मे दोनो हाथ फैलाकर अंगड़ाई ली. चारो और सब कुछ ताजगी भरा लग रहा था. घर पर अभी कंस्ट्रक्शन का काम चल रहा है. छत्त पर दो कमरे बनवाये है  तो नयी छत्त पर ताजी हवा का आनंद लिया. ऐसी सुबह पौधे भी नयी उर्जा मे दिखाई देते है. मुझे हमेशा से ही पौधे लगाने और उनकी देखभाल करने का शौक है. बचपन का एक किस्सा मेरे को याद है

मै जब प्राथमिक कक्षाओं का विध्यार्थी था. ऐसा ही मौसम था. मै स्कूल नही गया था. बादलो भरे आकाश के नीचे मै दिन भर घुमता रहा. घर के सामने खुले मैदान की तरह  खाली जमीन थी. अभी की तरह उस समय सड़के नही हुआ करती थी. मै घर के आगे मैदान मे अकेला घुमता रहा क्योकि सभी स्कूल गये हुए थे. दीदी भी स्कूल गयी हुई थी
मेरे पड़ोस मे दीदी रहा करती थी. वो मेरे से दो क्लास आगे  थी. मुझे वो पढ़ाती थी. मै दुनिया भर के सवाल दीदी से पूछता था. वो बता भी देती थी. वो मेरे सवालो पर कभी परेशान नही होती थी बल्कि मेरे अटपटे सवालो मे मुस्कुरा देती थी. मै हर बात उसे बताता था. मेरे को बचपन से ही बागवानी का शौक था. मैने घर के पास ही टमाटर के बीज डाल दिये थे मै उसमे रोज पानी देता परन्तु उसमे कोंपले नही निकल नही रही थी. मै दीदी से पूछता तो दीदी कहती तुम पानी डालते रहो. एक दिन जरूर कोंपले निकलेगी. तुम अपना काम करते रहो. मैने कोपले निकलने की उम्मीद छोड़ दी थी परन्तु दीदी ने कहा था पानी डालते रहना इसलिए मै पानी डालता रहा.  ठंडे मौसम मे घर के आगे घूमते हुए मैने देखा कि मेरे टमाटर के बीजो मे कोंपले निकल गयी है. मै आल्हादित हो गया. मुझे इतनी खुशी मिली कि उसका कोई ठिकाना नही रहा. मैने सबसे पहले पौधे को सुरक्षित किया. उसके चारो ओर पत्थर लगा दिये और ऊपर जाली लगा दी. फिर घर की देहरी पर बैठ गया और दीदी का इंतजार करने लगा. सबसे पहले यह खुशी मुझे दीदी से साझा करनी थी

मैने किसी को नही बताया था. इतनी बड़ी खुशी मै सबसे पहले दीदी को ही बताना चाहता था. स्कूल की छुट्टी होने मे अभी समय था. मेरे मन मे इतनी उत्सुकता थी कि मैने खाना ही नही खाया था. मुझे सबसे पहले दीदी से यह बात शेयर करनी थी. घड़ी मे एक बज रहा था. स्कूल की छुट्टी का समय हो गया था मै देहरी से उठकर रास्ते मे थोड़ा आगे तक चला गया. दूर से दीदी आती दिखायी दी
मै दौड़ता हुआ दीदी के पास गया. दीदी अपनी सहेली से बात कर रही थी. मेरी बात पर गौर नहीं कर नहीं रही थी. मै दीदी के साथ साथ चलता रहा. फिर मै दीदी को खींच कर मेरे घर के पास ले गया. मैने दीदी को कहा कि दीदी  तुमने कहा था कि कोंपल जरूर आयेगी देखो ये आ गयी. दीदी ने दो कोंपले देखी और मेरी तरफ देखकर मुस्कुरा दी. मुझे दीदी की मुस्कुराहट कोंपले फुटने जैसी लगी. आज भी मुझे दीदी की वो मुस्कुराहट याद है.


आज छत्त पर पौधो के गहरे हरे रंग से मुझे यह किस्सा याद आ गया. मैने छत्त पर हरी मिर्च, टमाटर, गिलोय, केला, पालक, तुलसी, गेंदा के पौधे लगे है. मिर्च के पौधे मे फल निकलने लगे है. मेरा बच्चा उस मे से उत्सुकता से मिर्च निकलते हुए देखना चाहता है. टमाटर के पौधे मे अभी फल आये नही है. गिलोय पिछले साल तो बढ़ी नही थी. इस बार तेजी से बढ़ रही है. अब तक एक हाथ लंबी हो चुकी है. गेंदे के पौधे मे फूल आ गये है. आज ठंडी सुबह मे हरे पौधो के बीच फूल मेरे बगीचे की शोभा बढ़ा रहे है. अब कारीगरों के आने का समय आ रहा है. मै नीचे चलता हुं.

Saturday, January 2, 2021

रस्किन बाण्ड की डायरी

जब मै छोटा था तो मेरी आया मुझ से कहा करती थी कि यदि तुम ज्यादा जोर से हंसोगे तो तुम्हारा सिर पीछे गिर जायेगा. इसका परिणाम यह हुआ कि मै हंसते हुए कभी भी मै अपना सिर ज्यादा पीछे नही करता.

हम पिछले नौ महीने से अपने मुंह पर जो मास्क पहन रहे है उसकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि यदि कोई मुस्कुरा रहा है, खीझ रहा है या दांत पीस रहा है तो हम पहचान नही पाते है. मुझे मेरे बैंक मेनेजर ने बुलवाया तो मैने उनका मास्क देखकर कहा आप बैंक लुटेरे लग रहे हो तो वे इतना जोर से हंसे कि मास्क लगभग निगल गये हो.

इन दिनो खुशी आगे होल्ड है क्योकि छोटे व्यापार संघर्ष कर रहे है. बहुत से लोगो की नौकरी चली गयी. विमान जमीन पर पड़े है. प्रवासी श्रमिक और उनके परिवार भूखे मर रहे है. यात्राएं स्थिर है.  हमे कहा जाता है चीजे जल्दी अच्छी होगी और हम आशा और विश्वास के साथ चलते रहते है.

लेखक के रूप मे मै भाग्यशाली हूं. सामाजिक कार्य और पार्टी के लिए नही. मै अपनी संचय की हुई पुस्तको के साथ खुश हुं.  मै उनको पढ़ना भी चाह रहा हुं और कुछ को मैने दोबारा पढ़ा और इन्होने नीचे मेरे बैठने के कमरे को साहित्य का सुंदर मंदिर बना दिया है. मै इस प्रिंट ऋण के पीछे आश्रय लेना चाहता हुं. मेरी लिखने की डेस्क पर समय बिताने से पूर्व दो तीन घंटे इनके साथ बताकर खुश होता हूं.

और क्या मै कुछ भी लिख लेता हुं? 

प्रकाशक भले ही धीमे पड़ गये है लेकिन यह अधीर लेखक पूरी स्पीड मे है. आखिरकार यह लेखक 86 का हो गया है और कुछ नयी कहानियां, किस्से बड़े या छोटे लूटना चाहता हुंआसमान की सबसे बड़े पुस्तकालय को ज्वाईन करने से पहले.

ये कहानियां कहां से आती है? सपनो  से, कभी कभी. और मै महसूस करता हुं कि  इस एट होम पीरियड मे मैने सामान्य से ज्यादा सपने देखे. ताजे सपने जो कुछ समय मेरे साथ रहते है. इसलिए मै उन्हे अपनी सपनो की नोट बुक मे लिख लेता हुंहुं और कभी कभी कहानियों मे बदल जाते है. इस साल लिखी दो कहानियां मेरे सपनो पर आधारित है.  दूसरी कहानियां पक्षियो और जानवरो से मिलने का परिणाम है. एक उल्लू ने मेरे कमरे मे अपना निवास बना लिया हैऔर उसके पास कहने के लिए किस्से है. मेरे एक पौधे मे एक कीड़े ने शरण ली है. वह देर रात को आवाज करना शुरू करता है. मै गौर नही करता हुं परन्तु साथी के रूप मे अच्छा है.

परन्तु मै अकेला नही हुं.  मेरी और परवाह करने वाला परिवार है जो मेरे पर नजर रखता है परन्तु जब भी मै अकेला रहना चाहता हूं, मेरी किताबो और नैटपैड के साथ अकेला छोड़ देते है तथा मेरे कमरे के एकांत मे जहां से खिड़की से पहाड़ और घाटिया दिखाई देती है. 

यही वो चीजे है जिन्होने मुझे इन महीनो मे जाने से रोका है.

प्रत्येक व्यक्ति को खिड़की की जरूरत होती है. कोई भी बंद रहना पसंद नही करता हैहै और एक लेखक के लिए तो खिड़की पसंद है.  इस मे से रेल्वे यार्ड, बसे और व्यस्त गलियां दिखने के बाद भी. यह आपको बाकि दुनिया से जुड़ा रहने का अहसास देती है,  टुटी हुई दुनिया होने के बावजूद.


मेरी खिड़की बादलो और आसमान पर खुलती है और क ई बार तो बादल कमरे मे घुस आते है. मै छ: बजे उठ जाता हुं ,  पहाड़ो पर भोर को होते हुए देखने के लिए. सुदुर क्षितिज पर गुलाबी अनारी रंग फैला हुआ है, वह यही है. धीरे धीरे यह लुप्त होने लगता है और सूरज के आने से पहले एक अंतराल होता है. यह दिन का सबसे शानदार क्षण होता है जब अपनी पूरी चमक के साथ आता है, वास्तव मे मेमेरी खिड़की से आता है और पूरे कमरे को जगमग कर देता है.्, इस तरह से इन सर्दियो मे स्वागत करता है.


मेरी खिड़की से मै देखता हुं कि मेरे दांये घाटी से निकलती हुए छोटी नदियां गंगा मे मिलती है.् और मेरे बांये नदियां यमुना मे मिलती है. यह पूर्ण वाटरमैन है. इसमे कुछ महत्वपूर्ण होना चाहिए. यह मेरे लिए होता है. इसने मेरे जीवन के 50 वर्षो से अब तक बनाये रखा है.् और शायद मेरे लिए कुछ और सालो तक सूर्योदय देखने के बनाये रखेगा.

दरवाजे पर आहट हुई. फिनलैण्ड से एक आदमी मुझ से मिलने आया है. वह प्रकाशक है और मुझ से कुछ कहानियां चाहता है. जैसे कोई उन्हे मांग नही रह था वो मैने अपनी कहानियां और लिखे हुए सपने उसे दे दिये. उसने एडवांस के तौर मुझे एक चैक दिया. उसने मेरी कहानियां ली और उसे अपने बड़े बैग मे रखा,  मुझे क्रिसमिस और नये साल की बधाई दी और हु हु हु कहते हुए चला गया.


मैने चैक को देखा. यह सांता क्लॉज़ द्वारा साईन किया हुआ था. अच्छा ! मै सपना देख सकता हुं. क्या नही देख सकता? 

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Wednesday, November 25, 2020

लिच्छा



 
कोलकत्ता नाम का कोई रेल्वे स्टेशन नही है. कोलकत्ता जाने वाली ट्रेन हावड़ा स्टेशन पर जाकर रूकती है. हावड़ा से पहले एक स्टेशन आता है लिलुआ. हावड़ा जाते वक्त हमेशा मै लिलुआ को खिड़की से ही देखता था. लिलुआ मे कभी गाड़ी नही रूकती थी. टैन मे साथी यात्री बताते है कि लिलुआ आने के लिए आपको पहले हावड़ा उतरना होगा ओर फिर वहां से लोकल मे लिलुआ आना होगा. मुझे इस मित्र के घर फंक्शन मे लिलुआ जाना था. हावड़ा की टेन मे लिलुआ स्टेशन आया तो बीच मे बड़ा मन हुआ उतरने का पर गाड़ी कहां रुकने वाली थी. गाड़ी तो सीधे हावड़ा जाकर रूकी. हावड़ा स्टेशन से  लोकल मे बैठकर हम लिलुआ आये.

लिलुआ एक छोटा सा जंक्शन है. दो प्लेट फार्म है और एक पुल. मै सामान लेकर पटरियों के ऊपर से आ गया बाकि लोग पुल से नीचे आये. लिलुहा दो भागो मे बंटा हुआ है. स्टेशन के एक तरफ बहुत बड़ा शहर और दूसरी तरफ एक कस्बा. मेरे मित्र  का मकान कस्बे मे था. हम लोग रिक्शा करके मित्र के घर पहुंचे.  मित्र का घर बाजार से थोड़ा दूर था. एक लंबी अंधेरी गली के बाद  मित्र का घर था. हम लोग शाम को पहुंचे थे. 

फंक्शन दो दिन बाद था. रात को बातो की महफिल सजी. देर रात तक मतलब अगले दिन की भोर तक बाते और हंसी मजाक चलती रही. दूसरे दिन शाम को चार बजे नींद से उठे.

मित्र फंक्शन की तैयारी मे व्यस्त था. मित्र का भाई वरूण मेरे साथ था. शाम को वरूण के साथ बाजार घूमने निकला. छोटा कस्बा था इसलिए दुकाने भी छोटी थी. कोई बड़ा शो रूम नही था. वरूण के साथ पैदल चलते चलते स्टेशन तक आ गये. स्टेशन के नजदीक ही एक इडली डोसा का ठेला था. ठेले पर भीड़ बहुत थी जो बता रही थी कि इसका इडली डोस बहुत फेमस है.  हम लोगो ने भी वहां इडली डोसा लिया. इतने स्वादिष्ट इडली बोले पहली बार खाये थे. भरपेट नाश्ता कर लिया था. कस्बा छोटा ही था इसलिए वही से वापिस लौट लिये. रात को भी दुकाने ज्यादा देर तक खुली नही रहती. हम लौट रहे थे तब तक दुकाने बंद होने लगी थी. भेल मुड़ी, फल सब्जी और चाय के ठेले वाले खड़े थे. 

हम घर की तरफ लौट रहे थे. एक बच्ची ने सड़क के बीच मे आकर रास्ता रोक लिया. वह बच्ची बारह तेरह बरस की रही होगी. टी शर्ट और लंबा स्कर्ट पहने थी. बहुत मीठी आवाज मे बोल रही थी.कह रही थी हमारी भेल मुड़ी खाकर जाइये. एक बार खाओगे बार बार खाओगे. लिलुहा की प्रसिद्ध मुड़ी से तैयार भेल मुड़ी. हाथ मे भेल मुड़ी की प्लेट लिए वो मनुहार कर रही थी. हम लोग भरपेट इडली डोसा खाकर आये थे. हम लोगो की भेल मुड़ी खाने की कोई इच्छा नही थी. वो बच्ची बार बार मनुहार कर रही थी. मनुहार करते वक्त वो मुस्कुराती तो उसके गालो मे डिंपल पड़ जाते.  उस बच्ची की किशोरवय मासूमियत देखकर मुझ से रहा नही गया. वरूण के साथ उसके ठेले पर गये. भेल मुड़ी उस बच्ची का बापू बना रहा था. भेल मुड़ी वाकई बहुत स्वादिष्ट थी. ईच्छा नही होने पर भी हमने एक प्लेट खा ली. मैने इतनी स्वादिष्ट भेल मुड़ी कभी खायी नही थी. हम वहां से निकल लिये वो बच्ची फिर से सड़क पर लोगो की मनुहार कर रही थी.

वरूण ने कोलकत्ता घूमने को कहा था परन्तु मेरा मन इस कस्बे मे लग गया था. यहां घूमने को खास नही था परन्तु यहां के लोग प्यारे थे. मित्र और उसका भाई फंक्शन की तैयारी करते तो हम लोग भेल मुड़ी खाने निकल जाते.  उसी ठेले पर. उस बच्ची के ठेले पर. हम लोग ठेले के नजदीक रखी बैंच पर बैठ जाते. वो बच्ची हमारे लिए भेल मुड़ी लाती. मैने उस बच्ची से नाम पूछा. उसने अपना नाम लिच्छा  बताया. लिच्छा मुस्कुराते हुए बहुत प्रेम से भेल मुड़ी खिलाती. लिच्छा के मासूमियत भरे प्रेम से भेल मुड़ी और स्वादिष्ट हो जाती. भेल मुड़ी खाने के बाद हम पैदल घूमते हुए स्टेशन तक निकल जाते. स्टेशन के पास ही एक सिनेमा हाल था. सिनेमा हाल मे कोई ज्यादा भीड़ नही होती थी. सिनेमा हाल के बाहर भी चाय और गोलगप्पो के ठेले लगे होते थे.

दो दिन हो गये थे लिलुहा आये हुए. दो दिन मे क ई बार लिच्छा के ठेले पर हो आया था.कल मित्र का फंक्शन था. तैयारियों जोरो पर थी. मै भी तैयारियो मे हाथ बंटा रहा था. जिस भवन मे कार्यक्रम होना था उसके ठीक सामने ही लिच्छा का ठेला था. जब भी खाली होता लिच्छा के ठेले पर बैठ जाता. लिच्छा और उसके बापू से बाते करता रहता. उसके बापू ने बताया कि लिच्छा स्कूल नही जाती. उनके यहां लड़कियो को स्कूल नही भेजते. लिच्छा उसकी ठेले पर बहुत मदद करती है.

आज फंक्शन था. सुबह से ही बहुत काम था. शाम को खाना था. कोलकत्ता से काफी मेहमान आने वाले थे. बहुत बड़ा शामियाना लगाया गया था. शामियाने को सजाया जा रहा था. जब तक शामियाने को सजाया जा रहा था, मै भवन के बाहर खड़ा था. बाहर लिच्छा खड़ी थी. लोगो की मनुहार कर रही थी. इस समय सड़क पर भीड़ नही थी. यहां दोपहर मे सड़क सुनी हो जाती थी. यहां दोपहर मे सारी दुकाने बंद हो जाती है. कभी कोई सड़क पर आदमी दिखता तो लिच्छा सड़क पर आ जाती. अभी सड़क पर कोई नही था. वो मेरी ओर आयी. मनुहार के लिए हाथ उठाकर रोककर दिए. मैने पूछा- आज मेरी मनुहार नही करोगी.

बाउजी आप तो रोज आते हो. लिच्छा ने कहा.

मैने पूछा - तुम नही खाती हो भेल मुड़ी.

मुझे पसंद नही.

तुम्हे क्या पसंद है.

मुझे तो चकलेट पसंद है बड़ी वाली.

खायी हुई है बड़ी वाली चाकलेट.

हां भाई की शादी मे खायी थी.

भाई अब कहां रहता है.

वो बताने लगी तब तक बापू ने आवाज दे दी. वो ठेले पर चली गयी. मै भी शामियाने की तैयारी देखने भवन मे चला गया. 

शाम को फंक्शन था. कोलकत्ता से काफी मेहमान आये. मेरे मित्र ने मुझे सबसे मिलवाया. मित्र ने खाने मे खास बंगाली मिठाईयां बनवायी. मधुर संगीत के साथ हमने फंक्शन का आनंद लिया.

अभी तीन चार दिन मे लिलुहा मे ही था.  मित्र के साथ कोलकत्ता घूमने चला गया. दो दिन कोलकत्ता मे ही बिताये थे. कोलकत्ता मे खूब चीजे खायी परन्तु लिच्छा की भेल मुड़ी जैसा स्वाद कही नही था. यात्रा का एक दिन और था. भेल मुड़ी कानून के लिए जल्दी से हम लिलुहा आ गये. रात हो चुकी थी. अगले दिन शाम को रवानगी. अगले दिन सुबह भेल मुड़ी खाने के लिए निकला. सोचा कुछ मुड़ी घर के लिए भी ले लुंगा. फिर ख्याल आया कि आज निकल रहे है तो लिच्छा को कुछ गिफ्ट दे आऊं. कस्बे की दुकानो मे बड़ी वाली चाकलेट लेने गया लेकिन कही नही मिली. मित्र ने बताया कि वह चाकलेट स्टेशन के उस पार माल मे मिलेगी. मै मित्र के साथ स्टेशन के उस पार गया. स्टेशन के पार की दुनिया कस्बे की दूनिया से अलग थी. बाजारो मे भीड़. बड़े बड़े माल. मित्र मुझे यहां के प्रसिद्ध सुपीरीयर माल ले गया. यह माल बहुत आकर्षक था. मैने वहां कुछ फोटो भी खींचे. फिर चाकलेट सेक्शन से लिच्छा के लिए एक बड़ी चाकलेट ली. आज शाम की गाड़ी थी. इसलिए जल्दी निकलना था. हम जल्दी से माल से निकलकर स्टेशन आ गये. स्टेशन को पार कर वापिस कस्बे मे आ गये. मै जल्दी से लिच्छा की भेल मुड़ी खा लेना चाहता था. हम जल्दी जल्दी चलकर लिच्छा के ठेले तक आये. लेकिन यह क्या. वहां ठेला नही था. इधर उधर देखा ठेला कहीं नही था. पास की दुकान मे पूछा उसने बताय- दो दिन से ठेले वाला नही आ रहा है. कल उसकी बेटी लिच्छा की शादी थी.

मै हैरान था बच्ची की शादी? मैने फिर पूछा उस लड़की की कि जो उसके साथ ठेले पर काम करती थी. दूकानदार ने कहा - हां. 

उसकी हां ने मेरे पैर जमा दिये. ऐसा लगा हाथ मे पकड़ी हुई चाकलेट पिघल रही थी.

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Monday, August 31, 2020

किस्सा दरवाजे का

मेरा घर बहुत पूराना था. घर मे दो ही कमरे थे. एक आगे और एक पीछे. आगे वाला डड्रांईग रूम था. इसे स्टोर रूम या बैड रूम भी कह सकते थे. हम चार भाई बहिन थे. बड़ा वाला अपनी मस्ती मे इधर उधर घूमता रहता था. हमे लगता कि वो अपने बड़े होने का मजा ले रहा है. हम तीनो घर मे ही रहते थे. मै घर की देहरी पर झुककर बाहर की ओर देखता रहता. मेरी छोटी बहिन देहरी पर खड़े होकर बाहर की तरफ देखती रहती. क ई बार वो फिसलकर गिर जाती. फिर पास के अंकिल उसे उठाकर मां को दे देते. इसलिए मां जब भी खाना बनाती तो वो दरवाजा बंद कर देती. दरवाजा भी घर की तरह पूराना था. दरवाजे मे जगह जगह छेद थे. मां दरवाजा बंद करती तो हम बंद दरवाजे के पीछे बैठे रहते. यहां भी हम खेल कर लेते. दरवाजे के छेदो मे से सुबह सुबह सूर्य की रोशनी एक धार मे आती. सूरज की रोशनी मे हम क ई छोटे छोटे कीटाणुओं को देखते. कभी सूरज की रोशनी की धार मे अंगुली रखते कभी बहते हुए कीटाणुओं को देखते.
यह दरवाजा हमारे लिए हमेशा से ही खेलने का साधन रहा. यह हमारा साथी था. कभी सूर्य ग्रहण होता तो मां घर का दरवाजा बंद कर देती. पापा दफ्तर जाते थे. मां सूर्य ग्रहण के समय अंदर वाले कमरे मे बैठकर माला फेरती. बड़े वाला मां को चकमा देकर अपने दोस्तो के साथ निकल जाता. हम तीन भाई बहिन बंद दरवाजे के पीछे बैठ जाते. हमारे लिए वही दरवाजा खेल बन जाता. दरवाजे के छेद मे से सूर्य की परछाई पड़ती हम हथेली पर ग्रहण वाले सूर्य की परछाई देखते. इस तरह से उस दरवाजे के जरिये हम सूर्य ग्रहण देखते.
दोपहर मे घर मे हम बच्चे अकेले होते थे. पापा अपने दफ्तर मे और मां महराज जी की बेची मे सत्संग मे होती थी. फिर घर पर हम अकेले धमाचौकड़ी मचाते. दोपहर मे कभी कभार घर की मालकिन आती. हमारा घर किराये का था. मकान मालकिन आकर दरवाजे के बीच मे बैठ जाती. फिर हम बच्चो को डांटती रहती. हम बच्चे कोशिश करते कि वह जल्दी से चली जाये. एक दिन दोपहर मे हम छत्त पर खेल रहे थे. भाई ने दूर से ही देख लिया कि मकान मालकिन आ रही है. बड़े वाला भाई थोड़ा ज्यादा ऊधमी था. उसने दरवाजे के एक पल्ले को चूड़ी मे से निकाल कर बीच मे आडा पटक दिया. फिर हम छत्त पर खड़े है गये. बूढ़ी मालकिन लकड़ी के सहारे हमारे घर तक आयी. उसने आडे पड़े हुए दरवाजे के एक पल्ले को देखा और फिर ऊपर हमारी ओर देखा. फिर चली गयी. हम बहुत खुश हुए. भाई ने वापिस दरवाजे का पल्ला चूड़ी मे लगा दिया.
शाम को बाहर चौक मे खेलते वक्त देखा कि पापा घर के बाहर खड़े है. मैने नजदीक जाकर देखा. एक कारीगर बैठा लकड़ी छिल रहा था. मैने पाप से पूछा तह क्या हो रहा है? पापा ने बताया- मकां मालकिन हमारे लिए नया दरवाजा  लगवा रही है. मै उस कारीगर को काफी देर तक देखता रहा. वो बार बार दरवाजे का नाप लेता और फिर लकड़ी छिलने लग जाता. देर रात तक वह काम करता रहा. फिर मेरे को नींद आ गयी. सुबह उठते ही दौड़कर दरवाजे तक गया. अब नया दरवाजा लग गया था. उस दरवाजे मे कोई छेद नही था. मै दौड़कर छत्त पर गया. छत्त पर पुराना दरवाजा पड़ा था. उस दरवाजे को मैने ऊपर से नीचे तक देखा. फिर बंद दरवाजे के पीछे आकर बैठ गया. अब वहां कोई रोशनी नही थी.
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Sunday, August 2, 2020

अनामिका






    मै पहली बार कोलकत्ता जा रहा था। किसी महानगर की मेरी यह पहली यात्रा थी। मेरा सीए के एग्जाम का सेंटर था। पापा ने सेंटर कोलकत्ता का भर दिया था। कोलकत्ता मेरे दूर के रिश्ते के चाचाजी रहते है। पापा ने कहा कि एक महीने पहले चले जाना ओर एक महीने वही रूक कर तैयारी कर लेना। मन मे कोलकत्ता देखने का भी कौतुहल था।  पापा ने कोलकत्ता के बारे मे बहुत सी बाते बताई थी वो सब मेरे माथे मे थी। कहते है कि कोलकत्ता मे दिन तड़के चार बजे ही निकल आता है।इस बात को तो मै अब देख सकता था। गाड़ी तीसरे दिन सुबह 5 बजे हावड़ा स्टेशन पहुंचती है। ट्रेन हावड़ा के नजदीक थी। दिन निकल चुका था । खिड़की से खेतो मे सूरज की किरणे दिखाई दे रही थी। गाड़ी बिलकुल राईट टाईम पर स्टेशन पहुंच गयी थी। जैसा पापा ने कहा था स्टेशन पर बहुत भीड़ थी। प्लेटफार्म लोगो से ठसाठस भरा था। भीड़ मे मै भी अपना सूटकेस और बैग लेकर उतर गया। हावड़ा स्टेशन पर ही आप निजि गाड़ी ला सकते है। प्लेटफार्म के एक किनारे लोगो की निजि गाड़ियां खड़ी थी। लोग अपना सामान गाड़ियो मे रख रहे थे। मै भीड़ मे खड़ा चाचाजी के लड़के की राह देख रहा था। मेरा फोन भी डिस्चार्ज हो गया था। मै अपने कोच के सामने ही खड़ा था। महानगर के  नाम से ही मन मे थोड़ा डर भी था। सोच रहा था कि भाई नही पहुंचा तो मै क्या करूंगा। इसी उधेड़पन मे था कि भाई ने मुझे देख लिया। पहले हम दोनो गले मिले। भाई ने मेरा बैग उठाया और हम चलकर स्टेशन से बाहर आ गये। स्टेशन के बाहर भी बहुत भीड़ थी। हम लोग टेक्सी स्टेण्ड की ओर गये। भाई ने टैक्सी किराये की और हम टैक्सी मे बैठकर घर की ओर रवाना हो गये टैक्सी की खिडकी से मै शहर को देख रहा था। भाई मुझे बता रहा था। हमारी टैक्सी हावड़ा ब्रिज से निकली तो भाई ने बताया कि यह हावड़ा ब्रिज हे जो सबसे पूराना है और बिना किसी खंभे बना है। मै आश्चर्य से हावड़ा ब्रिज देखता रहा। जल्द ही हमारी टैक्सी एक सड़क के किनारे रुकी। टैक्सी से उतर कर हम एक गली मे गये। गली मे दोनो ओर गगनचुम्भी बिल्डिग्स थी। हमलोग इन बिल्डिंग्स को बाड़ी कहा करते है। गली मे एक बाड़ी मे गये। सुन रखा था बाड़ियो मे रहने के लिए छोटे छोटे कमरे होते है और पूरी बाड़ी मे एक दो ही टायलेट होते है। यह सोचकर मै डर रहा था। बाड़ी मे अंधेरा ही अंधेरा दिख रहा था।हम लोग सीढ़ियो से ऊपर चढ़ते रहे। सीढ़ियो मे एक बल्ब की मद्धम रोशनी आ रही थी। हर एक मंजिल पर लोग रह रहे थे। कोई खाना बना रहा था तो कोई कपड़े सूखा रहा था। हम बसे ऊपर चौथी मंजिल पर आ गये। यह बाड़ी की आखिरी मंजिल थी। यह खुली छत्त थी एक ओर एक लाईन मे पांच कमरे मे थे। यही चाचाजी का घर था। इस छत्त से चारो ओर बड़ी बिल्डिग्स दिखाई दे रही थी। मैने चाचा और चाची के पैर छुए। भाई ने मुझे मेरा कमरा बताया। कमरा इतना था कि उसमे मै केवल सो सकता था। यह जानकर खुशी हुई कि चाचा के स्वंय के टायलेट थे। पहले दिन मैने चाचा और चाची के साथ खूब बाते की। यहां जैसे सुबह जल्दी होती है वैसे ही रात भी जल्दी हो जाती है। मै रात को अपने कमरे मे लेट गया। तभी जोर से किसी लड़की के खिलखिला कर हंसने की आवाज आयी। मै बैठ गया। सामने देखा। एक कमरे मे एक लड़की खिलखिलाकर हंस रही है। मुझे बैठा देखकर भाई आ गया । भाई ने बताया कि ये अनामिका है। ये लड़की अपने भाई और मां के साथ सामने के कमरो मे रहती है। यह बात बात पर खिलखिलाती रहती है। यह विडो है। शादी के पहले ही साल...। कोई नही तुम सो जाओ। मै कुछ देर तक सामने के कमरे मे लड़की को देखता रहा । 
    सुबह आंख खुली तो सामने वही लड़की दिखाई दी और इस बार भी खिलखिला रही थी। मेरा आज कोलकत्ता मे पहला दिन था। मुझे पूरा एक महीना यहा रहना था। पहले दिन नाश्ते मे चाचाजी ने मेरे लिए कोलकत्ता की स्पेशल कचौरी मंगवायी। ये छोटी छोटी बिना मशाले की कचौरिया होती है जिसे आलू की सब्जी डालकर खायी जाती है। पहले दिन चाचा जी ने खाने के बराबर नाश्ता करवा दिया। भाई ने कहा दिनभर आराम करो शाम को घूमने चलेगे। चाचा और भाई दोनो काम पर चले गये। मै अपने कमरे मे। कमरे से दिख रहा था लड़की तैयार होकर अपने कमरे से बैग लेकर निकली। उसने आसमानी कलर की बंगाली साड़ी पहनी थी। अपनी मां को हाथ से बाय बाय करके निकल गयी। मै दिनभर सोता रहा। शाम को भाई जल्दी आ गया। दोनो तैयार होकर कोलकत्ता घूमने के लिए निकले। सीढ़ियो से उतर रहे थे तो सामने वाली लड़की ऊपर चढ़ रही थी। मेने उसकी और उसने मेरी ओर देखा । फिर दोनो आगे चल दिए. सड़क पर बहुत भीड़ थी जैसे लोगो का हुजुम कही जा रहा हो। भाइ ने बताया यहां तो रोज ऐसा ही होता है। सड़क के नीचे मैट्रो थी। सड़क के ऊपर दो पुल थे। दोनो पर ट्रेफिक था। सड़क पर सभी तरह के वाहन घल रहे ते ट्राम भी सड़क पर बिछी पटरियो पर दूसरे वाहनो की तरह ही चल रही थी। हम दोनो सड़क के किनारे खड़े थे। घण्टी बजाती हुई ट्राम आई। हम दोनो भाई ट्राम मे चढ़ गये। ट्रेन के एक कोच की तरह थी ट्राम। कंडक्टर आने पर भाई ने कह दिया दो विक्टोरिया। कंडक्टर ने दो टिकिट काट दिए। मै ट्राम की खिड़की मे से शहर देख रहा था। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे किसी गांव से मै बड़े शहर मे आ गया हुं। यह महानगर हर वक्त  दौड़ता रहता है। ट्राम से उतरकर  हम थोड़ी दूर तक पैदल चलकर विक्टोराया पहुंचे।  अ़ग्रेजो द्वारा बनाया गया यह रमणीय स्थल था। विक्टोरिया के अंदर जाकर देखने का समय समाप्त हो चुका था। अंदर पार्क मे रंगीन फव्वारे चल रहे थे। उसके किनारे गोलाई मे बेंचे लगी थी पूरे पार्क मे मद्धम रोशनी थी। लगभग हर बेंच पर लड़के व लड़कियां एक दूसरे के हाथ थामे बैठे थे। हमारे शहर मे ऐसे दृश्यो की कल्पना करना मुश्किल था। हम रंगीन फव्वारो को घूमकर देख रहे थे। एक जगह मे कुछ रूका ।भाई के पीछे देखने पर मै वापिस चल पड़ा। मुझे लगा कि कमरे के  सामने वाली लड़की किसी के साथ बेंच पर बैठी थी। परन्तु भाई के आने पर लगा वैसी ही कोई और लड़की होगी। फिर हम बाहर आ गये। बाहर क ई प्रकार के ठेले लगे थे। हम लोगो ने तरह की चीजे खायी। फिर हम लौट पड़े। आते वक्त हम टैक्सी से आये| घर पहुंचने तक हम थक गये |  मै सोने के लिए कमरे मे चला गया| कपड़े बदलकर लेटने लगा |सामने वाले कमरे मे से फिर खिलखिलाने की आवाज आई। मैने अपनी गर्दन ऊंची करके देखा। अनामिका अपना चेहरा ऊपर करके खिलखिला रही थी। पास में उसका भाई और मां बैठी थी। अनामिका के हाथ मे पानी का गिलास था। जिसका आधा पानी वह पी चुकी थी। हंंसते हुए पानी का गिलास लिये वस बाहर आयी। मेरे कमरे की ओर एक क्षण देखा और वापिस अपने कमरे मे चली गयी। मै कुछ देर अनामिका के बारे मे सोचता रहा । फिर नींद आ गयी।

    मैं यहां भी अपने शहर की तरह ही उठता। यह भूल जाता कि मै कोलकत्ता आया हुआ हूं और यहां दिन जल्दी निकलता है। आज नींद से जागा तब तक बहुत देर हो चुकी थी। चाचा जी और भाई काम के लिए निकल चुके थे। चाची जी घर पर थी। चाची जी ने चाय के लिए पूछा। मैने चाय के लिए हामी भर दी । मै कमरे से निकल कर छत्त के मुंडेर तक आ गया। अनामिका कपड़े सूखाने के लिए आई। उसने कपड़े सूखाते हुए टेढी नजर कर पूछा- घूमने आये हो।
    नही। परीक्षा देने।
    किसकी?
    सीए की।
    कब है।
    इस महीने के लास्ट मे।
    आप आज काम पर नही गयी?
    आज वीकली रेस्ट है। उसने अपने चेहरे पर आये बाल कान के पीछे करते हुए कहा।
    बाते होने लगी तो मैने पूछ ही लिया- आप ह़सती बहुत है।
    क्या आपको हंसने वाले लोग पसंद नही है।
    नही ऐसी बात नही है।
    तो फिर कैसी बात है।
    वो आप जोर........।
    वो मुस्कुराते हुए बोली- तो फिर आपको एसे भी पसंद नही। वैसे भी पसंद नही। कहते हुए खिलखिलती हुई अपने कमरो की तरफ चली गयी. कुछ देर उसे जाते हुए देखता रहा। चाची जी चाय ले आयी थी। मै चाय नाश्ता करने लग गया। दिनभर पढ़ता रहा कही नही गया।
    दो दिन तक मै कही नही गया। तीसरे दिन शाम को भाई मुझे बड़ा बाजार ले गया। हम बाड़ी से नीचे उतर कर सड़क पर आ गये थे। भाई ने एक हाथ रिक्शा वाले को रोका। दोनो रिक्शा मे बैठ गये। हाथ रिक्शा मे बैठने का मेरा पहला अनुभव था। रिक्शा वाला नंगे पांव रिक्शा लेकर दौड़ रहा था। रिक्शे मे एक घंटी लटक रही थी जो रिक्शा चलने पर बज रही थी। और भी रिक्शे दौड़ रहे थे जिस पर मोटे पतले सभी प्रकार के लोग बैठे थे। मुझे यह अमानवीय लग रहा था। पर यहां लोगो की आदत पड़ चुकी थी। बड़ा बाजार से थोड़ा पहले रिक्शा रोका। यहां से पैदल चले। बड़ा बाजार मारवाड़ी व्यापारियो का बाजार है। यहां रोज अरबो रूपयो कि व्यापार होता है। दोनो तरफ दुकानो के आगे फुट बने हुए है। फुट पर छोटे व्यापारी अपना सामान बेचते है। यहां भी बहुत भीड़ थी। यहां सामान थोड़ा सस्ता मिल जाता है। मैने क ई दुकानो से सामान खरीदा। एक जगह हम बैग देख रहे थे। वही से सड़क के उस पार अनामिका चश्मा लगाये हुए भेल मुड़ी खा रही थी। और बीच बीच मे खिलखिला कर हंस रही थी। साथ मे एक हम उम्र लड़का भी था। मै उसे देख ही रहा था कि भाई ने कहा- चलो। मै आगे चल पड़ा।  पीछे गर्दन घूमाकर अनामिका को देख रहा था।  वह भी गोलगप्पे खाते हुए ऊपर की ओर मुंह् करके हंस रही थी। भाई  आगे चल रहा था। भाई के थोड़ा आगे निकलने पर मै तेज चलकर उसके बराबर आ गया। भाई मुझे काली घाट ले गया। यहां बहुत भीड़ थी। लोगो मे जबरदस्त उत्साह था। बंगाली अपने परिवार के साथ आये हुवे थे। हम  दर्शन कर लौट गये। यहां से हम मेट्रो से घर आये । मैट्रो मे बैठने का मेरा पहला अनुभव था। मैट्रो क ई स्टेशनो पर रूकते रूकते चलती। एक स्टेशन पर अनामिका चढ़ी काला चश्मा लगाये हुवे । हमसे थोड़ी दूर की सीट पर बैठ गयी। बैग से मैबाईल निकालकर देखने लगी। मैने सोचा यहां उसके लिए हंसने का कोई बहाना नही है। उसके पास ही एक बच्चा बार बार उसके कंधे का सहारा लेकर खड़ा हो रहा था। वह उसकी तरफ देखकर मुस्कुराती और फिर मोबाईल देखने लग जाती। हमारी बाड़ी वाले स्टेशन पर मेट्रो रूकी। हम लोग उतर गये। भाई मुझे बड़ा बाजार ले गया। जहां पान की दुकान पर उसके दोस्तो का मजमा लगा था। दोस्तो के साथ देर तक गपशप करते रहे। रात को घर आ गये। अब मेरी परीक्षा भी नजदीक आने लगी थी। अब मै जोरशोर से परीक्षा मे जुट गया। पढ़ते वक्त रात को अनामिका की खिलखिलाहट उसके होने का अहसास कराती।  मै पूरी तरह पढ़ाई मे व्यस्त हो गया। दो दिन बाद ही परीक्षा थी परन्तु उसकी खिलखिलाह का ख्याल रहता। आज खिलखिलाट की आवाज आयी नही। परीक्षा नजदीक होने के कारण बाहर जाकर पत्ता करने की फूर्सत नही थी। दूसरे दिन भी आवाज नही आयी तो बाहर की तरफ देखा। वो  आपस मे बातचीत कर रहे थे। कल परीक्षा थी। चाचा ने परीक्षा के बाद रूकने को कहा था। मेरा भी मन रूकने का था। परीक्षा दिन भर थी। जल्दी सुबह परीक्षा के लिए निकलना पड़ा था क्योकि परीक्षा केंद्र पुरलिया मे था। दिनभर परीक्षा देने के बाद शाम को लौटा तो पहली नजर सामने के कमरो पर गयी। परन्तु कमरो मे कोई नही था। कमरो के बाहर एक विवाहित युगल खड़ा था जिनकी गोद मे एक छोटी बच्ची थी। घर पर चाची थी। चाची से सामने वाले कमरो के बारे मे पूछा तो बताया अनामिका का प्रमोशन हो गया। कंपनी ने उन्हे पुरलिया मे एक फ्लैट दिया है। आज वो वहां शिफ्ट हो गये है। यहां नये किराये दार आ गये है। मै कुछ देर अनामिका के बारे मे सोचता रहा। फिर अपने कमरे मे सामान बांधने लगा। चाची ने कहा दो दिन और रूकोगे नही। मैने कहा - नहीं। कल ही निकलना जरूरी है। सामान बांधकर बैठ गया। चाची चाय लेकर आयी। बैठकर चाय पीते हुए सामने वाले कमरे को देख रहा था।