Saturday, June 11, 2022

स्ट्रॉबेरी

 


बसंत के दिन थे।कहीं से कोई आवाज नहीं आ रही थी। इन दिनो चलने वाली हवा का शोर ही सुनाई दे रहा था खासकर पास के पीपल के पेड़ के हिलने का। घर के पास पीपल का पेड़ था जिससे पत्‍ते गिर गिर कर घर के बरामदे में आ रहे थे। बरामदे में दोपहर तक काफी सूखे पत्‍ते आ गये थे। हवा के झोंको के साथ सूखे पत्‍तो के खनकने की आवाज आती। और कोई आवाज मुझे सुनाई नहीं दी। कभी कभार गाय के रंभाने की आवाज कानो में जरूर पड़ती। घर में घूसते ही बडा सा हॉल था। जिसमें एक डायनिंग टेबिल लगी थी। बुढि़या उस डायनिंग टेबिल पर अपने हाथ रखे हुए बैठी थी। उसके ठीक सामने एक खिड़की थी। उसकी नजरे उस खिड़की पर थी। मैं नहाकर आ चुका था। मुझे उपर की बालकानी से बुढि़या दिखाई दे रही थी। मैने कपड़े पहने और फिर बालकानी की ओर आया। बुढिया वैसे ही बैठी थी। मैं जब से आया हू बुढिया वैसे ही बैठी है। मैं बाल बना रहा था तो नीचे से बुढिया की आवाज आयी- खाना तैयार है। मैं दौड्कर नीचे गया  और डायनिंग टेबिल पर बैठ गया। बुढिया एक प्‍लेट में खाना लेकर आयी और मेरे आगे रख दिया। खाने में दाल चावल थे। मैने पूछा- आप घर में अकेली हो। बुढिया की नजरे अभी भी सामने वाली खिड़की पर थी। काफी देर तक बुढिया का कोई जवाब नहीं आया। मुझे लगा उसने मेरी बात को अनसुना कर दिया। कुछ देर बाद वो मेरी तरफ मुंह किए बिना बोली- तुम खाना खाओ। तुम्‍हे कोई तकलीफ नहीं होगी।‘ मैं खाना खाने लग गया। बुढिया लगातार उस खिड़की की ओर देखती रही। मैने बात करने की कोशिश की लेकिन मेरी किसी बात का जवाब नहीं दिया। मैने खाना खाया और उपर चला आया अपने कमरे में।

आज मेरा उदयपुर में पहला दिन था। अखबार में एक एड को देखकर यहां बुढिया के यहां पेईग गेस्‍ट के लिए संपर्क किया था। फोन पर संपर्क किया था तो एक अंकिल बोल रहे थे परन्‍तु यहां मुझे आंटी ही दिखाई दी। उपर छत्‍त पर मेरा अकेले का कमरा है बाकि सारी छत्‍त खाली है। आधी छत्‍त को धूप ने घेर लिया है। इस घर के आस पास दस बारह सरकारी बंगलेनुमा घर है। घर के सामने वाली सड़क पर ईक्‍का दुक्‍का लोग चलते नजर आते है। आदमियों की आवाज तो न के बराबर सुनाई देती है। पीपल के पेड़ो की और गायो के रंभाने की आवाजे कानो में पड़ती रहती है। मेरे को एक महीना यहां रहना है। उपर की बालकानी से नीचे का हाल दिखाई देता है। हाल में बुढिया डायनिंग टेबिल पर हाथ रखे हुए बैठी है। कभी अपने हाथो पर ठुडी रख लेती है। कई बार उठकर दरवाजा खोलती है और बरामदे जाती है। बाहर की ओर कुछ देर देखती है और फिर वापिस आकर डायनिंग टेबिल पर बैठ जाती है। शाम की चाय के लिए बुढिया ने आवाज दी। मै नीचे गया तो एक कप चाय और स्‍नेक्‍स की प्‍लेट मुझे पकड़ा दी। मेरे को बात करने का मौका ही नहीं दिया। मैने कुछ पूछा तो भी कोई जवाब नहीं दिया। अब शाम को चुकी थी। मैने नीचे की ओर देखा बुढिया वैसे ही बैठी थी। मै अपनी किताबे संभालने लगा। बाहर अंधेरा हो चुका था। पहले गर्म हवा आ रही थी परन्‍तु अब हवा में शीतलता आ गयी है। बाहर कोई ज्‍यादा रोशनी नहीं है। रोड़ लाईटो की रोशनी घर तक आ नहीं पाती है। घर के बाहर एक बल्‍ब जल रहा है। बुढिया ने खाने के लिए आवाज लगायी तो मै एक बार फिर नीचे डायनिंग टेबिल पर जाकर बैठ गया। मैने एक बार फिर बात करने की कोशिश करते हुए पूछा- अंकिल कहां है।‘ बुढिया ने खाने की प्‍लेट मेरे आगे रखते हुए बोली- मैने कहा था ना। तेरे को कोई तकलीफ नहीं होगी। तुम खाना खाओ। ‘ मैने आगे बात करना उचित नहीं समझा। मै खाना खाने लग गया। खाने में शाम को भी पुलाव ही बनाये थे। मैने खाने पर कोई टिप्‍पणी किये बिना खाना खा लिया। खाना खाने के बाद मै उपर चला गया। मुझे सफर की थकावट हो रही थी। इसलिए नींद आ रही थी। मैने सोने से पहले नीचे हॉल में देखा। बुढिया वहीं डायनिंग टेबिल पर बैठी थी। बैठे बैठे उठकर दरवाजे पर गयी। दरवाजा खोला और बरामदे मे कुछ देर खडी रही । फिर वापिस आ गयी। मेरा मन तो बहुत हो रहा था कि बुढिया से उसकी चिंता के बारे में पूछूं परन्‍तु बुढिया कुछ भी बताना नहीं चाहती थी। मुझे नींद आ रही थी। मै सोने के लिए बिस्‍तर पर चला गया।

रात को मेरी आंख खुली। सोचा बुढिया को देख लूं। सोयी है या वैसे ही बैठी है। मैने बालकानी से हाल में देखा। बुढिया डायनिंग टेबिल पर नहीं थी। इस बार वो अपनी कुर्सी खिड़की के पास लगाकर बैठी थी। हॉल में अंधेरा था। खिड़की से बाहर सड़क पर मद्धम रोशनी पड़ रही थी। सड़क पर आवाजाही नहीं थी। हवा का शोर था। हवा के साथ कभी सड़क से धूल उड़कर आती थी। सोचा नीचे बुढिया को जाकर सोने के लिए कहूं परन्‍तु बुढिया के व्‍यवहार को देखकर पांव रूक गये। वापिस सोने के लिए चला गया। सुबह देर से आंख खुली। घर पर उठते ही बिस्‍तर पर ही चाय लेता हूं। आज चाय के लिए किसी ने आवाज नहीं थी। बाद में ख्‍याल आया कि मै तो उदयपुर में पेंईग गेस्‍ट हूं। उठकर नीचे हाल मे गया। बुढिया खिड़की में रात की तरह ही बैठी थी। शायद कुर्सी पर बैठे बैठे ही उसे नींद आ गयी। मैने बुढिया को जगाया नहीं। मै कीचन में गया और चाय बनाने लगा। सामान को ढुंढने में थोडी परेशानी हुई परन्‍तु मैने चाय बना ली। एक चाय मेरे लिए और एक बुढिया के लिए बनायी। मैने चाय के दोनो कप डायनिंग टेबिल पर रखे। मै बुढिया को उठाने के लिए उसके नजदीक गया। मैने ज्‍योही उसकी कुर्सी को छुआ उसकी आंख खुल गयी। मैने उससे कुछ नहीं कहा। मैने उसका हाथ पकड़ा और उसे उठाया। हाथ पकड़कर उसे डायनिंग टेबिल पर लाया। मै उसके पास बैठ गया। उसकी नजरे उस खिड़की पर थी। मैने उससे पूछने के लिए मुंह खोला ही था कि उसकी आंखो से आंसूओ की धारा निकल गयी। उसने अपने पल्‍लू से आंसू पोंछे। फिर भी आंसू रूके नहीं। मै उठकर एक गिलास में पानी लाया। बुढिया ने मना नहीं किया और पानी पी लिया। मैने कहा- क्‍या हुआ आंटी।‘ वो कुछ बोली नहीं। अपने आंसू अपने पल्‍लू से पोंछती रही। मैने फिर कहा- आंटी । कुछ तो बोलो। शायद मै आपके कुछ काम आ सकूं’। बुढिया ने एक बार फिर आंसूओ को पोंछा और बोली- ‘बेटा । तुम्‍हारे अंकिल कल सुबह से नहीं लौटे है’। मैने पूछा- ‘कहां गये थे’।

‘कल सुबह हम दोनो में झगड़ा हुआ था। झगड़े में उन्‍होने कहा मै घर छोड़कर चला जाउंगा। मैने कहा चले जाओ। वो उसी समय घर से निकल गये। वैसे तो हर बार झगडे के बाद शाम तक लौट आते है। आज दूसरा दिन हो गया है। अभी तक नहीं आये है’। बुढिया ने उम्‍मीद देखते हुए कहा।

’आंटी आप चाय पीओ। मेरे को बाजार से कुछ सामान लाना है। मेरे को बताओ अंकिल कहां कहां जाते है। मै उन सब जगह देखकर आता हूं। वो जरूर आ जायेंगे। किसी रिश्‍तेदार के यहां रूक गये होंगे। आप चिंता मत करो । मैं उन्‍हे ढुंढने जाउंगा’। मैने बुढिया को दिलासा दिया।

बुढिया ने बताया कि उनका फोन भी कल से बंद आ रहा है। उसने मुझे बताया कि अंकिल कहां कहां जा सकते है। मै चाय नाश्‍ता करके बाहर निकल गया। बुढिया ने बताया था कि अंकिल पान खाने जरूर जाते है। तो सबसे पहले मै पान की दुकान पर गया। पान की दुकान घर से काफी दूर है। कॉलोनी से बाहर निकलने के बाद भी दो किलोमीटर दूर है। पान की दुकान के पास चहल पहल थी। यहां लग रहा था कि मै किसी शहर मे हुं वहां तो लग रहा था कि किसी जंगल में बैठा हूं। पान वाले से अंकिल के बारे में पूछा तो पान वाले ने बताया कि अंकिल दो दिन से पान खाने नहीं आ रहे है। पान वाले से उनके दोस्‍तो के बारे मे जानकारी ली। उसके बाद अंकिल के सब दोस्‍तो के घर भी गया परन्‍तु अंकिल का कोई पता नहीं चला। मुझे बाजार से कुछ सामान भी लेना था परन्‍तु ज्‍यो ज्‍यों अहसास होने लगा कि अंकिल नहीं मिलेंगे मन दुखी हो गया। मै कुछ भी खरीद नहीं पाया। मैं थके कदमो के साथ घर आ गया। घर पहुंचते ही बुढिया ने पूछा- ‘कुछ पता चला’। मैने कहा – ‘नहीं। परन्‍तु जल्‍दी ही चल जायेगा।मै कुछ लोगो से बात करके आया हूं। शाम तक इंतजार करते है। नहीं तो पुलिस थाने मे रपट लिखायेंगे’।

‘नहीं । रपट नहीं लिखायेंगे। ऐसे ही आ जायेगे’। दोपहर का खाना मै कुछ खा नहीं सका। मेरे को भी अंकिल की चिंता होने लगी थी। मै अपने कमरे में चला गया। मै बीच बीच में उठकर नीचे बुढिया को देखता। वो अंकिल के इंतजार में डायनिंग टेबिल पर बैठी थी। उठकर बरामदे में जाती और सड़क को दूर दूर तक देखती। फिर लौटकर डायनिंग टेबिल पर बैठ जाती। शाम हो चुकी थी। बुढिया वैसे ही अंकिल के इंतजार में बैठी थी। खाने का समय हो चुका था। मुझे भूख भी लग रही थी परन्‍तु मैने बुढिया को खाने के लिए कहना ठीक नहीं समझा। अब तो रात हो रही थी। मै नीचे गया। बुढिया के पास बैठ गया। मैने कहा’ ‘थाने में रपट लिखा आये’। उसने कहा- नहीं’। मैने पुछा- क्‍यों’।

‘हम दोनो प्राय झगड़ते है परन्‍तु कभी भी झगड़ा पुलिस थाना तो दूर की बात है कभी किसी दूसरे व्‍यक्ति रिश्‍तेदार के पास भी लेकर नहीं गये। हमारी कॉलोनी में भी किसी को पता नहीं है कि हम झगड़ते है। मै उनका इंतजार करूंगी जब तक वो स्‍वयं नहीं आ जाते’।

‘इतना विश्‍वास है’।

’हां’।

’कैसे’।

’ हमारे बीच जब भी झगड़ा होता है। वो मुझ से नाराज होकर चले जाते है। फिर लौटकर आते मेरी फेविरिट चीज लेकर’।

‘आपकी फेविरिट चीज क्‍या है’।

स्ट्रॉबेरी

। जब भी नाराज होते है और फिर लौटकर आते है तो स्ट्रॉबेरी लाते है’। वो मेरे से बात करते करते पूरानी यादो में खो गयी। फिर उसे ख्‍याल आया कि इस बार अंकिल आये नहीं। हर बार तो शाम को लौट आते है। आज दूसरा दिन है आये नहीं है। वो चुप हो गयी। मैने भी खाना नहीं खाया। उपर चला गया। उसने खाने के बारे मे पूछा भी नहीं । रात गहराने लगी थी। बाहर सड़क पर भी एक दो रोड लाईट की रोशनी थी। पेडो के सांय सांय करने की आवाजे आ रही थी। मैने बुढिया को देखा। बुढिया वहीं डायनिंग टेबिल पर बैठी थी। मुझे लगा कि वो ऐसे ही जागती रही तो उसकी तबीयत भी खराब हो सकती है। वो अपनी आंखो पल्‍लू से पोंछती और नजरे खिड़की पर गढा देती। सड़क पर कोई राहगीर दिखता तो वो खिड़की पर जाती। उस राह‍गीर को देखकर वापिस डायनिंग टेबिल पर लौट आती। अब बारह बज रहे थे। मेरा मन आशंकाओ से भर गया था। आशंकाऐं बुढिया के मन में भी रही होगी। ठीक बाहर बजे दरवाजे की बैल बजी। मै दौडकर नीचे गया। बुढिया मुझ से पहले ही दरवाजे तक पहुंच चुकी थी। मै बुढिया के पीछे था। बुढिया ने दरवाजा खोला। खोलते ही सामने बुजुर्ग खड़े थे। बुढिया कुछ नहीं बोली। वहीं खड़ी रही। उस बुजुर्ग को देखती रही। बुजुर्ग भी बुढिया को एक टक देखता रहा। बाहर हवा से पीपल के पेड के पत्‍ते उड़कर उस अंकिल पर गिर रहे थे। हम तीनो के बीच कोई आवाज नहीं थी। हवा के सांय सांय की आवाज आ रही थी। रोशनी इतनी ही थी कि दोनो के चेहरे दिखाई दे। सफेद बालो वाले अंकिल कुछ नहीं बोले वे बुढिया को देखते रहे। बुढिया भी कुछ नहीं बोली । चुपचाप देखती रही। मैने भी कुछ बोलना ठीक नहीं समझा। कुछ देर बाद अंकिल ने अपने पीछे किऐ हुए हाथ आगे लाये। उनके हाथ में स्ट्रॉबेरी का बडा सा डिब्‍बा था। उस डिब्‍बे मेसे लाल लाल स्ट्रॉबेरी दिखाई दे रहे थे। अंकिल ने डिब्‍बा बुढिया के आगे करके कहा- ‘इस बार मुझे याद है। आज तुम्‍हारा जन्‍म दिन है। हैप्‍पी बर्थडे’। अब बुढिया की आंखो से नहीं रूकने वाला पानी बहने लगा। मैने दोनो को पकड़ा और डायनिंग टेबिल पर लाकर बैठाया। दोनो एक दूसरे के सामने बैठे थे। हॉल में अंधेरा था। खिड़की से रोड लाईट की रोशनी आ रही थी जो सीधे स्ट्रॉबेरी पर गिर रही थी। उनके बीच में पड़े लाल लाल रंग की स्ट्रॉबेरी के गुच्‍छे चमक रहे थे।

Saturday, June 4, 2022

नानाजी के प्रयोग

 

मै जब दसवीं में पढता था तो मेरे नानाजी रिटायर हो गये थे। मै सोचता था कि नानाजी रिटायर होने के बाद क्‍या करेंगे। यह सोचना नानाजी का काम था परन्‍तु मेरे मन में जिज्ञासा थी क्‍योकि नानाजी बिना काम कभी बैठते नहीं थे। रिटायरमेंट के बाद कुछ दिन तो वे अपने आफिस किसी न किसी काम से जाते रहे परन्‍तु बाद में वो भी बंद हो गया। हमारे शहर मे उन दिनो यूनिवर्सिटी खुली थी। मेरे नानाजी फिर उस यूनिवर्सिटी में काम करने के लिए जाने लग गये। नानाजी साईकिल पर रोज यूनिवर्सिटी जाते थे। मैं अपने दूसरे भाईयो के साथ ननिहाल ही रहता था। रात को नानाजी हम बच्‍चो से बारी बारी से पैर दबवाते थे। नाना जी की मौसी भी वहीं रहती थी। उन दिनो आज की तरह न तो मोबाईल था और ना ही टीवी। नानाजी की मौसी रात को हम सब बच्‍चो को कहानियां सुनाती थी। रात को आंगन में नानी मौसी की खाट लगी रहती थी। उस खाट के आस पास हम सभी बच्‍चे बैठ जाते थे और नानी मौसी कहानी सुनाती थी। आज के टीवी शो की तरह हम में से कोई भी बच्‍चा कहानी छोडना नहीं चाहता था। नानाजी का कमरा सामने ही था। जब कभी पैर दबाने की मेरी बारी आती तो मुझे कहानी छोडने का बडा अफसोस होता क्‍योंकि नानी मौसी ठीक उसी समय कहानी सुनाती थी। मै पैर दबाते दबाते अपनी गर्दन उंची करके कमरे के बाहर झांकता। नानाजी आंखे बंद किये मेरे को डांट देते तो मै फिर पैर दबाने मे लग जाता। कई बार नानी मौसी देख लेती तो वो नानाजी को मुझे भेजने के लिए कह देती। मैं दौडकर कहानी सुनने आ जाता।

नानाजी का यूनिवर्सिटी जाने का सिलसिला ज्‍यादा नहीं चला। फिर वो दिनभर घर में ही कुछ न कुछ करते रहते। कभी अपनी आफीस की पूरानी फाईले देखते तो कभी कोई किताब पढ्ते। रविवार को विशेष पूजा करते । मेरे से प्रसाद के लिए बाजार से लडडू मंगवाते। हम सब बच्‍चे नानाजी पूजा करते तो पीछे बैठ जाते । नानाजी पूजा करने में तीन-चार घंटे लगाते । हम तीन चार घंटे लगातार इंतजार करते लडडू खाने के लिए। नानाजी पाठ करते हुए कई बार पीछे झांक कर देखते। हम पीछे बैठे होते। नानाजी समझ जाते कि हम सब लडडू के लिए बैठे है परन्‍तु नानाजी पूजा में कोई कसर नहीं छोडते थे। पूरे चार घंटे पूजा करते थे। उसके बाद वो लडडू हम सब में बांटते और हम बडे चाव से प्रसाद का लडडू खाते।

नानाजी हम बच्‍चो में घुलेमिले तो नहीं थे परन्‍तु हमारी बातो में रूचि बहुत लेते थे। खासकर हम अपनी पढाई के ईतर जो भी करते उसमें नानाजी पूरी रूचि लेते थे मसलन मेरे भाई को पेंटिग का बहुत शौक था तो वे उसे पेंटिंग के नये नये आयडिया देते थे। मै कोई कविता लिखता तो उसमें बताते ये ऐसे होनी चाहिए थी। अच्‍छी कविता अखबारो में छपवाने के आयडिया भी देते थे। अब रिटायरमेंट के बाद नानाजी के पास कोई काम नहीं था तो भी वे कोई न कोई काम निकाल लेते थे। नानी और नानी मौसी दोपहर को सत्‍संग में जाती तो पीछे घर में हम बच्‍चे और नाना रह जाते। नानाजी फिर हमारे साथ नये नये प्रयोग करते । एक बार तो नानाजी ने कहा कि चलो घर पर भूजिये बनाते है। मेरे को कह दिया कि स्‍टोव जला। पहले गैस वगैराह की सुविध आम नहीं थी। हमारे यहां भी गैस नहीं थी। हम केरोसीन वाला स्‍टोव जलाते थे। दूसरो को बेसन घोलने और दूसरे काम के लिए कहते। कढाई स्‍टोव पर चढाने के बाद उस पर झारी लगाकर उससे भूजिया निकालते । भूजिये बनते देख नानाजी के चेहरे पर खुशी आ जाती। नानी आने के बाद गुस्‍सा होती परन्‍तु चाय के साथ नानी भी भुजियो के मजे लेती। कई बार तो कोई मिठाई बनाने के लिए पूरे घर भर को लगा देते। बाजार से मावा और दूध लाते । मेरी मां, मौसी और मामी भी इसी काम में लग जाते। कई बार तो मिठाई बन जाती और कई बार खराब हो जाती। परन्‍तु हम सब इस काम का आनंद लेते ।

एक बार दोपहर को मेरे को कहा कि स्‍टोव जला। मैने स्टोव जलाया। फिर उस पर कढाई चढाने को कहा। फिर नानाजी ने जैसा कहा करता गया। उसमे तेल डाला, बेसन डाला, चीनी डाली और नींबू डाला। मैने नानाजी से कहा हम क्‍या बना रहे है तो नानाजी ने कहा देखते जाओ क्‍या बनता है। कुछ देर बाद नानाजी उसको पका कर नीचे उतारा और मेरे से कहा चखो – कैसा बना है। मैने पूछा- नानाजी हमने क्‍या बनाया है। नानाजी ने कहा – पहले चखो। फिर नाम रखते है। मैने चखा। मैने अपना मुंह बनाते हुए कहा कि – अजीब सा स्‍वाद है। कुछ खटटा है कुछ मीठा है और थोडा थोडा तीखा भी है। नानाजी कहा बन गया। यह हमारी नयी डिश है। अब इसको बडे स्‍तर पर बनायेगे। मैं कुछ समझ नहीं पाया और खेलने चला गया।

गरमीयो में हमारे स्‍कूल की छुटिया थी। नानाजी ने हमे नया टास्‍क दे दिया। उन्‍होने दोपहर को हम सबको बुलाया और कहा कि चलो कुछ नया करते है। उन्‍होने पूराने अखबार मंगवाये। फिर कहा कि हम लिफाफे बनाते है। नानाजी ने अखबार काटकर हम सबको लिफाफा बनाना सिखाया। लिफाफा चिपकाने के लिए उन्‍होने गोंद का प्रयोग नहीं किया। उन्‍होने हमे आटे से लई बनानी सिखाई। बहुत सारी लई बना लेते फिर उससे हम लिफाफे चिपकाते। यह लिफाफे उन दिनो दुकान वाले काम में लेते थे। दस – पन्‍द्र लिफाफे बनाने के बाद मुझ से कहा कि सामने दुकानदार से पूछ कर आओ कि इस प्रकार के लिफाफे उसके काम आ जायेंगे क्‍या। मै उससे पूछ कर आया और उसने हां कर दी। फिर क्‍या था नानाजी ने बडे स्‍तर पर यह काम शुरू कर दिया। हमे सुबह से शाम तक इसी में लगाकर रखते। अलग अलग नाप के लिफाफे हमसे बनवाते। लिफाफो की पहली खेप तैयार हो गयी तो मै सामने वाले दुकानदार को दे आया। उसको पसंद भी आ गये। अब नानाजी का हौसला और बढ गया। उन्‍होने एक सप्‍ताह में बहुत सारे लिफाफे तैयार करवा दिये। हमारा ननिहाल बाजार के बीच में था। ननिहाल के चारा ओर दुकाने ही दुकान थी।

एक सप्‍ताह में जितने लिफाफे तैयार होते । मै साईकिल लेकर निकलता हर एक दुकान में देता जाता। लगभग हर दुकान वाला ऐसे लिफाफे खरीद लेता। सामने दुकानदार के बगल में ही एक लकडी की टाल थी। फोग की लकडियो की दुकान को हमारे यहां टाल कहा जाता है। पहले अधिकांश घरो में ईधन के रूप में फोग की लकडियो का ही प्रयोग होता था। उस टाल पर एक युवा लड्का अशोक बैठा रहता। केवल कच्‍छा पहने हुए बाकि सारे बदन पर कुछ नहीं होता था। सरदी और गरमी में वह ऐसे ही रहता था। उसके टाल के आगे से मै निकलता तो वो दो चार लिफाफे खींच लेता था। मेरे को बहुत गुस्‍सा आता था परन्‍तु वो मुझ से बडा था तो मै कुछ  कह नहीं पाता था।

शाम को नानाजी हिसाब करते । जितने भी पैसे आते वो सब हम बच्‍चो के गुल्‍लक में डाल दिये जाते। मै नानाजी को बताता कि वो टाल वाला लडका लिफाफे खींच लेता है। नानाजी कहते – वो बेवकूफ है। नंगा बैठा रहता। मैने कहा नानाजी वो ऐसा क्‍यों है। नानाजी बताते कि उसकी शादी नहीं हो रही है। क्‍योंकि वो लकडी की टाल पर बैठता है। इसीलिए वो पागलो जैसी हरकते करता है। तुम पर उस ध्‍यान नहीं दिया करो।

मै और मेरा भाई दोनो साईकिल पर रोज लिफाफे दुकानदारो को देने जाते और रोज वहीं टाल वाला लडका अशोक लिफाफे खींच लेता। वो लिफाफे उसके कुछ काम नहीं आते क्‍योंकि लकडिया तो लिफाफो में तोलकर दी नहीं जा सकती परन्‍तु छेडखानी के हिसाब से वो यह सब करता। हमे तो नानाजी ने समझाया हुआ था कि हमे उससे उलझना नहीं है। इसलिए हम कभी दो चार लिफाफे खींच लेने पर विरोध नहीं करते और आगे निकल जाते। ऐसे ही हमारी गरमियों की छुटिटयां बीत गयी। आज छुटिटयों का अंतिम दिन था। हमारे लिफाफे बेचने का भी अंतिम दिन था। आज हम साईकिल लेकर दुकानो पर लिफाफे देते हुए निकल रहे थे। लकडियो की टाल पर आज किसी ने लिफाफे नहीं खींचे। हमने मुडकर देखा। अशोक कपडे पहने हुए मुंह चिकना किए हुए बैठे मुस्‍कुरा रहा था। हम आश्‍चर्य करते हुए निकल गये। आश्‍चर्य इसलिए हुआ कि पूरे महीने उसने लिफाफे खींचे और आज उसने कुछ नहीं किया।

शाम को नानाजी को बताया। नानाजी ने भी आश्‍चर्य किया। नानाजी को भी चैन नहीं था। उन्‍होने बाहर निकल कर पडोसी दुकानदार से पूछा तो उसने बताया बाउजी । खुशी की बात है। अशोक की शादी तय हो गयी है। इसीलिए वो सीधा बनकर बैठा है। नानाजी ने अंदर आकर कहा – अपने तो छुटिटया खत्‍म हो गयी। पर कोई बात नहीं अशोक की तो शादी तय हो गयी। हम भी उठकर चले गये और अपनी किताबे बस्‍ते तैयार करने लग गये।

 

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Sunday, May 29, 2022

रेत की छुअन

मैदानी इलाको में गरमी बहुत तेज पडती है। भीषण गरमी में मैदानी ईलाको के लोग ठंडे स्‍थानो की ओर घूमने निकल जाते है। खासकर रेगिस्‍तानी इलाको के लोग भीषण गरमी से राहत पाने के लिए पहाडो की ओर जाते है। ऐसे मौसम में यदि बर्फ मिल जाये तो सोने पे सुहागा हो जाय। वहां बर्फ की छुअन रेगिस्‍तान की गरमी को कुछ क्षणो के लिए भुला देती है। वहां पहाडो पर गिरी हुई बर्फ को उठाकर एक दूसरे पर मारते है तो उसकी छुअन देह की सारी गरमी को सोख लेती है। ऐसे कोमल अहसास के लिए ही रेगस्तिानी लोग पहाडो का रूख करते है। रेगिस्‍तान में गांवो में आप जाकर देखो तो आपको पीले पीले टीले ही नजर आते है और गरमीयो की धूप में तो सोने जैसे चमकते है। आपको चारो ओर रेत के टीले ही टीले दिखते है और कहीं भी कोई पेड पौधा नहीं। आपको कहीं पेड दिखेगा भी तो खेजडी का। दूर दूर तक जहां तक आपकी नजर जाती है रेत के टीले ही टीले दिखाई देते है। गरमीयो की तपती धूप में इन टीलो पर आपको पानी जैसी भ्रमजाल वाली आक़ति दिखाई देती है। जिसे देखकर प्‍यासे राहगीर को पानी का अहसास होता है परन्‍तु वह पानी होता नहीं है। रेत के टीलो में आपके पसीने से टपकने वाला ही पानी होता है और कहीं पानी नहीं होता है।

मैं गरमीयो के कई बार ऐसे टीलो के बीच गया हूं। मैं तपती दोपहर में शौक से टीलो पर नहीं गया बल्कि सरकारी काम से जाना पडा। सरकारी काम से एक तहसील से दूसरी तहसील जाते है तो आपको टीलो में से गुजरना होता है। एक यही कारण है जिससे मुझे भरी दोपहरी में कई बार इन टीलो में जाना पडा। एक बार मेरे मामा के मि्त्र मुझसे मिलने मेरे आफीस आये तो रेत के टीलो के बारे मे उनकी बात सुनकर मै दंग रह गया। वैसे तो उनका नाम जयशंकर था परन्‍तु प्रेम का नाम चौपाया था। चौपाया मामा ने बताया कि मै और मेरा भाई दोपहरी में नंगे पैर रोही में चले जाते है। रेगिस्‍तानी इलाको को गांव और शहर के बाहर के इलाके को रोही कहा जाता है जो प्राय जंगल होता है। मैने पूछ लिया दोपहर में आप रोही में क्‍या करते हो। उन्‍होने कहा कि हम दोनो नंगे पैर जाते है और टीलो पर जाकर लेट जाते है। तपती हुई धूप हमारी देह को छुती है तो हमे बडा आनंद आता है और हमारी देह विषाक्‍त किटाणुओ से मुक्‍त हो जाती है। गरमीयों में टीलो पर रेत इतनी गरम होती है कि आप पापड सेक सकते हो। ऐसी धूप में वे दोनो टीलो पर लेट जाते थे। उन्‍होने बताया कि जब धूप ढलने लगती तो हम घर को लौटते। मै जब चौपाया मामा के बारे में सोचता हूं तो मेरी आंखे आश्‍चर्य से फटी रह जाती । इतनी धूप में उनका बदन पूरी तरह सिक जाता होगा परन्‍तु उनके चेहरे और देह पर किसी जलन का चिन्‍ह दिखाई नहीं देता था। उनका चेहरा पूरी तरह लाल दिखाई देता था।

रेत की छुअन का अहसास तो मैने भी किया है परन्‍तु चौपाया मामा जैसा नहीं । रेत जैसे दिन में तपती है राज को उतनी ही जल्‍दी ठंडी हो जाती है। मै बचपन में एक बार अपने मोहल्‍ले के ताउजी के साथ बजरंग धोरा गया था। बरसात के बाद के दिन थे जब थोडी थोडी ठंड शुरू हो जाती है। वहां एक बडा सा टीला था। हम सभी मित्र वहां टीले पर खूब घूमे। बिना चप्‍पल हम रेत पर घूम रहे थे। ठंडी ठंडी छुअन हमे रोमांचित कर रही थी। इस छुअन को शब्‍दो में बयां नहीं किया जा सकता था। हमने एक बडा गडडा खोद एक मित्र को खडा कर उसमें रेत डाल दी। मित्र आधा रेत के अंदर था। ऐसा हम सभी ने बारी बारी से किया। रेत से भरे गढढे में रेत की छुअन पूरे बदन को कोमलता का अहसास देती थी। ऐसी छुअन बर्फ में भी नहीं होती है। भरी गरमीयों में रात को आपको रेत इतनी ही ठंडी मिलेगी। यहां जन्‍मे साहित्‍यकारो ने तो ठंडी रात में रेत के टीलो से दिखाई दे रहे चांद पर बहुत सारा काव्‍य लिखा है।

ठंड के दिनो में तो रात को रेत बर्फ जैसी ठंडी हो जाती है। उस पर नंगे पांव रखना भी मुश्‍किल हो जाता है। एक बार ठंड में मैं हमारे शहर के नजदीक पुनरासर धाम गया । वहां भी बहुत सारे रेत के टीले है। रात और सुबह तो वहां पैर रखा ही नहीं जा रहा था। जैसे ही धूप निकली रेत में गरमी आने लगी। सुबह की धूप मे हम सब टीलो पर लेट गये। ऐसा धूप सेवन मैने एक बार समुद्र के किनारे किया था। वहां लोग धूप में समुद्र के किनारे पर लेटे हुए थे। हम जब पुनरासर में लेटे हुए थे तो हम वो अहसास हो रहा था जो बिरलो को ही मिलता है। रेत ठंडी से गरम हो रही थी और उसकी छुअन हमारी देह में रोमांच पैदा कर रही थी। सुबह हम जब रेत के टीले पर लेटे हुए थे तो उस समय धूप कम थी तो टीले पर एक कीट जैसा जानवर गोबर के ढेले को लुढकाता हुआ ले जा रहा था। यह रेगिस्‍तान के टीलो में पाया जाता है। हम सब की नजरे उसी कीट पर थी। वो उसे लुढकाता हुआ टीले के उस पार ले गया। यह द़श्‍य कैमरे में कैद करने लायक था। हमने कैद भी किया। मै रेत की छुअन की वो याद हमेशा संजोये रखता हूं।

बचपन में तो रेत ही हमारी मित्र थी। उन दिनो शहर के गली मोहल्‍लो में सडके नहीं हुआ करती थी। घरो के आगे मोहल्‍लो में रेत ही रेत थी। टीले तो नहीं कह सकते परन्‍तु चलते थे तो रेत उडती थी। संडे वाले दिन हम सुबह से घर के आगे रेत में खेलते रहते थे। एक छोटा सा गढढा करके कंचे खेलते थे। खेलते हुए हमारे घुटनो से लेकर चेहरे तक मिटटी चिपक जाती थी। हमारे घुटनो पर कोई छोटी मोटी चोट लगती तो मां दवाई नहीं लगाती थी। कहती थी मिटटी लगाले ठीक हो जायेगी। रेत खेलते हुए मिटटी चोट पर गिरती और कुछ ही दिनो में चोट ठीक हो जाती। रेत से इतने सने हुए होते थे कि नहाते वक्‍त हमे साबुन की जरूरत ही नहीं पडती थी। हमे नहलाकर कमरे में बिठा दिया जाता और निर्देश दिया जाता कि अब कोई मिटटी में खेलने नहीं जायेगा। शाम को हम फिर मिटटी में खेलने चले जाते । मिटटी पर खेलते हुए घास से भी ज्‍यादा कोमलता का अहसास होता।

बचपन में तो जानबुझ कर रेत और मिटटी में खेलते थे परन्‍तु एक बार तो हम वैसे ही रेत में नहाये जा रहे थे। हमारे शहर मे एक बार पांच दिन तक लगातार धूल भरी आंधी आयी। आंधी ऐसी कि पांच दिन में एक क्षण के लिए भी नहीं रूकी। रात को छत्‍त पर सोते तो सुबह धूल से सने हुए होते। चाय भी हमे कमरो में छिपकर पीनी पडती थी ताकि चाय मे रेत न गिर जाये। नहाने के कुछ देर बाद ही हम सब रेत से सने हुए भूत जैसे दिखाई देते थे। बालो से लेकर चेहरे और कपडो में रेत ही रेत हो जाती थी। घर साफ करते थे तो झाडू से रेत हटते ही वापिस बिछ जाती। जहां झाडू नहीं लगाया वहां तो रेत के छोटे छोटे टीले बन गये। हम लोग ने उस आंधी को रोकने के लिए कई तरह के टोटके भी किए। किसी ने सुबह सुबह घर के आगे लोटे से पानी गिराया। हमारे पडोसी ने तो अपने छोटे बच्‍चे को नंगा करके छत्‍ पर घूमाया।  मंदिर के पुजारी जी ने बडे वाला शंख् शाम को बजाया परन्‍तु आंधी लगातार चलती रही। पांचवे दिन जब सुबह उठे तो हवा बंद थी तो सबने राहत की सांस ली।

रेगिस्‍तान में रेत की छुअन का अहसास रूमानी होता है। और किसी के लिए रेत परेशानी का सबब हो सकती है परन्‍तु यहां के लोगो के लिए तो वह संगिनी है। वो जीवन के साथ साथ चलती है। आप उसे लाख बुरा मान सकते हो परन्‍तु आप उसकी उपेक्षा नहीं कर सकते हो। वो आपको अपनी उपस्थिती का अहसास कराती रहेगी।   

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Sunday, May 15, 2022

कहानी- आत्‍मा का प्रलाप

 

इन दिनो आफीस से आते वक्‍त देर हो जाती थी। गरमीयो में तो इतना पता नहीं चलता था परन्‍तु सर्दीयों में घर पहुंचता थो तो धनघोर अंधेरा हो जाता था। कडाके की ठंड में रात को लौटते वक्‍त ऐसा लगता था कि नौकरी को छोड दूं परन्‍तु फिर भी नौकरी करता। नौकरी करता क्‍या अभी भी कर रहा हूं। अब इतनी देर नहीं होती है जितनी उन दिनो हो जाती थी। उन दिनो आफिस से घ्‍र आते ही ऐसे लगता था कि सीधे सो जांउ। खाने की भी ईच्‍छा नहीं रहती थी। ऐसा महसूस होता था कि मै किसी जेल का कैदी हू और मुझे रोज रात घर पर बिताने की पैरोल मिलती है। उन दिनो में बहुत परेशान रहता था। रात को आफिस से घर आता, खाना खाते ही सो जाता। बाकि दुनिया में क्‍या हो रहा है, उससे मुझे कोई मतलब नहीं रहता था। यहां तक की मैने सामाजिक कार्यक्रमो मे भी जाना बंद कर दिया था। बंद भी क्‍या कर दिया था, दरअसल मुझे सामाजिक कार्यक्रमो में जाने का समय ही नहीं मिल पाता था। उन्‍ही दिनो में एक दिन किसी खास कारण से दिन भर परेशान रहा। रात होते होते परेशानी ज्‍यादा बढ् गयी। परेशानी ऐसी थीकि ऐसा लग रहा था जैसे मेरी आत्‍मा रो रही हो। किसी दुख से बुरी तरह से पीडित हो रही हो। ऐसा महसूस होता था कि आत्‍मा असहाय महसूस कर रही है। थके थके कदमो के साथ मै घर लौट रहा था। माथे में परेशानीयो का बोझ था। कुछ समझ में नहीं आ रहा था। घर पहुच कर खाना खाया और सोने के लिए चला गया। मेरे घर का आंगन खुला है। उन दिनो सर्दी भी कम थी। इसलिए मैं आंगन में खाट डालकर सोता था। उस दिन कुछ ज्‍यादा ही परेशान था। मै आंगन में खाट डालकर सो गया। नींद नहीं आ रही थी। आंगन से आसमान दिखाई देता था। काले आसमान में तारे चमक रहे थे। नजरे तारो पर थी परन्‍तु माथे में परेशानी । सोच रहा था कि मेरी आत्‍मा कभी प्रसन्‍न नहीं रही होगी। मैने अपनी आत्‍मा को बहुत परेशान किया है। मै अपने विचारो में उलझ गया था। इसी उलझन में मेरी आंख लग गयी।

आधी रात को मेरी आंख खुल गयी। मैं उठकर बैठ गया। मेरे को ऐसा लगा किसी ने मेरे को आवाज दी है परन्‍तु मेरे कानो ने तो कोई आवाज सुनी नहीं। फिर मेरे को लगा किसी ने तो मेरे को आवाज दी है। मैने इधर उधर देखा कोई नहीं था। चारो ओर घोर घूप अंधेरा था। दोबारा सोने के लिए वापिस लेटने लगा था तो फिर मेरे को लगा किसी ने आवाज दी है। इस बार भी आवाज सुनाई नहीं दी परन्‍तु मुझे महसूस हुआ कि किसी ने मेरे को आवाज दी है। एक बार फिर मैने दांये बाये और उपर नीचे सभी जगह देखा। कोई नहीं था। पर मेरे को आवाज कौन लगा रहा है। आवाज सुनाई नहीं दे रही है परन्‍तु महसूस हो रही है। फिर आवाज आयी- किसे ढुंढ रहे हो ?

कौन हो ?

मै तुम्‍हारा आत्‍मा ।

आत्‍मा ?

हां। आत्‍मा । वहीं जिसे तुम कोस रहे हो। जिसके लिए तुम दुखी हो रहे हो। वही आत्‍मा ।

यह सुनकर मैने अपने माथे को खुजाया और फिर कहा- मुझे दिखाई नहीं दे रही ।

मै दिखाई नहीं देती हूं।

पर आवाज कैसे लगायी।

आवाज तुमको सुनाई दी।

नहीं।

मेरी आवाज भी सिर्फ महसूस की जा सकती है।

मैंने फिर आसमान की ओर देखा। कुछ दिखाई नहीं दिया। कोई धुआ धुआ सा देखने की कोशिश की। कुछ दिखाई नहीं दिया परन्‍तु सब कुछ महसूस किया। ऐसा लगा कोई तो है जो मुझसे बात कर रहा है। मैने पूछा- मै तुम्‍हे कैसे जान सकता हूं।

तुम मुझे महसूस कर रहे हो न ।

हां। कर रहा हू।

हां मै वही हूं।

यहां क्‍यों आयी हो ?

आयी हो? मै गयी कहां थी। मै तो हमेशा तुम्‍हारे पास हूं।

मेरा मतल‍ब मुझे आवाज क्‍यों दी ? मैने हैरान होते हुए पूछा।

आवाज तो तुमने दी थी। मेरी आत्‍मा रो रही है। मेरी आत्‍मा दुखी है। मै यह पूछ रही हूं कि मै दुखी क्‍यों हू। मै रो क्‍यों रही हूं।

मै सोच रहा था इसका मैं क्‍या जवाब दूं। फिर भी मैने रूक कर कहा- जब मै तुम्‍हे प्रसन्‍न करता हूं तो भी तो कहता हूं कि मेरी आत्‍मा आज प्रसन्‍न है।

ऐसा कब कहा तुमने ?

आत्‍मा के इस जवाब के बाद मै एक बार फिर सोचने लगा।  सोच कर मैने कहा – तीन महीने पहले की बात है। शादियो को सीजन था। मैं मेरे दोस्‍त की शादी में गया था। दोस्‍त पैसे वाला था। उसने शानदार आयोजन किया था। उसकी शादी में पहुचते ही मन प्रसन्‍न हो गया। शहर के बडे होटल में शादी थी। शानदार शामियाना लगाया हुआ था। अंदर प्रवेश करते ही विभिन्‍न प्रकार की खूशूबूओ का स्‍प्रे किया जा रहा था। मधुर संगीत बज रहा था। दुल्‍हा दुल्‍हन मंहगे स्‍टेज पर बैठे थे। बहुत खूबसूरत लग रहा था। मेहमानो को सबसे पहले सूप दिया जा रहा था ताकि अच्‍छी भूख लग सके। खाने में सैकडो प्रकार की वैरायटी थी। मैने हर आईटम का आनंद लिया। राजभोग से लेकर आईसक्रीम तक हर एक चीज लाजवाब थी। पूरी शादी का एंजोय करने के बाद बाहर निकला तो मेरे मुंह से एक ही बात निकली कि – आज तो मेरी आत्‍मा प्रसन्‍न हो गयी।

आत्‍मा ने जवाब दिया- खाना तुमने खाया और मै प्रसन्‍न कैसे। खाने से मेरी संतुष्टि कैसी। मै तो बदहवास सी संतुष्टि के लिए बैचेन थी और तुमने कह दिया कि मै संतुष्‍ट हूं। तुम्‍हारे खाने ने तो मुझे और बैचेन कर दिया। मेरी प्रसन्‍नता को कभी महसूस करो तो पाओगे कि मुझे क्‍या चाहिए। तुमने कभी इसका प्रयास ही नहीं किया।

मैने आत्‍मा को अपने जवाब से संतुष्‍ट करने के लिए एक और घटना सुनायी – मै पिछली गरमियों में घूमने के लिए  अपने दोस्‍तो के साथ मसूरी गया। पहाडो का सौंदर्य देखकर मन प्रसन्‍न हो गया। वहां कंपनी बाग में तो दिल बाग बाग हो गया। वहां हजारो तरह के फूल है। आदमी फूलो के सौंदर्य में खो जाता है। वहां बडे लेकर छोटे छोटे फूल भी थे। बडे फूल मैने पहली बार देखे थे। उनके नजदीक जाकर कुछ देर खडा हो गया। सब कुछ भूल गया था। वहां मुझे लगा आज मेरी आत्‍मा संतुष्‍ट हो गयी।

मेरे इतना कहने के बाद कुछ देर शांति छायी रही । फिर आत्‍मा ने जवाब दिया- तुम इसे कैसे मेरी संतुष्टि समझ सकते हो। फूलो के बाग से तुम्‍हारा मन प्रसन्‍न हो मै कैसे प्रसन्‍न हो गयी। तुम तो उस बाग के सौंदर्य में खो गये। मै तुम्‍हे बैचेन होकर ढुंढती रही कि तुम कहां चले गये। इस संतुष्टि को तुम मेरी संतुष्टि कैसे मान सकते हो। पहाडो के सौंदर्य और फूलो की कोमलता के बीच तुम मुझे तो भूल गये। वास्‍तविकता यह है कि तुमने कभी मुझे प्रसन्‍न करने का प्रयास किया ही नहीं ।

आत्‍मा के इस जवाब के बाद एक बार फिर मै सोच में पड् गया कि मै अब कौनसी घटना का स्‍मरण आत्‍मा को कराउ ताकि वो मान जावे कि मैने हमेशा से ही उसे संतुष्‍ट रखने का प्रयास किया। मुझे तत्‍काल एक घटना स्‍मरण हो आयी जिसे मैने आत्‍मा को सुना दिया- एक रात मै अपने दोस्‍त के साथ रेल्‍वे स्‍टेश्‍न से घर आ रहा था। स्‍टेशन से थोडी दूर चलते ही सडक के किनारे एक बुजुर्ग हमारे पीछे हो गया। वो हमसे भोजन की गुहार कर रहा था। कह रहा था कि उसके बच्‍चे दो दिन से भूखे है। मेरे दोस्‍त ने कहा कि ये इनका रोज का नाटक है। ऐसा कह कर वो आगे चलने लगा। मुझे लगा कि बाबा भूखा है। मैने उससे कहा कि – बच्‍चे कहा है। तो वो अपने बच्‍चो के पास ले गया। बच्‍चे भूख से तडप रहे थे। मैने उसको बहुत सारा भोजन और दूध्‍ दिलाया। मैने वहां देखा कि बच्‍चे भोजन खाते हुए अत्‍यंत प्रसन्‍न हो रहे थे। उस दिन मेरी आत्‍मा बहुत प्रसन्‍न हुई। मुझे लगा कि मेरी आत्‍मा आज प्रसन्‍न है। उस दिन वाकई मेरी आत्‍मा प्रसन्‍न थी।

मेरे इस वाकिये के बाद एक बार फिर शांति छा गयी। फिर आत्‍मा बोली- ये तो तूने अच्‍छा किया। परन्‍तु ये तूने कैसे मान लिया कि मै प्रसन्‍न हूं। तेरे इस काम से वो बाबा और तुम प्रसन्‍न हुऐ। मेरा तो इसमे कुछ हुआ ही नहीं। मुझे इसमें क्‍या मिला? जब मुझे कुछ मिला ही नहीं तो मै कैसे प्रसन्‍न हो सकती हूं। तुमने मुझे कभी प्रसन्‍न करने का प्रयास किया ही नहीं। तुम सब काम अपने लिए करते रहे ।

मैन कुछ देर सोचा और फिर कहा- तेरे को प्रसन्‍न करके मेरे को क्‍या मिलेगा । मै इस आत्‍मा को क्‍यों प्रसन्‍न करूं?

मेरे इस सवाल का जवाब आत्‍मा ने तुरंत दिया- सूकून।

मैने इतनी जल्‍दी जवाब की प्रत्‍याशा नहीं की थी। मैने भी पूछ लिया कि तुम्‍हे क्‍या चाहिए ?

आत्‍मा ने कहा – मुझे तुम चाहिए। तुम दुनिया में खोये रहते हो तो मै अकेली पड जाती हूं। मेरी दुनिया तुम हो। तुम मुझ में मिल जाओ । मेरी दुनिया प्रसन्‍न हो जायेगी। तुम मुझ में समा जाओ। मै तुम्‍हे अपने भीतर समा लेना चाहती हूं परन्‍तु तुम दुनिया में भागते रहते हो। मै दुनिया के दुख से दुखी और सुख से सुखी नहीं होती हूं। मै राह तक रही हूं कि कब तुम मुझ में समाओ और मै प्रसन्‍न हो जाउं।

इस जवाब के बाद में सुन्‍न हो गया। घोर घूप रात फिर दिखाई देने लग गयी। आसमान के तारे फिर टिमटिमाने लगे। एक क्षण रूककर आत्‍मा के जवाब पर सोचा। मनन किया तो पाया कि मुझे मेरी परेशानियो का हल मिल गया। मुझे मेरी खुशी मिल गयी।

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Saturday, May 7, 2022

कहानी- बारात फूलो की

हम लोग थार के मरूस्‍थल में रहते है जहां गरमी और सरदी दोनो तकलीफदेह होती है। यहां गरमीयां बहुत सताने वाली होती है। गरमि‍यों में या तो तेज धूप होती है या फि‍र धूल भरी आंधि‍यां  । दो दो दि‍न लगातार आंधि‍या चलती है । हर जगह धूल ही धूल हो जाती है। इन दि‍नो घर के हर कोने मे धूल मि‍लती है। आप सफाई करोगे उसके कुछ ही देर में धूल आ जाती है। थोडी बहुत धूल तो वैसे ही खाने के साथ हमारे पेट मे चली जाती है। हम हम इसके आदि‍ हो चुके है। अब हमे धूल अपनी सी लगती है। रेत के समंदर के कि‍नारे हमारे लि‍ए हरि‍याली तो कि‍ताबो में ही होती है। इसके बावजूद हम प्रकति‍ के प्रेमी होते है। हमे पेड पौधो से बहुत प्‍यार है। मुझे तो पेड् पौधो का बहुत शौक है। मै अपने घर में गमलो मे पौधे रखता हूं। मेरे पास अधि‍कांश फूलो के पौधे है। उसमें गुलाब, गेंदा, रात की रानी के पौधे है। सरदी और बसंत के दि‍नो में तो मेरे घर की बगि‍या फूलो से आच्छादि‍त रहती है। गरमि‍यों में फूल गरमी से सूख जाते है और पौधो की पत्‍ति‍यां झड जाती है। गरमि‍यो में पौधो को कम ही संभाल पाता हू। हमारे घर के नजदीक ही एक नीम का पूराना पेड् है। इस पेड् के नीचे ही फूल वाले की दुकान है। दुकान तो पेड् के पीछे है परन्‍तु वो पेड् के नीचे ही फूलो का काउंटर सजाता है। मै बेरोजगारी के दि‍नो मे अक्‍सर उसके पास जाकर बैठ जाता था। उसकी दुकान का नाम था बारात फूलो की । मै उससे पूछता कि‍ ये क्‍या नाम रखा है। तो वो बताता कि‍ उसे यह गाना बहुत पसंद है कि‍ रात है या बारात फूलो की। वो कई बार इस गाने का सुनता है। मैने भी दुकान पर रेडि‍यो पर इस गाने को सुना है।

     मै सुबह और शाम उसकी दुकान पर बैठता था। जब ग्राहकी ज्‍यादा होती तो मै उससे बात नहीं कर पाता लेकि‍न जब ग्राहक नहीं होते तो वो मूझ से खुलकर बाते करता । वो अपनी जि‍दगी के बारे में सबकुछ मुझे बता देता है परन्‍तु संकोचवश्‍ अपनी कुछ नि‍जि‍ बाते मेरे से छुपा भी लेता था। उस सड्क पर उसके अलावा और भी फूलो की दुकाने थी। इससे उसका कॉम्‍पीटि‍शन बढ गया था। वो बताता था कि‍ पहले उसके अकेले की दुकान थी परन्‍तु दो और दुकाने खुल जाने से उसकी ग्राहकी पर फर्क पडा है। दोपहर में वो अपने फूलो को काउण्‍टर से दुकान के फ्रीज में रख लेता था। वो दुकान में लेटकर संगीत के साथ उपन्‍यास पढा करता था। मै उससे पूछता कि‍ ये कैसे उपन्‍यास पढता है- मौत का सरगना, चालीस चोर, चोर दरवाजा। वो कहता कि‍ ये उपन्‍यास फि‍ल्‍मो की तरह होते है। मुझे कभी ये उपन्‍यास पसंद नहीं आये।

उसकी दुकान के सामने एक बडा सा घर था। एक क्‍या दुकान के सामने बहुत सारे घर थे। परन्तु दुकान के ठीक सामने भी एक घर था। उस घर में एक बुढि‍या रहती थी। उस बुढि‍या के लि‍ए वो रोज फूल ले जाता था। वो रोज कई तरह के ताजा फूल उस बुढि‍या के लि‍ए ले जाता था। बुढि‍या उसका इंतजार करती रहती थी क्‍योंकि‍ बुढि‍या इन्‍ही फूलो से पूजा करती थी। मैने उससे पूछा कि‍ इन फूलो के पैसे कौन देता है। उसने बताया कि‍ जब भी उसका लडका बाहर से आता है तो मेरा हि‍साब कर जाता है। इन दि‍नो वो यहीं आया हुआ है परि‍वार के साथ। उसका टासंफर इसी शहर में होया हुआ है। उसके बच्‍चे और बीवी भी यहीं आये हुए है। उसके दो बच्‍चि‍यां और एक लडका है। मैने इससे आगे और जानने की इच्‍छा नहीं थी। मै तो उसके पास बैठा रहता। एक लडकी साईकि‍ल पर वहां से नि‍कलती। वो उसकी दुकान पर नही रूक कर आगे वाली दुकान पर रूकती। वो अपनी दुकान के फूलो को व्‍यवस्‍थि‍त करता लेकि‍न वो आगे नि‍कल जाती । पास वाली दुकान से वो फूल मालाऐ ख्ररीदती और नि‍कल जाती । मैने उससे पूछा कि‍ वो कौन है तो उसने बताया कि‍ वो उस बुढि‍या की पोती है। मैने कहा यह रोज यहां से नि‍कलती है। उसने हामी भरते हुए बताया कि‍ यह शि‍व मंदि‍र जाते हुए फूल ले जाती है। रोज वो उसकी दुकान के आगे से नि‍कलती परन्‍तु फूल आगे वाली दुकान से लेती। वो अपनी दुकान के फूल सहेजता परन्‍तु उस लडकी को कभी उसके फूल पसंद नहीं आये। वो कभी भी उसकी दुकान पर रूकी नहीं और कभी उसने भी उस लडकी से पूछा नहीं। वो लडकी नि‍कलती तो वो अपने फूलो को व्‍यवस्‍थि‍त जरूर करता। कि‍सी ग्राहक से बात करता तो बात करता रूक जाता। मैने कभी ज्‍यादा उससे उस लडकी के बारे में नहीं पूछा।

सुबह सुबह वो बुढि‍या को फूल देने जाता तो उसकी छोटी पोती उसे मि‍ल जाती। वो बहुत बातूनी थी। वो उससे तरह तरह के सवाल पूछती । बुढि‍या को फूल देने के बाद कुछ देर वो उसकी पोती से बात करता रहता। उसकी पोती उससे कभी फूलो के बारे में तो कभी फित्‍मो के बारे में पूछती रहती और वो जवाब देता रहता। वो कई बार पूछती आप रोज फूल कहां से लाते हो। वो रोज एक ही जवाब देता था कि‍ बाग से। दोपहर में वो कई बार कि‍सी दुकान से सामान लेने जाती तो उसकी दुकान पर रूक जाती। वो कहती आप दुकान में क्‍यो नहीं बैठते, बाहर क्‍यो बैठते हो। वो कहता कि‍ दुकान पेड के पीछे है इसलि‍ए। वो इस तरह की हजार बाते करती। फि‍र सामने से उसकी मां आवाज लगाती छुटकी। तो छुटकी दौडकर घर चली जाती। उसने कभी भी छुटकी से नहीं पूछा कि‍ तेरी दीदी उसकी दुकान से फूल क्‍यों नहीं ले जाती है। उसकी दीदी जब भी वहां से नि‍कलने वाली होती है। उसके उम्‍मीदो के पर लग जाते। वो सारे ताजे फूल आगे रखता। अपने काउण्‍टर के आगे खूशबू वाला छि‍डकाव भी करता परन्‍तु उसकी साईकि‍ल ठंडे हवा के झोंके के साथ वहां से नि‍कल कर पास वाली दुकान पर रूकती। वहां से फूल लेती और मंदि‍र की ओर चली जाती। वो उसे देखता रह जाता। उसकी हमेशा ईच्‍छा रहती कि‍ वो उसकी दुकान से फूल खरीदे परन्‍तु कभी उसने फूल खरीदने के लि‍ए उसने कहा नहीं और जब भी उसके घर गया तो कभी उससे बात नहीं की। जब वो सामने वाले घर में फूल देने जाता तो छुटकी से बात करते वक्‍त वो उपर की बालकानी में खडी रहती। वो छुटकी से बाते करता रहता। छुटकी पूछती आप और भी लोगो के घरो में फूल देने जाते हो क्‍या । वो कहता – नहीं मै तो सि‍र्फ तुम्‍हारे घर पर ही फूल लाता हूं। वो पूछता छुटकी तुम्‍हे कौन से फूल पसंद है तो वो कहती मुझे तो लाल रंग के फूल पसंद है। छुटकी की दीदी काफी देर तक बालकानी में उन दोनो की बाते सुनती रही। उससे अब रहा नहीं गया। उसने छुटकी से पूछ ही लि‍या कि‍ तुम्‍हारी दीदी मेरी दुकान से फूल क्‍यों नहीं खरीदती है। दीदी ने टेडी नजर से उसे देखा। छुटकी ने दीदी की ओर देखा और चपलता से जवाब दि‍या- आपके पास नीला गुलाब नहीं है। दीदी को नीला गुलाब पसंद है। जि‍स दि‍न तुम नीला गुलाब लाओगे उस दि‍न दीदी जरूर तुम्‍हारी दुकान से फूल खरीदेगी। यह जवाब सुनकर उसने उपर देखा- दीदी खि‍डकी बंद करके अंदर चली गयी। वो खि‍डकी की ओर देखते हुए वापि‍स आ गया।

अब उसके दि‍माग में एक ही बात दौडने लगी- नीला गुलाब। उसने अपने फोन पर देखा – नीला गुलाब। नीला गुलाब उसे दि‍या जाता है जो मुश्‍कि‍ल से दोस्‍त बनता है। उसने देखा नीला गुलाब तो जापान में होता है। भारत में कुछ प्रयोगशाला में उगाया जाता है। भारत में यह अधि‍कांश जगहो पर सफेद फूलो को रंग करके बनाया जाता है। वो कहां मि‍ल सकता है। इन सबके बारे मे उसने पता कर लि‍या। कुछ ही दि‍नो में उसे ठि‍काना मि‍ल गया और उसने नीले गुलाब का ऑर्डर भी दे दि‍या। अब वो इंतजार करने लगा कि‍ जब नीला गुलाब आयेगा तो वो मेरी दुकान से फूल खरीदेगी। वो यह कल्‍पना करने लगा कि‍ उसकी दुकान में एक गुलदस्‍ता नीले गुलाबो का होगा। वो साईकि‍ल चलाते हुए आयेगी और नीले गुलाब देख्‍कर वो साईकि‍ल उसकी दुकान की ओर मोड लेगी। वो नीले गुलाबो के साथ दूसरे फूल भी खरीदेगी।

आज वो बहुत खुश था क्‍योंकि‍ आज उसकी दुकान पर नीले गुलाब आने वाले थे। आज शाम तक नीले गुलाब आ जायेगे और कल सुबह वो अपने काउण्‍टर पर लगा लेगा। यह सोचते हुए वो सामने रोज की तरह फूल देने गया। वहां छुटकी ने बताया कि‍ आज वो यहां से वापि‍स जा रहे है। मैने पूछा क्‍यो । तो उसने बताया कि‍ पापा का टासफर हो गया है। इसि‍लए आज ही शाम को हम कानपूर के लि‍ए नि‍कल जायेगे। उसके पैरो तले से जमीन खि‍सक गयी। वो नीले गुलाबो के बारे में सोचने लगा। वो दौड्कर दुकान पर गया। उसने अपने थोक वि‍क्रेता को फोन लगाया। उसने कहा कि‍ वो जल्‍दी से जल्‍दी पांच बचे तक भेज सकता हुं। उसने अंदाजा लगाया कि‍ सवा पांच बजे गाडी जायेगी तब तक गुलाब आ जायेंगे। उसने सौदा पक्‍का कर दि‍या।

वो दि‍न भर नीले गुलाबो के बारे मे सोचता रहा। वो यह भी सोच रहा था कि‍ वो नीले गुलाब तो उसको दे देगा परन्‍तु वो उस सुख का आनंद नहीं ले पायेगा कि‍ वो साईकि‍ल लेकर उसकी दुकान पर फूल लेने आयेगी। कई प्रकार की कहानि‍यां वो बनाता और बि‍गाडता रहा। उसने शाम को चार बजे के करीब देखा कि‍ सारा सामान गाडी में लोड हो चुका था। एक गाडी में घर के सारे लोग बैठ चुके थे। छुटकी कार के अंदर से बाय बाय कर रही थी। वह बाय बाय करके सीधे टान्‍सपोर्ट बाजार भागा। नीले फूल वही आने वाले थे। वो टांसपोर्ट बाजार पहुच कर नीले गुलाबो का इंतजार करने लगा। पांच बजे फूलो वाली गाडी आयी। उसने जरूरी कार्यवाही जल्‍दी से नि‍पटायी और गुलाब के फूल लेकर स्‍टेश्‍न की ओर दौडा। स्‍टेशन के बाहर पहुंचा तब तक सवा पांच बज चुके थे। स्‍टेशन के बाहर से गाडी खडी दि‍खाई दे रही थी। उसे लगा कि‍ अभी गाडी गयी नहीं है। वो प्‍लेटफार्म टि‍कि‍ट लेकर प्‍लेटफार्म पर पहुंचा। प्‍लेटफार्म पर पहुंचते ही गाडी ने आवाज दे दी। वो दौडकर उनका कोच ढुंढने लगा। एक कोच की खि‍डकी से छुटकी हाथ हि‍लाती दि‍ख गयी। साथ में उसकी दीदी भी बैठी थी। वो दौडकर उसके पीछे गया। वो हाथ में नीले गुलाब लि‍ये दौड रहा था। दौडभाग में कि‍सी से टक्‍कर से गुलाब नीचे गि‍र गये। वो उठाने के लि‍ए झुका तब  तक कोई उस पर पांव रख कर चला गया। उसने सीधे होकर देखा गाडी हवा से बाते करती हुइ उससे दूर चली गयी। वो धीमे कदमो से वापि‍स बाहर की ओर चल दि‍या।

Saturday, April 23, 2022

साबुन

 


गर्मियो की रात थी। छत्‍त पर बैठा था। ठंडी हवा चल रही थी। हमारे यहां गर्मियो मे राते ठंडी होती है। इस कारण रात‍ को अक्‍सर छत्‍त पर बैठता हूं। कुछ साल पहले तक लोग रात को छत्‍त पर ही सोते थे। छत्‍त पर सोने का आनंद ही अलग होता था। ठंडी हवा में छत्‍त्‍ पर सोना और देर रात तक चांदनी रात में बाते करना। इस सुख के सामने दुनिया के सारे सुख फीके है। अब नित्‍य बदल रहे जीवन में इस आनंद की कोई वैल्‍यू नहीं रह गयी है। अब अपनी छत्‍त से देखता हूं तो दूर दूर तक खाली छत्‍ते दिखाई  देती है। कुछ छत्‍तो पर सोलर सिस्‍टम लगने से छत्‍त ही सोने लायक नहीं रही। आधुनिक जीवन में पूराने सूखो को बेचकर नया सुख खरीदा जा रहा है। मैने छत्‍त पर सोने का सुख बहुत लिया है या यों कहे मैने छत्‍त के सारे सुखो को बटोरा है। मैं याद करता हूं तो मेरी आंखो के आगे नानी के घर की छत्‍त सामने आ जाती है। उस छत्‍त पर हमने कई सपने देखे थे। वो छत्‍त हमारे सपनो की गवाह है। वो हमारे आजाद बचपन की गवाह है। हम बच्‍चे नानी के पास ही रहते थे। रात को सभी बच्‍चे इकटठा होकर खूब मस्‍ती करते थे। रात होते ही छत्‍त को सजाया और संवारा जाना शुरू हो जाता था। शाम होते ही हम बच्‍चे सब मिलकर बाल्‍टी से पानी छत्‍त पर लाते और पूरी छत्‍त को पानी से गीला करते ताकि रात पर सोये तो बिस्‍तर के नीचे से हमारी देह को ठंडक मिले। फिर रात को पीने के पानी के लिए मटका लाकर रखते। बिस्‍तर लगाने के बाद हम बच्‍चो की मस्‍ती शुरू होती। हम देर रात तक दुनिया भर की बाते करते । रात को आसमान से गुजरते हवाई जहाजो को लेकर भी लंबी लंबी बहसे करते । हमारी बहसो का कोई मतलब नहीं होता था परन्‍तु एक अजीब सा सुकून मिलता । इन बहसो से नीद में सपने देखने का मेटिरियल मिलता था। जब तक नानी सोने के लिए नहीं कहती, हमारी बहसे चलती रहती। हमारी बहसो के सामने आजकल टीवी पर आने वाली बहसे भी फीकी लगती है। बहुत देर हो जाती तो नानी को कहना पड्ता- अब सो जाओ। नानी के कहने पर हम सोने के लिए आंख बंद करते।

सुबह होते ही हमारी धमाचौकडी शुरू हो जाती। यही चीज थी जो हमें नानी के यहां रोकती थी। हमे मना करने वाली कोई नही था। नाना की नजर हमारे पर रहती परन्‍तु डांटने पर नानी बीच में बाले पड्ती। इसलिए हमारे बचपन की मस्ती पर नानी का कवच था। एक ही मिनट में छत्‍त पर और एक ही मिनट में वापिस नीचे । ऐसा दिन भर चलता था। दुनिया भर के खेल हम खेल लेते थे। हमारे लिए भी नानी हमारी आईडियल थी। नानी देसी चीजे यूज करती और हमे भी वैसा ही करने के लिए कहती। नानी सुबह सुबह काला दंत मंजन करती और हमे भी काला दंत मंजन ही करने के लिए देती थी। घर में साबुन केवल नहाने के लिए इस्‍तेमाल होती थी। हम लोग नानी को बताते थे कि बर्तन साबुन से साफ करने से जल्‍दी और अच्छे साफ होते है। ऐसा कहने पर नानी हमे बालू रेत के गुण्‍ और  शासत्रो की बाते बताने लगती। कई बार तो नानी मिटटी पर शास्‍त्रो में लिखी कथाऐं बताने लगती। नानी का कहानी सुनाने का लहजा इतना सुंदर था कि हम सब काम छोड्कर कहानी सुनने बैठ जाते  और हमे नानी की बात इतनी खरी लगती जेसे पत्‍थर पर लकीर। फिर हम घर जाकर भी अपनी मां को कहते कि बरतन साबुन से नहीं मिटटी से साफ करने चाहिए। उस समय तक गलियो में सड्के बन गयी थी। अब बालू मिटटी मिलना सहज नहीं था। गलियो की मिटटी वैसे भी उपयोग के लायक नहीं होती थी। नानी के घर सदबू मियां मिटटी लेकर आते थे। वो दो हफतो में एक बार मिटटी लेकर आते थे। हम छत्‍त पर खेलते थे तो हमे दूर से ही सदबु मियां आते दिख जाते । हम दौड् कर नानी को बताते थे कि सदबू मियां आ रहे है। सदबू मियां सफेद गांधी टोपी लगाये हुए गधे पर बैठे हुए आते थे। उनके हाथ मे एक छडी होती थी। आगे चार पांच गधे और होते थे जिन पर मिटटी के थैले लटकाये हुए होते थे। आगे चार पांच गधे पूरे अनुशासन में चलते थे और पीछे सदबू मियां चलते थे। नानी के घर मिटटी का आना हमारे लिए उत्‍सव होता था। सदबू मियां घर के बाहर रूक कर आवाज देते और नानी गेट खोल देती। सदबू मियां गधो के उपर से थैले उठाकर लाते और आंगन मे खाली कर देते । हम फिर उस मिटटी के ढेर पर कुछ देर खेलते । फिर नानी उस मिटटी को अंदर रखने के लिए कहती। नानी मिटटी रखने के लिए अंदर एक छोटा कुआ बनाकर रखा था। हम लोग बरतन में भर भर कर मिटटी उस कुऐं में डालते। यह भी हमारे लिए एक खेल होता । हमारी मस्‍ती में पता ही नहीं चलता की वह ढेर कब आंगन से कुऐ मे चला गया। फिर सारा घर उस मिटटी का इस्‍तेमाल करता। नानी उससे बरतन साफ करती तो बाकि लोग शौच के बाद हाथ इसी मिटटी से धोते । नानी यह हिदायत भी देती कि हाथ तीन बार साफ करना। हमारी भी आदत मिटटी से हाथ धोने की पड् गयी । घर आते तो साबुन रखी होने के बावजूद कहीं से मिटटी लाकर मिटटी से ही हाथ धोते।

शहर में हम ठेठ गांव के हरबल जीवन का मजा ले रहे थे। सभी नानी की नसीहतो से सहमत थे। नाना और मामा जरूर कई बार नानी को कहते कि अब जमाना बदल गया है, अब साबुन से सफाई ज्‍यादा अच्‍छी होती है। नानी फिर वही पूराने किस्‍से सुनाने लगती। उधर सदबू मियां जब भी मिटटी के थैले लाते नानी उसे इसके बदले उनका महनताना देती। सदबू मियां एक थैले के पूरे पच्‍चीस पैसे लेते थे। सदबू मियां कहते थे कि वो ठेठ रोही से शुद्ध बालू रेत लाता है। उस समय पच्‍चीस पैसे की कीमत बहुत थी। नानी मियां जी को पैसे ही नही देती थी। कभी कभी पूराने कपडे भी देती थी। हमारे यहां त्‍योंहारो पर मिठाई आती तो कुछ वो सदबू मियां के लिए भी रख्‍ती। मियां जी भी मिठार्इ मांग ही लेते थे। कभी मियां जी कहते उनके बच्‍चे की फीस भरनी है तो नानी उन्‍हे फीस के भी पैसे दे देती। सदबू मियां बहुत रूचि और खुशी से मिटटी के थैले लाता था।

बरसो यह सिलसिला चलता रहा। हम लोग नानी को साबुन के फायदे बताते रहते और नानी मिटटी के फायदे। गली के लगभग सभी घरो में साबुन का उपयोग होने लगा था। सदबू मियां पहले पांच गधो पर मिटटी लाता था अब दो गधो पर ही लाता है। दो गधो पर लाना सदबू मियां के पड्ते नही पड्ता था। फिर भी नानी के स्‍वभाव के चलते वो ले आता था। मिटटी लाने से नानी की ओर से उसे काफी मदद भी मिल जाती थी। कई बार वो मिटटी लाकर बैठता तो बताता था कि उसका बेटा अब इजीनियरींग कर रहा है। वो इसके लिए नानी से कुछ पैसे भी ले गया था। उसका बेटा उसे मिटटी ढोने का काम बंद करने का कहता परन्‍तु वो कहता आज जो कुछ भी है इस मिटटी की वजह से ही है। नानी उसे कहती तु भले ही यह काम बंद करदे लेकिन मेरे लिए तो मिटटी लाकर दे देना। अब हमारे यहां शहर मे बालू मिटटी मिलती नहीं है। हम उसे देखते रहते कि वो अभी तो मिटटी लाता रहेगा। हमारे लिए साबुन से हाथ धोने की उम्‍मीद खत्‍म हो जाती। कभी मिटटी कम होती तो नानी हमे जुगती से मिटटी इस्‍तेमाल करने के लिए कहती।

 

एक दिन सदबू मियां अपनी गरदन नीचे किये गधे पर बैठा हुआ आया। नानी ने पूछा कि आज वो उदास सा क्‍यो है। उसने कहा आज वो अंतिम बार मिटटी लाया है। अब वो मिटटी नहीं लायेगा। नानी ने कारण पूछा तो उसने बताया कि मेरा बेटा मना करता है। मै बेटे की बात मानता भी नहीं । परन्‍तु बेटे की नौकरी बाहर आ गयी है। हम सब उसके साथ बाहर जा रहे है। यह सुनकर नानी ने मुझे आवाज लगायी जा मिठार्इ लेकर आ। सदबू के बेटे की नौकरी लगी है। मै दौड्कर पास की दुकान से मिठाई ले आया। सदबू मियां की आंखो में आंसू आ रहे थे। नानी ने कहा – सदबू ये तो खुशी की बात है। मेरे पोते की नौकरी लगी है। मिटटी की तो कोई बात नहीं है। अब तक बहुत सारे साधन हो गये। अब तक लोग साबुन काम में लेने लगे है। तुं चिंता न कर । आराम से जा। कोई जरूरत हो तो मुझे बताना। सदबू मियां नानी के पैरे छुने लगा तो नानी ने पैर छुने से मना कर दिया। उधर हम लोग मन ही मन खुश हो रहे थे कि अब साबुन से हाथ धायेंगे। हमारे यहां भी साबुन इस्‍तेमाल होगा। मेरा भाई कहता इतना खुश मत हो। नानी दूसरी व्‍यवस्‍थ कर लगी।

सदबू मियां को नानी ने रवाना किया। फिर मेरे को आवाज लगायी कि इस बार महीने के सामान में एक बरतन धोने की साबुन लिख देना।

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Sunday, January 2, 2022

साल का पहला दिन


 आज एक लंबे अरसे बाद ब्लॉग लिख रहा हूं.पिछले साल मैने बहुत कम किताबे पढ़ी. जब मै पढ़ नही पाता हूं तो लिख ही नही पाता हूं परन्तु जब से व्लॉग शुरू किया है. ब्लॉग लिखने का मन हो गया है. साल के पहले दिन सहकर्मियों के साथ नये साल की पार्टी मे शामिल हुआ. पार्टी मे पूराने और नये साथियो से मुलाकात हुई. कुछ यादे ताजा हुई.

आफिसो मे भी और बाहर भी लोगो मे एक चीज कॉमन होती है. उनके वोकल होने और न होने की विशेषता.  पार्टी मे कुछ लोग बहुत वोकल थे. खुलकर अपने विचार लोगो से शेयर कर रहे थे और कुछ लोग कम वोकल थे. वे अपने विचार अपने निजात साथियो के साथ ही शेयर कर रहे थे. आप एक बड़ी पार्टी मे इस प्रकार लोगों को आसानी के साथ आप दो भागों मे बांट सकते है परन्तु इन दो प्रकार के लोगो मे एक चीज सामान्य थी. एक दूसरे के प्रति सहयोग और प्रेम जो सबको एक दूसरे से बांधे रखता है. पार्टी मे सर्दीयो वाला सदाबहार खाना था जिसका जमकर लुत्फ उठाया गया. गाने के शौकिन कार्मिको ने गाने गाकर गला साफ किया.
पार्टी समाप्त होते ही हम चार पांच साथी श्री पूनरासर धाम के दर्शन के लिए निकल गये. रास्ते मे सोच रहे थे कि कोरोना के चलते दर्शन होगे या नही. रास्ते मे आने वाले सरसो के खेत मन मोह रहे थे. हमने तय किया लौटते वक्त इन खेतो मे फोटो शूट करेगे. पूनरासर धाम पहुंचने पर देखा कि यहां तो खूब भीड़ थी. लोगो नये साल के पहले दिन बाबे के दर्शन को आये हुए थे. साथी विवेक ने जगह देखकर गाड़ी पार्क की. मंदिर मे भी भीड़ थी. हम भीड़ मे पीछे काफी देर खड़े रहे. भीड़ सरक ही नही रही थी. काफी देर बाद भीड़ सरकने लगी तो हमने बाबा के और जोत के दर्शन किए. दर्शन के बाद चाय पी और पूनरासर धाम से निकल लिए.

लौटते वक्त पहले अंजनी माता मंदिर दर्शन करने गये. भीड़ यहां भी कम नही थी. बहुत खूबसूरत मंदिर है. यहां काफी देर तक फोटोग्राफी करते रहे. 

अब शाम हो रही थी तो घर के लिए रवाना हो गये. रास्ते मे पीले फूलों के लहलहाते सरसो के खेत मे फोटोशूट के लिए रूके. खेत के मालिक की अनुमति के बाद एक अच्छे से खेत मे गये. सरसों का पीला पीला खेत देखकर डीडीएलजे फिल्म की यादे ताजा हो गयी. पीले फूलों के बीच शाहरुख और काजोल दौड़ते कल्पना मे नजर आ रहे थे. हम सब ने जमकर फोटोग्राफी की. सब ने दिल खोलकर अलग अलग पोज मे फोटो खिंचवाई. 

अब धूप हल्की हो रही थी. अब हमने चलने का निश्चय किया, अंधेरा होने से पहले हम लोग घर पहुंच गये. नये साल का पहला दिन पूरी तरीके से मस्ती भरा रहा.