Sunday, April 2, 2023

झबरू

 

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धरमसाळा  री पिरोळ गढ रै पिरोळ जिती बडी ही। पिरौळ रै फाटकां माथै शूळ जिस्‍या तीरीयां तो हा कोयनी पण तीरीयां री जग्‍या चमकीले कलर रै मांय चौरस डिजायन बणियोडी ही। पिरोळ रै बिचाळै म्‍है उभौ ईयां लाग रैया हो ज्‍याण कै कुवै रै मांय जिनावर उभौ हुवै। आप म्‍हनै राजा मानौ तौ म्‍है पिरोळ बिचाळै राजा उभौ हुवै ज्‍याण उभौ हो। म्‍हारै आगै धरमसाळा री बरसाळी ही। बरसाळी रै आगै म्‍हारै साम्‍हे धरमसाळा रै सैठ रै दादौ सा री मूरत ही। मूरत रै माथै तावडे अर बिरखा सूं बचण खातर लौ रौ छोटौ सौ छपरौ हो। छपरै माथै दो चार कबूतर बैठा हा। मूरत रै चारां कांनी छौटौ सौ बाग हो। बाग री बैंच्‍या खाली ही। म्‍हारै एक कानी काउंटर हो। काउंटर री सीट माथै पागडी पैरोडो अर मुंडै रै मांय पान चबावतौ एक जणौ बैठयो रजस्टिर रै मांय पैन सूं लिख रैया हो। बिगैं आगै जात्री उभा हा। काउंटर रै लारै भौत बडी सैठ रै दादौ सा री तस्‍वीर लागौडी ही। दूजै कानी धरमसाळा री लाईब्रेरी  ही। जठै एक जणौ बैठौ छापौ बांच रैयौ हो। धरमसाळा री बरसाळी रै मांय कबूतरां रै पंखा रै फडफडाणै री आवाज आ रैयी ही। सागै जात्री बोल रैया हा। और कीं आवाज ईती बडी धरमसाळा रै मांय नीं ही। ईयां मैसूस हो रैया हो कै एक सूने गढ रै मांय दो चार लोगां रौ बोलारो हुव्‍वै। म्‍है हौळे हौळे दो पग आगै बधाया। म्‍हारै जूतां री आवाज बरसाळी रै मांय सुणीज रैयी ही। म्‍है काउण्‍टर माथै ग्‍यो, अर म्‍हारै कमरै री चाभी ली। चाभी लै अर म्‍है दूजै कानी री बरसाळी रा दो पगातियां चढया। म्‍हनै कीं नीं सुणीज रैया हो। आ बात नीं है के म्‍हारे कानां रै मायं की खराबी ही। पूरी धरमसाळा रै मायं बैवंती सूनी हवा मैसूस कर रैयो हो। दो पग आगूण उपरली बलकानी रै मांय जावण खातर पगातियां री नाळ ही। नाळ रै मायं दो कबूतर बैठया गूटर गूं कर रैया हा। म्‍है पगातियां चढतौ ज्‍यू म्‍हारै जूतां री आवाज आ रैयी ही ज्‍याण शौले फिलम रै मायं गब्‍बर सिंह रै जूतां री आवाज आवै।

म्‍है पगातियां चढ अर उपरली बालकानी रै मायं आ ग्‍यो। उपर री गैलेरी रै मायं सगळा कमरा रै आगै कूंटा माथै ताळा लटक रैया हा। छात माथै तीन पंखा लागौडा हा। अबै ठंड कम ही । पण पंखा चलाणै रौ मौसम नी हो। पंखा माथै चिडकल्‍यां बैठण लागगी ही । ईण पंखा माथै भी चिडकल्‍यां बैठी ही। गैलेरी री झाळया मांय सूं झीणौ तावडो आ रैयो हो। पूरी गैलेरी रै मांय कोई मिनख नी हो। ठैठ गैलेरी रै दूजी ठौड झीणै तावडै रै मायं पूराणौ कोट पैरोडो झबरू बैठो हो। माथै रै मायं काळै कैसां रै सागै दो चार धौळा केस चमक रैया हा। मुंछां रै मांय भी धौळा केस चमकण लाग रैया हा। आपरा गोडा भैळा करियोडा। हौळे हौळे गुन गुन कर रैयो हो। सुनी गैलेरी रै मायं झबरू रै गुन गुन री आवाज भीतां माथै चिप अर गूंज रैयी ही। पूरी गैलेरी रै कमरां रै मायं एक कमरौ म्‍हारै कनै अर दूजौ दूजै जात्री कनै हो। पूरी गैलेरी रै मायं म्‍है दो जात्री रूकोडा हा। म्‍हनै आवंतै देख झबरू उभौ हो अर हौळे हौळे भागतौ भागतौ म्‍हारै कनै आयौ।

बाउजी । चा लाउं कांई । ठंड भौत पड रैयी।झबरू आपरै दौनू हाथां री आंगळियां भैळी करियोडो बोल्‍यो।

नीं रैवण दै। म्‍है आराम करसूं। म्‍है जवाब दियौ।

बाउजी। अदरक री चा पी लो। गरमास रैसी। पढाई सौरी हुयसी। झबरू फैर कैयो।

अरै यार। अबै तुं ईत्‍तौ कैवे जणै जा लै आजा। म्‍है कैयो।

म्‍है म्‍हारै कमरै रौ ताळौ कूंटौ खोल्‍यो अर मायं बडग्‍यो। कमरै रै मांय माचै माथै पौथ्‍यां ईनै बिनै पडी ही। टैबुल माथै पाणी री बौतल गुडक्‍योडी ही। म्‍है कुरसी माथै बैठ अर जमीन माथै टांगा लंबी कर ली । म्‍है रावत मिष्‍ठान भंडार तक जा अर आयो हो। बारै ठंडी हवा चाल रैयी ही। आज ईम्तियान नीं हो। अबै दौ दिन री छुटी रै बाद दूजौ पेपर है। म्‍हारै त्‍यारी करियोडी ही। ईण कारण म्‍है आज थोडो आरोम सूं हूं। अबकी बार पेपर सौरा ही हा। लारली बार पेपर दौरा घणा आया हा। म्‍है लारलै दो सालां सूं सीएस रा पेपर दैवण नै जोधपुर आउं हूं। अबकी बार फाईनल पैपर हा। ईण धरमसाळा रै मांय म्‍हनै की याद नीं रैवै खाली औ झबरू याद रैवे। म्‍है सरदी रै मायं आउं हूं जणै म्‍है ईण नै हमेस औ पूराणो कोट पैरियोडो ही देखू। हाथ आपस रै मायं बांधोडा भागतौ रैवे। रात हौवते ही बाउजी थारीं सिरख आयगी है। आ लौ बाउजी थांरो तकियो। हर अेक जात्री रौ घर आळै ज्‍यू ठा राखै। म्‍हारी तौ औ घणी सैवा करै । म्‍हनै आवंतै ही पूछै बाउजी । घरै सब ठीक है। म्‍है धरमसाळा छौडू जणै ईण नै कांई ना कांई बख्‍शीस दे अर जाउं। म्‍है ईण नै घर रै बारै म्‍है पूछूं जणै कैवे – बाउजी। म्‍हारौ ब्‍यावं मंडसी जणै म्‍है घरै जायसूं। म्‍है पूछू- थारो ब्‍यावं कद होयसी जणै जवाब दैवे- म्‍हारै घर आळा छौरी देखे । सगपण पक्‍को हौवंते ई बाबूसा री चिटठी आ जासी। बाउजी थानै भी ब्‍यावं रै मायं चालणो है। ब्‍यांव रौ नांव लैवंते ई झबरू रै सरमा जावै। पूरी धरमसाळा रै मायं म्‍हनै झबरू ई घूमतौ दिखै। नीचे सूं सेठ आवाजां लगावंतौ रैवे झबरू..........झबरू................झबरू.....। ईण धरमसाळा री पैचाण झबरू ही है।


म्‍है छात पर लटकोडे पंखै नै देख अर सोच रै मायं डूबोडो हो। बांडै रौ खडकौ हौवंतै ही म्‍है सौच सूं बांडे आयग्‍यो। लौ बाउजी। गरमागरम चा। म्‍है झबरू रै हाथां सूं चा आपरै हाथ मांय लै ली। झबरू बांडै कानी मुडग्‍यो। फैर पाछौ घूम्यो । फैर म्‍हारै साम्‍ही उभौ हुयग्‍यो। आपरा दौनू हाथ आपरी ठोडी कनै भैळा कर उभौ हो। म्‍है पूछयो कीं पिसा दूं क्‍या।

नीं बाउजी । पिसा री जरूरत नीं है।

तौ

बाउजी। म्‍हारी चिटठी बांच दैसौ कांई। आपरै भौळे मुंडै सूं बोल्‍यो।

क्‍यूं नीं। बांच दैसां।म्‍हारै आ कैवते ई । आपरै कोट री जेब मायं हाथ घाल अर हळको टेडो होय अर चिठी निकाळ अर म्‍हनै दी। चिठी एक अंतरदेसी पत्‍तर हो। अंतरदेसी पत्‍तर म्है फाड अर बांचणौ सुरू करियो- म्‍है अठै सगळा राजी हा। तुं भी सैर रै मायं राजी हुवैला। थारी मां एकदम राजी है। तनै रोज याद करै । अजेरी गांव सूं एक सगपण आयोडो है। बात चालै है। बात पक्‍की होयसी तौ म्‍है तनै छौरी रो फौटू भेजसूं। रोटी पाणी  चोखी तरीके सूं खाये। ब्‍यांव खातर सरीर त्‍यारं करनौ है। रात नै दूध जरूर पीजै। जोधपुर री गळी मै दूध री मळाई मिलै । सेठां ने चिठी लिखोडी है। व्‍है थारै खातर दूध अर मळाई ला अर दैवेला। खा लीजै। मन लगा अर काम करीजै। म्‍है चिठी बांची। चिठी सुणतै ई व्‍हौ घणौ ई राजी हुयौ। चिठी सुण अर म्‍हनै पूछयो – बाउजी । अबकी बार म्‍हारो ब्‍यांव पक्‍कौ हो जासी नीं।

म्‍है कैयो – हुवै क्‍यूं कोयनी। थारै ईत्‍ती बढिया नौकरी है। अठै थारो रैवास भी चोखो है। म्‍हारी बात सुण अर राजी हौवंतौ बोल्‍यो- म्‍हारा बाबूसा म्‍हारै खातर चोखो सगपण देखै। ईण खातर देर लाग रैयी है। ठीक बाउजी। अबै आप पढाई करौ। कीं चीज री जरूरत हुवै तौ म्‍हनै आवाज दे दी जौ सा। आ कै अर झबरू बांडौ खौल अर निकळग्‍यो। म्‍है झबरू रै बारै मांय सोचण लाग ग्‍यो। उण टैम मोबाईल हा कोयनी। ईक्‍का दुक्‍का घरां रै मांय लैण्‍डलाईन फोन हा। म्‍है सोच्‍यो आज सैठां सूं ईण बारै मांय बात करसां। झबरू रो ब्‍यावं होवणौ चाईजै । उमर निकळ रैयी ही।

धरमसाळा रै मायं म्‍है सिंझया नै चाय पीवण नै नीचै जाउं। सिंझया नै धरमसाळा री कैंटीन रै मायं चा बण रैयी ही। कैंटीन रै मायं दूजौ कोई नीं हो। म्‍है अेकलौ हो। कोई बात नीं करण वाळो। चा आवंतै ही म्‍है साम्‍हे सेठ आळै कमरै कानी गयो। सेठ कमरै रै बांडै सौफै माथै बैठो हो। म्‍है चाय लै अर सैठ रै साम्‍हे पडी कुरसी माथै बैठग्‍यो। सैठ छापौ बांचतौ बांचतौ बार बार आपरै मुंछा माथै हाथ फैर रैयो हो। म्‍है चा रै कप सूं अैक घूंट लै अर सैठ सूं बोल्‍यो – ‘ झबरू रौ कुण सौ गांव है।

औदसरसैठ आपरी मुंछा पर हाथ फैरते उत्‍तर दियौ।

औ आपरै गांव जावे कोयनी क्‍या ।म्‍है पूछयो।

आप क्‍यूं ओ सब पूछौ हो।सैठ कैयो।

म्‍है संका करते करते जवाब दियौ – औ आज म्‍हारै कनै आपरै गांव सूं आयोडी चिठी लायो हो।

चिठी आप बांची।

हां। म्‍है बांची। चिठी रै मांय व्‍है रै ब्‍यांव री बातां लिखोडी ही। व्‍है रा बाबूसा व्‍है रै खातर अैक सगपण देख्‍यौ है।म्‍है चा रौ अैक और घूंट लैवंते लैवंते जवाब दियौ।

सैठ छापै ने समेटतां समेटतां कैयौ- कोई सात बरस पैला म्‍हारै गांव वाळा ईणनै म्‍हारे कनै धरमसाळा में छोडग्‍या। ईण रा मां बाबूसा अैक एक्‍सीडेंट में खत्‍म हुयग्‍या। ईण रै दिमाग रौ ईलाज चालै है। ईण नै बात री ठा नीं है कै ईण रा मां बाबूसा खत्‍म हुयग्‍या। म्‍हारै गांव रौ है। ईण खातर म्‍है संभळा हा। भौळो है। आपरौ टैम काढे है।

म्‍हारौ माथौ चकरा ग्‍यो। सैठ झबरू री चिठी सूं अलायदा बात बतायी। चा रौ घूंट म्‍हारे गळै में उतरतो रूकग्‍यो। म्‍है सोचतो रैयग्‍यो कै आ चिठी कठै सूं आयी। आयी तौ कुण ईणनै लिखी। म्‍है हिम्‍मत कर सैठ नै पूछयो – ईण रै गांव सूं चिठी कुण भेजै।

आपरै लारै कमरै रै मायं झांकौ घालौ।सैठ आपरै साम्‍है कमरे कानी सैनाण करते कैयो। सैठ री बात सुण म्‍है और सोच रै मांय पडग्‍यो। म्‍है आपरौ मुंडौ हौळे हौळे कमरे कानी घूमायो। म्‍है कमरै रै मायं देख्‍यो। टैबुल माथै अन्‍तरदेसी पत्‍तरां री डिगली पडी ही। कनै तख्‍ती अर पैन पडयो हो। पंखै री हवा सूं अत्‍तरदेसी पत्‍तरां रौ अैक पासो उड रैयौ हो। म्‍है सैठ कानी पाछौ मुंडौ करयो। सैठ आपरै माथै सळवटां घालते हौळे सूं कैयो – ‘ झबरू री चिठीयां अठै सूं ही जावै।

आ सुण म्‍है उभौ हुयग्‍यो। गैलेरी रै रोसनदान रै मायं बणियोडो घौसला म्‍हारै पगा कनै आ पडयो। साम्‍है बालकानी रै मायं झबरू हाथ लारै करियोडो हौळे हौळे चालतौ दिख रैयो हो।

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Sunday, March 26, 2023

फि‍र छि‍ड़ी बात फूलो की ..............

 




चैत्र नवरात्रा में धूप तीखी होने लगती है। फर्श पर बि‍छी चमकती हुई धूप आंखो पर कि‍सी कांच के रि‍फ्लेक्‍शन की तरह पड्ती है। एक बार तो आंखे चुंधि‍याने लगती है। इस समय हमारे यहां ऐसी ही धूप है। नवरात्रा में चार दि‍न का वीकेंड था। नवरात्रा चल रहे है तो उपवास भी है। चार दि‍न के वीकेंड का अधि‍कांश समय तो पूजा पाठ में ही बीता। सुबह दोपहर और शाम का वक्‍त पूजा में ही नि‍कला। फि‍र भी कुछ कामो और आयोजनो के लि‍ए समय नि‍काल लि‍या। आयोजन अपनी पंसद के हो तो समय का रूम नि‍कल ही जाता है। वीकेण्‍ड के पहले दि‍न एक नाटक देखने जाने का नि‍श्‍चय था। अमर कला महोत्‍सव में पहले दि‍न बालीगंज 1990 नाटक खेला जाना था। इस नाटक का नाम पढते ही मैने इसे देखने जाने का नि‍श्‍चय कर लि‍या था। नाटक बालि‍का वधू फेम अनूम सोनी द्वारा अभि‍नीत होना था। मेरे लि‍ए यह पहला अनुभव था कि‍ कि‍सी ख्‍यातनाम कलाकार को नाटक करते हुए देखूं। 



शाम तक सारे काम नि‍पटाकर मै ठीक 7;30 बजे रवि‍न्‍द्र रंगमंच पहुंच गया। कोई साथ नहीं था। अकेला ही गया था। रवि‍न्‍द्र रंगमंच के बाहर भीड नहीं था। जब अंदर हॉल में प्रवेश करने वाला दरवाजा खोला तो देखा कि‍ हॉल लगभग हाउस फुल था। बैठने को कहीं जंगह नहीं मि‍ल रही थी। योगेन्‍द्र बैठा मि‍ल गया। उसके पास एक सीट पर बैग रखा हुआ था। उसने वो सीट मुझे दे दी । नाटक का सेट शानदार था। एक बंगाली घर के ड्राईग रूम का सैट था। बंगाली मकानो में होने वाले दरवाजे और दीवारो पर टंगी पेंटिग बंगाली माहौल का अहसास करा रही थी। थोडी देर में हॉल की लाईट बंद कर दी गयी। सब लोगो की नजरे स्‍टेज पर थी। नाटक अनूप सोनी की एन्‍ट्री के साथ शुरू हुआ। कमाल का अभि‍नय था। अनूप सोनी के साथ थी नि‍वेदि‍ता । दोनो के अभि‍नय से पूरे हॉल में पूरे डेढ घंटे पि‍न ड्रॉप साईलेंस रहा। हम लोग जैसे नाटक मे खो गये थे। यह दो प्रेमि‍यो की कहानी थी। नाटक में थ्रि‍लर और सस्‍पेंस था। ऐसा लगता है जि‍सने इस नाटक को नहीं देखा, उसने कुछ नहीं देखा। नाटक खत्‍म होने के बाद मै वहां से नि‍कलने लगा तो दो चार लोग और मि‍ल गये। सबसे मि‍ले और बातचीत की  और वहां से नि‍कल लि‍या।

वीकेंड का तीसरा दि‍न बेहद खास रहा । इस दि‍न मेरे सहकर्मी और मि‍त्र गोपाल जी सोनी का सुबह सुबह फोन आया कि‍ एक कार्यक्रम 11 बजे है तो आपको जरूर आना है। पूजा पाठ का समय था इसलि‍ए इतना ध्‍यान नहीं दि‍या। फि‍र पूजा पाठ नि‍पटाने के बाद कुछ काम नहीं था तो गोपालजी वाले कार्यक्रम की याद आ गयी। फि‍र नि‍कल पडा इस कार्यक्रम के लि‍ए। स्‍थानीय मोहता भवन में यह कार्यक्रम था। यह एक संगीत का कार्यक्रम था। कार्यक्रम कोई बडा नहीं था परन्‍तु दोस्‍तो ने इसे बडा बना दि‍या। मंझे हुए कलाकार वि‍जय स्‍वामी और संजय पूरोहि‍त ने मनभावन गीत सुनाये। हम सब गीतो को पूरी तरह से इंजॉय कि‍या। एक साथी ने जब नगमा छेडा – ‘ फि‍र छि‍डी बात फूलो की ........ तो उसका भरपूर आनंद लि‍या। यह कर्णप्रिय गीत सुनते ही हर कोई खो जाता है। मैने भी माईक लेकर दो चार हाथ मार लि‍ये। कुछ साथि‍यो के साथ और कुछ अकेले दो चार लाईने गुनगुना दी। मैने हर एक गीत का आनंद लिया। इस कार्यक्रम के आयोजन के लि‍ए वाकई गोपाल जी सोनी धन्‍यवाद के पात्र है।



इस वीकेंड में यह दो आयोजन बेहतरीन रहे। वीकेंड के अंति‍म दि‍न में अजि‍त फाउण्‍डेशन गया। वहां संजय श्रीमाली से बैठकर लंबी चर्चा की। मैने अपनी कि‍ताब मोळि‍यो अजि‍त फाउण्‍डेशन को भेंट की। यह कि‍ताब अब अजि‍त फाउण्‍डेशन पुस्तकालय की शोभा बढायेगी।

अब शाम हो रही है तो बता रही है कि‍ लंबा वीकेंड अब समाप्‍त हो रहा है। अब कार्यालय दि‍खाई देने लग गया है। बहुत सारा काम और देर रात तक घर लौटना। अब अगले हफते यही रहने वाला है।

Sunday, March 19, 2023

गब्बरसिंह की गोली

 


जाडो के दि‍न थे। ठंड बहुत थी। नौ बजे के करीब दि‍न नि‍कलता था और शाम को पांच बजे अंधेरा होने लगता था। शाम छ बजे तक तो सडको और छत्‍तो पर कोहरा छा जाता। हम सब बच्‍चे गर्म टोपि‍यां और स्‍वेटर पहन कर कमरो में दुबक जाते। नानी शाम की चाय नाना के आने बाद ही बनाती थी। नानी मेरे को कहती कि‍ देखना नाना आ रहे है क्‍या। मै कमरे की खि‍डकी से बाहर सडक पर झांकता। सडक पर कोहरा ही कोहरा होता। कुछ दि‍खाई नहीं देता था। आस पास के दुकानो की बत्‍ति‍यां धुंध में लहराती हुई नजर आती। सामने सडक की ओर मै देखता। दूर दूर तक धुंध के सि‍वा कुछ भी नजर नहीं आता था। फि‍र कुछ ही देर में धुंध में से नाना साईकि‍ल चलाते हुए दि‍खाई देते। गर्म कोट पहने हुए लंबी सफेद दाडी में वो यूरोपि‍यन कथाओ के जि‍न्‍न की तरह नि‍कल कर आ रहे होते।
 मै खि‍डकी बंद कर दौडकर नानी के पास जाकर नाना के आने की सूचना देता। नानी झट से चूल्‍हे पर चाय चढा देती।

वो चाय हमेंश कप और प्‍लेट में पीते। आमतौर पर लोग चाय पीते वक्‍त प्‍लेट का प्रयोग नहीं करते है। चीनी मि‍टटी के कप और प्‍लेट में ही वो चाय पीना पसंद करते थे। ठंड के दि‍नो में वो शाम को आफि‍स से आने के बाद आरामदायक कुर्सी पर बैठ कर कुछ देर कुछ न कुछ सोचते रहते । कि‍सी से बात नही करते थे। चाय को कप से प्‍लेट में डालते और प्‍लेट को होठो के पास लेजाकर फूंक मारते । फि‍र अपनी आंखो से एक टक कहीं देखते हुए प्‍लेट से चाय का घूंट लेते। उस समय इतना शांत वातावरण होता कि‍ उनके घूंट लेने की आवाज हम अपने कानो से सुन सकते थे। कभी भी हम बच्‍चे नाना के चाय पीने के घूंट की आवाज को रीदम बना लेते । कभी नाना की नजर हमारे उपर पड्ती तो हैडमास्‍टर की तरह  डांट लगा देते। नाना से मेरा करीबी का रि‍श्‍ता रहा। मुझे लगता है कि‍ वो मेरे सबसे ज्‍यादा करीब रहे। बचपन में उनका हमारे साथ हैडमास्‍टर सा बर्ताव था। हर बात को जोर से बोलकर बताते। सफेद दाडी के उपर भरे हुए गाल और बडी बडी आंखे जि‍नमें हमेंशा पीछे की ओर कुछ चलता रहता। वो हम से बाते करते तो भी लगता कि‍ वो साथ में कुछ और सोच रहे है।

नाना के रि‍टायरमेंट के बाद वो हम से दोस्‍ताना हो गये थे। वो हम बच्‍चो की रूचि‍ के बारे में बात करते । कभी अपनी तरफ से भी कोई नया काम बता देते । एक बार गर्मियो की छुटि‍यो में उन्‍होने हम सबको पूराने अखबारो से लि‍फाफे बनाना सि‍खाये। हम सब बच्‍चो ने मि‍लकर बहुत सारे लि‍फाफे बनाये और फि‍र वो दुकानो में बेचने भी गये। उन दि‍नो टीवी और मोबाईल नहीं थे। रोज शाम को नाना हमें तरह तरह के कि‍स्‍से बताते थे। कि‍स्‍से बताना तो उनकी आदत में शूमार था। दो तीन कि‍स्‍से तो वे हर बार दोहराते थे। हम भी उन कि‍स्‍सो को हर बार सुन लेते । वे अपने आफि‍स के माथुर साहब का कि‍स्‍सा हर बार सुनाते । वैसे उनके पास कि‍स्‍सो की कमी नहीं थी। हर चीज के बारे में उनके पास कोई न कोई कि‍स्‍सा था। वो अपने पलंग पर रजाई ओढ कर बैठे रहते । अपनी लंबी सफेद दाडी पर एक हाथ फेरते रहते और कि‍स्‍से याद कर हमे सुनाते। हमे लगता वो अपनी दाडी में से कि‍स्‍से नि‍कालते है। नानी हमेंशा उनकी दाडी को देखकर चि‍ढती थी। वो हमेशा उनकी दाडी पर छींटाकशी करती। नाना अपनी आंखे नानी की तरफ घूमाकर मुस्‍कुरा देते और फि‍र दाडी पर हाथ फेरने लगते। दाडी को लेकर नाना – नानी में कई बार कहासुनी भी होती थी परन्‍तु नाना के कोई असर नहीं होता। उस समय हमारे पडनाना भी जिंदा थे। पडनाना यानि‍ नाना के पि‍ता जी। मेरे पडनाना का देहांत होने पर नाना को अपनी दाडी मुंडवानी पडी थी। पडनाना के देहांत के बाद उन्‍होने दाडी नहीं रखी थी ।

जाडो में वो छत्‍त पर धूप में बैठते। मेरे से वो दाडी करने का सामान मंगवाते थे। उनका दाडी करने का सामान बहुत पूराना था। ब्रुश और पानी रखने का कप तो बरसो पूराने लग रहे थे। कप के उपर बने हुए फूल के चि‍त्र घि‍स चूके थे। केवल अहसास हो रहा था कि‍ कप के उपर फूल के चि‍त्र थे। वो एक चि‍नी मि‍टटी का सफेद कप था। उसका हैण्‍डि‍ल भी टूट चूका था। हैण्‍डि‍ल के नि‍शान कप पर जरूर थे। मै नाना को कहता कि‍ अब पानी के लि‍ए नया कप ले लेते है। नाना कप का कि‍स्‍सा का सुना देते । वो कहते यह कप उनके पि‍ताजी को पुरस्‍कार में मि‍ला था। उनके पि‍ता जी गणि‍त पढाने वाले मार्जा थे। हमारे यहां उन दि‍नो गणि‍त पढाने वाले शि‍क्षक को मार्जा कहा जाता था। नाना कहते तुम्‍हारे पडनाना की ख्याति‍ दूसरे शहरो तक थी। नागौर से भी बच्‍चे पढने के लि‍ए तुम्‍हारे पडनाना के पास आते थे। एक बार गर्वनर साहब हमारे शहर में आये थे तो उनकी ख्‍याति‍ को देखकर गर्वनर साहब ने उन्‍हे यह कप पुरस्‍कार  के रूप में दि‍या था। उस समय मै बहुत छोटा था। फि‍र जब यह कप पूराना हो गया था तो तुम्‍हारे  पडनानाजी इसे दाडी बनाने के लि‍ए पानी रखने के काम में लेने लग गये। फि‍र मै भी इसी कप में पानी डालकर दाडी बनाले लगा। इसमें दाडी बनाता हूं तो मुझे मेरे पि‍ताजी के गौरव का अहसास होता है। नाना धूप में बैठकर दाडी बनाते रहते और हम लोग उनको घेर कर बैठे रहते। फि‍र सामान को धोकर लोहे की डि‍ब्‍बि‍यां में डाल देते और कप को अलग से सुरक्षि‍त जगह पर रख देते। जब भी नाना दाडी करते तो उस कप को हम लोग बहुत संभालकर लाते थे। मेरे मामा भी उसी कप में पानी रख कर  दाडी करते । हम लोग उस कप को देखते रहते। नाना के लि‍ए वो कप उनके पि‍ताजी की नि‍शानी थी। उनको इस कप से बहुत प्रेम था। वो इसे सोने से भी कीमती मानते थे। हमे भी उस कप का उतना ही ध्‍यान रखना पडता था।

नाना के रि‍टायरमेंट के कुछ समय बाद ही हमारे शहर में टीवी आ गया था। टीवी आने के बाद हम सब लोग एक कमरे में बैठकर टीवी देखा करते थे। टीवी पर फि‍ल्‍म आती तो हम सब लोग कमरे में इकटठा होते। नाना फि‍ल्‍म के बीच में कलाकारो के बारे में बतात रहते। कहते धर्मेन्‍द्र ने इस फि‍ल्‍म की शूटि‍ग राजस्‍थान में की थी। ऐसे कई कि‍स्से वो फि‍ल्‍म के बीच में ही बताते। नाना खाना, चाय और दाडी सभी काम अब टीवी के सामने ही करते थे। एक बार टीवी पर शोले फि‍ल्‍म आ रही थी। हम सब कमरे में बैठकर टीवी देख रहे थे। नाना पीछे पलंग पर बैठकर दाडी कर रहे थे। सामने स्‍टूल पर दाडी का सामान रखा था। उसी कप में पानी रखा हुआ था। टेबि‍ल के आगे मैं बैठा था। सभी फि‍ल्‍म का आनंद ले रहे थे। एक सीन में सभी लोग शांत थे। तभी अचानक से गोली की आवाज आयी। मै डर कर पीछे हुआ। पीछे होते ही टेबि‍ल के धक्‍का लगा। कप टेबि‍ल से नीचे गि‍र गया। कप टूट गया और पानी बि‍खर गया। कमरे में शांति‍ छा गयी। मै बूत की तरह स्‍थि‍र हो गया। नाना अपनी दाडी पर ब्रश फेरते रूक गये। सभी की नजरे मेरे और नाना पर थी। कमरे में केवल टीवी की आवाज आ रही थी परन्‍तु टीवी कोई नहीं देख रहा था। सभी मेरे को और नाना को देख रहे थे। बि‍खरा हुआ पानी मेरे नजदीक आ रहा था परन्‍तु मै फि‍र भी हि‍ल नहीं रहा था। हर कोई सोच रहा था अब क्या होगा। मै मन ही मन बहुत घबरा रहा था। नाना की नजरे मेरे पर टि‍की हुयी थी। कुछ देर कि‍सी की आवाज नही आयी। फि‍र नाना जोर से हंसे और बोले- कि‍तना मजबूत कप था। कोई नहीं तोड पाया। गब्‍बर सिंह की गोली से ही टूटा। नाना के साथ सभी हंसने लग गये।


Saturday, January 7, 2023

साल के पहले दि‍न आफ रोडि‍गं

इस साल भी मै बहुत कम ब्‍लॉग लि‍ख पाया परन्‍तु पि‍छले साल की तरह इस साल भी साल की शुरूआत में ही ब्‍लॉग लि‍ख रहा हूं। नये साल की शुरूआत भी पि‍छले साल की तरह ही हुई। साल का पहला दि‍न कार्यालय के साथि‍यो के साथ बीता। इस साल ठीक वैसा ही हुआ जैसा पि‍छले साल हुआ था। इस साल एक साथी ने कोडमदेसर में सवामणी का प्रसाद रखा था। जाहि‍र हम सबको शामि‍ल होना था। साल का पहला दि‍न था और रवि‍वार भी था। सब कुछ संयोग भगवान के दर्शन और साल की अच्‍छी शुरूआत का बन गया था। हम चार पांच साथि‍यो ने कार्यक्रम बनाया। साल के पहले दि‍न सुबह कडाके की ठंड थी परन्‍तु फि‍र अच्‍छी धूप नि‍कली। मौसम का भी अच्‍छा संयोग बन गया था। हमने गि‍नती की पूरे छ: साथि‍यो की टीम बन गयी। तय हुआ कि‍ सभी गोकुल सर्किल पर मि‍लेंगे। मै तय समयानुसार सुबह ग्‍यारह बजे गोकुल सर्कि‍ल पर पहुंच गया जहां सभी साथी तैयार मि‍ले। वे सभी गाडी का इंतजार कर रहे थे। थोडी देर में टाटा सफारी गाडी आ खडी हुई और हम सब गाडी मे बैठ रवाना हुए।

पूरे रास्‍ते धूप खि‍ली हुई थी। सभी मस्‍ती करते हुए कोडमदेसर धाम की ओर जा रहे थे। रास्‍ते में राजनीति‍ की छींटाकसी से लेकर ऑफीस की मस्‍ति‍यो की बाते हो रही थी। आज साल का पहला दि‍न और रवि‍वार होने के कारण कोडमदेसर में भारी भीड थी। कोडमदेसर के द्वार से लेकर कोडमदेसर के कोरि‍डोर तक भीड लगी हुई थी। मंदि‍र में तो पैर रखने की जगह नहीं थी।

 सभी ने मंदि‍र में जाने के लि‍ए जैसे तैसे जगह बनायी और भैरवनाथ जी के दर्शन पा लि‍ये। रवि‍वार को भैरूजी के इतनी पूजा श्रंगार के साथ दर्शन हो जाना अदभूत था। मै फोटो का कोई अवसर नहीं छोडना चाहता। इसि‍लए भारी भीड के बावजूद फोटो शूट के लि‍ए मैने जगह बना ही ली। दर्शन कर मंदि‍र से बाहर आते वक्‍त अपने कार्यालय के और साथी मि‍ल गये। दूसरे साथी मि‍लने पर मन और प्रसन्नता से भर गया। हम सभी को जोरो की भूख लगी थी तो सभी ने प्रसाद स्‍थल ढुंढा और बैठ गये प्रसाद लेने । प्रसाद वैसे होता ही मन को भाने वाला परन्‍तु यहां हमारे साथी ने भगवान के लि‍ए रूचि‍ से और स्‍वादि‍ष्‍ट पकवान बनाये । भगवान का प्रसाद हो जाने के बाद तो वे और स्‍वादि‍ष्‍ट और लजीज लगने लगे। प्रसाद लेकर मेजबान साथी से वि‍दा ली। भैरवनाथ के फि‍र से दर्शन कर वापसी के लि‍ए रवाना हो गये।

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वापसी में कोडमदेसर से नि‍कलनते ही एक ढाबे पर चाय पी। यह कभी प्रसिद्ध ढाबा रहा था परन्‍तु यहां पुल बन जाने के बाद यहां आने वाले ग्राहको की संख्‍या पर फर्क पडा है परन्‍तु हमे मेहमानो की तरह चाय पि‍लायी गयी। जाडे में धूप मे बैठकर चाय पीने का सूख दुनि‍या के सभी सूखो से अलाहयदा है। चाय पीने के बाद हम घर की ओर रवाना हुए। रवाना होकर थोडी दूर ही चले थे कि‍ हमारे डाईवर ने रोही में घूमने का सुझाव दि‍या। अभी समय काफी था तो हमने डाईवर की बात मान ली और हम रोही में घूमने को राजी हो गये थे। समय से ज्‍यादा डाईवर ने रोही की जो वि‍शेषताऐं बतायी थी उससे हम प्रभावि‍त हो गये थे। इसलि‍ए हम रोही में जाने के लि‍ए राजी हो गये थे। रोही का मतलब जंगल से होता है हमारे यहां ।
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रोही में प्रवेश करते ही डाईवर ने गाइड की तरह काम करना शुरू कर दि‍या। रोही की अनोखी ि‍वशेषताओ के बारे में वह हमे बताता रहा। हमारे यहां पहाडो जैसे जंगल तो होते नहीं। इस कारण धोरो में गाडी टेडी मेढी हो रही थी जो रोमांच उत्‍पन्‍न कर रही थी। वो बता रहा था कि‍ यहां जंगली सुअर होते है तो आदमि‍यो पर हमला कर देते है। यह भी बताया कि‍ यहां मोर, खरगोश और कई तरह के पक्षी है। उसने बताया कि‍ शाम को मोर को ऩत्‍य


 करते देखा जा सकता है। रोही में वो सबसे पहले हमे लेकर गया सि‍द्धेश्‍वर महादेव मंदि‍र । जहां पर एक व्‍यक्‍ति‍ ध्‍यान में बैठा था। एक ओर छोटी झोंपडी बनी हुई थी जहां पर एक हवन कुण्‍ड भी बना था। हमारे वहां जाने से उस व्यक्‍ति‍ का ध्‍यान भंग हो गया और फि‍र हमने उनसे इस मंदि‍र के बारे में जानकारी ली। वो बताता है कि‍ वो जब भी समय मि‍लता है इस जंगल में आकर साधना करता है। यहां भी हम फोटोग्राफी का कोई मौका छोडना नहीं

 चाहते थे। हम सब ने मंदि‍र में और गाडी के इर्दगिर्‍द फोटो ग्राफी की। हम सब के बीच गोग्‍ल्‍स एक ही था तो सब ने उसी गोगल्‍स से फोटो खि‍चवाये । आप फोटो में देख सकते है। इसके बाद वो जंगल में बने करणी माता के मंदि‍र ले गया। जहां मंदि‍र में एक पूजारी था। वहां हमने पानी पीया और सुस्‍ताऐ । जंगल में हमे कोई जानवर नहीं दि‍खायी दि‍ये। कुछ तरह के कबूतर दाना चुग रहे थे। जंगल में पैदल घूमने वाले बुजुर्ग जरूर दि‍खायी दि‍ये। डार्इवर बता रहा था कि‍ इनमें अधि‍कांश बुजुर्ग 75 साल से उपर के है और वो रोज यहां आते है। पूरे जंगल में घूमते है। हम लोगो ने भी आश्‍चर्य कि‍या। वो जंगल में घूम रहे थे। अब संध्‍या हो रही थी। धूप में पेडो की परछाईयां छोटी हो रही थी। ठंड भी बढ रही थी। इसलि‍ए हमने वापि‍स लौटने का नि‍श्‍चय कि‍या। डाईवर ने गाडी वापि‍स बाहर की और चला दी। हम भैरवनाथ के भजन गाते हुए घर की तरफ चल दि‍ये। एक के बाद एक सभी को घर छोडते हुए मै भी अपने घर पर पहुचा। साल का पहला दि‍न एक बार फि‍र मेरे लि‍ए यादगार रहा। भगवान के दर्शन के साथ प्रसाद ग्रहण और जंगल में आफ रोडि‍ग यादगार रहा। अब उम्‍मीद करते है कि‍ सबके लि‍ए यह साल खुशनुमा और उपलब्‍धि‍यां देने वाला रहे। 

Monday, October 3, 2022

मनीष कुमार जोशी की कहानी - भिक्षु

 


मै अपने शहर के जिस हिस्‍से में रहता हूं वहां आश्रम बहुत है। हर एक किलोमीटर पर एक आश्रम है। हर किलोमीटर ही नहीं बल्कि हर सौ मीटर की दूरी पर एक आश्रम आपको मिलेगा। यह हिन्‍दू सनातन संस्‍क़ति के आश्रम है। इस क्षेत्र में रहने वाले बाशिन्‍दे अपने आपको आश्रम का हिस्‍सा ही मानते है। यहां के लोग का रहन सहन साधारण है और खान पान भी साधारण है। यहां तक की यहां कोई प्‍याज भी नहीं खाता है। हम लोग सुबह उठते है तो हमारे कानो में वेदमंत्र और प्रार्थनाओ की आवाजे पडती है। शाम को मन्दिरो की घंटिया सुनाई देती है। हमारे यहां इन आश्रमो को बगेचियां कहते है। इन बगेचियों में संत और साधु रहते है। महिला साधुओ और संतो की बगेचियां अलग से है। दोंपहर में इन बगेचियों में प्रवचन होते है जिसमें हर घर से काई न कोई जाता है। प्रवचनो की आवाजे हमारे घरो तक भी आती रहती है। जब कोई बडा संत किसी बगेची मे आता है तो आस पास के लोग उसमें सहयोग करते है। युवा बढ चढ कर इसमें हिस्‍सा लेते है। आने वाले संत की वो खूब सेवा करते है। सुबह सुबह जब आप निकलते हो तो आप को कहीं न कहीं कोई साधु और संत मिल ही जाता है।  यहां किसी वाशिदे को आज तक कभी किसी बगेची के कार्यक्रम से कोई परेशानी नहीं हुई है और वाशिंदो के किसी कार्यक्रम से किसी बगेची को कोई परेंशानी नहीं हुई है। 

मै इस क्षेत्र में रहता हूं तो मै भी बगेची की संस्‍कृति से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। मेरे घर से मेरी मां इन बगेचियो में जाती रहती है। जब घर से मां बगेची जाती है तो हमें भी कभी जाने का अवसर मिल ही जाता है। मैं जब छोटा था तो अपनी मां के साथ बगेची जाया करता था। मां कभी मेरे साथ बगेची में भेंट भी भेजती थी और मै दौडकर उस बगेची में दे आता था। हमारे लिए कोई बगेची घर से ज्यादा दूर नहीं थी। कभी मै अपने दोस्‍त के साथ उस बगेची में भेंट देने के लिए ले जाता था। किसी उत्‍सव या त्‍योंहार के अवसर पर मां हम सब घरवालो को बगेची में महंतजी से आर्शिवाद लेने भेजती । हम सब की यह आदत भी हो चुकी थी कि उत्‍सव या त्‍योंहार के अवसर पर हम सब एक साथ बगेची जाते । मै जब पन्‍द्रह – सत्रह वर्ष का रहा होउंगा। मै मां के साथ बेगची जाता था। बगेची मे मै महंत जी से आर्शीवाद लेता और मंदिर में दर्शन करता। यहां हर बगेची में मंदिर बना है। वहां साधुओ और संतो की टोलियो को देखता । मैं उन साधु और संतो की टोलियो को देखकर प्रभावित होता। मुझे हमेंशा से ही साधु और संतो के दर्शन करना अच्‍छा लगता है। उस समय में उनके कार्यकलापो को देखता कि वे कहां जाते और क्‍या करते है। एक उत्‍सुकता मेरे मन में हमेंशा बनी रहती। मैं उनके द्वारा उच्‍चारित किये जाने वाले वेद मंत्रो को ध्‍यान लगाकर सुनता। मै अपनी मां से इस बारे में बहुत सारे प्रश्‍न पूछता रहता ।  साधु और संत टीवी नहीं देखते क्‍या । साधु और संत दूसरे कपडे क्‍यो नहीं पहनते । ये भी त्‍योंहार मनाते है क्‍या। त्‍योहरो पर ये भी खरीदारी करते है क्‍या । बहुत सारे उटपटांग प्रश्‍न मै अपनी मां से पूछता। मेरी मां मेंरे हर प्रश्‍न का जवाब देकर मुझे संतुष्‍ट कर देती। उन दिनो में बगेची में गया तो मुझे एक लडका हमेंशा प्रभावित करता। वो मेरी उम्रं का ही रहा होगा। कोई चौदह- पन्‍द्रह वर्ष का। मैं बगेची जाता तो वो मुझे साधुओ के साथ चलता हुआ दिखता। मुंडन करवाया हुआ और भगवे वस्‍त्र पहने हुए। मै उसकी तरफ देखता तो वो मुस्‍कुरा देता। उसे आये हुए कुछ दिन ही हुए होंगे। उसके होठो के बीच निकले हुए सफेद दांत हमेंशा मेरे में उर्जा भर देते। साधु और संत वेदमंत्रो का उच्‍चारण करते तो वो भी उसी लय में वेदमंत्रो का उच्‍चारण करता। महंत जी उसे भिक्षु कहकर बुलाते । मैने कभी उसके माथे पर चिंता, भय और परेशानी की कोई रेखा नहीं देखी। मां के साथ कभी दोपहर में प्रवचन में जाता तो भिक्षु मंहत जी के पीछे बैठा होता। वैसे ही मुस्‍कुराते हुए। शाम को कभी मै बगेची जाता तो वो मंदिर में आरती करते हुए मिलता। वो जोर जोर से स्‍तुति के साथ आरती गाता। वहां आये हुए लोग आरती के बाद उसके चरण छुकर आर्शीवाद लेते । वो मुस्‍कुराते हुए आर्शीवाद देता।

मै उस समय किशोरावस्‍था में था। मेरे मन में कई प्रश्‍न उठते थे। भिक्षु को देखने के बाद तो मेरे न में प्रश्‍नो का झरना बह निकला। मै सोचता रहता कि इतना छोटा बच्‍चा साधु कैसे बन गया। क्‍या घर से भागकर साधु बना है। उसका मन साधु बनने में कैसे लग गया। मै अपनी मां से ये सारे सवाल पूछता । मेरी मां मेरे सवालो का कुछ न कुछ उत्‍तर दे देती परन्‍तु भिक्ष्‍ुा  पर दिये गये जवाबो से मै संतुष्‍ट नहीं था। मेरे मन में उलझन बनी रहती। एक शाम को मै बगेची गया। बगेची मै आरती हो रही थी। श्रद्धालुओ की भीड थी। सभी आरती में भाव विभोर थे। आरती समाप्‍त होने के बाद सभी जयकारे लगा रहे थे। भिक्षु आरती हर एक नजदीक ले जा रहा था। सभी आरती के उपर हाथ फेरकर अपनी आंखो के लगा रहे थे। भिक्षु मुस्‍कुराते हुए सभी को आरती के दर्शन कर रहा था। मैं भीड में सबसे पीछे खडा था। भिक्षु धीरे धीरे मेरी ओर आ रहा था। मेरी ओर भिक्षु आया। मै उससे कुछ पूछना चाह रहा था। मेरी हिम्‍म्‍त नहीं हो रही थी। इस कारण मेरे चेहरे पर शंका के भाव थे। भिक्षु मेरे नजदीक आया। वो ही मुस्‍कुराता हुआ। उसके दो सुदंर होठो में से सफेद दांत झांक रहे थे। ऐसे लग रहा था कि सुबह की लालिमा मे से भोर का सूरज निकल रहा हो। मैं कुछ बोल नही पाया। वह मुस्‍कुराते हुए बोल पडा- कैसे हो ब्रदर। कहते हुए आरती मेरे आगे कर दी।  मै सकपका गया। आरती के बाद घर लौटा तो मेरे जहन मे सवालो की जगह उस भिक्षु का मुस्‍रकुराता हुआ चेहरा था।

रात को बिस्‍तर पर सोने गया तो एक बार फिर सवाल मेरे सामने खडा हो गया। इतना छोटा बालक भिक्षु कैसे बन गया। उन दिनो दीवाली आने वाली थी। मै सोच रहा था कि मुझे दीवाली का इतना शौक है। मै दीवाली पर पूरे शहर की रोशनी देखने जाता हूं। इतने पटाखे फोडता हु और तरह तरह की मिठाईयां खाता हूं। मै इनके बिना नहीं रह सकता हूं। वो कैसे रहता होगा। उसके कानो में पटाखो की आवाज पडती होगी तो उस‍के मन में भी आता होगा। मै दीपावली को नये नये कपडे पहनता हु। तो भिक्षु के मन में भी दूसरे कपडे पहनने की आती होगी। यह सोच कर मै भिक्ष्‍ुा के लिए दुखी होता । मै करवटे बदलता रहा और भिक्षु के बारे में सोचता रहा।



अगले दिन मै खेलने गया। वहां भी सोचता रहा कि मुझे खेलने मे बहुत मजा आता है तो उस भिक्षुं के मन में भी तो आती होगी। उसके मन में भी तो खेलने की बात आयी होगी। पर वो खेल नही सकता। आश्रम के नियम ही है ऐसे। वो कैसे रहता होगा। उसकी जिंदगी तो रसहीन हो गयी होगी। एक बार फिर भिक्षुं को लेकर मै दुखी हुआ। बडो तक तो ठीक है पर एक बच्‍चा कैसे भिक्षु हो सकता है। तभी उस बगेची से साधुओ की एक टोली भिक्षा मांगने निकली। वैसे तो बगेचियो में बहुत से सेठ दान करते है और उन्‍हे भिक्षा मांगने की जरूरत नहीं होती है परन्‍तु भिक्षा मांगना उनकी एक परंपरा है। इसलिए वो महीने में किसी दिन भिक्षा मांगने निकलते है। कुछ एक घरो में जाकर परंपंरा का निर्वाह करते है। उन साधुओ की टोली में भिक्षु मुस्‍कुराता हुआ चल रहा था। मै उसे देखकर दुखी हो रहा था। उसके चेहरे पर कोई शिकन और चिंता नहीं थी बल्कि वो मुझ से दुगुना खुश्‍ दिखाई दे रहा था। मै फिर भी सोच रहा था कि वो इतना खुश क्‍यों है। क्‍या वो पहले अभावो में जी रहा था। हो सकता है वो पहले कहीं अनाथाश्रम में रहा हो। वहां से भागकर आया और यहां उसे अच्‍छा लगने लगा हो। फिर भी ऐसा नहीं हो सकता है कि वो इन बंधनो में खुश रहे ।

मै दिन भर उलझन में रहा। मेरे चेहरे पर उलझन साफ देखी जा सकती थी। मेरे चेहरे पर तनाव व उलझन उतनी ही थी जितनी भिक्षु के चेहरे पर खुशी और आनंद। मेरे पिताजी ने मुझे देख लिया और मेरे चेहरे पर लिखे तनाव और उलझन को पढ लिया। पिता जी ने पूछा- क्या बात है। तो मैने सारी बात अपने पिताजी को बता दी। पिताजी मेरी बात सुनकर मुस्‍कुराये और कहा कि कल मै तुम्‍हारे साथ बगेची चलूंगा। कल हम भिक्षु से ही पूछ लेते है। मै क्‍या तुम खुद ही पूछ लेना।

अगले दिन मै अपने पिताजी के साथ बगेची गया। महंत जी साधना मे व्‍यस्‍त थे। दूसरे संत अध्‍ययन कर रहे थे। भिक्षु भी अध्‍ययन कर रहा था। पिताजी ने वहां बात की  तो उन्‍होने भिक्षु से बातचीत करने की अनुमति दे दी। मै भिक्षु के सामने चुपचाप बैठा था। खामोशी से उसे देखता रहा । भिक्षु भगवे वस्‍त्र पहने हुए चेहरे पर मुस्‍कान के साथ बैठा था। भिक्षु पहले बोल पडा – क्‍या बात है ब्रादर।

मैने पूछा – एक बात पूछूं ।

भिक्षु बोला- एक नहीं दस पूछो।

मैने अपना माथा खुजाया और बोला- तुम्‍हारी मुस्‍कान असली है।

भिक्षु मेरे प्रश्‍न पर फिर मुस्‍कुराया और बोला- सौ प्रतिशत खरी। तुम्‍हे क्‍या लगा कि मै झूठा मुस्‍कुरा रहा हूं।

नहीं। मै तो ऐसे ही पूछ रहा था। तुम्‍हे कभी दूसरे प्रकार के कपडे पहनने की ईच्‍छा नहीं होती।

वो फिर मुस्‍कुराय और बोला- ब्रादर। रंग बिरंगे कपडे क्‍यों पहनते है। खुशी के लिए। मुझे वैसे ही इतनी सार खुशी मिली हुई । रंग बिरंगे कपडे पहनने लगगूगां तो ये खुशी मै खो दूंगा।

भिक्षु के जवाब से मै पूरा संतुंष्‍ट नही् हुआ। फिर मैने अगला सवाल किया – तुम्‍हे कभी खेलने का मन नहीं होता।

इस बार फिर भिक्षु मुस्‍कुराया नहीं बल्कि हंसा । उसने कहा- यहां खेलने की पाबंदी थोडे ही है। मै  जब चाहे खेल सकता हूं। मै तुम्‍हारे साथ भी खेल सकता हूं। मुझे मना थोडे ही है परन्‍तु मै ज्ञान के साथ खेलता हूं। मुझे उसमे आनंद आता है। मै महंत जी के प्रवचनो मे खो जाता हूं। मुझे शास्‍त्रो में नयी नयी चीजे मिलती है। मेरी जिज्ञासा शांत होने के बाद बढती जाती है।

इस जवाब के बाद तो मेरे को लगा कि मेरे पास सवाल है ही नहीं । फिर भी मैं पूर्ण रूप से संतुष्‍ट नहीं था। मैने फिर पूछ लिया – तुम्‍हे इतनी खुशी मिलती कैसे है।

इस बार भिक्षु मंद मंद मुस्‍काया और बोला – यह तो यहां आने पर पता चलता है।यहां पर महंत जी शास्‍त्रो का ज्ञान देते है और फिर ध्‍यान करवाते है। उस परमात्‍मा को ध्‍यान करता हूं तो मुझे खुशी मिलती है। मै परमात्‍मा में खोया रहता हूं। मेरी खुशी का कारण भी यही है। इसके लिए अभ्‍यास करना पडता है। महंत जी के सानिध्‍य में मै इसका कठोर अभ्‍यास कर रहा हू। इसी अभ्‍यास से मुझे खुशी मिलती है ब्रादर।

इस जवाब का मेरे पास कोई जवाब नहीं थी। इस जवाब ने मेरे सारे सवालो के जवाब दे दिये। अब मेरे पास कोई सवाल नहीं था। मै भिक्षु को देखता रहा। मैने भिक्षु का प्रणाम किया। आज मेरे मन में भिक्षु के प्रति आदर भाव बढ गया। मै और पिता जी मंदिर के दर्शन कर वहां से निकल लिये। हमारे कानो में वेदमंत्रो की ध्‍वनियां पड रही थी।

Sunday, September 18, 2022

मनीष कुमार जोशी की कहानी - बर्थडे गिफ्ट

 


करीब छ: महीनो बाद वो अपने फार्म हाउस आया था। हाउस उसने शिमला के मकानो के डिजायन का बनवाया था। पगडंडियो पर खरपतवार उग आयी थी। पगडंडियो पर चलने में घास फूस आडे आ रही थी। उसकी पेंट घासफूस से पूरी तरह से खराब हो चुकी थी। खेत में बना हाउस पतथर और लकडी से बना था। पिछले दिनो अच्‍छी बारीश हुई थी। खेत लहलहा रहा था। मकान में पतथरो के बीच में हर पत्‍ते निकल आये थे। छत्‍त पर भी बहुत ख्‍रपतवार इक्‍टठी हो गयी थी। वो निकल कर बाहर लटक रही थी। इन दिनो धूप तेज होने से कुछ पत्तियां जल गयी थी। हरे पत्‍तो के बीच चली हुई टहनियां लटक रही थी। बारिश से इतनी हरियाली हुई कि हाउस के ताले पर भी हरि टहनियां आ गयी थी। चारो तरफ हरियाली होने के बावजूद वो थके मन से चल रहा था। उसका मन कहीं ओर था। पगडंडी पर उगी हुई घास फूस उसके मन को लौटाकर फार्म हाउस पर नहीं ला पायी। वो हर दो महीने में फार्म हाउस आ जाता है। पिछले साल शादी के बाद उसका यहां आना कम हुआ है। मुश्किल से एक दो बार आया है। वो भी आने के बाद रात को यहां नहीं रूका था। वो हाउस के पास आकर खडा हो गया। उसने पूरे हाउस पर एक नजर दौडाई। धूप आज तेज थी। उसके सिर पर सीधे पड रही थी। उसे गरम लग रही थी। उसके माथे पर पसीना आ गया था। धूप में पैदल चलने से पसीना आ ही जाता है। उसके जल्‍दी आता है। रिंकू भी कहती है कि उसे पसीने की बीमारी है। चलते है तो पसीना। खाते है तो पसीना। कुछ पीते है तो पसीना । कोई काम करते वक्‍त उसके माथे पर पसीना आ जाता है। उसका मन उलझाव में खोया हुआ था। उसने ताले की तरफ नहीं देखा। दीवार में उग आयी पत्तियो को तोडने लगा। हर बार तो उसके आने पर किसना दौडकर आ जाता है परन्‍तु आज वो अभी तक नहीं आया। उसे भी ख्‍याल नहीं आया कि किसना को यहां रखवाली के लिए रखा हुआ है। वो दीवार को देखता रहा। फिर उसे ख्‍याल आया चाबी तो उसके पास है। उसने जेब से चाबी निकाली और ताले में लगायी। ताले को खोलने में थोडी मशक्‍कत करनी पडी। थोडी कोशिश के बाद ताला खुल गया। छ- हीने से बंद घर में एक अजीब सी बदबू आ रही थी। घर के अंदर धूल ही धूल थी। वो अंदर चला गया। उसने किसना को आवाज भी नहीं दी। घर में घूसते ही एक कमरा है। उसने कमरे को खोला। कमरे में भी मिटटी जमी हुई थी। वो कमरे के अंदर गया। वहां आरामदायक कुर्सी खिडकी के पास थी। उसने अपनी जेब से रूमाल निकाला और कुर्सी पर से रूमाल से धूल हटाई। फिर खिडकी खोलकर उस आरामदायक कुर्सी पर बैठ गया। खिडकी से उसका हरा भरा खेत दिखाई दे रहा था। आराम दायक कुर्सी पर अपनी गर्दन पीछे कर कुर्सी को आगे पीछे हिला रहा था। मन में विचारो का सैलाब उमड रहा था। अंदर विचारो का सैलाब बाहर की शांति को भंग नहीं कर पा रहा था। यह जरूर था बाहर की शांति अंदर मची हुयी उमड घुमड को रोकने में विफल थी। 



उसे लग रहा था कि रिंकू ने ठीक नहीं किया। उसकी भावनाओ का ख्‍याल उसे रखना चाहिए था। वो उसका ख्‍याल रखता है। उसे भी भावनओ को समझना चाहिए था। अब वो वापिस घर नहीं जायेगा। फार्म हाउस में ही रहेगा। रिंकू उसकी छोटी छोटी जरूरतो का ख्‍याल नहीं रख सकती तो शादी करने का मतलब ही क्‍या था। अब उसे यहीं रहना है। रिकू नौकरी करती है। अपना पेट खुद पाल सकती है। मेरी जरूरत क्‍या है। यह ठीक है कि मुझे समय नहीं मिलता है परन्‍तु फिर मै उसका ख्‍याल रखता हुं। परन्‍तु वो। वो मेरे लिए रूमाल जैसी चीज की भी व्‍यवस्‍था नहीं कर सकती। रोज होता है । वो रूमाल मांगता है और रिंकू कहती है भूल गयी। जब उसकी रिंकू के लिए अहमियत ही नहीं है तो उसे साथ क्‍यों रहना है। दुनिया बहुत बडी है। वो तो अपनी जिंदगी इस फार्म हाउस पर बिता सकता है। विचारो का सैलाब तुफान की तरह चल रहा था।

थोडी देर में किसना दोडकर आ गया। साब माफ करना। मैने आपको देखा नहीं । वो हाथ जोडकर बोलने लगा।

नहीं कोई बात नहीं । पानी लेकर आ।

अभी लाया।

किसना दौडकर पानी लेकर आया। उसने पानी पीया और थोडी देर तक कुर्सी पर टहला और खडा हो गया। उसने किसना से कहा कि आज से वो यहीं रहेगा। उसके हिसाब से ही सब कुछ ठीक कर देना। किसना ने पूछा मैम साहब भी आयेगी क्‍या। उसने मना कर दिया और कह दिया अब वो अकेले ही यहां रहेंगे। किसना कुछ बोला नहीं और घर की सफाई में लग गया।

वो खेत में आ गया। खेत के बीच मे चलता रहा। खेत में फसल उसके कमर तक आ गयी थी। चलते हुए वो टहनियो को अपने हाथो से किनारे कर रहा था। मन में विचारो की रेल अभी भी सरपट दौड रही थी। रिंकू के लिए उसने कितना कुछ किया। शादी के बाद से ही उसने रिंकू की भावनाओ का सम्‍मान किया है और वो उसे लज्जित करने का एक भी मौका नहीं छोडती है। आज उसने एक रूमाल की बात पर बखेडा खडा कर दिया। उसे समझाने के लिए उसके पास दिमाग नहीं है। वो तो अब सब कुछ छोड आया है। यही फार्म हाउस उसका घर है। अब वो संभाल लेगी अपना घर। एक बादल का टुकडा आसमान में आ गया था। उससे थोडी बहुत छाया खेत में हो गयी थी। वो चलते चलते किसना की झोंपडी तक पहुंच गया था। किसना की झौपडी के बाहर पेड के नीचे खाट बिछी थी और पास में ही भैंस बंधी हुई थी। वो खाट पर बैठकर लेट गया। पेड पर चिडियाऐं चहचहा रही थी। सभी चिडियाओ के एक साथ चहचहाने से शोर जैसा महसूस हो रहा था परन्‍तु उसे कुछ महसूस नहीं हो रहा था। उसके मन में तो रिंकू के प्रति गुस्‍सा निकल रहा था। आज जैसे उसने ठान लिया था कि वो फार्म हाउस में ही रहेगा। वो रिंकू को बताकर भी नहीं आया था। रिुकू काम पर चली गयी थी। वो इधर चला आया। सुबह झगडे के बाद रिंकू का फोन भी नहीं आया था। उसने भी फोन करने की जरूरत नहीं समझी थी।


किसना घर साफ करने के बाद आकर बोला- साहब । खाना लगा दूं क्‍या। बाजरे की रोटी और सब्‍जी है। उसने कुछ देर सोचा फिर बोला ले आओ। आज सुबह हो झगडे के बाद खाना भी खाकर नहीं आया था। किसना एक थाली में बाजरे की रोटी और सब्‍जी ले आया था। थाली कुछ देर उसके आगे पडी रही। किसना के कहने पर उसने एक कौर तोडा । धीरे धीरे अपने मुंह तक ले गया। उसका खाने का मन नहीं था। उसने आधी रोटी खायी और आगे खाने से मना कर दिया। अब शाम होने लगी थी। सूरज डूब चुका था। पक्षी लौटकर आने लगे थे। वो अभी तक खाट पर ही बैठा था। अब उठकर कमरे की ओर जाने लगा। उस खाट से कमरे की दूरी आधा किमी होगी परन्‍तु उसके लिए वो कई किमी दूर थी। वो धीरे धीरे जा रहा था। हाथ से बाजरे की फलियों को हटाते हुए। एक बार फिर वो घर के आकर खडा हो गया। पत्‍थरो से निकल पत्तियों को उखाडने लगा। फिर धीमे कदमो से अपने कमरे में गया। कमरे में कलैण्‍डर लटक रहा था।हवा तेज हो गयी थी। तेज हवा के झौंको से कलैण्‍डर के पन्‍ने फडफडा रहे थे। पहले उसने सोचा कि खिडकी बंद कर दूं परन्‍तु फिर उसने अपना विचार बदल लिया। कलैण्‍डर अब भी फडफडा रहा था। वो कलैण्‍डर के पास गया और कलैण्‍डर को उतार लिया। कलैण्‍डर को उतार कर उपर रखने लगा तो उसने कलैण्‍डर के महीने  के पन्‍ने को बदल दिया। उसने देखा आज की तारीख पर गोल किया हुआ है। वो महत्‍वपूर्ण दिनो को साल के पहले दिन ही गोल कर देता है। आज उसने याद नहीं आ रहा था कि क्‍यों गोल किया हुआ है। उसने अपने दिमाग पर जोर डाला परन्‍तु उसे याद नहीं आ रहा था। फिर अचानक से याद आया। आज तो रिंकू का बर्थडे है। बर्थ डे का विचार आते ही पहले से चल रही विचारो की रेल रूक गयी। जैसे विचारो की रेल का स्‍टेशन आ गया हो और दूसरी रेल चलने की तैयार हो। उसने अपना बैग उठाया और घर से निकल गया। किसना दौडता हुआ आया। उसने पूछा साहब वापिस आ रहे हो क्‍या। वो हाथो से मना करते हुए गाडी में बैठ गया। गाडी तेजी से दौडाता हुआ शहर में आ गया। उसने अपनी गाडी ज्‍वेलरी शॉप के पास पार्क की और ज्‍वेलरी शॉप में चढ गया। रिंकू पिछले एक बरस से अंगूठी मांग रही थी। उसने ज्‍वेलरी शॉप से एक अंगुठी खरीदी। हीरे की अंगुठी। रिंकू को हीरे की अंगुठी पसंद थी। उसने अंगुठी पैक करवाई और शॉप की सीढिया उतरने लगा। उसकी नजर ज्‍वेलरी शॉप के ठीक सामने गयी जहां से रिंकू उतर रही थी। सामने जैण्‍टस गिफट का शो रूम था। रिंकू शौ रूम की सीढिया उतर रही थी। रिंकू ने उसको देखा नहीं था। दोनो उतरकर बिलकुल एक दूसरे के सामने आ गये। उसके हाथ में रिंग का शो केस था तो रिंकू के हाथ में रूमालो का एक बंच था। दोनो ने एक दूसरे को देखा । दोनो जोर से मुस्‍कुराये । उसने रिंकू का हाथ पकडा और गाडी में बैठ गये। रात चांदनी थी। चांदनी राते में गाडी चमकते हुए हॉर्न बजाती हुई घर की तरफ जा रही थी।

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Sunday, September 11, 2022

असली कबूतर

 






मेरे पापा मेरे लिए किसी हीरो से कम नहीं थे। वे बचपन में मुझे अपनी मास्‍टरी के किस्‍से सुनाया करते थे। वे किसी तरह से गांवो में पढाने जाया करते थे जहां उन्‍हे कई मील धोरो में पैदल चलना पडता था। गांव वाले किसी प्रकार उनकी सेवा करते थे। गांव में उनकी सबसे ज्‍यादा ईज्‍जत होती थी। गांव के लोग राय लेने के लिए उनके पास आते थे। एक बार गांव जाते थे तो एक सप्‍ताह बाद ही उनका आना होता था। पापा बताते थे कि वे जिस गांव में पढाने जाते थे उस गांव में पानी की बहुत कमी थी। पीने के लिए भी मुश्किल से पानी मिल पाता था। पहली बार वे उस गांव गये थे तो पीने का पानी कहीं नही मिला। एक हर एक आदमी छाछ का लौटा ले आता परन्‍तु पानी कोई नहीं लाया । फिर शाम को सरपंच ने पानी का घडा भर कर दिया। पापा काफी सालो तक गांव में पढाते रहे । फिर शहर में नौक्‍री करने लग गये। पढाने का शौक उन्‍हे फिर भी था। शाम को बच्‍चे उनके पास पढने आते थे। वे बच्‍चो से फीस नहीं लेते थे। वो अपनी सेवाऐ ऐसे ही देते थे। उनका मानना था कि विद्या खर्च करने से बढती है। एक बार शहर के एक अमीर व्‍यक्ति ने अपने बच्‍चे को अलग से पढाने के लिए बहुत सारी फीस का आफर दिया। पापा ने उसे साफ मना कर दिया और कह दिया कि पढाई में कोई अमीर और गरीब नहीं होता है। मेरे लिए सारे बच्‍चे बराबर है। उन्‍हाने अमीर व्‍यक्ति को वापिस लौटा दिया। 



पापा के पढाये बच्‍चे जब अच्‍छे नंबरो से पास होने लगे तो पढने आने वाले बच्‍चो की भीड बढ गयी। फिर पापा ने शाम का स्‍कूल खोल लिया। वहां पढाने के लिए दूसरे मास्‍टरो को भी रख लिया। मै उस समय दसवीं में पढता था। मै भी शाम की स्‍कूल में जाने लगा। वहां पढाई को रोचक किस्‍सो के साथ पढाया जाता। हमे पढने में बहुत रूचि आती। बच्‍चे कभी भी कोई क्‍लास मिस नहीं करते । मैं और राजेश दोनो शाम की स्‍कूल में पढने जाते। राजेश मेरा मित्र था। वो मेरे पापा से प्रभावित भी था। वो शुरू से ही पापा के पास पढने के लिए आता था। उसके घर में समस्‍याऐ थी परन्‍तु पापा कभी उसे उदास नहीं होने देते और उसका मन पढाई में लग जाता । शाम की स्‍कूल खुली तो वो सबसे ज्‍यादा खुश हुआ। मेरे साथ वो शाम को स्‍कूल में आने लगा। हम दोनो स्‍कूल में खूब मन लगाकर पढते और क्‍लास में बतायी गयी बात पर खूब चर्चा करते।



एक बार क्‍लास में पापा पशु पक्षियो के बारे में बता रहे थे। पापा  बता रहे थे कि पशु प‍क्षी किसी प्रकार किसी को कोई तकलीफ नहीं देते । कोई मानव उसे प्रेम करता है तो वो भी उसी प्रेम से उसका जवाब देते है। पापा ने बताया किस प्रकार लोग कुत्‍ता पालते है तो कुत्‍ता वफादारी से घर की रखवाली करता है। उसी प्रकार कोई पशु या पक्षी जिसको पालते है तो वो भी अपने मालिक के प्रति प्रेम दर्शाता है। पापा ने बताया कि पशु पक्षियो को कभी भी बांधकर या पिंजरे में नहीं रखना चाहिए। उन्‍हे खुले घूमते रहने देना चाहिए। कुत्‍ता पालते है तो उसे बांधना नहीं चाहिए और पक्षी पालते है तो उन्‍हे पिंजरे में नहीं रखना चाहिए। राजेश ने पूछ लिया – पिंजरे में नहीं रखेगे तो पक्षी उड जायेंगे। इस पर पापा ने बताया कि यदि हम उसे वास्‍तव में प्रेम करते है तो वो हमारे प्रेम के कारण् कहीं नहीं जायेगे। पापा ने एक जीवंत उदाहरण देकर अपनी बात को समझाया। उन्‍होने सफेत कपोतो की बात बतायी। पापा ने पूछा आप सफेत कपोत के बारे मे जानते हो। तो सभी ने ना में अपनी गर्दन हिलायी। फिर पापा ने कहा जिसे आप सफेद कबूतर या असली कबूतर कहते हो वहीं सफेद कपोत होते है। हमारे यहां सफेद कपोत को असली कबूतर के नाम से जाना जाता हे। वे शहर में दिखाई नहीं देते है। उनको चिडियाघर में या जंगलो में देखा जा सकता है। पापा ने बताया कि यहीं जस्‍सूसर दरवाजे के अंदर एक व्‍यक्ति के पास दो असली कबूतर है। उसने दोनो असली कबूतर खुले में रखे हुए है। वो उसके घर में ही घूमते रहते है। शाम को वो छत्‍त पर अपने हाथो से उनको आसमान में छोडता है तो वे आसमान में उडते है और एक घंटे तक उडकर वापिस वो उसी छत्‍त पर लौट आते है। राजेश ने कहा – पक्षी उडने के बाद लौटकर नहीं आते है। पापा ने कहा कभी तुम शाम को उधर जाओ तो देखकर आना किस प्रकार वो लौटते है।



असली कबूतर की क्‍लास हम लोगो को बहुत पसंद आयी। राजेश तो जैसे पापा की बातो में खो गया। वो असली कबूतर की कई प्रकार से कल्‍पनाऐ करता। शाम को अपनी छत्‍त पर खडा हो जाता और असली कबूतरो का इंतजार करता। आसमान में कोई सफेद सा पक्षी दिखाई देता तो मूझे कहता तो देखो वो असली कबूतर जा रहे है। मै आसमान की ओर देखकर मुस्‍कुरा देता। जस्‍सूसर दरवाजा हमारे घर से दूर था इसलिए हमे वहां अकेले जाने की इजाजत नहीं थी। मै और राजेश कभी सोचते की पापा के साथ जायेगे तो पापा को समय नहीं मिलता। राजेश् के पापा रात को देर से आते। हम यह सोचते ही रहते कि किस प्रकार वो व्‍यक्ति असली कबूतरो को पालता होगा। कबूतर उडकर कैसे वापिस उसके पास लौट आते है। राजेश सोचता इंसान ही इंसान का कहना नहीं मानता तो पक्षी इंसान को इतना कैसे मानते है। राजेश की बुआ कॉलेज में पढती थी उस समय घर छोड कर गयी थी परन्‍तु अभी तक लौटकर नहीं आयी। राजेश के पापा ने उसे बहुत ढुंढा। उसके पापा दूसरे शहरो में भी गये परन्‍तु बुआ कुछ पता नहीं चला। कई दिनो तक पापा उदास रहते थे। उस समय राजेश छोटा ही था। उसके दिमाग से बुआ की बात अभी तक नहीं गयी। असली कबूतरो के जिक्र से उसके मन में फिर से बुआ की याद आ गयी । वो मुझे रोज कहता कि हम असली कबूतर देखने चले । उसकी रूचि असली कबूतर देखने से ज्‍यादा उसके लौटकर आने को देखने की थी। कैसे उडे हुए पक्षी लौटकर कैसे आते है। वापिस उसी जगह पर जहां उन्‍हे कैद में रखा गया है। हम दोनो रोज उस ओर जाने की जुगत भिडाते लेकिन जा नहीं पाते। शाम को स्‍कूल का समय हो जाता तो स्‍कूल आ जाते ।

एक बार पापा किसी काम से शहर से बाहर गये हुए थे तो मै अपनी मम्‍मी से परमिशन लेकर राजेश के साथ जस्‍सूसर दरवाजे के अंदर गया। शाम को वक्‍त था। हमे नहीं मालमू था कि असली कबूतर किस घर मे है। हमने आस पास पूछा तो किसी ने ईशारा करके सामने वाला घर बताया। हम उस घर की ओर जाने लगे तो उस घर के छत्‍त पर एक व्‍यक्ति दोनो हाथे में असली कबूतर लिये खडा था। बिलकुल सफेद कबूतर थे। जैसा पापा ने बताया था वैसे ही सफेद थे। हम उन कबूतरो को देखकर रोमांचित हो रहे थे। उस व्‍यक्ति ने कबूतरो को हाथ मे लेकर अपने छत्‍त्‍ के दो चक्‍कर लगाये। फिर अपने दोनो हाथ उपर किए और दोनो असली कबूतर आसमान में छोड दिये। वो दोनो असली कबूतर आसमान में उडते गये। मै और राजेश् बहुत देर तक आसमान में उन सफेद कपोतो को देखते रहे और थोडी देर में वो सफेद कपोत आसमान में दिखने बंद हो गये। मैने राजेश को वापिस चलने के लिए कहा परन्‍तु राजेश ने कह दिया असली कबूतरो के वापिस आने तक हम यहीं है। हम वहीं एक किनारे बैठ गये। धीरे धीरे शाम गहराने लगी। सूरज छिप चुका था। चिडियाओ की चहचहाट  बढ गयी। वो व्‍यक्ति फिर से छत्‍त पर आ गया। हमने आसमान में देखा असली कबूतर फिर आसमान में नजर आने लगे। धीरे धीरे वो उडते हुए नीचे आने लगे। धीरे धीरे वो वापिस उस व्‍यक्ति की छत्‍त पर आ गये। वो दोनो नीचे आकर उस व्‍यक्ति के कंधो पर बैठ गये। हम दोनो यह दश्‍य देखकर बहुत रोमांचित हुए। राजेश बहुत ज्‍यादा रोमांचित था। फिर हम घर लौट आये। मैने अपनी मम्‍मी को बडे कौतूहल से यह किस्‍सा सुनाया।

अगले दिन शाम की स्‍कूल में यही किस्‍सा चलता रहा कि हमने किस प्रकार असली कबूतर देखे और वो किस प्रकार उडकर लौट आये। आज पापा की क्‍लास आयी तो पापा क्‍लास में आये। आज पापा ने वापिस पशु पक्षियो का किस्‍सा छेडा। पापा ने राजेश् से पूछा असली कबूतर देखकर कैसा लगा। उसने रोमांचित होकर वो किस्‍सा सुनाया। फिर उसने एक सवाल पूछ लिया। इस सवाल का जवाब पापा भी नहीं दे पाये। उसने पूछ लिया- असली कबूतर वापिस शाम को अपने मालिक के पास लौट आते है तो क्‍या इंसान वापिस लौटकर आता है क्‍या। इंसान अपना घर छोडकर जाने के बाद क्‍यो नहीं लौटता है। उसको गली गली आवाज देने के बाद भी वो नहीं लौटता है। सर इंसान घर छोडने के बाद क्‍यो नहीं लौटता है। बताइये सर जो इंसान घर छोडकर चला गया है वो क्‍यो नहीं लौटता है। यह कहते हुए राजेश के गालो पर आंसू लुढक गये। पापा कुछ देर खडे राजेश को देखते रहे । फिर क्‍लास के दरवाजे पर खडे होकर आसमान को देखने लगे। मैने राजेश के कंधे पर हाथ रखकर उसे नीचे बैठाया। क्‍लास में बिलकुल शांति थी।