Saturday, April 15, 2023

स्‍मृृतियों से लौटते हुए




















 कमरे में पलंग पर किताबे बिखरी पडी थी। एक दो किताबे खुली थी जिनके पन्‍ने हवा से पलट रहे थे। पलंग पर चदर भी ईधर उधर होकर नीचे लटक रही थी। टेबिल पर अखबार पडे थे। हवा से उड रहे थे। कमरे में अंधेरा था। बाहर शाम हो चुकी थी और आसमान में बादल आ जाने से अंधेरा सा हो गया था। बॉलकोनी वाला गेट खुला था। कमरे में बॅालकोनी के गेट से जितनी रोशनी आ रही थी वही रोशनी थी। टेबिल पर लैपटॉप खुला था जिसकी कुछ रोशनी टेबिल पर पड रही थी। कमरे के बीच में ही आरामदायक कुर्सी पर वो बैठा था। गर्दन को कुर्सी के सहारे पर रखे हुए। उसने टांगे फैला रखी थी और आंखे उसकी बंद थी। पंखे की हवा से उसके बाल उड रहे थे। उसने अपने एक हाथ की अंगुली अपनी आंखो पर और बाकि हथेली गाल पर रखी हुयी थी। कुछ देर में उसने अपने दोनो हाथो की अंगुलियो को आपस में बांधकर पेट पर  रख लिया था। उसने एक लंबी सांस ली और फिर नाक से जोर से सांस छोडी। फिर वह उठ कर खडा हो गया। हल्‍के हल्‍के कदमो से चलते हुए बॉलकोनी में आया। बालकोनी से सडक पर हो रही आवाजाही को कई देर तक एक टक देखता रहा । बादलो की गर्जना रूक रूक कर हो रही थी। बारिश की बूंदे सडको पर गिरने लगी थी। थोडी देर में बारिश तेज हो गयी। बारिश तेज होने के बाद भी वो बॉलकोनी में खडा रहा । ऐसा लग रहा था कि उसे कोई मतलब नहीं है कि मौसम में क्‍या चल रहा है। बॉलकोनी में बारिश की बूंदे नहीं गिर रही थी। फुहार उसके कपडो तक जरूर आ रही थी। वो थोडी थोडी देर में अपने बालो में हाथ फेर रहा था और फिर अपनी हथेली से मुंह पोंछ रहा था। बिजली जोर से कडकने लगी थी। ऐसा लगने लगा कि बिजली आज तो गिर ही जायेगी। गर्जना जोर से होने लगी तो वो अंदर चला आया।

अंदर आकर वो एक बार फिर कुर्सी पर बैठ गया।  पंलग पर बिखरी किताबो को देखता रहा। पलंग पर परिंदे किताब भी पडी थी। इस किताब को देखकर याद आया। यही किताब उसको वह देकर गयी थी। उसे वो लौटा नहीं पाया। वो इस किताब को उसे लौटाना चाहता था। वो अकेला ही खुश था। कमरे में कब आता और कब जाता कोई पता नहीं था। देर रात तक और फिर देर तक सोते रहना। पास के किचन में खुद ही चाय बना लेता था। देर रात को वो किचन में बरतन साफ करता तो सिंक में पानी के गिरने की आवाज रात के सन्‍नाटे को चीरती हुइर् प्रतीत होती थी। वो ढेर सारी किताबे पढता था। उसे याद है कि वह कई दिनो तक दाडी नहीं बनाता था। एक दिन वो उसे सेविग किट गिफट कर गयी।

वो अपनी इस जिंदगी से बहुत खुश था। उसे पता ही नहीं चला अचानक वो पास के कमरे में किरायेदार के रूप में आयी। उसे कभी उससे बात नहीं की। वो लडकियो से बात नहीं करता था। एक दिन वो उसके कमरे आयी तो वह किचन में था। बिखरे को कमरे को उसने सैट कर दिया। कमरे में कई दिनो से झाडू भी नहीं लगाया था। उसने झाडू भी लगा दिया। अब वो कमरा दिखने लग गया। लडकी ने उसे इतना गंदा कमरा रखने के लिए डांट भी लगायी।

बारिश के धीमे होने पर वो वापिस बॉलकोनी में आ गया। बाहर शायद पावर आफ था। सडक पर अंधेरा पसरा हुआ था। सडक पर गुजरे रहे वाहनो की रोशनी थी। उसने अपने दोनो हाथ बालकोनी की जाली पर रख दिये थे। उसने कभी अपना जन्‍म दिन नहीं मनाया था। पता नहीं उसने कैसे मेरी इंस्‍टाआईडी देख ली और एक दिन शाम को केक ले आयी। किस प्रकार उसने जोर जोर से हैप्‍पी बर्थ्र डे बोला था। उसने कभी उस लडकी को सीरीयसली नहीं लिया था। पर उस लडकी ने उसकी जिंदगी को व्‍यवस्थित कर दिया था। बालकोनी में खडे खडे उसने चाय पीने की सोची। चाय बनाने के लिए कीचन में गया। कीचन में प्‍लेटफार्म के आगे कुछ देर खडा रहा और फिर निकल कर बाहर आ गया। कमरा बंद किया और नीचे बाहर आ गया। दो कदम की दूरी पर चाय की थडी है। यहीं पर वो कई बार चाय पीता है। वहां रखी हुई एक स्‍टुल लेकर किनारे बैठ गया। थडी के उपर लगे छप्‍पर से अभी भी बारिश की बूंदे गिर रही थी। उसके कानो में चाय बनाने की आवाज ही पहुंच रही थी। आस पास के लोग क्‍या बात रहे है। उस पर कोई असर नही हे। वो चाय से नफरत करती थी। उसकी चाय बंद कराने के लिए वो लडकी ग्रीन टी का पैकेट भी लायी और ग्रीन टी पीने के बहुत सारे फायदे बताये। लेकिन उसने कभी ग्रीन टी नही पी। ग्रीन टी का डिब्‍बा अभी उसके कीचन की शोभा बढा रहा है। कुछ ही देर में थडी वाला चाय का कप ले आया। उसने चाय का कप सामने की स्‍टूल पर रख दिया। वो चाय के कप को देखता रहा । उसे याद हो आया कि वो यहां रिसर्च करने आयी थी। उसका सबजेक्‍ट हैल्‍थ था परन्‍तु उसे लडकी के सबजेक्‍ट से कोई मतलब नहीं दिया। वो अपनी ही दुनिया में व्‍यस्‍त रहता था। लडकी उसको हेल्‍थ के बारे में बताती रहती थी। ये खाने से ये हो जाता है और यह खाने से यह हो जाता है। लेकिन उसने खाने पीने की कोई भी आदत नहीं छोडी। यहां तक कि चाय भी नहीं छोडी। उसके कहने से शाम का खाना जल्‍दी खाने लगा था। रोज शाम को वो उसके कमरे में आकर हैल्‍थ पर भाषण देकर जाती थी। वो कभी भी एक भी शब्‍द नहीं बोलता था। रोज शाम को वो उसका इंतजार जरूर करता । उसके बाद ही वो कोई किताब पढना शुरू करता । उसे पता था वो आयेगी और डिस्‍टर्ब करेगी।

एक दिन शाम को वो नहीं आयी। उसे नयी किताब पढना शुरू करना था। उसने सोच उस लडकी के भाषण के बाद ही वो किताब शुरू करेगा। वो इंतजार करता रहा । शाम से रात हो गयी परन्‍तु वो नहीं आयी। रात से देर रात हो गयी परन्‍तु वो फिर भी नहीं आयी। वो कमरे से निकल कर बाहर गया। उसके कमरे पर ताला लटक रहा था। कमरे में वो अकेली रहती थी। कभी कोई उससे मिलने भी नहीं आता था। कमरे में ताला देखकर बालकोनी में गया और नीचे सडक पर देखा। रात को आवाजाही कम होने लगी थी। दूर से कोई आता साफ दिखाई दे जाता है। वो दूर सडक तक अपनी नजर जमा कर खडा हो गया। रात के बारह बज गये थो वो नहीं आयी। वो इतना कम बोलता था कि उसने लडकी का मोबाईल नं भी नहीं लिया था। कुछ देर और इंतजार करने के बाद वो अंदर आकर पलंग पर लेट गया। लेटकर पंखे को देखता रहा । उसकी आंख लग गयी। सुबह उठते ही वो बाहर पास वाला कमरा देखने गया। कमरे पर ताला लटक रहा था। उसने आज चाय भी नहीं पी। उस लडकी के बारे मे सोचता रहा। सुबह दस बज गये थे। वो अभी भी पलंग पर लेटा रहा । अचानक उसे बाहर दरवाजा खुलने की आवाज आयी। उसे लगा कि लडकी आ गयी। उठने लगा और फिर सो गया। उसके मन में था वो लडकी मेरी कौन है मै क्‍यों चिंता करूं। कुछ देर लेटा रहा। फिर उसे रहा नहीं गया। बाहर देखने के लिए खडा हुआ। दो कदम दरवाजे की और बढाये ही थे कि कमरे में हसंते हुए वो लडकी आयी। अभी तक नहीं नहाने के लिए उसने डांट लगायी। वो उससे पूछना चाहता था कि रात भर वो कहां थी। वो कुछ बोलता उससे पहले ही वो बो बोल पडी कि – कल रात मै अपने पापा के साथ थी। दो दिन बाद मेरी शादी है इसी शहर में।

‘ कोग्रेच्‍यूलेशन। इसी शहर में। ‘ उसने चौकते हुए कहा।

‘ हां इसी शहर में । मेरे साथ वो रिसर्च कर रह है। उसीसे। तेरे को जरूर आना है।‘ उसने खुश होते हुए कहा। जल्‍दी मे होने का कहकर वो निकल गयी। वो दरवाजे को देखता रहा। कमरे में धूप की लकीर गिरी हुयी थी।

‘ चाय ठंडी हो रही है।‘ थडी वाले ने कहा । वो स्‍मृतियो से लौटकर चाय की थडी पर आया। चाय का कप उठाकर अपने मुंह से लगाया।

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Saturday, April 8, 2023

लैम्‍प पोस्‍ट वाली लडकी

 


यह शहर पढने वालो के लिए एक हैरिटेज शहर था। प्रतियोगी परिक्षाओ की तैयारी करने वालो के लिए यह एक मुश्किल शहर था। उन्‍हे काफी कुछ सामान्‍य ज्ञान इसी शहर से मिलता था। पूराने पत्‍थरो से बने हुए मकान और एक पंक्ति में बने हुए पूराने शिल्‍प के मकान देख कर लगता था कि किसी ठंडी दुनिया में हम आ गये है। ऐसा लगता था कि इस शहर की दीवारो पर शहर के लोगो की भोली भोली बाते बह रही है। यह जीवन धीमा चलता है परन्‍तु सकून से चलता है। शहर की सडको की बनावट भी पूरानी थी। इन सडको पर चलते हुए ऐसा लगता था कि हम किसी राजा महाराजा के राज में चल रहे है। सडको के बीच में थोडे थोडे गैप के बाद लगी हुई हैरिटैज लैम्‍प इस शहर को और खूबसूरत बनाते थे। छोटा सा शहर था। शहर में एक ही बडा सा पार्क था। पार्क में इस शहर के लोग कम आते थे। इस पार्क में पर्यटक ही देखे जा सकते थे। पार्क में एक पेड के नीचे एक चित्रकार कैनवास लगाकर पैंटिंग किया करता था। वो अभी अभी कई दिनो से पार्क में पेंटिंग कर रहा है। दिन भर वो पेंटिंग करता रहता है। शाम को शहर के कुछ लोग उसे पेंटिंग करते हुए कौतूहलवश देखने आ जाते है। लगता है ज्‍यादा भीड उसे डिस्‍टर्ब करती है। वो शाम को सामान समेट कर सामने बने रेस्‍टारेंट में आ जाता है।

पार्क में बना यह रेस्‍टोरेंट इस इलाकै में इकलौता रेस्‍टोरेंट है। रेस्‍टोरेंट के सामने पार्क की दीवारो के सहारे पूराने हैरिटेज लैम्‍प लगे है। इन लैम्‍पो से रेस्‍टोरेंट की शोभा बढती है। इन लैम्‍पो से यह रेस्‍टोरेंट खास बन गया है। दूसरे देशो से आये हुए पर्यटको के लिए यह रेस्‍टोरेंट भी एक हैरिटैज लुक का रेस्‍टोरेंट है। वह चित्रकार शाम को रेस्‍टोरेंट में चाय पीने आता है। रेस्‍टारेंट के बाहर दो पत्‍थर की टेबिले बनी है। उसके पर हैरिटेज लैम्‍प है। वो वहां बैठकर चाय पीता है और पार्क को देखता है। कुछ बोलता नही है। उसके बाल लंबे है। चाय पीते हुए कई बार वो अपनी बालो में हाथ फेरता है और फिर चश्‍मा ठीक करके पार्क मे देखने लगता है। चाय पीने के बाद एक किताब निकालता है और उसके कुछ पन्‍ने पढता है। फिर बंद करके अपने बैग मे डाल लेता है। फिर खडा होकर रेस्‍टोरेंट के काउण्‍टर पर आता है और बिल का बिना पूछे पैसे दे देता है। तब तक अंधेरा हो चुका होता है और पार्क में होकर पार्क के दूसरे दरवाजे से निकल जाता है। वो किसी से बात नहीं करता है। रेस्‍टोरेंट में भीड होने पर भी वह अकेला बैठा रहता है। कोई उससे मिलने नहीं आता है और ना ही वो किसी से मिलता है। दिन में एक लडकी रेस्‍टोरेंट में आती है। वो रेस्‍टोरेंट के अंदर बैठकर चाय पीती है और रेस्‍टोरेंट के कांच के गेट से पार्क मे देखती रहती है। वो उस चित्रकार को चित्र बनाते हुए देखती है परन्‍तु कभी उसके नजदीक नहीं गयी। चाय पीने के कुछ देर तक वो चित्रकार को देखती रहती है और फिर निकल कर लैम्‍प पोस्‍ट पर कुछ समय रूकती है और फिर रेस्‍टोरेंट के पास वाली सडक से निकल जाती है। ऐसा लगता है नदी चित्रकार की ओर बहना चाहती है परन्‍तु दूसरी ओर निकल जाती है।

रेस्‍टोरेंट का मालिक उस लडकी को कुछ कहने का विचार करता है परन्‍तु निजि मामला होने के कारण वो उसे कुछ कह नहीं पाता है। एक दिन लडकी पार्क के अंदर जाती है। चित्रकार को कुछ देर चित्र बनाते हुए देखती है। उसके कैनवास पर आडी तिरछी रेखाऐं खींची हुई है। उनमें वो रंग भर रहा है। वो कुछ देर चित्रकार को देखती है फिर वो निकल जाती है। तीन-चार दिन यही सिलसिला चला। एक दिन लडकी ने उससे पूछा- आप क्‍या बना रहे हो्।

‘ चित्र बना रहा हूं। ‘

‘ ये कैसा चित्र है । ‘

‘ ये मेरे मन की भावनाऐं है। ‘

‘ ये कैसी भावनाऐं है। ‘

‘ मेरे विचार उलझे हुए और चित्र में समाधान की खोज में बढ रहे है। ‘’

‘ समाधान मिला। ‘

‘ अभी जो मेरे दिमाग की स्थिति है, वो इस पैंटिंग में दिखाया गया है।‘

लडकी कुछ देर चुप रही । वसंत का मौसम था। पूराने पत्‍ते पेडो से टूट कर पार्क में गिर रहे थे। दो पत्ते टूट कर लडकी के बालो में आकर गिरे। लडकी ने पत्‍तो को निकाल कर फैंकते हुए चित्रकार से कहा- ‘ आप मेरी पैंटिग भी बना सकते हो। ‘

चित्रकार पैंटिंग में कलर करते हुए रूक गया और लडकी की तरफ बिना देखे ही कहा ‘ मैं पोट्रेट नहीं बनाता हूं।‘

लडकी पैटिंग की और थोडा झुकी और कहा – ‘ नहीं मुझे पोट्रेट नहीं बनवाना। मुझे तो आप जैसी पैटिंग बनानी है। मेरी भावनाओ की।‘

‘ मुझे कैसे पता तुम्‍हारी भावनाऐं क्‍या हे। ‘

‘ वो मै आपको बता दूंगी।‘

चित्रकार ने कुछ क्षणो के लिए लडकी के प्रश्‍न का उत्‍तर नहीं दिया। फिर अपने बालो में हाथ फेरते हुए कहा -  शाम को मै सामने वाले लैम्‍प पोस्‍ट के नीचे चाय पीता हूं। आज जाना। वहीं बात करेंगे।

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लडकी को चित्रकार का स्‍वभाव रूखा सा लगा। उसे बात से लगा वो उसके आग्रह को टाल रहा है। चित्रकार वापिस अपने काम में लग चुका था। लडकी सफेद कपडे पहने हुए अपने खुले बालो को पीछे करते हुए चित्रकार को देख रही थी। कुछ देर वो वहीं खडी रही । फिर चित्रकार को अपने काम में व्‍यस्‍त देख वहां से वापिस मुड गयी। सूखे पत्‍तो पर चलते हुए वो पार्क के बाहर जा रही थी। सूखे पत्‍तो के कुचलने की आवाज पार्क में आ रही थी।

शाम को चित्रकार लैम्‍प पोस्‍ट के नीचे चाय का कप लिये बैठा था। वो पार्क में खडे अपने कैनवास को देख रहा था। उसी पार्क मे से वो लडकी सफैद कपडो में कैनवास के आगे से आ रही थी। चित्रकार की एकाग्रचितता में अवरोध हुआ। वो लडकी पार्क से निकल कर सीधे चित्रकार के सामने रखी कुर्सी पर बैठ गयी। रेस्‍टोरेंट से वेटर एक चाय का कप और लेकर आया। चित्रकार अभी चुप था। लडकी अपने काले बाल जो उसके चेहरे पर आ रहे थे, पीछ कर रही थी। चित्रकार ने चाय का कप टेबिल पर रखते हुए पूछा- ‘ आप सचमुच चित्र बनवाना चाहती है। ‘

‘हां’

‘आपको पता है इसकी कीमत क्‍या होगी। ‘

‘ मै इसकी कीमत चुका दूंगी। ‘

चित्रकार ने अपना कप वापिस अपने होठो तक ले जाते हुए कहा – ‘ तो ठीक है। आप बताईये आप जीवन के बारे में क्‍या सोचती है। ‘

लडकी ने चाय का कप उठाते हुए कहा – ‘ देखिये । मेरे ख्‍याल से जीवन का रंग सफेद है। जीवन शांत नदी की तरह है। उस शांत नदी पर चलते हुए उस परम परमात्‍मा को प्राप्‍त किया जा सकता है। मै हमेंशा उस परम पिता परमात्‍मा को प्राप्‍त करने की साधाना करती हूं। इसलिए मै हमेंशा सिंगल रहना चाहती हूं। घरवालो का हमेंशा मेरे पर शादी करने का दबाव रहता है जो मेरी साधना मे मुझे डिस्‍टर्ब करता है। उस परमपिता परमात्‍मा को प्राप्‍त कर लेने के बाद आपको पूर्णता के लिए किसी की जरूरत नही है। आप परमात्‍मा को प्राप्‍त करने के बाद पूर्ण हो जाते हो। घरवालो को कहना है कि पूर्ण होने के लिए आपको साथी की जरूरत होती है। उनका यह दबाव और सलाह मेरे लिए अवरोध पैदा करती है। यूं कहे मै खीझ सी जाती हूं। ‘



चित्रकार ने चाय का घूंट लेते हुए कहा –‘ मै आपके जीवन का सार समझ गया। अब मै आपकी भावनाओ को कैनवास पर उकेर सकता हूं। आपको मेरे पास बैठे हुए समय देना होगा ताकि मै आपके बारे मे और जान सकूं।

दोनो ने थोडी ही देर में अपनी बात समाप्‍त कर दी। दोनो ने अभी चाय भी पूरी नहीं पी थी। लडकी चाय का कप नीचे रखकर खडी हो गयी और पार्क के पास वाली सडक से निकल गयी। चित्रकार कुछ देर वहां बैठा बैठा उस लडकी के बारे में सोचता रहा।

अगले दिन पार्क में बसंत की धूप खिली हुयी थी। घास पर सुबह की ओस की बूंदे धूप में चमक रही थी। चित्रकार कैनवास लेकर चित्र बनाना शुरू कर दिया था। वो लडकी सफेद कपडो में नीचे घास पर बैठी थी। चित्रकार ने चित्र बनाते हुए कहा – ‘ आपकी सोच अच्‍छी है। परमपिता परमात्‍मा को प्राप्‍त करने के लिए जीवन में शांति होना जरूरी है।‘

‘ हां । बिलकुल सही है जब तक आपके मन में ठहराव नहीं होगा आप परमपिता के रास्‍ते तक भी नहीं पहुंच सकते। ‘ लडकी ने कहा ।

चित्रकार ने अपने चश्‍मे को ठीक करते हुए कहा – ‘ आपका अपना मत है परन्‍तु मेरा मत है कि भगवान ने यह प्रकृति बनायी है। इस प्रकृति में कितने सुंदर रंग है। परमपिता तक उसके बनायी प्रकृति के सहारे ही पहुंचा जा सकता है। मै प्रकृति का आनंद लेता हूं और परमपिता का शुक्रिया अदा करता हूं। मै वसंत में पीला वस्‍त्र पहन कर महसूस करता हूं कि परमपिता मेरे नजदीक है। देखो आज मेरे पीले वस्‍त्र पहने हुए है। मै प्रकति के बनाये फल खाता हूं। इस प्रकति के जरिये ही परमपिता तक पहुंचा जा सकता है। ‘ चित्रकार बोलता रहा और चित्र बनाता रहा । इतना चित्रकार शायद कभी बोला नहीं था। लडकी उसकी बात ध्‍यान से सुन रही थी। उसके मन में प्रश्‍न कौंध रहे थे। उसने पूछ ही लिया – ‘ रंग आपकी एकाग्रता को भंग नहीं करते। ‘

‘ भंग नहीं करते एकाग्रता बनाते है। रंग मेरे अंदर की भावनाओ को तृप्‍त करते है। भावनाऐं तृप्‍त होने के बाद डिस्‍टर्ब नहीं करती। उपर सफेद पहन कर भावनाओ को नियंत्रित नहीं किया जा सकता है।‘

लडकी को चित्रकार की यह बात ठीक लगी। वो एक टक घास की ओर देखती रही। बातो बातो में शाम हो गयी थी। पहले लडकी फिर चित्रकार पार्क से निकल गये थे।

अगले दिन फिर सुबह चित्रकार अपने कैनवास में व्‍यस्‍त था। लडकी अभी आयी नहीं थी। आज धूप थोडी तेज थी। पार्क में धूप घास पर गिर कर चमक रही थी। कैनवास बनाते हुए उसने सामने देखा पीले लडको में वही लडकी आ रही है। उसने अपनी आंखो को बंद करके एक बार फिर देखा वो सफेद कपडे पहनने वाली लडकी आज पीले कपडे पहन कर आयी थी। चित्रकार ने उसके पहनावे के बारे में कोई सवाल नहीं किया वो चित्र बनाता रहा। उसने बात शुरू करते हुए कहा – ‘ आप अपने जीवन को इतना सादा क्‍यों रखना चाहती है। ‘

‘ मै परमपिता की प्राप्ति के रास्‍ते को एक शांत नदी की तरह देखती हूं। उथल पुथल होकर बहने वाली नदी में नाव डगमगा सकती है। ‘ लडकी ने कहा।

‘ आप जिसे उथल पुथल कहती है वो भीतर की भावनाओ को शांत करने का साधन है। उन भावनाओ को समाप्‍त करने के लिए जीवन में रंगो की जरूरत होती है। जब तक आप सकारात्‍मक नहीं होओगे आप परमपिता तक नहीं पहुंच पाओगे। आप गीत संगीत को बाधक मानती है जबकि गीत संगीत से तो परमपिता तक पहुंचने का रास्‍ता सुगम होता है।‘ चित्रकार ने अपने कैनवास पर ब्रश चलाते हुए कहा।

लडकी  चित्रकार की बात सुनते हुए एक टक घास पर देख रही थी। चित्रकार ने अपनी कूंची को बॉक्‍स में रखते हुए कहा कि ये लीजिये आपकी पैंटिंग तैयार है। लडकी ने खडे होकर कैनवास को देखा। पूरा कैनवास सफेद था। सफेद रंग की हल्‍की, मध्‍यम और भारी तीन तरह की लेयर थी। बीच में एक हल्‍के काले रंग का बिन्‍दू था। इन सब एक टेडी मेडी काली लाईन भी बनी हुयी थी। उसने पूछा – इसे मुझे समझाओ कि यह कैनवास मेरी भावनाऐं कैसे व्‍यक्त कर रहा है।

चित्रकार अपना सामान समेटते हुए कुछ देर सोचकर बोला – ‘ मुझे लगता है कि यह पैटिंग अभी तक पूरी नही है। यदि यह पूरी होती तो आप समझ जाती है कि यह आपकी भावनाऐ है। चलो ठीक है। आप कल सुबह आना । आपको यह पैटिंग पूर्ण मिलेगी।

चित्रकार शाम को लैम्‍प पोस्‍ट के नीचे चाय पीते हुए सोचता रहा कि पैटिंग को कैसे पूरा करूं। उसने तो उस लडकी की भावनाऐं पूरी तरह से कैनवास पर उकेर दी थी। फिर भी वो अपनी भावनाओ को कैनवास पर कैसे नहीं देख पायी। वो घर पर भी रातभर सोचता रहा। वो इतना परेशान कभी नहीं रहा । उसने पहले कभी अपने आपको इतना असफल  नहीं पाया था। वो अपने आपको दुनिया का सबसे असफल चित्रकार महसूस करने लगा। उसे लगा कि अभी उसे और सीखने की जरूरत है। वो अब कल लडकी को क्‍या जवाब देगा। वो पैटिंग को कैसे पूरा करेगा। यह सोचते हुए उसे नींद आ गयी।

यह बसंत की एक और सुबह थी। रोज की तरह धूप अपनी चमक बिखेर रही थी। पार्क में सूखे पत्‍ते ईधर उधर बिखरे हुए थे। हल्‍की हवा चलने से पत्‍ते उड रहे थे। पार्क में कोई नहीं था। चिडियो की चहचहाट सुनायी दे रही थी। एक पेड के नीचे कैनवास लगा था। कैनवास एक सफेद कपडे से ढका था। चित्रकार वहां नहीं था। दूर से वो लडकी पार्क में चलते हुए आ रही थी। पीले कपडे पहने हुए और लाल बैग लटकाये हुए आ रही थी । वो पेड तक आयी। उसने इधर उधर चित्रकार को देखा। वो रेस्‍टोरेंट तक भी चित्रकार को ढुंढने को गयी । वो उसे नहीं मिला। कैनवास के आस पास उसका सामान भी नहीं था। कैनवास कपडे से ढका हुआ था। उसने कपडे को खींचा। कल वाली पैटिंग थी। सफैद की तीन लेयर के साथ एक टेडीमेडी काली लाईन थी। आज उसमे एक परिवर्तन था। पूरे कैनवास पर सफेद रंग की तीन लेयर थी। कैनवास के एक कौने पर पीला रंगा बिखरा हुआ और उसमें लाल रंग की चार पांच बिन्दिया थी। वो लडकी कैनवास को देखती रह गयी। उसने फिर अपने कपडो और अपने बैग को देखा। फिर पैटिंग को। उसने कैनवास को हाथ में लिया और पार्क के अंदर व बाहर सब जगह चित्रकार को देखा। वह उसे कहीं नहीं दिखाई दिया। उसने उसके बारे मे कुछ भी जानकारी  नहीं ली थी। वो पैटिंग को बार बार देखती रही और फिर अपने आपको।

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Sunday, April 2, 2023

झबरू

 

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धरमसाळा  री पिरोळ गढ रै पिरोळ जिती बडी ही। पिरौळ रै फाटकां माथै शूळ जिस्‍या तीरीयां तो हा कोयनी पण तीरीयां री जग्‍या चमकीले कलर रै मांय चौरस डिजायन बणियोडी ही। पिरोळ रै बिचाळै म्‍है उभौ ईयां लाग रैया हो ज्‍याण कै कुवै रै मांय जिनावर उभौ हुवै। आप म्‍हनै राजा मानौ तौ म्‍है पिरोळ बिचाळै राजा उभौ हुवै ज्‍याण उभौ हो। म्‍हारै आगै धरमसाळा री बरसाळी ही। बरसाळी रै आगै म्‍हारै साम्‍हे धरमसाळा रै सैठ रै दादौ सा री मूरत ही। मूरत रै माथै तावडे अर बिरखा सूं बचण खातर लौ रौ छोटौ सौ छपरौ हो। छपरै माथै दो चार कबूतर बैठा हा। मूरत रै चारां कांनी छौटौ सौ बाग हो। बाग री बैंच्‍या खाली ही। म्‍हारै एक कानी काउंटर हो। काउंटर री सीट माथै पागडी पैरोडो अर मुंडै रै मांय पान चबावतौ एक जणौ बैठयो रजस्टिर रै मांय पैन सूं लिख रैया हो। बिगैं आगै जात्री उभा हा। काउंटर रै लारै भौत बडी सैठ रै दादौ सा री तस्‍वीर लागौडी ही। दूजै कानी धरमसाळा री लाईब्रेरी  ही। जठै एक जणौ बैठौ छापौ बांच रैयौ हो। धरमसाळा री बरसाळी रै मांय कबूतरां रै पंखा रै फडफडाणै री आवाज आ रैयी ही। सागै जात्री बोल रैया हा। और कीं आवाज ईती बडी धरमसाळा रै मांय नीं ही। ईयां मैसूस हो रैया हो कै एक सूने गढ रै मांय दो चार लोगां रौ बोलारो हुव्‍वै। म्‍है हौळे हौळे दो पग आगै बधाया। म्‍हारै जूतां री आवाज बरसाळी रै मांय सुणीज रैयी ही। म्‍है काउण्‍टर माथै ग्‍यो, अर म्‍हारै कमरै री चाभी ली। चाभी लै अर म्‍है दूजै कानी री बरसाळी रा दो पगातियां चढया। म्‍हनै कीं नीं सुणीज रैया हो। आ बात नीं है के म्‍हारे कानां रै मायं की खराबी ही। पूरी धरमसाळा रै मायं बैवंती सूनी हवा मैसूस कर रैयो हो। दो पग आगूण उपरली बलकानी रै मांय जावण खातर पगातियां री नाळ ही। नाळ रै मायं दो कबूतर बैठया गूटर गूं कर रैया हा। म्‍है पगातियां चढतौ ज्‍यू म्‍हारै जूतां री आवाज आ रैयी ही ज्‍याण शौले फिलम रै मायं गब्‍बर सिंह रै जूतां री आवाज आवै।

म्‍है पगातियां चढ अर उपरली बालकानी रै मायं आ ग्‍यो। उपर री गैलेरी रै मायं सगळा कमरा रै आगै कूंटा माथै ताळा लटक रैया हा। छात माथै तीन पंखा लागौडा हा। अबै ठंड कम ही । पण पंखा चलाणै रौ मौसम नी हो। पंखा माथै चिडकल्‍यां बैठण लागगी ही । ईण पंखा माथै भी चिडकल्‍यां बैठी ही। गैलेरी री झाळया मांय सूं झीणौ तावडो आ रैयो हो। पूरी गैलेरी रै मांय कोई मिनख नी हो। ठैठ गैलेरी रै दूजी ठौड झीणै तावडै रै मायं पूराणौ कोट पैरोडो झबरू बैठो हो। माथै रै मायं काळै कैसां रै सागै दो चार धौळा केस चमक रैया हा। मुंछां रै मांय भी धौळा केस चमकण लाग रैया हा। आपरा गोडा भैळा करियोडा। हौळे हौळे गुन गुन कर रैयो हो। सुनी गैलेरी रै मायं झबरू रै गुन गुन री आवाज भीतां माथै चिप अर गूंज रैयी ही। पूरी गैलेरी रै कमरां रै मायं एक कमरौ म्‍हारै कनै अर दूजौ दूजै जात्री कनै हो। पूरी गैलेरी रै मायं म्‍है दो जात्री रूकोडा हा। म्‍हनै आवंतै देख झबरू उभौ हो अर हौळे हौळे भागतौ भागतौ म्‍हारै कनै आयौ।

‘ बाउजी । चा लाउं कांई । ठंड भौत पड रैयी।‘ झबरू आपरै दौनू हाथां री आंगळियां भैळी करियोडो बोल्‍यो।

‘ नीं रैवण दै। म्‍है आराम करसूं। ‘ म्‍है जवाब दियौ।

‘ बाउजी। अदरक री चा पी लो। गरमास रैसी। पढाई सौरी हुयसी। ‘ झबरू फैर कैयो।

‘ अरै यार। अबै तुं ईत्‍तौ कैवे जणै जा लै आजा। ‘ म्‍है कैयो।

म्‍है म्‍हारै कमरै रौ ताळौ कूंटौ खोल्‍यो अर मायं बडग्‍यो। कमरै रै मांय माचै माथै पौथ्‍यां ईनै बिनै पडी ही। टैबुल माथै पाणी री बौतल गुडक्‍योडी ही। म्‍है कुरसी माथै बैठ अर जमीन माथै टांगा लंबी कर ली । म्‍है रावत मिष्‍ठान भंडार तक जा अर आयो हो। बारै ठंडी हवा चाल रैयी ही। आज ईम्तियान नीं हो। अबै दौ दिन री छुटी रै बाद दूजौ पेपर है। म्‍हारै त्‍यारी करियोडी ही। ईण कारण म्‍है आज थोडो आरोम सूं हूं। अबकी बार पेपर सौरा ही हा। लारली बार पेपर दौरा घणा आया हा। म्‍है लारलै दो सालां सूं सीएस रा पेपर दैवण नै जोधपुर आउं हूं। अबकी बार फाईनल पैपर हा। ईण धरमसाळा रै मांय म्‍हनै की याद नीं रैवै खाली औ झबरू याद रैवे। म्‍है सरदी रै मायं आउं हूं जणै म्‍है ईण नै हमेस औ पूराणो कोट पैरियोडो ही देखू। हाथ आपस रै मायं बांधोडा भागतौ रैवे। रात हौवते ही बाउजी थारीं सिरख आयगी है। आ लौ बाउजी थांरो तकियो। हर अेक जात्री रौ घर आळै ज्‍यू ठा राखै। म्‍हारी तौ औ घणी सैवा करै । म्‍हनै आवंतै ही पूछै – बाउजी । घरै सब ठीक है। म्‍है धरमसाळा छौडू जणै ईण नै कांई ना कांई बख्‍शीस दे अर जाउं। म्‍है ईण नै घर रै बारै म्‍है पूछूं जणै कैवे – बाउजी। म्‍हारौ ब्‍यावं मंडसी जणै म्‍है घरै जायसूं। म्‍है पूछू- थारो ब्‍यावं कद होयसी जणै जवाब दैवे- म्‍हारै घर आळा छौरी देखे । सगपण पक्‍को हौवंते ई बाबूसा री चिटठी आ जासी। बाउजी थानै भी ब्‍यावं रै मायं चालणो है। ब्‍यांव रौ नांव लैवंते ई झबरू रै सरमा जावै। पूरी धरमसाळा रै मायं म्‍हनै झबरू ई घूमतौ दिखै। नीचे सूं सेठ आवाजां लगावंतौ रैवे – झबरू..........झबरू................झबरू.....। ईण धरमसाळा री पैचाण झबरू ही है।


म्‍है छात पर लटकोडे पंखै नै देख अर सोच रै मायं डूबोडो हो। बांडै रौ खडकौ हौवंतै ही म्‍है सौच सूं बांडे आयग्‍यो। ‘ लौ बाउजी। गरमागरम चा। ‘ म्‍है झबरू रै हाथां सूं चा आपरै हाथ मांय लै ली। झबरू बांडै कानी मुडग्‍यो। फैर पाछौ घूम्यो । फैर म्‍हारै साम्‍ही उभौ हुयग्‍यो। आपरा दौनू हाथ आपरी ठोडी कनै भैळा कर उभौ हो। म्‍है पूछयो – कीं पिसा दूं क्‍या। ‘

‘ नीं बाउजी । पिसा री जरूरत नीं है। ‘

‘ तौ’

‘ बाउजी। म्‍हारी चिटठी बांच दैसौ कांई। ‘ आपरै भौळे मुंडै सूं बोल्‍यो।

‘ क्‍यूं नीं। बांच दैसां।‘ म्‍हारै आ कैवते ई । आपरै कोट री जेब मायं हाथ घाल अर हळको टेडो होय अर चिठी निकाळ अर म्‍हनै दी। चिठी एक अंतरदेसी पत्‍तर हो। अंतरदेसी पत्‍तर म्है फाड अर बांचणौ सुरू करियो- म्‍है अठै सगळा राजी हा। तुं भी सैर रै मायं राजी हुवैला। थारी मां एकदम राजी है। तनै रोज याद करै । अजेरी गांव सूं एक सगपण आयोडो है। बात चालै है। बात पक्‍की होयसी तौ म्‍है तनै छौरी रो फौटू भेजसूं। रोटी पाणी  चोखी तरीके सूं खाये। ब्‍यांव खातर सरीर त्‍यारं करनौ है। रात नै दूध जरूर पीजै। जोधपुर री गळी मै दूध री मळाई मिलै । सेठां ने चिठी लिखोडी है। व्‍है थारै खातर दूध अर मळाई ला अर दैवेला। खा लीजै। मन लगा अर काम करीजै। ‘ म्‍है चिठी बांची। चिठी सुणतै ई व्‍हौ घणौ ई राजी हुयौ। चिठी सुण अर म्‍हनै पूछयो – बाउजी । अबकी बार म्‍हारो ब्‍यांव पक्‍कौ हो जासी नीं।

म्‍है कैयो – हुवै क्‍यूं कोयनी। थारै ईत्‍ती बढिया नौकरी है। अठै थारो रैवास भी चोखो है। ‘ म्‍हारी बात सुण अर राजी हौवंतौ बोल्‍यो- म्‍हारा बाबूसा म्‍हारै खातर चोखो सगपण देखै। ईण खातर देर लाग रैयी है। ठीक बाउजी। अबै आप पढाई करौ। कीं चीज री जरूरत हुवै तौ म्‍हनै आवाज दे दी जौ सा। ‘ आ कै अर झबरू बांडौ खौल अर निकळग्‍यो। म्‍है झबरू रै बारै मांय सोचण लाग ग्‍यो। उण टैम मोबाईल हा कोयनी। ईक्‍का दुक्‍का घरां रै मांय लैण्‍डलाईन फोन हा। म्‍है सोच्‍यो आज सैठां सूं ईण बारै मांय बात करसां। झबरू रो ब्‍यावं होवणौ चाईजै । उमर निकळ रैयी ही।

धरमसाळा रै मायं म्‍है सिंझया नै चाय पीवण नै नीचै जाउं। सिंझया नै धरमसाळा री कैंटीन रै मायं चा बण रैयी ही। कैंटीन रै मायं दूजौ कोई नीं हो। म्‍है अेकलौ हो। कोई बात नीं करण वाळो। चा आवंतै ही म्‍है साम्‍हे सेठ आळै कमरै कानी गयो। सेठ कमरै रै बांडै सौफै माथै बैठो हो। म्‍है चाय लै अर सैठ रै साम्‍हे पडी कुरसी माथै बैठग्‍यो। सैठ छापौ बांचतौ बांचतौ बार बार आपरै मुंछा माथै हाथ फैर रैयो हो। म्‍है चा रै कप सूं अैक घूंट लै अर सैठ सूं बोल्‍यो – ‘ झबरू रौ कुण सौ गांव है।‘

‘ औदसर’ सैठ आपरी मुंछा पर हाथ फैरते उत्‍तर दियौ।

‘ औ आपरै गांव जावे कोयनी क्‍या ।‘ म्‍है पूछयो।

‘ आप क्‍यूं ओ सब पूछौ हो।‘ सैठ कैयो।

म्‍है संका करते करते जवाब दियौ – ‘ औ आज म्‍हारै कनै आपरै गांव सूं आयोडी चिठी लायो हो।‘

‘ चिठी आप बांची।

‘ हां। म्‍है बांची। चिठी रै मांय व्‍है रै ब्‍यांव री बातां लिखोडी ही। व्‍है रा बाबूसा व्‍है रै खातर अैक सगपण देख्‍यौ है।‘ म्‍है चा रौ अैक और घूंट लैवंते लैवंते जवाब दियौ।

सैठ छापै ने समेटतां समेटतां कैयौ- ‘ कोई सात बरस पैला म्‍हारै गांव वाळा ईणनै म्‍हारे कनै धरमसाळा में छोडग्‍या। ईण रा मां बाबूसा अैक एक्‍सीडेंट में खत्‍म हुयग्‍या। ईण रै दिमाग रौ ईलाज चालै है। ईण नै बात री ठा नीं है कै ईण रा मां बाबूसा खत्‍म हुयग्‍या। म्‍हारै गांव रौ है। ईण खातर म्‍है संभळा हा। भौळो है। आपरौ टैम काढे है।‘

म्‍हारौ माथौ चकरा ग्‍यो। सैठ झबरू री चिठी सूं अलायदा बात बतायी। चा रौ घूंट म्‍हारे गळै में उतरतो रूकग्‍यो। म्‍है सोचतो रैयग्‍यो कै आ चिठी कठै सूं आयी। आयी तौ कुण ईणनै लिखी। म्‍है हिम्‍मत कर सैठ नै पूछयो – ‘ईण रै गांव सूं चिठी कुण भेजै।‘

‘ आपरै लारै कमरै रै मायं झांकौ घालौ।‘ सैठ आपरै साम्‍है कमरे कानी सैनाण करते कैयो। सैठ री बात सुण म्‍है और सोच रै मांय पडग्‍यो। म्‍है आपरौ मुंडौ हौळे हौळे कमरे कानी घूमायो। म्‍है कमरै रै मायं देख्‍यो। टैबुल माथै अन्‍तरदेसी पत्‍तरां री डिगली पडी ही। कनै तख्‍ती अर पैन पडयो हो। पंखै री हवा सूं अत्‍तरदेसी पत्‍तरां रौ अैक पासो उड रैयौ हो। म्‍है सैठ कानी पाछौ मुंडौ करयो। सैठ आपरै माथै सळवटां घालते हौळे सूं कैयो – ‘ झबरू री चिठीयां अठै सूं ही जावै।‘

आ सुण म्‍है उभौ हुयग्‍यो। गैलेरी रै रोसनदान रै मायं बणियोडो घौसला म्‍हारै पगा कनै आ पडयो। साम्‍है बालकानी रै मायं झबरू हाथ लारै करियोडो हौळे हौळे चालतौ दिख रैयो हो।

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Sunday, March 26, 2023

फि‍र छि‍ड़ी बात फूलो की ..............

 




चैत्र नवरात्रा में धूप तीखी होने लगती है। फर्श पर बि‍छी चमकती हुई धूप आंखो पर कि‍सी कांच के रि‍फ्लेक्‍शन की तरह पड्ती है। एक बार तो आंखे चुंधि‍याने लगती है। इस समय हमारे यहां ऐसी ही धूप है। नवरात्रा में चार दि‍न का वीकेंड था। नवरात्रा चल रहे है तो उपवास भी है। चार दि‍न के वीकेंड का अधि‍कांश समय तो पूजा पाठ में ही बीता। सुबह दोपहर और शाम का वक्‍त पूजा में ही नि‍कला। फि‍र भी कुछ कामो और आयोजनो के लि‍ए समय नि‍काल लि‍या। आयोजन अपनी पंसद के हो तो समय का रूम नि‍कल ही जाता है। वीकेण्‍ड के पहले दि‍न एक नाटक देखने जाने का नि‍श्‍चय था। अमर कला महोत्‍सव में पहले दि‍न बालीगंज 1990 नाटक खेला जाना था। इस नाटक का नाम पढते ही मैने इसे देखने जाने का नि‍श्‍चय कर लि‍या था। नाटक बालि‍का वधू फेम अनूम सोनी द्वारा अभि‍नीत होना था। मेरे लि‍ए यह पहला अनुभव था कि‍ कि‍सी ख्‍यातनाम कलाकार को नाटक करते हुए देखूं। 



शाम तक सारे काम नि‍पटाकर मै ठीक 7;30 बजे रवि‍न्‍द्र रंगमंच पहुंच गया। कोई साथ नहीं था। अकेला ही गया था। रवि‍न्‍द्र रंगमंच के बाहर भीड नहीं था। जब अंदर हॉल में प्रवेश करने वाला दरवाजा खोला तो देखा कि‍ हॉल लगभग हाउस फुल था। बैठने को कहीं जंगह नहीं मि‍ल रही थी। योगेन्‍द्र बैठा मि‍ल गया। उसके पास एक सीट पर बैग रखा हुआ था। उसने वो सीट मुझे दे दी । नाटक का सेट शानदार था। एक बंगाली घर के ड्राईग रूम का सैट था। बंगाली मकानो में होने वाले दरवाजे और दीवारो पर टंगी पेंटिग बंगाली माहौल का अहसास करा रही थी। थोडी देर में हॉल की लाईट बंद कर दी गयी। सब लोगो की नजरे स्‍टेज पर थी। नाटक अनूप सोनी की एन्‍ट्री के साथ शुरू हुआ। कमाल का अभि‍नय था। अनूप सोनी के साथ थी नि‍वेदि‍ता । दोनो के अभि‍नय से पूरे हॉल में पूरे डेढ घंटे पि‍न ड्रॉप साईलेंस रहा। हम लोग जैसे नाटक मे खो गये थे। यह दो प्रेमि‍यो की कहानी थी। नाटक में थ्रि‍लर और सस्‍पेंस था। ऐसा लगता है जि‍सने इस नाटक को नहीं देखा, उसने कुछ नहीं देखा। नाटक खत्‍म होने के बाद मै वहां से नि‍कलने लगा तो दो चार लोग और मि‍ल गये। सबसे मि‍ले और बातचीत की  और वहां से नि‍कल लि‍या।

वीकेंड का तीसरा दि‍न बेहद खास रहा । इस दि‍न मेरे सहकर्मी और मि‍त्र गोपाल जी सोनी का सुबह सुबह फोन आया कि‍ एक कार्यक्रम 11 बजे है तो आपको जरूर आना है। पूजा पाठ का समय था इसलि‍ए इतना ध्‍यान नहीं दि‍या। फि‍र पूजा पाठ नि‍पटाने के बाद कुछ काम नहीं था तो गोपालजी वाले कार्यक्रम की याद आ गयी। फि‍र नि‍कल पडा इस कार्यक्रम के लि‍ए। स्‍थानीय मोहता भवन में यह कार्यक्रम था। यह एक संगीत का कार्यक्रम था। कार्यक्रम कोई बडा नहीं था परन्‍तु दोस्‍तो ने इसे बडा बना दि‍या। मंझे हुए कलाकार वि‍जय स्‍वामी और संजय पूरोहि‍त ने मनभावन गीत सुनाये। हम सब गीतो को पूरी तरह से इंजॉय कि‍या। एक साथी ने जब नगमा छेडा – ‘ फि‍र छि‍डी बात फूलो की ........ तो उसका भरपूर आनंद लि‍या। यह कर्णप्रिय गीत सुनते ही हर कोई खो जाता है। मैने भी माईक लेकर दो चार हाथ मार लि‍ये। कुछ साथि‍यो के साथ और कुछ अकेले दो चार लाईने गुनगुना दी। मैने हर एक गीत का आनंद लिया। इस कार्यक्रम के आयोजन के लि‍ए वाकई गोपाल जी सोनी धन्‍यवाद के पात्र है।



इस वीकेंड में यह दो आयोजन बेहतरीन रहे। वीकेंड के अंति‍म दि‍न में अजि‍त फाउण्‍डेशन गया। वहां संजय श्रीमाली से बैठकर लंबी चर्चा की। मैने अपनी कि‍ताब मोळि‍यो अजि‍त फाउण्‍डेशन को भेंट की। यह कि‍ताब अब अजि‍त फाउण्‍डेशन पुस्तकालय की शोभा बढायेगी।

अब शाम हो रही है तो बता रही है कि‍ लंबा वीकेंड अब समाप्‍त हो रहा है। अब कार्यालय दि‍खाई देने लग गया है। बहुत सारा काम और देर रात तक घर लौटना। अब अगले हफते यही रहने वाला है।

Sunday, March 19, 2023

गब्बरसिंह की गोली

 


जाडो के दि‍न थे। ठंड बहुत थी। नौ बजे के करीब दि‍न नि‍कलता था और शाम को पांच बजे अंधेरा होने लगता था। शाम छ बजे तक तो सडको और छत्‍तो पर कोहरा छा जाता। हम सब बच्‍चे गर्म टोपि‍यां और स्‍वेटर पहन कर कमरो में दुबक जाते। नानी शाम की चाय नाना के आने बाद ही बनाती थी। नानी मेरे को कहती कि‍ देखना नाना आ रहे है क्‍या। मै कमरे की खि‍डकी से बाहर सडक पर झांकता। सडक पर कोहरा ही कोहरा होता। कुछ दि‍खाई नहीं देता था। आस पास के दुकानो की बत्‍ति‍यां धुंध में लहराती हुई नजर आती। सामने सडक की ओर मै देखता। दूर दूर तक धुंध के सि‍वा कुछ भी नजर नहीं आता था। फि‍र कुछ ही देर में धुंध में से नाना साईकि‍ल चलाते हुए दि‍खाई देते। गर्म कोट पहने हुए लंबी सफेद दाडी में वो यूरोपि‍यन कथाओ के जि‍न्‍न की तरह नि‍कल कर आ रहे होते।
 मै खि‍डकी बंद कर दौडकर नानी के पास जाकर नाना के आने की सूचना देता। नानी झट से चूल्‍हे पर चाय चढा देती।

वो चाय हमेंश कप और प्‍लेट में पीते। आमतौर पर लोग चाय पीते वक्‍त प्‍लेट का प्रयोग नहीं करते है। चीनी मि‍टटी के कप और प्‍लेट में ही वो चाय पीना पसंद करते थे। ठंड के दि‍नो में वो शाम को आफि‍स से आने के बाद आरामदायक कुर्सी पर बैठ कर कुछ देर कुछ न कुछ सोचते रहते । कि‍सी से बात नही करते थे। चाय को कप से प्‍लेट में डालते और प्‍लेट को होठो के पास लेजाकर फूंक मारते । फि‍र अपनी आंखो से एक टक कहीं देखते हुए प्‍लेट से चाय का घूंट लेते। उस समय इतना शांत वातावरण होता कि‍ उनके घूंट लेने की आवाज हम अपने कानो से सुन सकते थे। कभी भी हम बच्‍चे नाना के चाय पीने के घूंट की आवाज को रीदम बना लेते । कभी नाना की नजर हमारे उपर पड्ती तो हैडमास्‍टर की तरह  डांट लगा देते। नाना से मेरा करीबी का रि‍श्‍ता रहा। मुझे लगता है कि‍ वो मेरे सबसे ज्‍यादा करीब रहे। बचपन में उनका हमारे साथ हैडमास्‍टर सा बर्ताव था। हर बात को जोर से बोलकर बताते। सफेद दाडी के उपर भरे हुए गाल और बडी बडी आंखे जि‍नमें हमेंशा पीछे की ओर कुछ चलता रहता। वो हम से बाते करते तो भी लगता कि‍ वो साथ में कुछ और सोच रहे है।

नाना के रि‍टायरमेंट के बाद वो हम से दोस्‍ताना हो गये थे। वो हम बच्‍चो की रूचि‍ के बारे में बात करते । कभी अपनी तरफ से भी कोई नया काम बता देते । एक बार गर्मियो की छुटि‍यो में उन्‍होने हम सबको पूराने अखबारो से लि‍फाफे बनाना सि‍खाये। हम सब बच्‍चो ने मि‍लकर बहुत सारे लि‍फाफे बनाये और फि‍र वो दुकानो में बेचने भी गये। उन दि‍नो टीवी और मोबाईल नहीं थे। रोज शाम को नाना हमें तरह तरह के कि‍स्‍से बताते थे। कि‍स्‍से बताना तो उनकी आदत में शूमार था। दो तीन कि‍स्‍से तो वे हर बार दोहराते थे। हम भी उन कि‍स्‍सो को हर बार सुन लेते । वे अपने आफि‍स के माथुर साहब का कि‍स्‍सा हर बार सुनाते । वैसे उनके पास कि‍स्‍सो की कमी नहीं थी। हर चीज के बारे में उनके पास कोई न कोई कि‍स्‍सा था। वो अपने पलंग पर रजाई ओढ कर बैठे रहते । अपनी लंबी सफेद दाडी पर एक हाथ फेरते रहते और कि‍स्‍से याद कर हमे सुनाते। हमे लगता वो अपनी दाडी में से कि‍स्‍से नि‍कालते है। नानी हमेंशा उनकी दाडी को देखकर चि‍ढती थी। वो हमेशा उनकी दाडी पर छींटाकशी करती। नाना अपनी आंखे नानी की तरफ घूमाकर मुस्‍कुरा देते और फि‍र दाडी पर हाथ फेरने लगते। दाडी को लेकर नाना – नानी में कई बार कहासुनी भी होती थी परन्‍तु नाना के कोई असर नहीं होता। उस समय हमारे पडनाना भी जिंदा थे। पडनाना यानि‍ नाना के पि‍ता जी। मेरे पडनाना का देहांत होने पर नाना को अपनी दाडी मुंडवानी पडी थी। पडनाना के देहांत के बाद उन्‍होने दाडी नहीं रखी थी ।

जाडो में वो छत्‍त पर धूप में बैठते। मेरे से वो दाडी करने का सामान मंगवाते थे। उनका दाडी करने का सामान बहुत पूराना था। ब्रुश और पानी रखने का कप तो बरसो पूराने लग रहे थे। कप के उपर बने हुए फूल के चि‍त्र घि‍स चूके थे। केवल अहसास हो रहा था कि‍ कप के उपर फूल के चि‍त्र थे। वो एक चि‍नी मि‍टटी का सफेद कप था। उसका हैण्‍डि‍ल भी टूट चूका था। हैण्‍डि‍ल के नि‍शान कप पर जरूर थे। मै नाना को कहता कि‍ अब पानी के लि‍ए नया कप ले लेते है। नाना कप का कि‍स्‍सा का सुना देते । वो कहते यह कप उनके पि‍ताजी को पुरस्‍कार में मि‍ला था। उनके पि‍ता जी गणि‍त पढाने वाले मार्जा थे। हमारे यहां उन दि‍नो गणि‍त पढाने वाले शि‍क्षक को मार्जा कहा जाता था। नाना कहते तुम्‍हारे पडनाना की ख्याति‍ दूसरे शहरो तक थी। नागौर से भी बच्‍चे पढने के लि‍ए तुम्‍हारे पडनाना के पास आते थे। एक बार गर्वनर साहब हमारे शहर में आये थे तो उनकी ख्‍याति‍ को देखकर गर्वनर साहब ने उन्‍हे यह कप पुरस्‍कार  के रूप में दि‍या था। उस समय मै बहुत छोटा था। फि‍र जब यह कप पूराना हो गया था तो तुम्‍हारे  पडनानाजी इसे दाडी बनाने के लि‍ए पानी रखने के काम में लेने लग गये। फि‍र मै भी इसी कप में पानी डालकर दाडी बनाले लगा। इसमें दाडी बनाता हूं तो मुझे मेरे पि‍ताजी के गौरव का अहसास होता है। नाना धूप में बैठकर दाडी बनाते रहते और हम लोग उनको घेर कर बैठे रहते। फि‍र सामान को धोकर लोहे की डि‍ब्‍बि‍यां में डाल देते और कप को अलग से सुरक्षि‍त जगह पर रख देते। जब भी नाना दाडी करते तो उस कप को हम लोग बहुत संभालकर लाते थे। मेरे मामा भी उसी कप में पानी रख कर  दाडी करते । हम लोग उस कप को देखते रहते। नाना के लि‍ए वो कप उनके पि‍ताजी की नि‍शानी थी। उनको इस कप से बहुत प्रेम था। वो इसे सोने से भी कीमती मानते थे। हमे भी उस कप का उतना ही ध्‍यान रखना पडता था।

नाना के रि‍टायरमेंट के कुछ समय बाद ही हमारे शहर में टीवी आ गया था। टीवी आने के बाद हम सब लोग एक कमरे में बैठकर टीवी देखा करते थे। टीवी पर फि‍ल्‍म आती तो हम सब लोग कमरे में इकटठा होते। नाना फि‍ल्‍म के बीच में कलाकारो के बारे में बतात रहते। कहते धर्मेन्‍द्र ने इस फि‍ल्‍म की शूटि‍ग राजस्‍थान में की थी। ऐसे कई कि‍स्से वो फि‍ल्‍म के बीच में ही बताते। नाना खाना, चाय और दाडी सभी काम अब टीवी के सामने ही करते थे। एक बार टीवी पर शोले फि‍ल्‍म आ रही थी। हम सब कमरे में बैठकर टीवी देख रहे थे। नाना पीछे पलंग पर बैठकर दाडी कर रहे थे। सामने स्‍टूल पर दाडी का सामान रखा था। उसी कप में पानी रखा हुआ था। टेबि‍ल के आगे मैं बैठा था। सभी फि‍ल्‍म का आनंद ले रहे थे। एक सीन में सभी लोग शांत थे। तभी अचानक से गोली की आवाज आयी। मै डर कर पीछे हुआ। पीछे होते ही टेबि‍ल के धक्‍का लगा। कप टेबि‍ल से नीचे गि‍र गया। कप टूट गया और पानी बि‍खर गया। कमरे में शांति‍ छा गयी। मै बूत की तरह स्‍थि‍र हो गया। नाना अपनी दाडी पर ब्रश फेरते रूक गये। सभी की नजरे मेरे और नाना पर थी। कमरे में केवल टीवी की आवाज आ रही थी परन्‍तु टीवी कोई नहीं देख रहा था। सभी मेरे को और नाना को देख रहे थे। बि‍खरा हुआ पानी मेरे नजदीक आ रहा था परन्‍तु मै फि‍र भी हि‍ल नहीं रहा था। हर कोई सोच रहा था अब क्या होगा। मै मन ही मन बहुत घबरा रहा था। नाना की नजरे मेरे पर टि‍की हुयी थी। कुछ देर कि‍सी की आवाज नही आयी। फि‍र नाना जोर से हंसे और बोले- कि‍तना मजबूत कप था। कोई नहीं तोड पाया। गब्‍बर सिंह की गोली से ही टूटा। नाना के साथ सभी हंसने लग गये।


Saturday, January 7, 2023

साल के पहले दि‍न आफ रोडि‍गं

इस साल भी मै बहुत कम ब्‍लॉग लि‍ख पाया परन्‍तु पि‍छले साल की तरह इस साल भी साल की शुरूआत में ही ब्‍लॉग लि‍ख रहा हूं। नये साल की शुरूआत भी पि‍छले साल की तरह ही हुई। साल का पहला दि‍न कार्यालय के साथि‍यो के साथ बीता। इस साल ठीक वैसा ही हुआ जैसा पि‍छले साल हुआ था। इस साल एक साथी ने कोडमदेसर में सवामणी का प्रसाद रखा था। जाहि‍र हम सबको शामि‍ल होना था। साल का पहला दि‍न था और रवि‍वार भी था। सब कुछ संयोग भगवान के दर्शन और साल की अच्‍छी शुरूआत का बन गया था। हम चार पांच साथि‍यो ने कार्यक्रम बनाया। साल के पहले दि‍न सुबह कडाके की ठंड थी परन्‍तु फि‍र अच्‍छी धूप नि‍कली। मौसम का भी अच्‍छा संयोग बन गया था। हमने गि‍नती की पूरे छ: साथि‍यो की टीम बन गयी। तय हुआ कि‍ सभी गोकुल सर्किल पर मि‍लेंगे। मै तय समयानुसार सुबह ग्‍यारह बजे गोकुल सर्कि‍ल पर पहुंच गया जहां सभी साथी तैयार मि‍ले। वे सभी गाडी का इंतजार कर रहे थे। थोडी देर में टाटा सफारी गाडी आ खडी हुई और हम सब गाडी मे बैठ रवाना हुए।

पूरे रास्‍ते धूप खि‍ली हुई थी। सभी मस्‍ती करते हुए कोडमदेसर धाम की ओर जा रहे थे। रास्‍ते में राजनीति‍ की छींटाकसी से लेकर ऑफीस की मस्‍ति‍यो की बाते हो रही थी। आज साल का पहला दि‍न और रवि‍वार होने के कारण कोडमदेसर में भारी भीड थी। कोडमदेसर के द्वार से लेकर कोडमदेसर के कोरि‍डोर तक भीड लगी हुई थी। मंदि‍र में तो पैर रखने की जगह नहीं थी।

 सभी ने मंदि‍र में जाने के लि‍ए जैसे तैसे जगह बनायी और भैरवनाथ जी के दर्शन पा लि‍ये। रवि‍वार को भैरूजी के इतनी पूजा श्रंगार के साथ दर्शन हो जाना अदभूत था। मै फोटो का कोई अवसर नहीं छोडना चाहता। इसि‍लए भारी भीड के बावजूद फोटो शूट के लि‍ए मैने जगह बना ही ली। दर्शन कर मंदि‍र से बाहर आते वक्‍त अपने कार्यालय के और साथी मि‍ल गये। दूसरे साथी मि‍लने पर मन और प्रसन्नता से भर गया। हम सभी को जोरो की भूख लगी थी तो सभी ने प्रसाद स्‍थल ढुंढा और बैठ गये प्रसाद लेने । प्रसाद वैसे होता ही मन को भाने वाला परन्‍तु यहां हमारे साथी ने भगवान के लि‍ए रूचि‍ से और स्‍वादि‍ष्‍ट पकवान बनाये । भगवान का प्रसाद हो जाने के बाद तो वे और स्‍वादि‍ष्‍ट और लजीज लगने लगे। प्रसाद लेकर मेजबान साथी से वि‍दा ली। भैरवनाथ के फि‍र से दर्शन कर वापसी के लि‍ए रवाना हो गये।

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वापसी में कोडमदेसर से नि‍कलनते ही एक ढाबे पर चाय पी। यह कभी प्रसिद्ध ढाबा रहा था परन्‍तु यहां पुल बन जाने के बाद यहां आने वाले ग्राहको की संख्‍या पर फर्क पडा है परन्‍तु हमे मेहमानो की तरह चाय पि‍लायी गयी। जाडे में धूप मे बैठकर चाय पीने का सूख दुनि‍या के सभी सूखो से अलाहयदा है। चाय पीने के बाद हम घर की ओर रवाना हुए। रवाना होकर थोडी दूर ही चले थे कि‍ हमारे डाईवर ने रोही में घूमने का सुझाव दि‍या। अभी समय काफी था तो हमने डाईवर की बात मान ली और हम रोही में घूमने को राजी हो गये थे। समय से ज्‍यादा डाईवर ने रोही की जो वि‍शेषताऐं बतायी थी उससे हम प्रभावि‍त हो गये थे। इसलि‍ए हम रोही में जाने के लि‍ए राजी हो गये थे। रोही का मतलब जंगल से होता है हमारे यहां ।
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रोही में प्रवेश करते ही डाईवर ने गाइड की तरह काम करना शुरू कर दि‍या। रोही की अनोखी ि‍वशेषताओ के बारे में वह हमे बताता रहा। हमारे यहां पहाडो जैसे जंगल तो होते नहीं। इस कारण धोरो में गाडी टेडी मेढी हो रही थी जो रोमांच उत्‍पन्‍न कर रही थी। वो बता रहा था कि‍ यहां जंगली सुअर होते है तो आदमि‍यो पर हमला कर देते है। यह भी बताया कि‍ यहां मोर, खरगोश और कई तरह के पक्षी है। उसने बताया कि‍ शाम को मोर को ऩत्‍य


 करते देखा जा सकता है। रोही में वो सबसे पहले हमे लेकर गया सि‍द्धेश्‍वर महादेव मंदि‍र । जहां पर एक व्‍यक्‍ति‍ ध्‍यान में बैठा था। एक ओर छोटी झोंपडी बनी हुई थी जहां पर एक हवन कुण्‍ड भी बना था। हमारे वहां जाने से उस व्यक्‍ति‍ का ध्‍यान भंग हो गया और फि‍र हमने उनसे इस मंदि‍र के बारे में जानकारी ली। वो बताता है कि‍ वो जब भी समय मि‍लता है इस जंगल में आकर साधना करता है। यहां भी हम फोटोग्राफी का कोई मौका छोडना नहीं

 चाहते थे। हम सब ने मंदि‍र में और गाडी के इर्दगिर्‍द फोटो ग्राफी की। हम सब के बीच गोग्‍ल्‍स एक ही था तो सब ने उसी गोगल्‍स से फोटो खि‍चवाये । आप फोटो में देख सकते है। इसके बाद वो जंगल में बने करणी माता के मंदि‍र ले गया। जहां मंदि‍र में एक पूजारी था। वहां हमने पानी पीया और सुस्‍ताऐ । जंगल में हमे कोई जानवर नहीं दि‍खायी दि‍ये। कुछ तरह के कबूतर दाना चुग रहे थे। जंगल में पैदल घूमने वाले बुजुर्ग जरूर दि‍खायी दि‍ये। डार्इवर बता रहा था कि‍ इनमें अधि‍कांश बुजुर्ग 75 साल से उपर के है और वो रोज यहां आते है। पूरे जंगल में घूमते है। हम लोगो ने भी आश्‍चर्य कि‍या। वो जंगल में घूम रहे थे। अब संध्‍या हो रही थी। धूप में पेडो की परछाईयां छोटी हो रही थी। ठंड भी बढ रही थी। इसलि‍ए हमने वापि‍स लौटने का नि‍श्‍चय कि‍या। डाईवर ने गाडी वापि‍स बाहर की और चला दी। हम भैरवनाथ के भजन गाते हुए घर की तरफ चल दि‍ये। एक के बाद एक सभी को घर छोडते हुए मै भी अपने घर पर पहुचा। साल का पहला दि‍न एक बार फि‍र मेरे लि‍ए यादगार रहा। भगवान के दर्शन के साथ प्रसाद ग्रहण और जंगल में आफ रोडि‍ग यादगार रहा। अब उम्‍मीद करते है कि‍ सबके लि‍ए यह साल खुशनुमा और उपलब्‍धि‍यां देने वाला रहे। 

Monday, October 3, 2022

मनीष कुमार जोशी की कहानी - भिक्षु

 


मै अपने शहर के जिस हिस्‍से में रहता हूं वहां आश्रम बहुत है। हर एक किलोमीटर पर एक आश्रम है। हर किलोमीटर ही नहीं बल्कि हर सौ मीटर की दूरी पर एक आश्रम आपको मिलेगा। यह हिन्‍दू सनातन संस्‍क़ति के आश्रम है। इस क्षेत्र में रहने वाले बाशिन्‍दे अपने आपको आश्रम का हिस्‍सा ही मानते है। यहां के लोग का रहन सहन साधारण है और खान पान भी साधारण है। यहां तक की यहां कोई प्‍याज भी नहीं खाता है। हम लोग सुबह उठते है तो हमारे कानो में वेदमंत्र और प्रार्थनाओ की आवाजे पडती है। शाम को मन्दिरो की घंटिया सुनाई देती है। हमारे यहां इन आश्रमो को बगेचियां कहते है। इन बगेचियों में संत और साधु रहते है। महिला साधुओ और संतो की बगेचियां अलग से है। दोंपहर में इन बगेचियों में प्रवचन होते है जिसमें हर घर से काई न कोई जाता है। प्रवचनो की आवाजे हमारे घरो तक भी आती रहती है। जब कोई बडा संत किसी बगेची मे आता है तो आस पास के लोग उसमें सहयोग करते है। युवा बढ चढ कर इसमें हिस्‍सा लेते है। आने वाले संत की वो खूब सेवा करते है। सुबह सुबह जब आप निकलते हो तो आप को कहीं न कहीं कोई साधु और संत मिल ही जाता है।  यहां किसी वाशिदे को आज तक कभी किसी बगेची के कार्यक्रम से कोई परेशानी नहीं हुई है और वाशिंदो के किसी कार्यक्रम से किसी बगेची को कोई परेंशानी नहीं हुई है। 

मै इस क्षेत्र में रहता हूं तो मै भी बगेची की संस्‍कृति से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। मेरे घर से मेरी मां इन बगेचियो में जाती रहती है। जब घर से मां बगेची जाती है तो हमें भी कभी जाने का अवसर मिल ही जाता है। मैं जब छोटा था तो अपनी मां के साथ बगेची जाया करता था। मां कभी मेरे साथ बगेची में भेंट भी भेजती थी और मै दौडकर उस बगेची में दे आता था। हमारे लिए कोई बगेची घर से ज्यादा दूर नहीं थी। कभी मै अपने दोस्‍त के साथ उस बगेची में भेंट देने के लिए ले जाता था। किसी उत्‍सव या त्‍योंहार के अवसर पर मां हम सब घरवालो को बगेची में महंतजी से आर्शिवाद लेने भेजती । हम सब की यह आदत भी हो चुकी थी कि उत्‍सव या त्‍योंहार के अवसर पर हम सब एक साथ बगेची जाते । मै जब पन्‍द्रह – सत्रह वर्ष का रहा होउंगा। मै मां के साथ बेगची जाता था। बगेची मे मै महंत जी से आर्शीवाद लेता और मंदिर में दर्शन करता। यहां हर बगेची में मंदिर बना है। वहां साधुओ और संतो की टोलियो को देखता । मैं उन साधु और संतो की टोलियो को देखकर प्रभावित होता। मुझे हमेंशा से ही साधु और संतो के दर्शन करना अच्‍छा लगता है। उस समय में उनके कार्यकलापो को देखता कि वे कहां जाते और क्‍या करते है। एक उत्‍सुकता मेरे मन में हमेंशा बनी रहती। मैं उनके द्वारा उच्‍चारित किये जाने वाले वेद मंत्रो को ध्‍यान लगाकर सुनता। मै अपनी मां से इस बारे में बहुत सारे प्रश्‍न पूछता रहता ।  साधु और संत टीवी नहीं देखते क्‍या । साधु और संत दूसरे कपडे क्‍यो नहीं पहनते । ये भी त्‍योंहार मनाते है क्‍या। त्‍योहरो पर ये भी खरीदारी करते है क्‍या । बहुत सारे उटपटांग प्रश्‍न मै अपनी मां से पूछता। मेरी मां मेंरे हर प्रश्‍न का जवाब देकर मुझे संतुष्‍ट कर देती। उन दिनो में बगेची में गया तो मुझे एक लडका हमेंशा प्रभावित करता। वो मेरी उम्रं का ही रहा होगा। कोई चौदह- पन्‍द्रह वर्ष का। मैं बगेची जाता तो वो मुझे साधुओ के साथ चलता हुआ दिखता। मुंडन करवाया हुआ और भगवे वस्‍त्र पहने हुए। मै उसकी तरफ देखता तो वो मुस्‍कुरा देता। उसे आये हुए कुछ दिन ही हुए होंगे। उसके होठो के बीच निकले हुए सफेद दांत हमेंशा मेरे में उर्जा भर देते। साधु और संत वेदमंत्रो का उच्‍चारण करते तो वो भी उसी लय में वेदमंत्रो का उच्‍चारण करता। महंत जी उसे भिक्षु कहकर बुलाते । मैने कभी उसके माथे पर चिंता, भय और परेशानी की कोई रेखा नहीं देखी। मां के साथ कभी दोपहर में प्रवचन में जाता तो भिक्षु मंहत जी के पीछे बैठा होता। वैसे ही मुस्‍कुराते हुए। शाम को कभी मै बगेची जाता तो वो मंदिर में आरती करते हुए मिलता। वो जोर जोर से स्‍तुति के साथ आरती गाता। वहां आये हुए लोग आरती के बाद उसके चरण छुकर आर्शीवाद लेते । वो मुस्‍कुराते हुए आर्शीवाद देता।

मै उस समय किशोरावस्‍था में था। मेरे मन में कई प्रश्‍न उठते थे। भिक्षु को देखने के बाद तो मेरे न में प्रश्‍नो का झरना बह निकला। मै सोचता रहता कि इतना छोटा बच्‍चा साधु कैसे बन गया। क्‍या घर से भागकर साधु बना है। उसका मन साधु बनने में कैसे लग गया। मै अपनी मां से ये सारे सवाल पूछता । मेरी मां मेरे सवालो का कुछ न कुछ उत्‍तर दे देती परन्‍तु भिक्ष्‍ुा  पर दिये गये जवाबो से मै संतुष्‍ट नहीं था। मेरे मन में उलझन बनी रहती। एक शाम को मै बगेची गया। बगेची मै आरती हो रही थी। श्रद्धालुओ की भीड थी। सभी आरती में भाव विभोर थे। आरती समाप्‍त होने के बाद सभी जयकारे लगा रहे थे। भिक्षु आरती हर एक नजदीक ले जा रहा था। सभी आरती के उपर हाथ फेरकर अपनी आंखो के लगा रहे थे। भिक्षु मुस्‍कुराते हुए सभी को आरती के दर्शन कर रहा था। मैं भीड में सबसे पीछे खडा था। भिक्षु धीरे धीरे मेरी ओर आ रहा था। मेरी ओर भिक्षु आया। मै उससे कुछ पूछना चाह रहा था। मेरी हिम्‍म्‍त नहीं हो रही थी। इस कारण मेरे चेहरे पर शंका के भाव थे। भिक्षु मेरे नजदीक आया। वो ही मुस्‍कुराता हुआ। उसके दो सुदंर होठो में से सफेद दांत झांक रहे थे। ऐसे लग रहा था कि सुबह की लालिमा मे से भोर का सूरज निकल रहा हो। मैं कुछ बोल नही पाया। वह मुस्‍कुराते हुए बोल पडा- कैसे हो ब्रदर। कहते हुए आरती मेरे आगे कर दी।  मै सकपका गया। आरती के बाद घर लौटा तो मेरे जहन मे सवालो की जगह उस भिक्षु का मुस्‍रकुराता हुआ चेहरा था।

रात को बिस्‍तर पर सोने गया तो एक बार फिर सवाल मेरे सामने खडा हो गया। इतना छोटा बालक भिक्षु कैसे बन गया। उन दिनो दीवाली आने वाली थी। मै सोच रहा था कि मुझे दीवाली का इतना शौक है। मै दीवाली पर पूरे शहर की रोशनी देखने जाता हूं। इतने पटाखे फोडता हु और तरह तरह की मिठाईयां खाता हूं। मै इनके बिना नहीं रह सकता हूं। वो कैसे रहता होगा। उसके कानो में पटाखो की आवाज पडती होगी तो उस‍के मन में भी आता होगा। मै दीपावली को नये नये कपडे पहनता हु। तो भिक्षु के मन में भी दूसरे कपडे पहनने की आती होगी। यह सोच कर मै भिक्ष्‍ुा के लिए दुखी होता । मै करवटे बदलता रहा और भिक्षु के बारे में सोचता रहा।



अगले दिन मै खेलने गया। वहां भी सोचता रहा कि मुझे खेलने मे बहुत मजा आता है तो उस भिक्षुं के मन में भी तो आती होगी। उसके मन में भी तो खेलने की बात आयी होगी। पर वो खेल नही सकता। आश्रम के नियम ही है ऐसे। वो कैसे रहता होगा। उसकी जिंदगी तो रसहीन हो गयी होगी। एक बार फिर भिक्षुं को लेकर मै दुखी हुआ। बडो तक तो ठीक है पर एक बच्‍चा कैसे भिक्षु हो सकता है। तभी उस बगेची से साधुओ की एक टोली भिक्षा मांगने निकली। वैसे तो बगेचियो में बहुत से सेठ दान करते है और उन्‍हे भिक्षा मांगने की जरूरत नहीं होती है परन्‍तु भिक्षा मांगना उनकी एक परंपरा है। इसलिए वो महीने में किसी दिन भिक्षा मांगने निकलते है। कुछ एक घरो में जाकर परंपंरा का निर्वाह करते है। उन साधुओ की टोली में भिक्षु मुस्‍कुराता हुआ चल रहा था। मै उसे देखकर दुखी हो रहा था। उसके चेहरे पर कोई शिकन और चिंता नहीं थी बल्कि वो मुझ से दुगुना खुश्‍ दिखाई दे रहा था। मै फिर भी सोच रहा था कि वो इतना खुश क्‍यों है। क्‍या वो पहले अभावो में जी रहा था। हो सकता है वो पहले कहीं अनाथाश्रम में रहा हो। वहां से भागकर आया और यहां उसे अच्‍छा लगने लगा हो। फिर भी ऐसा नहीं हो सकता है कि वो इन बंधनो में खुश रहे ।

मै दिन भर उलझन में रहा। मेरे चेहरे पर उलझन साफ देखी जा सकती थी। मेरे चेहरे पर तनाव व उलझन उतनी ही थी जितनी भिक्षु के चेहरे पर खुशी और आनंद। मेरे पिताजी ने मुझे देख लिया और मेरे चेहरे पर लिखे तनाव और उलझन को पढ लिया। पिता जी ने पूछा- क्या बात है। तो मैने सारी बात अपने पिताजी को बता दी। पिताजी मेरी बात सुनकर मुस्‍कुराये और कहा कि कल मै तुम्‍हारे साथ बगेची चलूंगा। कल हम भिक्षु से ही पूछ लेते है। मै क्‍या तुम खुद ही पूछ लेना।

अगले दिन मै अपने पिताजी के साथ बगेची गया। महंत जी साधना मे व्‍यस्‍त थे। दूसरे संत अध्‍ययन कर रहे थे। भिक्षु भी अध्‍ययन कर रहा था। पिताजी ने वहां बात की  तो उन्‍होने भिक्षु से बातचीत करने की अनुमति दे दी। मै भिक्षु के सामने चुपचाप बैठा था। खामोशी से उसे देखता रहा । भिक्षु भगवे वस्‍त्र पहने हुए चेहरे पर मुस्‍कान के साथ बैठा था। भिक्षु पहले बोल पडा – क्‍या बात है ब्रादर।

मैने पूछा – एक बात पूछूं ।

भिक्षु बोला- एक नहीं दस पूछो।

मैने अपना माथा खुजाया और बोला- तुम्‍हारी मुस्‍कान असली है।

भिक्षु मेरे प्रश्‍न पर फिर मुस्‍कुराया और बोला- सौ प्रतिशत खरी। तुम्‍हे क्‍या लगा कि मै झूठा मुस्‍कुरा रहा हूं।

नहीं। मै तो ऐसे ही पूछ रहा था। तुम्‍हे कभी दूसरे प्रकार के कपडे पहनने की ईच्‍छा नहीं होती।

वो फिर मुस्‍कुराय और बोला- ब्रादर। रंग बिरंगे कपडे क्‍यों पहनते है। खुशी के लिए। मुझे वैसे ही इतनी सार खुशी मिली हुई । रंग बिरंगे कपडे पहनने लगगूगां तो ये खुशी मै खो दूंगा।

भिक्षु के जवाब से मै पूरा संतुंष्‍ट नही् हुआ। फिर मैने अगला सवाल किया – तुम्‍हे कभी खेलने का मन नहीं होता।

इस बार फिर भिक्षु मुस्‍कुराया नहीं बल्कि हंसा । उसने कहा- यहां खेलने की पाबंदी थोडे ही है। मै  जब चाहे खेल सकता हूं। मै तुम्‍हारे साथ भी खेल सकता हूं। मुझे मना थोडे ही है परन्‍तु मै ज्ञान के साथ खेलता हूं। मुझे उसमे आनंद आता है। मै महंत जी के प्रवचनो मे खो जाता हूं। मुझे शास्‍त्रो में नयी नयी चीजे मिलती है। मेरी जिज्ञासा शांत होने के बाद बढती जाती है।

इस जवाब के बाद तो मेरे को लगा कि मेरे पास सवाल है ही नहीं । फिर भी मैं पूर्ण रूप से संतुष्‍ट नहीं था। मैने फिर पूछ लिया – तुम्‍हे इतनी खुशी मिलती कैसे है।

इस बार भिक्षु मंद मंद मुस्‍काया और बोला – यह तो यहां आने पर पता चलता है।यहां पर महंत जी शास्‍त्रो का ज्ञान देते है और फिर ध्‍यान करवाते है। उस परमात्‍मा को ध्‍यान करता हूं तो मुझे खुशी मिलती है। मै परमात्‍मा में खोया रहता हूं। मेरी खुशी का कारण भी यही है। इसके लिए अभ्‍यास करना पडता है। महंत जी के सानिध्‍य में मै इसका कठोर अभ्‍यास कर रहा हू। इसी अभ्‍यास से मुझे खुशी मिलती है ब्रादर।

इस जवाब का मेरे पास कोई जवाब नहीं थी। इस जवाब ने मेरे सारे सवालो के जवाब दे दिये। अब मेरे पास कोई सवाल नहीं था। मै भिक्षु को देखता रहा। मैने भिक्षु का प्रणाम किया। आज मेरे मन में भिक्षु के प्रति आदर भाव बढ गया। मै और पिता जी मंदिर के दर्शन कर वहां से निकल लिये। हमारे कानो में वेदमंत्रो की ध्‍वनियां पड रही थी।