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Saturday, May 7, 2022

कहानी- बारात फूलो की

हम लोग थार के मरूस्‍थल में रहते है जहां गरमी और सरदी दोनो तकलीफदेह होती है। यहां गरमीयां बहुत सताने वाली होती है। गरमि‍यों में या तो तेज धूप होती है या फि‍र धूल भरी आंधि‍यां  । दो दो दि‍न लगातार आंधि‍या चलती है । हर जगह धूल ही धूल हो जाती है। इन दि‍नो घर के हर कोने मे धूल मि‍लती है। आप सफाई करोगे उसके कुछ ही देर में धूल आ जाती है। थोडी बहुत धूल तो वैसे ही खाने के साथ हमारे पेट मे चली जाती है। हम हम इसके आदि‍ हो चुके है। अब हमे धूल अपनी सी लगती है। रेत के समंदर के कि‍नारे हमारे लि‍ए हरि‍याली तो कि‍ताबो में ही होती है। इसके बावजूद हम प्रकति‍ के प्रेमी होते है। हमे पेड पौधो से बहुत प्‍यार है। मुझे तो पेड् पौधो का बहुत शौक है। मै अपने घर में गमलो मे पौधे रखता हूं। मेरे पास अधि‍कांश फूलो के पौधे है। उसमें गुलाब, गेंदा, रात की रानी के पौधे है। सरदी और बसंत के दि‍नो में तो मेरे घर की बगि‍या फूलो से आच्छादि‍त रहती है। गरमि‍यों में फूल गरमी से सूख जाते है और पौधो की पत्‍ति‍यां झड जाती है। गरमि‍यो में पौधो को कम ही संभाल पाता हू। हमारे घर के नजदीक ही एक नीम का पूराना पेड् है। इस पेड् के नीचे ही फूल वाले की दुकान है। दुकान तो पेड् के पीछे है परन्‍तु वो पेड् के नीचे ही फूलो का काउंटर सजाता है। मै बेरोजगारी के दि‍नो मे अक्‍सर उसके पास जाकर बैठ जाता था। उसकी दुकान का नाम था बारात फूलो की । मै उससे पूछता कि‍ ये क्‍या नाम रखा है। तो वो बताता कि‍ उसे यह गाना बहुत पसंद है कि‍ रात है या बारात फूलो की। वो कई बार इस गाने का सुनता है। मैने भी दुकान पर रेडि‍यो पर इस गाने को सुना है।

     मै सुबह और शाम उसकी दुकान पर बैठता था। जब ग्राहकी ज्‍यादा होती तो मै उससे बात नहीं कर पाता लेकि‍न जब ग्राहक नहीं होते तो वो मूझ से खुलकर बाते करता । वो अपनी जि‍दगी के बारे में सबकुछ मुझे बता देता है परन्‍तु संकोचवश्‍ अपनी कुछ नि‍जि‍ बाते मेरे से छुपा भी लेता था। उस सड्क पर उसके अलावा और भी फूलो की दुकाने थी। इससे उसका कॉम्‍पीटि‍शन बढ गया था। वो बताता था कि‍ पहले उसके अकेले की दुकान थी परन्‍तु दो और दुकाने खुल जाने से उसकी ग्राहकी पर फर्क पडा है। दोपहर में वो अपने फूलो को काउण्‍टर से दुकान के फ्रीज में रख लेता था। वो दुकान में लेटकर संगीत के साथ उपन्‍यास पढा करता था। मै उससे पूछता कि‍ ये कैसे उपन्‍यास पढता है- मौत का सरगना, चालीस चोर, चोर दरवाजा। वो कहता कि‍ ये उपन्‍यास फि‍ल्‍मो की तरह होते है। मुझे कभी ये उपन्‍यास पसंद नहीं आये।

उसकी दुकान के सामने एक बडा सा घर था। एक क्‍या दुकान के सामने बहुत सारे घर थे। परन्तु दुकान के ठीक सामने भी एक घर था। उस घर में एक बुढि‍या रहती थी। उस बुढि‍या के लि‍ए वो रोज फूल ले जाता था। वो रोज कई तरह के ताजा फूल उस बुढि‍या के लि‍ए ले जाता था। बुढि‍या उसका इंतजार करती रहती थी क्‍योंकि‍ बुढि‍या इन्‍ही फूलो से पूजा करती थी। मैने उससे पूछा कि‍ इन फूलो के पैसे कौन देता है। उसने बताया कि‍ जब भी उसका लडका बाहर से आता है तो मेरा हि‍साब कर जाता है। इन दि‍नो वो यहीं आया हुआ है परि‍वार के साथ। उसका टासंफर इसी शहर में होया हुआ है। उसके बच्‍चे और बीवी भी यहीं आये हुए है। उसके दो बच्‍चि‍यां और एक लडका है। मैने इससे आगे और जानने की इच्‍छा नहीं थी। मै तो उसके पास बैठा रहता। एक लडकी साईकि‍ल पर वहां से नि‍कलती। वो उसकी दुकान पर नही रूक कर आगे वाली दुकान पर रूकती। वो अपनी दुकान के फूलो को व्‍यवस्‍थि‍त करता लेकि‍न वो आगे नि‍कल जाती । पास वाली दुकान से वो फूल मालाऐ ख्ररीदती और नि‍कल जाती । मैने उससे पूछा कि‍ वो कौन है तो उसने बताया कि‍ वो उस बुढि‍या की पोती है। मैने कहा यह रोज यहां से नि‍कलती है। उसने हामी भरते हुए बताया कि‍ यह शि‍व मंदि‍र जाते हुए फूल ले जाती है। रोज वो उसकी दुकान के आगे से नि‍कलती परन्‍तु फूल आगे वाली दुकान से लेती। वो अपनी दुकान के फूल सहेजता परन्‍तु उस लडकी को कभी उसके फूल पसंद नहीं आये। वो कभी भी उसकी दुकान पर रूकी नहीं और कभी उसने भी उस लडकी से पूछा नहीं। वो लडकी नि‍कलती तो वो अपने फूलो को व्‍यवस्‍थि‍त जरूर करता। कि‍सी ग्राहक से बात करता तो बात करता रूक जाता। मैने कभी ज्‍यादा उससे उस लडकी के बारे में नहीं पूछा।

सुबह सुबह वो बुढि‍या को फूल देने जाता तो उसकी छोटी पोती उसे मि‍ल जाती। वो बहुत बातूनी थी। वो उससे तरह तरह के सवाल पूछती । बुढि‍या को फूल देने के बाद कुछ देर वो उसकी पोती से बात करता रहता। उसकी पोती उससे कभी फूलो के बारे में तो कभी फित्‍मो के बारे में पूछती रहती और वो जवाब देता रहता। वो कई बार पूछती आप रोज फूल कहां से लाते हो। वो रोज एक ही जवाब देता था कि‍ बाग से। दोपहर में वो कई बार कि‍सी दुकान से सामान लेने जाती तो उसकी दुकान पर रूक जाती। वो कहती आप दुकान में क्‍यो नहीं बैठते, बाहर क्‍यो बैठते हो। वो कहता कि‍ दुकान पेड के पीछे है इसलि‍ए। वो इस तरह की हजार बाते करती। फि‍र सामने से उसकी मां आवाज लगाती छुटकी। तो छुटकी दौडकर घर चली जाती। उसने कभी भी छुटकी से नहीं पूछा कि‍ तेरी दीदी उसकी दुकान से फूल क्‍यों नहीं ले जाती है। उसकी दीदी जब भी वहां से नि‍कलने वाली होती है। उसके उम्‍मीदो के पर लग जाते। वो सारे ताजे फूल आगे रखता। अपने काउण्‍टर के आगे खूशबू वाला छि‍डकाव भी करता परन्‍तु उसकी साईकि‍ल ठंडे हवा के झोंके के साथ वहां से नि‍कल कर पास वाली दुकान पर रूकती। वहां से फूल लेती और मंदि‍र की ओर चली जाती। वो उसे देखता रह जाता। उसकी हमेशा ईच्‍छा रहती कि‍ वो उसकी दुकान से फूल खरीदे परन्‍तु कभी उसने फूल खरीदने के लि‍ए उसने कहा नहीं और जब भी उसके घर गया तो कभी उससे बात नहीं की। जब वो सामने वाले घर में फूल देने जाता तो छुटकी से बात करते वक्‍त वो उपर की बालकानी में खडी रहती। वो छुटकी से बाते करता रहता। छुटकी पूछती आप और भी लोगो के घरो में फूल देने जाते हो क्‍या । वो कहता – नहीं मै तो सि‍र्फ तुम्‍हारे घर पर ही फूल लाता हूं। वो पूछता छुटकी तुम्‍हे कौन से फूल पसंद है तो वो कहती मुझे तो लाल रंग के फूल पसंद है। छुटकी की दीदी काफी देर तक बालकानी में उन दोनो की बाते सुनती रही। उससे अब रहा नहीं गया। उसने छुटकी से पूछ ही लि‍या कि‍ तुम्‍हारी दीदी मेरी दुकान से फूल क्‍यों नहीं खरीदती है। दीदी ने टेडी नजर से उसे देखा। छुटकी ने दीदी की ओर देखा और चपलता से जवाब दि‍या- आपके पास नीला गुलाब नहीं है। दीदी को नीला गुलाब पसंद है। जि‍स दि‍न तुम नीला गुलाब लाओगे उस दि‍न दीदी जरूर तुम्‍हारी दुकान से फूल खरीदेगी। यह जवाब सुनकर उसने उपर देखा- दीदी खि‍डकी बंद करके अंदर चली गयी। वो खि‍डकी की ओर देखते हुए वापि‍स आ गया।

अब उसके दि‍माग में एक ही बात दौडने लगी- नीला गुलाब। उसने अपने फोन पर देखा – नीला गुलाब। नीला गुलाब उसे दि‍या जाता है जो मुश्‍कि‍ल से दोस्‍त बनता है। उसने देखा नीला गुलाब तो जापान में होता है। भारत में कुछ प्रयोगशाला में उगाया जाता है। भारत में यह अधि‍कांश जगहो पर सफेद फूलो को रंग करके बनाया जाता है। वो कहां मि‍ल सकता है। इन सबके बारे मे उसने पता कर लि‍या। कुछ ही दि‍नो में उसे ठि‍काना मि‍ल गया और उसने नीले गुलाब का ऑर्डर भी दे दि‍या। अब वो इंतजार करने लगा कि‍ जब नीला गुलाब आयेगा तो वो मेरी दुकान से फूल खरीदेगी। वो यह कल्‍पना करने लगा कि‍ उसकी दुकान में एक गुलदस्‍ता नीले गुलाबो का होगा। वो साईकि‍ल चलाते हुए आयेगी और नीले गुलाब देख्‍कर वो साईकि‍ल उसकी दुकान की ओर मोड लेगी। वो नीले गुलाबो के साथ दूसरे फूल भी खरीदेगी।

आज वो बहुत खुश था क्‍योंकि‍ आज उसकी दुकान पर नीले गुलाब आने वाले थे। आज शाम तक नीले गुलाब आ जायेगे और कल सुबह वो अपने काउण्‍टर पर लगा लेगा। यह सोचते हुए वो सामने रोज की तरह फूल देने गया। वहां छुटकी ने बताया कि‍ आज वो यहां से वापि‍स जा रहे है। मैने पूछा क्‍यो । तो उसने बताया कि‍ पापा का टासफर हो गया है। इसि‍लए आज ही शाम को हम कानपूर के लि‍ए नि‍कल जायेगे। उसके पैरो तले से जमीन खि‍सक गयी। वो नीले गुलाबो के बारे में सोचने लगा। वो दौड्कर दुकान पर गया। उसने अपने थोक वि‍क्रेता को फोन लगाया। उसने कहा कि‍ वो जल्‍दी से जल्‍दी पांच बचे तक भेज सकता हुं। उसने अंदाजा लगाया कि‍ सवा पांच बजे गाडी जायेगी तब तक गुलाब आ जायेंगे। उसने सौदा पक्‍का कर दि‍या।

वो दि‍न भर नीले गुलाबो के बारे मे सोचता रहा। वो यह भी सोच रहा था कि‍ वो नीले गुलाब तो उसको दे देगा परन्‍तु वो उस सुख का आनंद नहीं ले पायेगा कि‍ वो साईकि‍ल लेकर उसकी दुकान पर फूल लेने आयेगी। कई प्रकार की कहानि‍यां वो बनाता और बि‍गाडता रहा। उसने शाम को चार बजे के करीब देखा कि‍ सारा सामान गाडी में लोड हो चुका था। एक गाडी में घर के सारे लोग बैठ चुके थे। छुटकी कार के अंदर से बाय बाय कर रही थी। वह बाय बाय करके सीधे टान्‍सपोर्ट बाजार भागा। नीले फूल वही आने वाले थे। वो टांसपोर्ट बाजार पहुच कर नीले गुलाबो का इंतजार करने लगा। पांच बजे फूलो वाली गाडी आयी। उसने जरूरी कार्यवाही जल्‍दी से नि‍पटायी और गुलाब के फूल लेकर स्‍टेश्‍न की ओर दौडा। स्‍टेशन के बाहर पहुंचा तब तक सवा पांच बज चुके थे। स्‍टेशन के बाहर से गाडी खडी दि‍खाई दे रही थी। उसे लगा कि‍ अभी गाडी गयी नहीं है। वो प्‍लेटफार्म टि‍कि‍ट लेकर प्‍लेटफार्म पर पहुंचा। प्‍लेटफार्म पर पहुंचते ही गाडी ने आवाज दे दी। वो दौडकर उनका कोच ढुंढने लगा। एक कोच की खि‍डकी से छुटकी हाथ हि‍लाती दि‍ख गयी। साथ में उसकी दीदी भी बैठी थी। वो दौडकर उसके पीछे गया। वो हाथ में नीले गुलाब लि‍ये दौड रहा था। दौडभाग में कि‍सी से टक्‍कर से गुलाब नीचे गि‍र गये। वो उठाने के लि‍ए झुका तब  तक कोई उस पर पांव रख कर चला गया। उसने सीधे होकर देखा गाडी हवा से बाते करती हुइ उससे दूर चली गयी। वो धीमे कदमो से वापि‍स बाहर की ओर चल दि‍या।

Saturday, April 23, 2022

साबुन

 


गर्मियो की रात थी। छत्‍त पर बैठा था। ठंडी हवा चल रही थी। हमारे यहां गर्मियो मे राते ठंडी होती है। इस कारण रात‍ को अक्‍सर छत्‍त पर बैठता हूं। कुछ साल पहले तक लोग रात को छत्‍त पर ही सोते थे। छत्‍त पर सोने का आनंद ही अलग होता था। ठंडी हवा में छत्‍त्‍ पर सोना और देर रात तक चांदनी रात में बाते करना। इस सुख के सामने दुनिया के सारे सुख फीके है। अब नित्‍य बदल रहे जीवन में इस आनंद की कोई वैल्‍यू नहीं रह गयी है। अब अपनी छत्‍त से देखता हूं तो दूर दूर तक खाली छत्‍ते दिखाई  देती है। कुछ छत्‍तो पर सोलर सिस्‍टम लगने से छत्‍त ही सोने लायक नहीं रही। आधुनिक जीवन में पूराने सूखो को बेचकर नया सुख खरीदा जा रहा है। मैने छत्‍त पर सोने का सुख बहुत लिया है या यों कहे मैने छत्‍त के सारे सुखो को बटोरा है। मैं याद करता हूं तो मेरी आंखो के आगे नानी के घर की छत्‍त सामने आ जाती है। उस छत्‍त पर हमने कई सपने देखे थे। वो छत्‍त हमारे सपनो की गवाह है। वो हमारे आजाद बचपन की गवाह है। हम बच्‍चे नानी के पास ही रहते थे। रात को सभी बच्‍चे इकटठा होकर खूब मस्‍ती करते थे। रात होते ही छत्‍त को सजाया और संवारा जाना शुरू हो जाता था। शाम होते ही हम बच्‍चे सब मिलकर बाल्‍टी से पानी छत्‍त पर लाते और पूरी छत्‍त को पानी से गीला करते ताकि रात पर सोये तो बिस्‍तर के नीचे से हमारी देह को ठंडक मिले। फिर रात को पीने के पानी के लिए मटका लाकर रखते। बिस्‍तर लगाने के बाद हम बच्‍चो की मस्‍ती शुरू होती। हम देर रात तक दुनिया भर की बाते करते । रात को आसमान से गुजरते हवाई जहाजो को लेकर भी लंबी लंबी बहसे करते । हमारी बहसो का कोई मतलब नहीं होता था परन्‍तु एक अजीब सा सुकून मिलता । इन बहसो से नीद में सपने देखने का मेटिरियल मिलता था। जब तक नानी सोने के लिए नहीं कहती, हमारी बहसे चलती रहती। हमारी बहसो के सामने आजकल टीवी पर आने वाली बहसे भी फीकी लगती है। बहुत देर हो जाती तो नानी को कहना पड्ता- अब सो जाओ। नानी के कहने पर हम सोने के लिए आंख बंद करते।

सुबह होते ही हमारी धमाचौकडी शुरू हो जाती। यही चीज थी जो हमें नानी के यहां रोकती थी। हमे मना करने वाली कोई नही था। नाना की नजर हमारे पर रहती परन्‍तु डांटने पर नानी बीच में बाले पड्ती। इसलिए हमारे बचपन की मस्ती पर नानी का कवच था। एक ही मिनट में छत्‍त पर और एक ही मिनट में वापिस नीचे । ऐसा दिन भर चलता था। दुनिया भर के खेल हम खेल लेते थे। हमारे लिए भी नानी हमारी आईडियल थी। नानी देसी चीजे यूज करती और हमे भी वैसा ही करने के लिए कहती। नानी सुबह सुबह काला दंत मंजन करती और हमे भी काला दंत मंजन ही करने के लिए देती थी। घर में साबुन केवल नहाने के लिए इस्‍तेमाल होती थी। हम लोग नानी को बताते थे कि बर्तन साबुन से साफ करने से जल्‍दी और अच्छे साफ होते है। ऐसा कहने पर नानी हमे बालू रेत के गुण्‍ और  शासत्रो की बाते बताने लगती। कई बार तो नानी मिटटी पर शास्‍त्रो में लिखी कथाऐं बताने लगती। नानी का कहानी सुनाने का लहजा इतना सुंदर था कि हम सब काम छोड्कर कहानी सुनने बैठ जाते  और हमे नानी की बात इतनी खरी लगती जेसे पत्‍थर पर लकीर। फिर हम घर जाकर भी अपनी मां को कहते कि बरतन साबुन से नहीं मिटटी से साफ करने चाहिए। उस समय तक गलियो में सड्के बन गयी थी। अब बालू मिटटी मिलना सहज नहीं था। गलियो की मिटटी वैसे भी उपयोग के लायक नहीं होती थी। नानी के घर सदबू मियां मिटटी लेकर आते थे। वो दो हफतो में एक बार मिटटी लेकर आते थे। हम छत्‍त पर खेलते थे तो हमे दूर से ही सदबु मियां आते दिख जाते । हम दौड् कर नानी को बताते थे कि सदबू मियां आ रहे है। सदबू मियां सफेद गांधी टोपी लगाये हुए गधे पर बैठे हुए आते थे। उनके हाथ मे एक छडी होती थी। आगे चार पांच गधे और होते थे जिन पर मिटटी के थैले लटकाये हुए होते थे। आगे चार पांच गधे पूरे अनुशासन में चलते थे और पीछे सदबू मियां चलते थे। नानी के घर मिटटी का आना हमारे लिए उत्‍सव होता था। सदबू मियां घर के बाहर रूक कर आवाज देते और नानी गेट खोल देती। सदबू मियां गधो के उपर से थैले उठाकर लाते और आंगन मे खाली कर देते । हम फिर उस मिटटी के ढेर पर कुछ देर खेलते । फिर नानी उस मिटटी को अंदर रखने के लिए कहती। नानी मिटटी रखने के लिए अंदर एक छोटा कुआ बनाकर रखा था। हम लोग बरतन में भर भर कर मिटटी उस कुऐं में डालते। यह भी हमारे लिए एक खेल होता । हमारी मस्‍ती में पता ही नहीं चलता की वह ढेर कब आंगन से कुऐ मे चला गया। फिर सारा घर उस मिटटी का इस्‍तेमाल करता। नानी उससे बरतन साफ करती तो बाकि लोग शौच के बाद हाथ इसी मिटटी से धोते । नानी यह हिदायत भी देती कि हाथ तीन बार साफ करना। हमारी भी आदत मिटटी से हाथ धोने की पड् गयी । घर आते तो साबुन रखी होने के बावजूद कहीं से मिटटी लाकर मिटटी से ही हाथ धोते।

शहर में हम ठेठ गांव के हरबल जीवन का मजा ले रहे थे। सभी नानी की नसीहतो से सहमत थे। नाना और मामा जरूर कई बार नानी को कहते कि अब जमाना बदल गया है, अब साबुन से सफाई ज्‍यादा अच्‍छी होती है। नानी फिर वही पूराने किस्‍से सुनाने लगती। उधर सदबू मियां जब भी मिटटी के थैले लाते नानी उसे इसके बदले उनका महनताना देती। सदबू मियां एक थैले के पूरे पच्‍चीस पैसे लेते थे। सदबू मियां कहते थे कि वो ठेठ रोही से शुद्ध बालू रेत लाता है। उस समय पच्‍चीस पैसे की कीमत बहुत थी। नानी मियां जी को पैसे ही नही देती थी। कभी कभी पूराने कपडे भी देती थी। हमारे यहां त्‍योंहारो पर मिठाई आती तो कुछ वो सदबू मियां के लिए भी रख्‍ती। मियां जी भी मिठार्इ मांग ही लेते थे। कभी मियां जी कहते उनके बच्‍चे की फीस भरनी है तो नानी उन्‍हे फीस के भी पैसे दे देती। सदबू मियां बहुत रूचि और खुशी से मिटटी के थैले लाता था।

बरसो यह सिलसिला चलता रहा। हम लोग नानी को साबुन के फायदे बताते रहते और नानी मिटटी के फायदे। गली के लगभग सभी घरो में साबुन का उपयोग होने लगा था। सदबू मियां पहले पांच गधो पर मिटटी लाता था अब दो गधो पर ही लाता है। दो गधो पर लाना सदबू मियां के पड्ते नही पड्ता था। फिर भी नानी के स्‍वभाव के चलते वो ले आता था। मिटटी लाने से नानी की ओर से उसे काफी मदद भी मिल जाती थी। कई बार वो मिटटी लाकर बैठता तो बताता था कि उसका बेटा अब इजीनियरींग कर रहा है। वो इसके लिए नानी से कुछ पैसे भी ले गया था। उसका बेटा उसे मिटटी ढोने का काम बंद करने का कहता परन्‍तु वो कहता आज जो कुछ भी है इस मिटटी की वजह से ही है। नानी उसे कहती तु भले ही यह काम बंद करदे लेकिन मेरे लिए तो मिटटी लाकर दे देना। अब हमारे यहां शहर मे बालू मिटटी मिलती नहीं है। हम उसे देखते रहते कि वो अभी तो मिटटी लाता रहेगा। हमारे लिए साबुन से हाथ धोने की उम्‍मीद खत्‍म हो जाती। कभी मिटटी कम होती तो नानी हमे जुगती से मिटटी इस्‍तेमाल करने के लिए कहती।

 

एक दिन सदबू मियां अपनी गरदन नीचे किये गधे पर बैठा हुआ आया। नानी ने पूछा कि आज वो उदास सा क्‍यो है। उसने कहा आज वो अंतिम बार मिटटी लाया है। अब वो मिटटी नहीं लायेगा। नानी ने कारण पूछा तो उसने बताया कि मेरा बेटा मना करता है। मै बेटे की बात मानता भी नहीं । परन्‍तु बेटे की नौकरी बाहर आ गयी है। हम सब उसके साथ बाहर जा रहे है। यह सुनकर नानी ने मुझे आवाज लगायी जा मिठार्इ लेकर आ। सदबू के बेटे की नौकरी लगी है। मै दौड्कर पास की दुकान से मिठाई ले आया। सदबू मियां की आंखो में आंसू आ रहे थे। नानी ने कहा – सदबू ये तो खुशी की बात है। मेरे पोते की नौकरी लगी है। मिटटी की तो कोई बात नहीं है। अब तक बहुत सारे साधन हो गये। अब तक लोग साबुन काम में लेने लगे है। तुं चिंता न कर । आराम से जा। कोई जरूरत हो तो मुझे बताना। सदबू मियां नानी के पैरे छुने लगा तो नानी ने पैर छुने से मना कर दिया। उधर हम लोग मन ही मन खुश हो रहे थे कि अब साबुन से हाथ धायेंगे। हमारे यहां भी साबुन इस्‍तेमाल होगा। मेरा भाई कहता इतना खुश मत हो। नानी दूसरी व्‍यवस्‍थ कर लगी।

सदबू मियां को नानी ने रवाना किया। फिर मेरे को आवाज लगायी कि इस बार महीने के सामान में एक बरतन धोने की साबुन लिख देना।

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