Wednesday, August 2, 2023

भारत का स्‍टार शटलर है लक्ष्‍य सेन

 

सुनील गावस्‍कर को हमने क्रिकेट कोमेण्‍ट्री करते देखा व सुना है। यह हम जानते है‍ कि वो क्रिकेट की प्रतिभा को दूर से ही पहचान लेते है परन्‍तु वो क्रिकेट के अलावा बैडमिंटन से भी बहुत लगाव रखते है। उन्‍होने जब अपने इंस्‍टाग्राम पर एक युवा शटलर के साथ तस्‍वीर पोस्‍ट करते हुए लिखा कि प्रकाश पादुकोन के बाद मेरे नये एकमात्र बैडमिंटन हीरो। उनकी इस पोस्‍ट के बाद सोशल मीडिया पर लाखो युवा इस युवा शटलर के बारे में जानने के लिए सर्च करने लगे। यह और कोई नही भारत का युवा और दुनिया का 13वे नंबर का शटलर लक्ष्‍य सेन है। लक्ष्‍य सेन ने अपनी युवावस्‍था में ही अनेको उपलब्धियां हासिल कर ली है। हाल ही में जापान ओपन के सेमिफाईनल में जगह बनायी थी जहां वो दुनिया के ९वे नंबर के खिलाडी इंडोनेशिया के जॉनाथन क्रिस्‍टी से संघर्षपूर्ण मुकाबले में पराजित हो गये। पहला सैट हारने के बाद लक्ष्‍य ने वापसी की परन्‍तु अंतिम सैट में वो क्रिस्‍टी को पकड नहीं पाये और मैच हार गये। इस हार के बाद भी उसने दुनिया भर के खेल प्रेमियो का ध्‍यान अपनी ओर खींचा है। प्रतिष्ठित आल ईग्‍लैण्‍ड ओपन बैडमिंटन ओपन में उपविजेता रहे लक्ष्‍य सेन भारतीय शटलरो की दुनिया में नयी सनसनी है।

लक्ष्‍यसेन उत्‍तराखंड के अल्‍मोडा से आते है। लक्ष्‍य सेन का परिवार शुरू से ही बैडमिंटन से जुडा रहा है। उनके पिता डी.के. सेन राष्‍ट्रीय बैडमिंटन कोच है और भाई चिराग सेन अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर के शटलर है। लक्ष्‍य को बचपन से बैडमिंटन से लगाव था। उसके पिता व भाई जब टुर्नामेंट के लिए बाहर जाते तो वो भी साथ जाने की जिद करता। भाई चिराग को बैडमिंटन खेलते देख लक्ष्‍य ने भी शटल को कैरियर के रूप में चुना। उसने अंडर 13, अंडर -15 और अंडरा -१९ में अच्‍छा प्रदर्शन किया और राष्‍ट्रीय स्‍तर पर छा गया। लक्ष्‍य ने अंडर -१५ में पहला नेशनल मेडल जीता था। वर्ष २०१६ में पहली बार एशियाई जूनियर प्रतियोगिता में भारत की ओर खेला और पहली बार में ही कास्‍यं पदक जीत लिया। इस मैच में उन्‍होने जूनियर नंबर वन को हराया था। इसके बाद शिखर छुने वाले वो गौतम ठक्‍कर और पी वी संधु के बाद तीसरे शटलर बने। वर्ष २०१८ में युवा ओलम्पिक में भारत के लिए पदक जीता। इसके बाद लक्ष्‍य के कदम नहीं रूके । वो एक के बाद एक लक्ष्‍यो को साधता गया। जैसे सफल होता गया उससे उम्‍मीदे बढती गयी। वर्ष २०१८ में एशियाई जूनियर में शानदार प्रदर्शन करते हुए भारत को ५३ साल बाद गोल्‍ड दिलाया।

भारत में महिला शटलरो का बोलबाला था। साईना नेहवाल और पी वी संधु ने ओलम्पिक में भारत के लिए पदक जीतकर शटल की दुनिया में भारत को नाम दिया। भारत की बैडमिंटन में पहचान महिला शटलरो से होने लगी। इनके साथ ही भारत के श्रीकांत कदांबी ने कुछ उपलब्धियां हासिल कर पुरूष वर्ग में भी भारत को सम्‍मान दिलाया परन्‍तु पुरूष वर्ग में अभी और मेहनत की जरूरत थी। श्रीकांत की काम्‍याबी से देश को उम्‍मीदे बढ गयी थी। देश अब पुरूष वर्ग में चमत्‍कारी शटलर को देखना चाहता था। लक्ष्‍य जिस पर अपने लक्ष्‍यो केा भेदते हुए आगे बढ रहे थे उससे लगा कि भारत की उम्‍मीदे पूरी होने वाली है। वर्ष २०२१ में स्‍पेन में आयोजित विश्‍व चैम्पियनशिप में लक्ष्‍य ने भारत के लिए कास्‍य पदक जीता वहीं किदाम्‍बी ने रजत पदक जीता। यहीं तय हो गया कि भारत के लिए अब आने वाले समय लक्ष्‍य का होगा। वो एक साल से बेहतरीन फॉर्म में चल रहे है। उनके जीवन का सबसे बडा टुर्नामेट आल ईग्‍लैड बैडमिंटन था। य‍ह प्रतिष्ठित र्दुनामेंट अब तक केवल दो भारतीय प्रकाश पादुकोन और पुलेला गोपीचंद जीत चुके है। इनके अलावा कोई यह टुर्नामेंट नहीं जीत पाया है। इस बार लक्ष्‍य के अलावा किदांबी श्रीकांत और पी वी संधु भी भाग ले रहे थे। आल ईग्‍लैण्‍ड बैडमिंटन के फाईनल में पहंचने से देशवासियों की उम्‍मीदे काफी बढ गयी थी। फाईनल में उसका मुकाबला दुनिया के नंबर एक खिलाडी विक्‍टर एक्‍सलसेन से था जहां वो सीधे सेटो मे पराजित हो गया परन्‍तु इस प्रतिष्ठित टुर्नामेंट के फाईनल में पहुंचना भी बडी उपलब्‍धी है। इस उपलब्‍धी के बाद लक्ष्‍य ने दनिया भर के खेल प्रेमियों का ध्‍यान अपनी ओर खींचा है। वर्ष २०२२ में ही लक्ष्‍य ने कॉमन वेल्थ गेम्‍स में मलेशिया के जी योंग को पराजित कर गोल्‍ड मेडल जीता। इस जीत के बाद लक्ष्‍य स्‍टार शटलर बन चुके थे। इसी साल लक्ष्‍य ने चीन के स्‍टार खिलाडी शी ली फेंग को पराजित कर कनाडा ओपन का खिताब जीता । ऐसा करने वाले महज वह दूसरे भारतीय है। वे २०२२ मे थॉमस कप जीतने वाली भारतीय टीम के सदस्‍य भी रहे। भारत ने पहली बार थॉमस कप जीता था। हाल ही में जापान ओपन के सेमिफाईनल में वे पराजित हो गये थे परन्‍तु वो सबसे सफल भारतीय रहे थे। इस उपलब्धि पर भारत के प्रधानमंत्री ने उनकी सराहना की थी।

लक्ष्‍य को खेल के प्रति समर्पित रहने की सीख अपने दादा से मिली जिन्‍हे अल्‍मोडा में बैडमिंटन का भीष्‍म पितामह कहा जाता है। लक्ष्‍य ने प्रकाश पादुकोन अकादमी में प्रशिक्षण लिया है। यहां वो साईना नेहवाल के साथ अभ्‍यास करते थे। उनके कोच विमल कुमार का कहना है कि वो अकादमी में अकेले ऐसे खिलाडी थे जो साईना नेहवाल को पराजित कर देते थे। यहीं से उनके कोच ने उनकी प्रतिभा को पहचान लिया था। आज वो दुनिया के सामने है। आज वो भारत के स्‍टार शटलर है। उनकी तुलना श्रीकांत कदाम्‍बी से की जाती है। विश्‍व चैम्पियन शिप के सेमिफाईनल में लक्ष्‍य का मुकाबला श्रीकांत से हुआ था जहां वो श्रीकांत से हार गये थे। उनकी तुलना श्रीकांत से नहीं की जानी चाहिए। दोनो के खेलने का तरीका अलग अलग है। श्रीकांत के पास अनुभव है और लक्ष्‍य अनुभव प्राप्‍त कर रहा है। लक्ष्‍य युवाओ  की पहली पसंद है क्‍योंकि वो अपने खेल में शानदार स्‍मेशिंग करता है। स्‍मेशिंग उसके खेल की विशेषता है।

लक्ष्‍य सेन महत्‍वपूर्ण मुकाबलो में अंतिम समय पर चूक जाता है। अभी हाल ही में जापान ओपन के सेमिफाईनल में पूरे समय गेम मे रहने के बाद भी अंतिम समय पर चूक गये। कई बडे टुर्नामेंटस में वो फाईनल में पराजित हुआ है।उसे एकाग्रता पर काम करना होगा। बडे मुकाबलो से पहले अपने प्रतिद्न्‍द्वी के खेल पर रिसर्च करनी चाहिए। उसके कोच इस बात पर जरूर ध्‍यान देते होगे। यदि वो महत्‍वपूर्ण मुकाबलो में सफल हो जाये तो आज वो दुनिया का नंबर एक खिलाडी हो सकता है। इस बात में कोई शक नहीं है कि वो भारत को अभी सबसे बडा खिलाडी है जिसके बारे में सुनील गावस्‍कर की टिप्‍पणी निश्चित रूप से उत्‍साह बढाने वाली है। सुनील गावस्‍कर खुद भी खाली समय में बैडमिंटन खेलते रहे है। जब उन्‍होने लक्ष्‍य को अपना हीरो बताया है तो निश्चित रूप से वो आज युवाओ का हीरो है। लक्ष्‍य के लिए एक ही चुन्‍नौत्‍ती है कि वो महत्‍वपूर्ण मुकाबलो में अति उत्‍साह न दिखाकर संयम का खेल दिखाये । आने वाले समय में ओलम्पिक जैसे टुनामेंट में भारत को सफलता हासिल करनी है ऐसे में लक्ष्‍य सेन जैसे खिलाडी भारत के लिए गोल्‍डन हीरो साबित हो सकते है।

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सीताराम गेट के सामने, बीकानेर ९४१३७६९०५३

Sunday, July 16, 2023

सहस्‍त्रधारा की रोमांचक यात्रा

 


ऋषिकेश में गंगा नदी के सामने ही सारे आश्रम बने हुए है। सुबह सुबह मै गीता भवन से निकला। सामने गंगा नदी बह रही थी। मै कुछ देर वहीं खडा हो गया गंगा को देखता रहा । गंगा अपने पूरे आवेग के साथ बह रही थी। कोई उसमें नहाकर रोमांचित हो रहा था तो कोई पुण्‍य कमा रहा था। छोटे छोटे बच्‍चे नदी के अंदर अठखेलियां कर राजी हो रहे थे। गंगा को छुकर आने वाली हवा शीतलता का अहसास करा रही थी। कुछ देर रूकने के बाद मै वहां से चल दिया। आश्रमो के बाहर गली में नये नये रेस्‍टोरेंट बने है। यहां फास्‍ट फुड और भोजन आधुनिकता में उपलब्‍ध है। आश्रमो में सात्विक भोजन मिलता है जबकि यहां आधुनिक परन्‍तु यहां भी वेज ही मिलता है। गली से निकलते हुए साधुओ की टोलियां मिलती है। कुछ साधुओ के काली दाडी और बाकि के सफेद दाडी है। कुछ के हाथ में कमण्‍डल और कुछ के हाथ में गठरी होती है। मौन धारण किये हुए अपने गंतव्‍य की ओर जा रहे होते है। यहां साधुओ की टोलियां प्राय दिख जाती है। मै ट्रैवल ऐजेन्‍सी के यहां गया था । आज हमें देहरादूर जाना था। ट्रैवल ऐजेन्‍सी वाला मिल गया था। पांच हजार रूपये मांग रहा था। कुछ मोल भाव किया तो साढे चार हजार में राजी हुआ ।  बात तय हो गयी। उसने कहा कि गाडी आपको जानकी पुल पर मिल जायेगी। ऋषिकेश में गंगा नदी पर तीन पुल है। एक लक्ष्‍मण झुला, राम झुला और जानकी झुला। लक्ष्‍मण झुला सबसे पुराना है। उसके बाद बना राम झुला और अब नया बना है जानकी झुला। बिना किसी पोल के ये पुल बने है। इन पर चलते है तो ये पुल हिलते है इसलिए इन्‍हे झुला कहा जाता है।


यात्रा में जितने लोग आये थे उनमें से केवल 6 लोग ही देहरादून भ्रमण पर जा रहे थे। धूप बहुत तेज थी। तेज धूप में गंगा नदी किसी आईने की तरह चमक रही थी। हम सब लोग जानकी पुल से गुजर रहे थे। यहां पुल से पैदल ही जाना होता है। इस पर वाहनो की अनुमति नहीं है। स्‍कूटी जरूर इस पर चलती है। माताजी को स्‍कूटी पर बिठाकर पुल के पार भेज दिया। हम सब लोग पैदल मस्‍ती करते हुए चल रहे थे। पुल पर बहुत भीड थी। काफी बच्‍चे सैल्‍फी के लिए पुल पर खडे थे। पुल से निकलते ही हमारी गाडी तैयार थी। ऐ सी गाडी होने से मानस बहुत खुश था। अब तक उसे पैदल ही यात्रा करवायी थी। पुल के बाहर बडा बाजार था। हमने दो पानी की बोतले और खाने पीने का सामान खरीद कर रख लिया। अब हमारी गाडी देहरादून के लिए रवाना हो गयी।


ऋषिकेश की सीमा पार होते ही हम जंगल में आ गये। कार की खिडकी से पहाड और उसके आगे घने जंगल दिखाई दे रहे थे। ये जंगल वैसे ही थे जैसे बेटा फिल्‍म में तु मेरा मै तेरी वाले गाने में बताये हुए थे। कार की खिडकी से जंगल किसी पिक्‍चर की तरह चल रहे थे। ऋषिकेश और देहरादून समुद्रतल की उंचाई मे ज्‍यादा अलग नही है। दोनो लगभग एक ही उंचाई पर है। गाडी में गाने गाते हुए हम जल्‍द ही देहरादून शहर पहुंच गये। यहां के शहर की सडके साफ सुथरी है। सडको पर धूल बिलकुल नहीं है। सडको पर जगह जगह फल के ठेले लगे हुए है जिन में अधिकांश पर लीची लदे हुए है। कई घरो में लीची के पेड भी लगे हुए दिखाई दिये परन्‍तु फिर भी लीची यहां सस्‍ते नहीं है। यहां लीची १४० से १८० रूपये किलो तक है। यह बात जरूर है कि यहां लीची ताजे मिल जाते है। अब हमारी गाडी सहस्‍त्र धारा की ओर जा रही थी। सहस्‍त्र धारा देहरादून में नीचे घाटी की ओर है। ड्राईवर हमें सहस्‍त्रधारा के बारे में बता रहा था। ड्राईवर अच्‍छा आदमी था। उसने बताया कि उसका गांव केदारनाथ के पास है। उसने बताया कि उसका परिवार कैसे मुश्किल में रहता है। वो बर्फबारी का तो वो साल में कई बार सामना करते है। उनके यहां स्‍कूल और अस्‍पताल की दिक्‍कते है। उसने अपने पहाडी खाने के बारे में भी बताया। उसने बताया कि वो ठंड में भटट की दाल बनाते है। पहाडी खाने में भटट की दाल विशेष होती है। उसने बताया कि पहाडो में कितनी ठंड पडती है। हमने भी उससे हमारे यहां पानी की कमी साझा की। हमारा जीवन पानी के बिना कितना मुश्किल है, यह भी बताया। बाते करते करते हम सहस्‍त्र धारा पहुंच गये। गाडी एक किनारे पार्क की। ड्राईवर ने बताया कि एक घंटे में आप आ जाना। हम सब गाडी से निकले और अपने हाथ मुंह धोये।



सबसे पहले मंदिर में गये। यहां शिव मंदिर है। सहस्‍त्रधारा एक बहुत बडा पहाड से जिसमें से लगातार पानी की धाराये निकलती रहती है। कहीं गंधक की धारा तो कहीं दूसरे पानी की सहस्‍त्रो धाराऐ निकलती रहती है। यह धाराऐ बरसो से अनवरत निकल रही है। मंदिर में शिव अभिषेक के लिए भी पानी उन्‍ही धाराओ से ही आ रहा था। पानी एकदम कंचन की तरह साफ था। सबसे पहले हम सब ने पानी से शिवअभिेषेक किया। फिर बाहर सहस्‍त्र धारा की ओर आ गये। सबसे पहले गुरूद्रोण की मुर्ति लगी थी। उस मुर्ति को प्रणाम किया और फोटो खिंचवाये। यहां पहुंचते ही ठंडी हवाऐं  आपको छुने लगती है। पहाडो से गिरने वाली सहस्‍त्र धाराऐं रोमांचित करती है। चारो और पहाडो से घिरा हुआ स्‍थान है ये। इसे घाटी भी कहा जा सकता है। इस पहाड पर कई गुफाऐं भी बनी हुई है। सब जगह से पानी आ रहा है। पहाडो से गिरने वाले पानी को तीन जगह बांध दिया है ताकि लोग वहां नहा सके। कई जगह छोट छोटे झरने बन गये है। हमारे चारो तरफ हरियाली से भरे हुए पहाड थे जिनमें से सहस्‍त्रो धाराऐं बह रही थी। हम दुनिया की सुंदरतम जगहो में से एक पर खउे थे। हमारे पीछे उंचाई पर गुफाऐं थी जिनमेंसे पानी आ रहा था। कुछ लोग उंचाई पर जाकर गुफाओ में जा रहे थे। गुफा से एक साथ पानी आने से वहां झरना बन गया था। दूसरी ओर उंचाई पर एक रेस्‍टोरेंट था जिसमें लोग रोपवे द्वारा जा रहे थे।



अनवरत धाराओ में बहने से बडे बडे पत्‍थर नीचे आ गये थे। उन पत्‍थरो पर चलते हुए हम सुरक्षित स्‍थान देख रहे थे। पानी को देखकर हम लोगो का भी नहाने का मन हो गया था। एक स्‍थान पर हम लोगो ने अपने कपडे रखे और पानी में कूद पडे। हमने ऐसा स्‍थान देखा जहां छोटा झरना भी था। पानी गहरा नहीं था। धाराओ से निकला हुआ पानी था। पानी के अंदर छोटे छोटे पत्‍थर थे जो पांवो में चुभ रहे थे। मै चलता हुआ झरने के पास पहुंचा । कुछ देर झरने के नीचे बैठा रहा। वहां मैने मानस और मंयक को भी बुला लिया था। यहां भी स्‍नैप जरूरी थे। कुछ स्‍नैप हमने वहां खींचे। फिर पानी में चलते हुए दूसरे झरने पर गये। वहां पानी का बहाव तेज था। पानी हमें धक्‍के मार रहा था। रोमांचित करने वाला अनुभव था। पानी के बीचे पडे बडे पत्‍थरो पर हम बैठ गये। कुछ देर बाद फिर पानी में उतर आये। एक पिता अपने छोटे से बच्‍चे को नहला रहा था। बच्‍चे चेहरे की खुशी देखी जा सकती थी। बच्‍चो अठखेलिया कर रहा था। पानी से सहस्‍त्र धाराओ वाला पहाड विशाल दिखाई दे रहा था। यहां से पहाडो से निकलती सहस्‍त्र धाराऐ, झरने और गुफाऐं दिखाई दे रही थी। अदभुत दृश्‍य था । अब एक घंटे से भी ज्‍यादा का समय हो चुका था। हम निकल कर बडे से पत्‍थर पर आ गये थे। वहां खडे होकर कुछ स्‍नैप और कुछ सैल्‍फी ली। फिर वहीं बैठकर भेल मुडी खायी। नहाकर निकले थे तो भेलमुडी बडी स्‍वादिष्‍ट लग रही थी। भेलमुडी खाने के बाद हमने कपडे पहने और बाहर की ओर चल दिये। यहां से जाने का मन नहीं हो रहा था। कुछ दूर जाकर वापिस पीछे आया। एक बार ओर इस अदभुत दृश्‍य को देखा। जी अभी भी नहीं भरा था परन्‍तु जाना तो था।




गाडी पर जाने से पहले हमे चाय की जोरदार तलब हो रही थी। नहाने के बाद ठंडे वातावरण में चाय तो जरूरी थी। गाडी पार्किंग के पास ही एक रेस्‍टोरेंट था। हमने रेस्‍टोरेंट में चाय और नाश्‍ता किया। चाय अच्‍छी थी इसलिए सबने दो दो कप लिये। चाय पीने के बाद वापिस हम अपनी गाडी में बैठ गये और गाडी रवाना हो गयी हमारे अगले डेस्‍टीनेंशन की ओर। अगला पडाव अगली कडी में …………
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Sunday, July 9, 2023

हिमशैैल वाटर फॉल से नीलकंठ महादेव



ऋषिकेश के गीता भवन की बालकॉनियों में जालियां लगी है ताकि बंदर यहां रहने वालो को परेशान नहीं कर सके। अस्‍थायी निवास में ठहरे यात्री जब भोजन बनाते है तो उसकी खूशबू से बंदर उन जालियो को पकड कर खडे हो जाते है। मै इन बंदरो को कमरे के बाहर रखी कुर्सी पर बैठकर देख रहा था। बंदर जाली से ऐसे लटके हुए थे जैसे कि उन्‍हे न्‍यौता देकर बुलाया गया है। मै उन्‍हे चौकीदार लग रहा था । मेरी ओर घूर रहे थे। पास बैठे भानजे ने कहा आज कहां चलना है मामा। मैने उसे गुगल में कोई नया टुरिस्‍ट प्‍वांईट या वाटरफाल देखने को कहा । हम ऋषिकेश की गली गली घूम चूके थे। हमे कुछ नया चाहिए था। भानजे ने अपने मोबाईल में दो तीन झरनो के नाम बताये। इनमेंसे नील झरना और पटना झरने पर जा चुके थे। मैने हिमशैल झरने पर जाने का निश्‍चय किया। मैने पूछा कितना दूर है तो गुगल में कोई 2 किमी दूर बताया। हम तीन लोग थे । तीनो तैयार हो गये । मैने भानजे से कहा तौलिया, कपडे और कुछ खाने का सामान बैग में डाल ले। मानस और मयंक ने बैग अपने कंधो पर डालकर तैयार थे। फिर चल पडे हिमशैल वाटर फाल की ओर


गीता भवन के बाहर से हमने गुगल मैप देखना शुरू किया। गुगल मैप देखते हुए गीता भवन के पीछे की सडक पर गये। एक ऐसी गली में भी घुस गये जो आगे बंद थी। गुगल मैप से मिलान करने मे हम गलती कर गये। आगे गली में कुछ लोग आते हुए दिखे। हम भी गुगल मैप वाली गली मानकर उसमें चलने लगे। गली में चढाई बहुत थी। हर पांच मिनट बाद रूकना पड रहा था। गली पार करने के बाद एक थडी पर मै बैठ गया। मानस मेरी हालत देखकर हंसने लगा। मयंक मेरे लिए नारियल पानी लाया। नारियल पानी पीने के बाद गुगल नक्‍शा देखकर चलने लगे। सामने भूतनाथ मंदिर था। उससे सीधे जाना था। हम उस ओर चल पडे। आते जाते लोगो से पूछ रहे थे हिमशेल वाटर फाल कहां है। किसी ने सही उत्‍तर नहीं दिया। अधिकांश लोगो ने तो कहा कि आगे कोई वाटर फाल नहीं है। रास्‍ता चढाई का था तो हम वापिस लौटने का सोचने लगे। आगे दो लडकियां दुकान लगाकर बैठी थी। उन्‍होने आवाज देकर कहा कि हिमशैल वाटर फाल आगे है। हमारे मन में नई उम्‍मीद जगी। उन्‍होने बताया थोडी दूर चलने पर उसका पानी सडक पर फैला हुआ दिखाई देने लग जायेगा। मानस ने कहा तो फिर ठीक है, चलते है परन्‍तु लडकियो ने कहा वो वाटर फाल बंद हो गया। किसी हाथी के हमले के बाद बंद कर दिया गया है। अब वहां पाईप लगा दिया गया है जिससे पानी आता है। हर मन मसोस कर लौट गये। लौटकर भूतनाथ मंदिर के बाहर थडी पर बैठ गये। मैने हिसाब लगाया और सोचा कि यदि 1000 रू तक कोई गाडी नीलकंठ चलती है तो नीलकंठ चल लेते है। मयंक ने वहां खडी गा‍डी वालो से पूछो तो किसी ने 2000रू से कम नहीं कहा । पहले हमने वहां कटा हुआ खीरा खाया तो वहां बैठे दो लोगो ने बताया हम अभी नीलकंठ जाकर आये है। एक आदमी का दो सौ रूपये लगे। मैने पूछा – कैसे । उन्‍होने बताया कि आगे एक टैक्‍सी स्‍टैण्‍ड है वहां 200 रू सवारी में आप जा सकते है। मै बहुत खुश हुआ। मैने कहा चलो नीलकंठ चलते है।


 टैक्‍सी स्‍टैण्‍ड पर जाते ही टेक्‍सी मिल गयी। टैक्‍सी में हमारे साथ बिहार से आये हुए चार युवक भी थे। वे पूरे रास्‍ते भोजपुरी में बाते कर रहे थे। इसका हमने बहुत मजा लिया। उन मेसे एक महाराज जैसा था । जिससे वो लोग हर बात की हां करवाते थे। वो बोल रहा था – हम तो सावन में यहां आते है। सावन में ससुरी यहां इतनी भीड होती है कि दर्शन करते में चार घंटे से नंबर आता है। हम तो यहां तक पैदल आते है। वो इतनी बाते कर रहे थे कि हम आपस में बात ही नहीं कर पा रहे थे।


मैने मानस से मोबाईल से रास्‍ते का वीडियो बनाने के लिए बोला। साथ में यह भी बोला कि मेरा भी फोटो साथ आना चाहिए। मै मानस का बता रहा था कि यहां से राफटिंग होती है। वहां राफटिंग वाले नावे लेकर खडे थे। कुछ लोग नदी में राफटिंग कर रहे थे। हमारी टैक्‍सी काफी उंची चल रही थी। गंगा में राफटिंग करने वाले काफी छोटे छोटे दिखाई दे रहे थे। एक तरफ गंगा नदी बह रही थी और दूसरी और विशालकाय पहाड थे जो हरियाली से आच्‍छादित थे। हमारी गाडी कुछ देर में राजाजी नेशनल पार्क से भी गुजरी। यहां गाडी रोकना मना था क्‍योंकि यहां जंगली जानवरो का भय था। पास बैठे युवक ने कहा वो देखो सुसरा शेर। दूसरे ने कहा- कहां है कहां है। गाडी मे बैठे सभी उत्‍सुकता से देखने लगे। महाराज ने कहा – वो सुसरी बकरी है। तुमको पता नहीं क्‍या क्‍या दिख जाते है। हम सभी ने महाराज की बात सुनकर जोर से ठहाका लगाया। गाडी अब नीचे घाटी में उतर रही थी। हमें अब वो सडक दिखाई दे रही थी जहां से चलके हम आये थे। सडक पर गाडियो की लंबी लाईन लगी थी। हम घाटी में उतर रहे थे। पहाडो पर सफेद बादल रूई के फौव्‍वो की तरह दिखाई दे रहे थे। हरियाली में सफेद बादल पहाडो पर गहनो के श्रंगार की तरह लग रहे थे। गाडी हमारी टैक्‍सी स्‍टैण्‍ड पर रोक दी। हम सब ने एक दूसरे के नंबर लिये ताकि समय पर लौट सके। गाडी टैक्‍सी स्‍टैण्‍ड पर खडी थी।




अब हम नीलकंठ में थे। चारो और पहाडो से घिरा हुआ। सारे पहाड हरे भरे। रोमांचित करने वाला दृश्‍य था। यहां फोटो खिंचवाने का मोह छोड नहीं पाया। मंदिर जाते हुए रास्‍ते में एक दो फोटो तो खिंचवा ही लिये। हम जहां खडे थे उसके नीचे और घाटी थी। एक ओर चाय पानी और प्रसाद की दुकाने लगी थी। सभी दुकानदार अपने यहां से प्रसाद लेने की मनुहार कर रहे थे। मंदिर के नजदीक पहुंच गये थे। मंदिर सीढिया उतर कर था। हम लोगो ने एक दुकान से प्रसाद लिया और वहीं चप्‍पले खोल दी। यहीं से मंदिर के द्वार में प्रवेश किया। लंबी लाईन थी।




आगे जबरदस्‍त भीड दिखाई दे रही थी। लोग बम बम भोले बोल रहे थे। मैने भी हर हर महादेव का उदघोष किया। लाईन में हम आगे पीछे हो गये थे। निज मंदिर में बहुत भीड थी। महोदव की लिंगी पर मैन जलाभिषेक किया। यह जलाभिषेक कुछ ही सैकिण्‍ड में पूजारी ने करवा दिया। पीछे भीड बहुत थी। मै जलाभिषेक कर आगे आ गया। मानस और मयंक भी पीछे पीछे आ गये। मंदिर के बाहर आने पर देखा मंदिर के बाहर बहुत सारे धागे बंधे थे। कुछ मन्‍नतो के लिए बांधे हुए थे और कुछ प्रसाद की थाली में आने वाले धागे को वैसे ही बांध देते थे। मैने मंदिर के बाहर अपने स्‍नैप खिंचवाये। मैने मानस से कहा फोटा में लगना चाहिए कि हम नीलकंठ महादेव के मंदिर में है। मंदिर में लगातार बम बम भोले के स्‍वर सुनाई दे रहे थे। 



मंदिर के बाहर आकर चारो ओर घिरे पहाडो को फिर से देखा। अपने जूते चप्‍पल पहन कर सबसे पहले कुछ खाने पीने का काम किया। एक रेस्‍टोरेंट में गये। जिसके पीछे बालकॉनी से नीचे घाटी और पहाड दिखाई दे रहे थे। हमने वहां बैठकर चाय का आनंद लिया। यहां के स्‍नैप अलग से लिये। नीचे घाटी में भी कुछ अस्‍थायी मकान बने हुए थे। चाय पानी करने के बाद बाहन निकले तो एक हैण्‍डपंप पर पानी भरा। मैने हैंड पंप चला कर देखा। फिर घाटी के सुंदर दश्‍य में कुछ योगा करते हुए स्‍नैप खिंचवाये। 





आने वाले सावन मास को देखते हुए परिसर में तैयारियां चल रही थी। ठंडी हवा में हम लोग हाथ फैलाकर खडे हो गये। हवा का भीतर तक अहसास किया। वहां दश्‍य इतना सुंदर था कि आधे घंटे तक हम वहां वीडियो सैल्‍फी और फोटो बनाते रहे । मैने कहा हम लोगो को साथ में दो ड्रेस और लानी चाहिए थी। शाम हो रही थी। हम जल्‍दी से टैक्‍सी की ओर गये। बिहारी युवक पहले से ही आ चुके थे। जल्‍दी से हम गाडी में बैठे। गाडी में बैठ कर हर हर महादेव का उदघोष किया और गाडी रवाना। लौटते वक्‍त समय का पता ही नहीं चला। गाडी राम झुले पर रूकी। हम लोग वहां उतर गये और वहां से हर हर महादेव का उदघोष करते हुए गीता भवन की ओर चल दिये। 

Wednesday, July 5, 2023

क्रिकेट से रोशनी जा रही है

 


वेस्टइंडीज क्रिकेट टीम को भारत में होने वाले वनडे विश्‍व कप से बाहर होना एक सामान्‍य घटना नहीं है बल्कि क्रिकेट की दमकती ईमारत के एक कोने पर लगा दाग है। चाहे इसके लिए कोई दोषी हो परन्‍तु वेस्‍टइंडीज के बाहर होने से दुनिया भर के करोडो क्रिकेट प्रे‍मियों को निराशा हुई है । एक टीम जिसने कभी दुनिया ए क्रिकेट पर राज किया था उसे क्रिकेट की जंग के सबसे बडे जलसे में शामिल होने का हक अब हासिल नहीं है। पूरी दुनिया जिन खिलाडियो की गेद और बल्‍ले से कांपती थी आज उसी वेस्‍टइंडीज की टीम के कदम जंग के मैदान के बाहर ही ठिठक गये है। जिस वेस्‍टइंडीज के गेंदबाजो के सामने दुनिया की कई पूरी की पूरी टीमे सामना करने से कांपती थी आज उसी वेस्‍टइंडीज टीम को एक क्‍वालिफायर टीम ने पराजित कर विश्‍व कप में खेलने का अधिकार छिन लिया । दो बार की विश्‍व चैम्पियन के बाहर होने पर क्रिकेट के दीवानो को बेहद अफसोस हुआ। जिस वेस्‍टइंडीज टीम के बिना क्रिकेट की कल्‍पना करना संभव नहीं था आज उसके बिना विश्‍वकप खेला जायेगा। एक टीम जिसने क्रिकेट को अपना अविस्‍मरणीय योगदान दिया उसी टीम के बिना क्रिकेट की सबसे बडी जंग आयोजित होगी। अब यह तय हो ही गयी है कि वेस्‍टइंडीज आने वाले विश्‍वकप का हिस्‍सा नहीं होगा तब यह विचारणीय प्रश्‍न है कि कभी अपनी कलाईयों के दम पर पूरी दुनिया को अपने बल्‍ले के नीचे रखने वाली टीम की इतनी दुर्दशा कैसी हुई। 

वर्ष १९७५ में जब पहला विश्‍वकप आयोजित होना तय हुआ तब वेस्‍टइंडीज ने अपनी प्रतिभा के दम पर पूरी क्रिकेट की दुनिया का अपने कब्‍जे में कर रखा था । किसी भी टीम के पास उस टीम का सामना करने की क्षमता नहीं थी। मैल्‍कम मार्शल, ज्‍यॉल गॉर्नर जैसे गेंदबाज अपनी गेंदो से आग उगलते थे। दुनिया के बडे बडे बल्‍लेबाज इनके आगे धराशायी हो जाते थे। क्‍लाईव लॉयड और विव रिर्चडस, डेसमंड हेंस और गॉडर्न ग्रीनीज जैसे बल्‍लेबाज से सुसज्जित टीम ने पहला और दूसरा विश्‍वकप आसानी के साथ जीत लिया था । उस समय लग रहा था कि यह टीम अजेय है। १९८३ में कपिल देव की कप्‍तानी में भारत की टीम ने फाईनल में पहली बार विश्‍वकप में पराजित किया। उसके बाद से वेस्‍टइंडीज टीम वापिस कभी भी फाईनल में नहीं पहुंच पायी है। विश्‍वकप के फाईनल में भारत के हार जाने के बाद भी वेस्‍टइंडीज टीम अपने विरोधियों पर भारी पडती रही । दुनिया भर के क्रिकेट खेलने वाले देश वेस्‍टइंडीज से निपटने की युक्तियां खोजते रहते। उस समय श्रीलंका के खिलाडी तो वेस्‍टइंडीज के गेंदबाजो का सामना ही नहीं कर पाते थे। १९८७ के विश्‍वकप में वेस्‍टइंडीज पहले दौर में बाहर हो गयी। पाकिस्‍तान के विरूद्ध एक मैच हार कर टीम बाहर हो गयी थी तब विव रिचर्डस मैदान में रो पडे थे। उस समय रोने का वक्‍त नहीं था क्‍योंकि टीम संघर्ष कर हारी थी परन्‍तु आज वेस्‍टइंडीज के लिए रोने का वक्‍त है। १९९० तक वेस्‍टइंडीज विश्‍वकप नहीं जीतने पर भी सिरमौर रही । विव रिचर्डस, रिचि रिर्चडसन, डेसमंड हेंस, लैरी गोम्‍स, जैफ डुजो, रोजर हार्पर जैसे खिलाडियो ने वेस्‍टइंडीज की मान मर्यादा बनाये रखी। 

दुनिया की सिरमौर टीम का पतन १९९० के बाद से शुरू हो गया था जब विव रिचर्डस ने संन्‍यास लिया। उसके बाद कमान रिची रिर्चडसन को सौंपी गयी। गेंदबाजी मे कर्टनी वाल्‍श बडा हथियार था परन्‍तु धीरे धीरे वेस्‍टइंडीज अपनी लय खोने लगी। उस समय ब्रायन लारा उनके साथ बडा बल्‍लेबाज था जिसने सचिन की तरह कई रिकार्ड बनाये। ब्रायन लारा ने काफी हद तक वेस्‍टइंडीज के पतन को रोके रखा। १९९६ के विश्‍वकप में टीम सेमिफाईनल तक पहुंचने में सफल रही । एम्‍ब्रोस, इयान बिशप गेंदबाजी के उच्‍च मानको को बनाये रखने में असफल रहे। फिर भी खिलाडियो ने टीम को स्‍वर्णकाल में ले जाने का प्रयास किया। एक बार चैम्पियंस ट्राफी भी जीतने में सफल रहे । २०१२ में आईसीसी टी २० चैम्पियनशिप भी जीती । १९९५ से २०१५ तक वेस्‍टइंडीज का प्रदर्शन मिश्रित रहा। कभी जीत जाते जो कभी बुरी तरह हार जाते। इस दौरान टीम का दबदबा नहीं रहा परन्‍तु टीम का एक औसत प्रदर्शन रहा । 

वेस्‍टइंडीज टीम के लिए बडी दिक्‍क्‍त यह है कि यह एक देश नहीं है। यह एक कैरबियन देशो का समूह है जिसके देशो के खिलाडियो से मिलकर टीम बनती है। इस कैरेबियन समूह का एक ही क्रिकेट बोर्ड है। बोर्ड और खिलाडियो के बीच २००५ में विवाद शुरू हुआ जो अभी तक किसी न किसी रूप में जारी है। एक बार तो कैरेबियन समूह के देशो की अलग अलग टीम के रूप में खेलने की भी कल्‍पना की जाने लगी। एक बार शिव चन्‍द्रपॉल कप्‍तानी में दूसरी टीम भेज दी गयी। खिलाडियो ने कई बार टीम से बगावत कर दी। उसके बाद टी २० आने के बाद वेस्‍टइंडीज के खिलाडियो को नया रोजगार मिल गया। वे राष्‍ट्रीय टीम से बगावत करके टी२० लीग में खेलने लग गये। पोलार्ड और दूसरे खिलाडी अपना अधिकांश वक्‍त टी २० लीगस को देने लग गये। इससे वेस्‍टइंडीज टीम को बहुत बडा नुकसान हुआ। उसकी राष्‍ट्रीय टीम कमजोर हो गयी। टीम का मैनजमेंट विव रिचर्डस के सन्‍यास के बाद ही हो गया क्‍योंकि उसके बाद डेसमेंड हेंस को बीच में ही हटा दिया गया। बार बार कप्‍तान बदले गये। गस लोगी को अंदर बाहर किया गया। २००५ के बाद टीम पूर्णत गर्त के रास्‍ते पर आ गयी। जिसकी परिणित यह हुई कि क्‍वालिफायर स्‍कॉटलैंड से हार कर बाहर हो गयी। 

वेस्‍टइंडीज के पतन में वहां का बोर्ड पूरी तरह से जिम्‍मेवार है। जब टीम का स्‍वर्णकाल था तो भविष्‍य की टीम के बारे में नहीं सोचा गया। प्रतिभाऐं अपने आप नहीं आती है उन्‍हे खोजना पडता है और अवसर देना पडता है। एम्‍ब्रोस और वाल्‍श के बाद तेज गेंदबाजो को नहीं तराशा गया। वेस्‍टंडीज बोर्ड की ओर से प्रोत्‍साहन नहीं मिलने से गुयाना और बारबोडोस के प्रतिभाशाली युवाओ ने अपना रूख ऐथेलेटिक्‍स की ओर कर लिया। मनोरंजन के नये साधान आने से युवा संगीत की ओर भी मुड गये। क्रिकेट में विवादो के चलते युवा क्रिकेट की ओर आकर्षित नहीं हुए। टीम का धरेलू क्रिकेट ढांचा भी दरकने लगा था जिसका नुकसान टीम को हुआ। किसी भी देश की क्रिकेट के लिए घरेलू क्रिकेट का मजबूत होना जरूरी है। वेस्‍टइंडीज टीम के गर्त में जाने का सबसे बडा कारण उनकी घरेलू क्रिकेट का विवादो में घिर जाना है। 

वेस्‍टइंडीज दुनिया के सबसे बडे क्रिकेट जलसे से बाहर है। इसका दुख सभी क्रिकेट प्रेमियों केा है परन्‍तु एक कमजोर वेस्‍टइंडीज टीम को भी हम स्‍वीकार नहीं कर सकते है। अब जरूरत है कि आईसीसी वेस्‍टइंडीज क्रिकेट टीम को मजबूत करने का जिम्‍मा ले क्‍योंकि वेस्‍टइंडीज क्रिकेट की विरासत है। उस विरासत को बचाये रखना जरूरी है। नयी टीमे आती रहेगी और क्रिकेट से जुडती रहेगी परन्‍तु हमें विरासत को भी लुप्‍त होने से बचाना जरूरी है। वेस्‍टइंडीज टीम के बिखरने के बाद क्रिकेट अधूरा हो जायेगा। इसलिए अब वक्‍त है कि वेस्‍टइंडीज टीम को एक विरासत के तौर पर बचाया जाय। वेस्‍टइंडीज का क्रिकेट की मुख्‍य धारा से बाहर होना वैसा ही जैसे चिरागो से रोशनी जा रही है। 


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Sunday, June 11, 2023

हडताल के दिन और बादलों के फौव्‍वे काटने के दिन




हडताल के दिन । वे हडताल के ही दिन थे। पूरा दिन पिन ड्रॉप चुप्‍पी में चिंघाडता था। मै अपनी छत्‍त पर बने कमरे में बैठा रहता । पूरी छत्‍त पर धूप पसर जाती थी । धूप भी ऐसी कि उसकी सेक फर्श से उठकर सीधे कमरे में आती थी जो मेरे बदन को जला देती थी । मै लैपटॉप लिये कमरे के बाहर देखा करता था। कमरे से छत्‍त के सिवा नीला आसमान दिखाई देता था। नीले आसमान में सफेद बादल फव्‍वो की तरह चिपके हुये दिखाई देते थे। ये सफेद बादल ही एक तरह की उम्‍मीद थे कि ये काले होयेगे और बरस कर धूप के ताप को कम करेगे। हमारी हडताल भी इसी उम्‍मीद पर थी कि सरकार भी कभी राहत का बादल बन कर बरसेगी। सरकार से अपनी मांगो को लेकर हम अपने कार्यालयो से हडताल पर चल रहे थे। यह हमारा 15 वां दिन था। मै कर्मचारी मैदान जाकर वापिस आकर अपने इस क्रियेटिव रूम में बैठ जाता हूं। पंखा तेज गति से चल रहा है। बाहर से आने वाली गर्म हवा को पूरे कमरे में फैला रहा है। मै लैप टॉप पर कई किताबो की पीडीएफ और दूसरे लेखको को एक्‍सप्‍लोर कर रहा हूं। मेरे पलंग पर मारकेज की अमरूद की महक, रस्किन बाण्‍ड की नाईट ट्रेन ऐट देओली और आचार्य श्रीराम की ज्ञानखण्‍ड उपनिषद भाग 3 बिखरी पडी है। लैपटॉप से उबता हूं तो इन में से कोई किताब पढ लेता हुं।

लैपटॉप पर गुगल क्रोम में मुझे एक कविता दिखाई पडी। किसी को बददुआ देनी थी, मै तेरा नाम देर तक बुदबुदाता रहा। यह कविता थी गौरव सोलंकी की । मुझे कविता अच्‍छी लगी। मैने गौरव की एक दो और कविताऐं खोजी। वो भी मुझे अच्‍छी लगी। फिर मुझे उसका ब्‍लॉग मेरा सामान मिला। उसमे उसकी लिखी बहुत सारी कविताऐं थी। उसकी कल्‍पनाऐं सोच से परे थी। ये कल्‍पनाऐं मुझे लुभाने लगी। मेरे अंदर का कवि भी जागने लगा। मुझे लगा कि सामने आसमान पर लगे बादल के फौव्‍वो को काटकर कविताऐं बना ली जावे। मै हमेशा कविताऐं करने से डरता था। लल्‍लन टॉप वेबसाईट पर मैने गौरव सोलंकी का इंटरव्‍यू सुना जिसमें उन्‍होने बताया कि कविताऐं मै अपने लिए करता हूं। वो चाहे किसी को पसंद आये या नहीं आये। यहां तक कि मेरी कविता कोई एक आदमी भी नहीं पढेगा तो मै कविताए करूंगा । गौरव सोलंकी से इसलिए भी प्रभावित हुआ कि उसने आईआईटी करने के बाद फैसला लिया कि वो सिर्फ लिखेगा। पीलीबंगा में सरकारी मास्‍टर रहे उसके पिता को कितना दुख हुआ होगा। एक आई आईटी किया हुआ लडका कहता है कि मै सिर्फ लिखने का काम करूंगा वो भी हिन्‍दी मे । हिन्‍दी में भी उसने अपना नवलेखन ज्ञानपीठ पुरस्‍कार स्‍वीकार करने से मना कर दिया। आज वह बॉलीवुड में सफल स्क्रिप्‍ट राईटर है। उसे फिल्‍म फेयर पुरस्‍कार भी मिल चुका है। मै उससे बहुत प्रभावित हूं। उसको देखकर मैने कविताऐ लिखने की हिम्‍मत की । हडताल के दौरान मैने करीब ५० -६० कविताऐ लिख डाली।

हडताल चलते हुए करीब ३५ दिन हो गये थे। मैने काफी कुछ नयी रचनाऐं कर ली थी। अब नयी रचनाऐं करने का विचार था। नीचे कमरे मे टीवी के सामने बैठा था। रिमोट को घुमाते हुए सत्‍या फिल्‍म दिख गयी। सत्‍या फिल्‍म देखनी शुरू कर दी । मनोज वाजेपयी की गजब फिल्‍म है। कुडी मेरी सपने मे मिलती है, गाने में तो मनोज वाजपेयी ने कमाल कर दिया। फिल्‍म के अंत में उर्मिला मातोडकर सब पर भारी पडी । उसके चेहरे के भावो में झकझोर दिया। उसके अगले दिन गैगस आफ वासेपुर देख डाली । नवाजुदीन सिदकी के अभिनय ने दिल छु लिया। फिल्‍म में सबसे ज्‍यादा प्रभावित किया बेकडोर गानो ने। फिल्‍म की शुरूआत में नवाजुदीन के घर से शव यात्रा निकल रही थी, वहीं दूसरी और एक स्‍टेज पर गायक कलाकर तेरी मेहरबानियां गाना गा रहे थे। यह फिल्‍म नहीं देखी उसने कुछ नहीं देखा। इन दिनो सिर्फ एक बंदा काफी है कि चर्चा बहुत सुनी थी। वो भी अगले दिन देख डाली। सिर्फ एक बंदा पूरी तरह से मनोज वाजपेयी की फिल्‍म है। मनोज वाजपेयी का अभिनय इतना अच्‍छा है कि उसने दर्शको का कलेजा निकाल कर जीत लिया। इस फिल्‍म के बाद मुझे मनोज वाजपेयी इतना पसंद आया कि उसके बहुत सारे इंटरव्‍यू देख डाले । एक इंटरव्‍यू में वो कहते है कि उन्‍होने यश चौपडा से काम मांगा तो यश चौपडा ने कह दिया कि वो उनके लायक फिल्‍मे नहीं बनाते है। जिंदगी के बारे में मनोज वाजपेयी कहते है कि आदमी के पास इतना पैसा होना चाहिए कि वो अच्‍छा ईलाज करा सके, मनपसंद जगह जा सके, मनपसंद गाडी में बैठ सके, मनपसंद मकान में रह सके। मनोज वाजपेयी ने बताया कि वो शुरू मे पैसे के लिए छोटा मोटा रोल भी कर लेते थे। मैने मनोज वाजपेयी को बहुत एक्‍सप्‍लोर किया। इसके लिए उसके कपिल शर्मा में आये सारे एपिसोड खोज कर देख लिये।

हडताल के दिनो में शाम को घर के पास पार्क है, उसमें घूमने के लिए जाया करता था। घूमते हुए सोचता था कि नौकरी छोड दू और क्रिऐटिव काम करूं। जीवन का बाकि हिस्‍सा में अपनी मनपसंद का काम करते हुए बिताउं। बिना मनपसंद के काम में मैने इतना मन दे दिया कि मन वहां से निकलने के लिए छटपटाने लगा। वहां भ्रमण पथ पर घूमते हुए मेरे उपर पेडो से पत्‍ते टूटकर गिर रहे थे। हर चक्‍कर मे दो चार पत्‍ते मेरे बालो मे जमा हो जाते । इसी दौरान चंडीगढ से आया मेरा दोस्‍त मिल गया। वो पांच बरस बाद आया था। बालघोटिया भायला था। दो दिन उसके साथ घूमा। वो बता रहा था आपकी हडताल का ऐसा हो जायेगा वैसा हो जायेगा। मै उसकी सुनता रहा । मैने कहा बहुत बोल रहा है क्‍या बात हो गयी। उसने कहा सुनने की आदत डाल ले मेरा ट्रांसफर बीकानेर हो गया है। मैने अपनी आने वाली किताबो की तैयारी भी कर ली परन्‍तु हडताल के दौरान मैने यह भी सीख लिया कि लिखने का काम अपनी संतुष्टि के लिए होता है। इसे अपनी संतुष्टि के लिए करके भी देखा।

आज कर्मचारी मैदान गया था। धूप बहुत तेज थी । एक छाया में कर्मचारी बैठे थे। सब अपनी अपनी राय व्‍यक्‍त कर रहे थे। ऐसा लग रहा था कि सभी कुऐं में से अपनी राय निकाल रहे है। लू के थपेडे हमारे गालो पर गिर कर यह संदेष दे रहे थे कि हम घर जाकर कुछ दिन और आराम करे। हमारे किसी साथी ने छाछ के पैकेट मंगा लिये। हमने छाछ पीकर भीतर की गर्मी और लू के थपेडो की गर्मी को कुछ हद तक शांत किया। सब अपने अपने दोस्‍तो के साथ अपनी राय बना रहे थे। पार्क में कुछ बुजुर्ग ताश के पत्‍ते खेल रहे थे। गर्म हवाऐं उनको छुकर जा रही थी। उन गर्म हवाओ के थपेडो को अपना कवर बनाकर मै बाईक पर बैठकर तपती सडको से चलते हुए घर आ गया। कूलर चालू किया और सो गया।

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Wednesday, June 7, 2023

टेस्ट मैच की लोकप्रियता की



आईपीएल के ताबड़तोड़ सत्र और आगामी महिनो में खेले जाने वाले वनडे विष्वकप के इंतजार के बीच विष्व टेस्ट चैम्पियनषिप का फाईनल खेला जा रहा है। आईपीएल की चकाचौंध और वनडे विष्वकप की बेकरारी में एक बुलबुले सा उभर कर आया है विष्व टेस्ट चैम्पियनषिप का फाईनल। टेस्ट चैम्पियनषिप के दूसरे संस्करण के फाईनल में भारत और आस्ट्रेलिया की टीमो के लिए चुन्नौत्तियां होगी ही परन्तु सबसे बडी चुन्नौती टेस्ट मैच के प्रारूप के लिए है। टी-20 और वनडे की चरमोत्कर्ष की लोकप्रियता के सामने टेस्ट को अपनी लोकप्रियता बढाने की चुन्नौत्ती है। टेस्ट मैच असली क्रिकेट है इसमें कोई दोराय नहीं है और इसे सब स्वीकार करते है परन्तु लोकप्रियता के मामले में अभी इस पर और काम की जरूरत है। विष्व टेस्ट चैम्पियनषिप इन्ही प्रयासो का परिणाम है। इस चैम्पिनषिप के दूसरे संस्करण में दुनिया की दो ताकतवर टीमे भारत और आस्ट्रेलिया आमने सामने है। आस्ट्रेलिया अंकतालिका में 152 अंको के साथ शीर्ष पर रहकर फाईनल में पहुंचा है जबकि भारत ने 127 अंको के साथ ईग्लैण्ड (124अंक)को पछाड कर फाईनल में जगह बनायी है। भारत दूसरी बार और आस्ट्रेलिया पहली बार फाईनल खेल रहा है। जो भी टीम जीते उसके लिए यह पहली टेस्ट चैम्पियनषिप ट्राफी होगी। 


पहले वनडे और बाद में टी-20 की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए टेस्टमैच का विष्वकप आयोजित करने की मांग उठ रही थी। टेस्ट मैच की अवधि लंबी होने और ड्रॉ का आप्षन होने से इसका कोई फार्मेट बन नहीं रहा था। 2007 में न्यूजीलैण्ड के मार्टिन क्रो ने एक बार फिर इसका प्रस्ताव चलाया। 2010 तक टेस्ट मैच के टुर्नामेंट का फार्मेट तैयार हो चुका था। यह तय हुआ कि वनडे की चैम्पियनषिप ट्राफी के स्थान पर टेस्ट चैम्पियनषिप होगी। इसके लीग और प्ले आफ के फार्मेट भी तय कर लिये थे। यह 2013 में आयोजित होनी थी परन्तु किन्ही कारणो से आयोजित नहीं हो सकी। फिर 2017 में प्रयास हुए लेकिन वे सिरे नहीं चढ़े। आखिरकार एक नये फार्मेट के साथ विष्व टेस्टचैम्पियनषिप 2019 में सामने आयी ।इसमे दो साल तक लीग मैच खेले जाते है। ये लीग मैच आईसीसी ईवेंट नहीं होकर दो देषो के बीच होने वाली सीरीज है जिसमें जीत हार पर अंक दिये जाते है। इसका फाईनल ही आईसीसी ईवेंट होता है। पहली विष्व टेस्ट चैम्पियनषिप 2020-21 में खेली गयी। जिसमें भारत और न्यूजीलैण्ड फाईनल में पहुंचे थे जिसमें न्यूजीलैण्ड ने भारत को हराकर खिताब जीता था। इस बार भारत और आस्ट्रेलिया फाईनल में पहंुचे है और यह लंदन के ओवल मैदान पर खेला जायेगा। 


विष्व टेस्ट चैम्पियनषिप लोकप्रियता के पायदान चढ रही है। इसके फाईनल को एक प्रतिष्ठित आईसीसी ईवेंट के रूप में देखा जा रहा है परन्तु इसका लीग फार्मेट आम क्रिकेट प्रेमी की समझ से बाहर है। एक आम क्रिकेट प्रेमी इसके लीग फार्मेट को समझने की माथापच्ची नही करता है। यही चीज इस चैम्पियनषिप को लोकप्रियता के मामले में आईपीएल और वनडे विष्वकप से पीछे धकेलती है। आईपीएल और वनडे विष्वकप में क्रिकेटप्रेमियों को पता होता है उनकी फेवरिट टीम की पोजीषन कहां पर है और वो कैसे आगे बढ सकती है। विष्व टेस्ट चैम्पियनषिप में दो टीमे फाईनल में पहुंचने पर ही पता चलता है कि अब विष्व टेस्ट चैम्पियनषिप का फाईनल खेला जायेगा। फाईनल मैच ने क्रिकेट प्रेमियों का ध्यान खींचा है। अब लोग इंतजार करने लगे है कि विष्व टेस्ट चैम्पियनषिप कौन जीतेगा। कौन टेस्ट का बॉस होगा। कौन क्रिकेट लंबी अवधि के फार्मेंट में चैम्पियन है। फाईनल ने सभी का ध्यान आकृष्ट किया है। क्रिकेट में टेस्ट धैर्य और संयम की परीक्षा होती है। क्रिकेट में आप कितने सिद्धहस्त है, इसका पता टेस्ट मैच से ही चलता है। रोमांचकता के मामले में टेस्ट मैच का कोई मुकाबला नही है। बल्ले और गेंद का असली संघर्ष टेस्ट मैच में ही देखा जा सकता है। उसी संघर्ष को लोकप्रिय बनाने की कवायद है विष्व टेस्ट चैम्पियनषिप। 

विष्व टेस्ट चैम्पियनषिप का आईपीएल और वनडे क्रिकेट से मुकाबला मैदान के बाहर नहीं आपको मैदान के अंदर ही देखने को मिल जायेगा जब आप बल्ले और बॉल का रोमांच देखेंगे। भारत और आस्ट्रेलिया दोनो के खिलाडी आईपीएल और काउंटी क्रिकेट खेलकर ओवल पहुंचे है। जाहिर तौर पर इसका प्रभाव खेल पर दिखाई देगा। खिलाडियो को प्रतिपक्षी टीम से ज्यादा अपने आपके विरूद्ध खेलना होगा। वो किस प्रकार आईपीएल और काउंटी के प्रभाव से निकल कर मैदान में इस रियल फार्मेंट में प्रदर्षन करते है। अपनी पारियों को वो किस प्रकार धैर्य और संयम अपना कर अपनी पारी बनाते है। गेंदबाज किस प्रकार असीमीत समय में अपने आपको साबित करते है। क्रिकेट के रियल टेस्ट में वे अपने आपको आईपीएल और काउंटी से कितना मुक्त कर पाते है। अपनी क्रिकेट प्रतिभा को बडे कैनवास पर कैसे वे चित्रित कर पाते है। उनका यह संघर्ष क्रिकेट के हर क्षेत्र में देखने को मिलेगा। क्षेत्ररक्षण में भी उन्हे टी 20 के दबाव से मुक्त होना होगा। यह उल्लेखनीय है कि आईपीएल और डबल्यूटीसी फाईनल में दस दिन से भी कम का समय था। इस कारण यह चुन्नौत्ति केवल टेस्ट मैच तक ही सीमित नही रही बल्कि खिलाडियो पर भी आ गयी। वे अपने आपको टेस्ट क्रिकेट मे कैसे साबित करे। 

डबल्यूटीसी का फाईनल दोनो टीमो के लिए तटस्थ मैदान पर है।  जिस पर दोनो ने ही बहुत कम सफलताऐं हासिल की है। दोनो ही टीमे दो दो बार ही यहां जीत सकी है। दोनो ही टीमो ने अपनी जीत के लिए जोरदार रणनीति बनायी है। भारत की टीम इस बार खिताब जीतने से चूकना नहीं चाहेगी क्योंकि वे लगातार दूसरी बार फाईनल में पहुंचे है और दस साल से कोई आईसीसी ट्राफी नहीं जीती है। वे टेस्ट चैम्पियनषिप जीत कर आईसीसी ट्राफी का सूखा दूर करना चाहेंगे। वहीं आस्ट्रेलिया ऐषेज शुरू होने से पहले खिताब जीतकर अपना मनोबन बढाना चाहेगी। दोनो टीमो को ही वास्तविक क्रिकेट खेलना होगा। यदि वे वास्तविक क्रिकेट खेले तो निष्चय ही मैच रोमांवक होगा और यह रोमांचकता टेस्ट के लिए दर्षक खींचेगी। हालांकि यह बात नही है कि टेस्ट मैच देखने के लिए दर्षक नहीं आते है। आजकल तो टेस्ट मैचो में फैसले भी होने लगे है परन्तु किसी भी फार्मेट में बडा टुर्नामेंट होना बडी बात है। बडे टुर्नामेंट फार्मेट को लोकप्रिय बनाते है। दर्षको में एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की भावना आती है जो खेल को लोकप्रिय बनाती है। दुनिया की दो बेहतरीन टीमे आमने सामने है। दोनो टीमे न केवल खिताब जीतने का प्रयास करेगी बल्कि टेस्ट क्रिकेट को ला

Thursday, June 1, 2023

वो अब कभी नहीं रोएगा



उस दिन दुनिया की सभी मांए रोयी होगी 

जिस दिन उसने अपने बेटे को 

दूध की जगह चूने का पानी पिलाया होगा । 

उस भवन की नींव में उसने 

अपने आपको गाढ दिया 

रोटी के चार टुकडे लाने के लिए 

उस रात तारो को भी नींद नहीं आयी होगी 

जिस रात उसका बच्‍चा रात भर रोया था 

सुबह गश खाकर गिर पडी थी 

उसका बच्‍चा अब बिलकुल भी नहीं रोया था 

अब उसकी मां रो रही थी 

सिर्फ उसकी मां रो रही थी 

बच्‍चा अब बिलकुल शांत था 

वो अब कभी नहीं रोऐगा ।