Saturday, November 30, 2019
Monday, November 11, 2019
Thursday, October 31, 2019
बड़े जोर की पड़ी थी नाना की बेंत
मैने अपना बचपन नानी के पास ही बिताया है। नानी से इतना लगाव था कि मेरे ज्यातर समय नानी के घर पर ही बितता था। मेरी शादी होने तक रात को मै नानी के घर ही सोता था।मैने मेरे बचपन की सारी बदमाशिया नानी के घर ही करी है। ये नही है कि नानी के घर हमे डाटने वाला नही था इसलिए दुनियाभर की ऊधम हम वहां कर लेते थे। एक बार मैने अपने एक दोस्त के कहने से बीड़ी के सुट्टे का कस लगा लिया थाः जिस समय मे सुट्टे का कस लगा रहा था उसी समय नाना वहां से गुजर रहे थे। उन्होने मुझे देख लिया। मै उन्हे देख नही पाया और सुट्टे के जोर से कस लगा रहा था। सुट्टे के कस लगाने से नाक से धुंआ निकलता देख हम बच्चे लोग हंस रहे थे। शाम को मैं नानी के घर पहुंचा तो नाना आंगन के बीच मे कुर्सी लगाकर बैठे थे। नाना को देखते ही मै तो पत्थर की मूर्ति हो गया न पांव आगे खिसक रहा था और न पीछे सरक रहा था। दिल जोर जोर से धड़क रहा था। रोना भी आ रहा था लेकिन नाना की गुस्से से भरी आंखे देखकर मेरी आंखो के आंसू ठहर गये। अभ मै मन ही मन.प्रार्थना कर.रहा था कि कही से नानी आ जाये। नानाजी ने भी मौका देखकर अदालत लगायी थीः नानी आज महाराज जी की कथा सुनने गयी हुई थी। अब मै भागने की कोशिश करू तो ऐसा लग रहा था मानो मेरे पैर जमीन पर चिपक गये हो। नाना.बोल कुछ नही रहे थे। उनके नथुने फुले हुए थे। वो खड़े हुए। चलकर मेरे पास आये। उनके काले रंग की जूतियां पहने हुए थी। वो जब चलकर मेरे पास आ रहे थे मुझे लग रहा था जैसे गब्बरसिंह अपना बेल्ट हाथ मे लिए मेरे पास आ रहा है। मेरे नजदीक आकर हाथ मे पकड़ी हुई छड़ी से मेरी ठुडी ऊपर उठाकर पूछा- क्यों बड़ा मजा रहा था।? खूब कस लगाये जा रहे थे। छड़ी मेरी ठुडी पर अटकी हुई थी। छड़ी जोर की चुभ रही थी। मैने अपनी आंखो के गोलो को ऊपर की ओर घूमा कर देखना चाहा। मुझे केवल नाना की दाढ़ी दिखाई दे रही थी। मै कुछ बोलना चाह रहा था परन्तु आवाज गले मे ही आकर रह गयी। मै बोलने के लिए अपने होठ खोलता उससे पहले ही सड़ाक से एक बेंत मेरे पिछवाड़े पर पड़ी। मैं अपनी हथेली से पिछवाड़े को रगड़ने लगा। बेंत की बड़ी जोर से लगी थी। मै कुछ ओर बोलता इससे पहले एक बेंत और पड़ी। मेरे ठीक पीछे दरवाजा था। जोर की दो बेंत पड़ने के बाद और खाने की हिम्मत नही थी। मै दरवाजे से बाहर निकल गया। नाना मेरे पीछे आ गये। मै आगे चल रहा था पीछे नाना। बेंत पिछवाड़े पर पड़ रही थी। नाना के डर से भाग नही पा रहा था। अब मेरी चिल्लाहट निकलने लगी थी। मै रोता हुआ चल रहा था पीछे नाना बेंत मारते हुए चल रहे थे। रोते हुए.मै आंसू पोंछते हुए चल रहा था। कुछ दूर चलने के बाद बेंत पड़नी बंद हो गयी। मैने नजर उठाकर देखा सामने नानी खड़ी थी। मै दौड़कर नानी से लिपट गया। अब नाना पत्थवरवत खड़े हो गये। नानी ने मेरे माथे पर हाथ फेराः फिर अपने पल्लू से अपने होठ के निचले हिस्से से पोंछते हुए बोली- जल्लाद हो गये हो क्या। छोरे की जान लेओगे क्या। ऐसा क्या कर दिया इसने। कुछ किया भी है तो ये कौनसा तरीका है समझाने का। नानी मुझे घर ले गयी। बाद मे नानी को मेरी बदमाशी का पता चला तो बहुत जोर से डांटा और कहा असकी बार ऐसा किया तो मै तेरे नाना को सजा देने से नही रोकूंगी। आज भी मै किसी बुरी चीज की ओर हाथ बढ़ाता हुं नाना की बेंत और नानी की डांट का स्मरण हो जाता है और मै बुरा काम करने से रूक जाता हुं।
Saturday, September 30, 2017
मै एक बार फिर
मैं एक बार फिर
देर तक सोना चाहता हूूं
सूरज माथे पर चढ आये
तब तक
मां आवाजे देती रहे
मैं करवटे बदलता रहूं
अधखुली आंखो से जागूं
बिस्तर पर ही चाय ले लूं
अखबार के सारे पन्ने पढ् लूं
विज्ञापन भी
फिर लेट जाऊं और
देर तक सोता रहूं
दोपहर को पलंग पर लेटे हुए
टीवी के सारे सीरियल और
थोडी देर कोई मैच देख लूूं
शाम को चला जाऊं
किसी ठेले पर और
जी भर कर गोल गप्पे खाऊं
फिर किसी चाय की थडी पर
मित्र मंडली के साथ
थोडी क्रिकेट की और थोडी राजनीति की
चर्चा करूं
देर रात तक मित्र के घर पर
उसके पलंग पर लेटा रहूं
बहुत देर रात को घर लौटूं
जब घर के सारे लोग सो जायें
और मां धीरे कदमो से दरवाजा खोले
मैं धीमे कदमो से से अपने कमरे में जाकर
बिस्तर पर लेट जाऊं
और टीवी पर लेट नार्इट मूवी देखूं
फिर नींद ले लूं
और देर तक सोता रहूं
क्योंकि
मैं एक बार फिर
देर तक सोना चाहता हूूं ।
देर तक सोना चाहता हूूं
सूरज माथे पर चढ आये
तब तक
मां आवाजे देती रहे
मैं करवटे बदलता रहूं
अधखुली आंखो से जागूं
बिस्तर पर ही चाय ले लूं
अखबार के सारे पन्ने पढ् लूं
विज्ञापन भी
फिर लेट जाऊं और
देर तक सोता रहूं
दोपहर को पलंग पर लेटे हुए
टीवी के सारे सीरियल और
थोडी देर कोई मैच देख लूूं
शाम को चला जाऊं
किसी ठेले पर और
जी भर कर गोल गप्पे खाऊं
फिर किसी चाय की थडी पर
मित्र मंडली के साथ
थोडी क्रिकेट की और थोडी राजनीति की
चर्चा करूं
देर रात तक मित्र के घर पर
उसके पलंग पर लेटा रहूं
बहुत देर रात को घर लौटूं
जब घर के सारे लोग सो जायें
और मां धीरे कदमो से दरवाजा खोले
मैं धीमे कदमो से से अपने कमरे में जाकर
बिस्तर पर लेट जाऊं
और टीवी पर लेट नार्इट मूवी देखूं
फिर नींद ले लूं
और देर तक सोता रहूं
क्योंकि
मैं एक बार फिर
देर तक सोना चाहता हूूं ।
Friday, September 29, 2017
दो कविताऐ
(एक)
मैं शांत पानी होना चाहता हूं
जिसके उपर दोपहर की धूप
बिछ जाये
चिड़ियायें चहचहाट करती हुयी
मेरे उपर से निकल जाये
सन्नाटे की आवाज मेरे उपर
घूमती रहे
बकरीयो के मिमियाने की आवाज
मेरे किनारो का छुकर निकल जाये
शाम को पहाडो की लंबी छाया
मेरे उपर गिर जाये
पर
कोई कंकर में मेरे उपर
गिर न पाये
जो मेरी सतह पर
कई भंवर बनाता जाये।
----
(दाे)
मेरी आत्मा
अकेला रहना चाहती है
बिलकुल अकेला
किसी से बात नहीं करना चाहती है
मन से भी नहीं
जब मेरी देह सोती है
तो आत्मा बात करती है
अपने आप से
अपने आपको देखती है
खरोंचोे से लहुलहान है
आत्मा की खरोंचो से
लहू रिस रहा है
वो कुछ नहीं कर सकती
देह के बिना
----
मैं शांत पानी होना चाहता हूं
जिसके उपर दोपहर की धूप
बिछ जाये
चिड़ियायें चहचहाट करती हुयी
मेरे उपर से निकल जाये
सन्नाटे की आवाज मेरे उपर
घूमती रहे
बकरीयो के मिमियाने की आवाज
मेरे किनारो का छुकर निकल जाये
शाम को पहाडो की लंबी छाया
मेरे उपर गिर जाये
पर
कोई कंकर में मेरे उपर
गिर न पाये
जो मेरी सतह पर
कई भंवर बनाता जाये।
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(दाे)
मेरी आत्मा
अकेला रहना चाहती है
बिलकुल अकेला
किसी से बात नहीं करना चाहती है
मन से भी नहीं
जब मेरी देह सोती है
तो आत्मा बात करती है
अपने आप से
अपने आपको देखती है
खरोंचोे से लहुलहान है
आत्मा की खरोंचो से
लहू रिस रहा है
वो कुछ नहीं कर सकती
देह के बिना
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Sunday, September 24, 2017
पवित्र आवाजे
एक कविता
अल सुबह
सड़क पर कुछ एक वाहनो
के हाॅर्न को
स्कूल जाते बच्चो के शोर को
सडक पर झाडू बुहारती
महिलओ की बातो को
दूध वाले और अखबार वालो
की आवाजो को
अपने कानो के बिलकुल पास से
निकालते हुए
अपना चेहरा नीचे किये
कुछ बुदबुदाते हुए
तेज कदमो के साथ
सफेद साड़ी में
कुछ महिलाऐ जा रही है
सीधे आश्रम में
जहां वे अपने कान
खोल देगी
पवित्र आवाजो
के लिए ।
अल सुबह
सड़क पर कुछ एक वाहनो
के हाॅर्न को
स्कूल जाते बच्चो के शोर को
सडक पर झाडू बुहारती
महिलओ की बातो को
दूध वाले और अखबार वालो
की आवाजो को
अपने कानो के बिलकुल पास से
निकालते हुए
अपना चेहरा नीचे किये
कुछ बुदबुदाते हुए
तेज कदमो के साथ
सफेद साड़ी में
कुछ महिलाऐ जा रही है
सीधे आश्रम में
जहां वे अपने कान
खोल देगी
पवित्र आवाजो
के लिए ।
Saturday, September 23, 2017
मौन
रेत के टीले
पूरी तरह से
मौन है
सूरज की तपन
भी उन्हे विचलित
नहीं कर पायी है
पवन की लहर
चलती है
टीलो के सपनो को
एक लय में उडा
ले जाती है
वे
देखते है उन्हे जाते हुए
अपने से दूर
खेजड़ी से लिपट कर
वे पवन से
संघर्श करते है
पर
वह उन्हे अपने साथ
ले जाती है
किसी और के
सपनो को पूरा करने के लिए
निर्मिषेश होकर देखते रहते है
टीले
अपने सपनो को
पवन के साथ जाते हुए
बिलकुल मौन होकर ।
पूरी तरह से
मौन है
सूरज की तपन
भी उन्हे विचलित
नहीं कर पायी है
पवन की लहर
चलती है
टीलो के सपनो को
एक लय में उडा
ले जाती है
वे
देखते है उन्हे जाते हुए
अपने से दूर
खेजड़ी से लिपट कर
वे पवन से
संघर्श करते है
पर
वह उन्हे अपने साथ
ले जाती है
किसी और के
सपनो को पूरा करने के लिए
निर्मिषेश होकर देखते रहते है
टीले
अपने सपनो को
पवन के साथ जाते हुए
बिलकुल मौन होकर ।
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