Sunday, May 17, 2020

नंदकिशोर आचार्य अध्यात्म के कवि है


नंदकिशोर आचार्य नाटक, निबंन्ध और कविताऐ लिखते है। मुझे उनकी कविताऐ बहुत पसंद है। मेरी नजर मे वे अध्यात्म के कवि है।  ऊन्होने एक इंटरव्यू मे कहा था कि भारत मे मृत्यु को भी आशावादी दृष्टिकोण से देखा जाता है। मृत्यु भारतीयो के लिए एक उत्सव है। यह सब उनकी कवाताओ मे मिलता है। प्रस्तुत है उनकी ऐसी ही दो कविताऐ-

(1)
 साधु ने भरथरी को
दिया वह फल—
अमर होने का

भरथरी ने रानी को
            दे दिया
रानी ने प्रेमी को अपने
प्रेमी ने गणिका को
और गणिका ने लौटा दिया
फिर भरथरी को वह
— भरथरी को वैराग्य हो
                    आया

वह नहीं समझ पाया:
हर कोई चाहता है
अमर करना
प्रेम को अपने ।
(2)
अन्धेरा घना हो कितना
देख सकता हूँ मैं
           उसको

कभी अन्धा लेकिन कर देता है
                            सूरज
कभी पाँखें जला देता है

बेहतर है मेरी अँधेरी रात
न चाहे रोशनी दे वह
दीखती रहती है

आकाश में गहरे कहीं मेरे
वह तारिका मेरी ।

Saturday, April 25, 2020

किस्से पतंगबाजी के

अक्षय तृतीया को हमारे शहर मे खूब पतंगबाजी होती है। पतंगबाजी भी ऐसी कि दुनिया के बड़े बड़े पतंगबाज भी अपनी अंगुलियां दांतो मे फंसा लेते है। जितनी पत़गबाजी उतने ही पतंगबाजी के किस्से। हर उम्र का अलग किस्सा। किस्सा भी ऐसा कि सिकंदर और पौरस की लड़ाई का किस्सा भी पीछे रह जाये। दिनभर पतंगबाजी करते शाम को सारे पंगत बनाकर बैठ जाते। बड़े बुजुर्ग अपनी पतंगबाजी के हुनर का किस्सा हमे बताते। हम अपने हाथो की अंगुलियो पर हाथ टिकाकर एक एक बात सुनते।
मै कोई सात बरस का रहा होउंगा। मेरा भाई पांच बरस का होगा। पतंगे तो हमारा जैसे जीवन थी। पतंग लूटना, उड़ाना और किस्से सुनना और सुनाना सब हमारे शौक थे।  हमारी छत्त बहुत लंबी थी। मैदान जितनी लंबी। छत्त पतग उड़ाने के बिलकुल मुफीद थी। हम भाई भाई छत्त पर खूब पतंगे लूटते और उड़ाते। छोटे थे तो बड़ी पतंग कभी उड़ाई नही थी। उड़ाने से डर भी लगता था। कभी कभार कोई बड़ी पतंग पकड़ते तो हाथ कटने का भय रहता। एक बार अक्षय तृतीया से दो दिन पहले की एक सुबह की बात है। मै अकेला छत्त पर पतंगे देख रहा था कि मेरे कान के पास मांजे की सरसराहट हुई।  मैने हाथ से झटका दिया। मांजा हाथ मे आ गया। मांजे मे भारीपन महसूस हुआ। मै कुछ समझ नही पाया। दोनो हाथो से मांजे को पकड़ लिया। लगा कोई पतंग है। पर पतंग दिखाई नही दी। मै इधर उधर देखता रहा। नीचे गली से आवाज आई भतीजे पतंग है। मैने देखा दूर ऐक काले रंग की पतंग दिखाई दे रही थी। मैने महसूस किया पतंग की डोर मेरे हाथ मे है। इतनी दूर पतंग उड़ाकर पहुंचाना मेरा सपना था। आज सचमुच इतनी दूर की पतंग मेरे हाथ मे थी। बिलकुल बिंदी जैसी पतंग दिखाई दे रही थी। पतंग पकड़े कभी पैर आगे करता तो कभी पीछे। यह सुना था कि इतनी दूर तक गयी पतंगे छोटे बच्चो को साथ ले जाती है। यह डर भी मन मे लग रहा था। मैने भाई को जोर से आवाज लगायी। भाई ने सुना नही। मे कभी उछलता.सभी पैर पटकता। जैसे मैने कोई.शेर पकड़ लिया। नीचे से फिर आवाज आयी। भतीज मुझे दे। मैने नीचे देखा। पड़ोस वाले अंकिल थे। मैने मांजे का एक छोर नीचे कर दिया। अंकिल ने पतंग की डोर पकड़ ली। मै दौड़कर नीचे गया।  अ़किल पतंग उतारने लगे। मेरे चेहरे पर किसी युद्ध के जीतने की गौरान्विती थी। मै मांजे की लच्छी कर रहा था। अंकिल पतंग उतार रहे थे। मै लच्छी करते थकने लगा था। आस पास कुछ लोग इकट्ठे हो गये। मेरे द्वारा इतनी बड़ी पतंग लूटने की बात सुनकर आश्चर्य कर रहे थे। अब पतंग काफी नजदीक आ गयी थी। बहुत बड़ी पतंग थी। हम उसे चौगी पतंग  कहते थे। हमारे यहां इतनी बडी पतंग.बड़े बड़े पतंगबाज ही उड़ाते थे। पतंग को देखकर मेरा छोटा सा सीना चौड़ा हुए जा रहा था। अब थोड़ी देर मे पतंग मेरे हाथ मे आने वाली ही थी। बहुत बड़ी पतंग थी। अंकिल का हाथ भी थकने लगा था। मै भी भाई की बाट देख रहा था। वै चरखी लावे तो मै मांजा उसमे लपेटु। पतंग अब काफी नजदीक थी। अंकिल दूसरी पतंगो से बचाकर उसे उतार रहे थे। अभी उतार ही रहे थे कि एक दूसरी पतंग ने मेरी पत़ंग फर्राट से काट दी। अंकिल हाथ मे धागा लिये असहाय से कभी मुझे कभी पतंग काटने वाली पतंग को देख रहे थे। जिस.पतंग ने हमारी पतंग को काटा वो राक्षस की तरह हमारे ऊपर सरसराट करते हुए उड़ रही थी। मै अपना मुंह ढिला किये सबको देख रहा था।
ऐसे ही किस्से हम गालो पर अंगुलिया टिकाये सुनते थे।

Friday, April 17, 2020

लॉक डाउन का एक दिन

लॉक डाउन का एक दिन
इन दिनो भोर अलग तरह की होती है। पौ फटते ही चिड़ियो की कलरव सुनाई देने लगती है। वैसे तो भोर मे हर रोज ही वातावरण निर्मल होता है परन्तु इन दिनो पानी की तरह स्वच्छ और निर्मल है। लाक डाउन के कारण वाहनो का धुआँ और चीं पो न के बराबर है। इन दिनो मेरी छत्त पर वो  पक्षी भी आ जाते जो कभी इस शहर मे नही देखे गये। कल दो तोते आये हुए थे। दोनो गुलाब के पौधे पर बैठ गये थे।बहुत मनोहर दृश्य बन पड़ा था। छत्त से देखता हूं तो एक या दो दूध वाले अपने वाहनो पर फिरते दिखाई  देते और कोई नही होता है।

मै अपने नित्य कर्म, पूजा पाठ, योग ध्यान करने के बाद आफिस की ओर निकलता हूं। वैसे तो लाक डाउन के कारण सारे सरकारी कार्यालय बंद है परन्तु मै जिला प्रशासन मे कार्यत हूं इसलिए जाना पड़ता है।  सड़क पर एका दुक्का लोग होते है। सारी दुकाने बंद है मानो किसी बेहोशी की हालत मे हो।  दुकानो के आगे की चौकियो पर कुछ कबूतर बैठे है जो एक दूसरे के साथ अठखेलिया कर रहे है। हवा चलने पर सड़क पड़े कूड़े मे पड़ी पालिथिन की थैलियां उड़ने लगती है। दूर दूर तक सड़क बिलकुल खाली  दिखाई देती है ऐसा लगता है जैसे शहरवासी शहर छोड़कर कहीं चले गये है। थोड़ी दूर चलते ही जस्सूसर गेट पर कुछ पुलिस वाले खड़े है। कुछ पुलिस वाले एक दुकान की लम्बी चौकी पर छाया मे बैठे है। दस बजे तक धूप तेज हो जाती है। सड़क पर गिर कर चमकती है। कहीं से कोई आवाज नही आ रही। सड़क पर चहलकदमी कर रहे पुलिस के सिपाहियो के जूतो की आवाजे सुनाई दे जाती है। दो मेडिकल की दुकाने खुली हुई। उस पर भी एक दो आदमी ही दवाई खरीद रहे है। आगे पुलिये पर चढ़ता हूं तो पूरा पुलिया किसी लंबे गलियारे की तरह दिखता है। पुलिये के ऊपर से आस पास के घरो की खाली छत्ते दिखाई देती है।   एसा लग रहा था जैसे एक साथ कई छत्ते धूप मे सूख रही है।  पुल से उतरते ही खाली पड़ा फड़ बाजार दिखाई देता् है। सामान्य दिनो मे फड़बाजार मे पैर रखने को जगह नही होती है परन्तु इस समय बिलकुल विरान है। फड़ बाजार के मार्ग के खड्डे और बड़े बड़े पत्थर  साफ दिखते है। तेज हवा के साथ कचरे मे पड़े कांदो के छिलके उड़ने लगते है। कुछ गाये बैठी ऊंघ रही है। आगे कुछ दूरी पर चलने पर हैड पोस्ट आफिस  के पास पुलिस वाले खड़े है। खाली सड़क पर आने वाले एक दुक्का लोगो पर नजर रख रहे है। मै उनके पास पहुंचता हुं तो मेरे  को रोकते है। मै रूककर अपने आफिस का कार्ड बताता हुं तो वे मेरे को जाने देते है। आगे हनुमानजी का मंदिर है। इस समय लाक डाउन के कारण शहर के सारे मंदिर बंद है। यह मंदिर भी बंद है। आगे लोहे की् ग्रिल के गेट बने हुए है। इस ग्रिल मे से हनुमान जी की छवि दिखाई दे जाती है। दो चार लोग उस ग्रिल मे से दर्शन कर रहे थे। मंदिर के आगे और कोई नही था।  मंने भी अपनी बाईक रोककर हनुमान जी के दर्शन किए। हर रोज आफिस जाते वक्त मै हनुमान जी के दर्शन करता हुं। फिर आगे निकलता हुं। आगे सड़क के किनारे जूनागढ़ के आगे विज्ञापनो के बड़े बड़े होर्डिग्स लगे है। होर्डिग्स ऐसे लग रहे जैसे वे खाली सड़क को देख रहे है। आगे सार्दुलसिंह जी सर्किल है जहां पर सार्दुशसिंह जी की मूर्ति  कोटगेट तक खाली सड़क को देखती हुई प्रतीत होती है।   सार्दुलसिंह सर्किल से निकलते ही मेरा आफिस आ जाता है। जिला कलक्टर कार्यालय।
 आफिस के कुछ गाड़ियां और बाईक्स खड़ी है।इनमे कुछ गाड़ियो पर लाल बत्ती लगी है। ये कलक्टर और दूसरे अधिकारियो की गाड़ियां है। मै अपनी बाईक्स खड़ी करके आफिस की सीढ़ियां चढ़ता हुं। सबसे पहले रसद विभाग है जहां दस बारह लोग काम मे लगे हुए। तीन-चार  लोग कम्पयूटर पर काम कर रहे है।  एक कर्मचारी फोन अटेण्ड कर रहा है। एक फोन आता है कि मुक्ताप्रसाद नगर मे चार लोग कल से भूखे बेठै है। कर्मचारी तुरंत सम्बन्धित को बताता है। पीछे वाले कमरे में से दो कर्मचारी खाने के पैकेट लेकर बाहर आते है और गाड़ी मे बैठकर खाना पहुंचने के लिए निकल पड़ते है। दिनभर यहां ऐसे ही चलता है। फिर मे ऊपर अपने विभाग मे चल पड़ता हुं। पूरे रास्ते शांति पड़ी है लेकिध मेरे विभाग मे आपाधापी मची हुई है। कोई सरकार को सूचना ईमेल कर रहा है। कोई मीटिंग की तैयारी कर रहा है। कुछ लोग पीबीएम अस्पताल से सूचना  ले रहे है। दूसरे कमरे मे कर्मचारी लोगो के पास जारी कर रहे है।  ये विभाग चौबीस घंटे काम करते है। घर मे लोक डाउन मे लोग जहां समय बिताने के बहाने ढुंढ रहे होते है वही यहां कर्मचारियो को खाना खाने के लिए समय नही मिल पा रहा है। मेरे को भी एक सूचना तैयार करने के लिए कहा जाता है। मै जुट जाता हूं सूचना तैयार करने मे। काम करते करते कब शाम हो जाती है पता ही नही चलता है। फोन  से सूचनाऐ लेकर मैने एक बड़ी सूचना तैयार की तब तक  आठ बज चुके थे। मैने घर निकलने की तैयारी कर ली। अपना बैग उठाया और नीचे अपनी बाईक पर आ गया.

 आसमान मे तारे निकल चुके थे। मेरे आफिस के आगे अभी भी गाड़िया और बाईक्स खड़ी थी। कुछ गाड़िया आ भी रही थी। आम दिनो मे रात को आठ बजे  सार्दुलसिंह सर्किल के आगे रौनक रहती है। इन दिनो इस समय ऐसा लग रहा है जैसे रात के दो बजे है। सर्किल से कोटगेट को साफ देख सकते है।    पुलिस के सिपाही रास्ते मे खड़े है। इस बार मेरे गले मे आफिस का आईडन्टी कार्ड लटका होने से मुझे नही रोका। जाते वक्त मे कोटगेट होकर जाता हुं। बंद पड़ी दुकानो के बी मे निसंग सा जाता हुं। कुछ दुकानो के छपरे की छाया सड़क पर पड़ रही है। दुकानो के आगे एक दो कुत्ते चल रहे है।आसमान मे चांद चमक रहा था। रोड़ लाईटो के बीच चादनी भी सड़को पर पड़ रही थी। पूरी सड़क पर सन्नाटा पसरा था। कही दूर से कुत्तो के भौंकने की आवाजे आ रही थी। कभी किसी चमगादड़ की आवाज भी आ जाती है। ऐसा लग रहा है में किसी जंगल मे से निकल रहा हुं।  दिमाग मे भी एकांत और आशंकाऐ विचरण कर रही है। तभी सामने से एक एंबुलस निकलती है। मै जाती हुई एंबुलेस को देखता हुं। मेरी देह कांप जाती है। एक महामारी ने जीते जागते शहर को वीरान कर दिया। आगे कोटगेट, जोशीवाड़ा सब जगह अर्धरात्री का सन्नाटा है। मेरा शहर जो रात को भी जागता है। उसी सड़को पर वीरानी है। बदहवास से जानवर घूम रहे है। मै खाली सड़को पर चलता हुआ घर पहुंच गया। इस तरह बीतता है  लोक डाउन मे मेरा दिन।

Friday, January 17, 2020

हैयर सैलून


मै आज भी बाल कटवाने डेढ महीने के बाद ही जाता हु। मेरा हेयर सैलून वाला हर बार कहता है साहब आप हमारे साथ अन्याय करते है। एक दाम मे तीन बार के बाल कटवा लेते हो। मै हर बार मुस्कुरा देता हुं। मै बरसो से एक ही सैलून मे बाल कटाता हूं। कई बार चाहा कि सैलून बदल लूं लेकिन मेरे कदम मेरे रेगुलर सैलून की ओर चले जाते है। मैने कभी उसको नही कहा कि मेरे बाल इस.तरह से काटना। वो बाल काट देता है और मै बाल बनाकर वापिस घर आ जाता हूं। मुझे याद नही कि  मै कब से इस सैलून मे बाल कटवा रहा हूं। कालेज के दिनो से मै एक ही सैलून मे बाल कटवा रहा हूं।
इससे पहले हम लोग अपने पूराने घर के नजदीक राजु नाई के सैलून मे बाल कटवाते थे। सैलून क्या थी दुकान थी। वो आज के सैलून की तरह अत्याधुनिक नही थी।
राजु नाई की सैलून मेरे मामाजी के घर के ठीक नीचे थी।  उसने अपनी दुकान मे अमिताभ, धर्मेन्द्र,  जितेन्द्र और शत्रुघ्न सिन्हा के.फोटो लगा रखे थे। लोग आते और फोटो देखकर बता देते कि उन्हे कैसी कटिंग करवानी है। वो वैसी ही कटिंग बना देता। हम बच्चे लोग भी अमिताभ बच्चन जैसी कटिंग करवाना चाहते थे। मै क ई बार राजु से कहता मेरी भी अमिताभ की तरह कानो के ऊपर बाल वाली कटिंग बना दे तो वो कहते पहले तेरे पापा से पूछ लूं। ऐसा कहते ही हम चुपचाप बाल कटवा लेते। उसकी दुकान मे मायापुरी पत्रिका पड़ी रहती थी। बाल कटवाने के लिए अपनी बारी का इंतजार करते लोग मायापुरी पढ़ते.रहते। मुझे मायापुरी मै मगर हम चुप रहेंगे कालम अच्छा लगता। मायापुरी का नया अंक आते ही मै राजु की सैलून मे जाकर उसे पढ़ता। 
उस जमाने महिलाओ के लिए ब्यूटी पार्लर.नही हुआ करत थे। इसलिए महिलाऐ कभी सैलून मे नही आती थी। परन्तु राधिका अपने भतिजो के बाल कटाने राजु की दुकान पर आती थी।  राजु भतिजे के बाल काटता और वो मायापुरी पढ़ने बैठ जाती। बाल काटते हुए राजु को आईने मे राधिका दिखाई देती थी। बाल पीछे बांधकर जुड़ा किये हुए वो तन्मयता से मायापुरी पढ़ती थी लेकिन बीच बीच मे नजर उठाकर भतीजे की बाल कटवाई पर भी ध्यान देती। राजु बाल ज्यादा छोटे मत कर देना, ऐसी हिदायते देती रहती थी। राजु भतीजे से मस्ती करता बाल काटता रहता था। बालकाटकर राधिका की तरफ नजर करके कहता देख बंटी हीरो की तरह तेरे बाल बना दिये है, अब बुआ को तंग मत करना । राधिका भतीजे का हाथ पकड़ कर ले जाती। राधिका का घर राजु की दुकान से कुछ दूरी पर ही था। मै तो वैसे ही ऊसकी दुकान पर चला आता था। अमिताभ का फैन था लेकिन उसकी दुकान मे हमेशा पूराने गाने ही बजते थे।  मै कहता कि राजु भैया कभी नये गाने भी बजाया करो तो वो कहता कि बुजुर्ग बिल कटवाते है तो बहुत तंग करते है। कोई कहता है नाक के बाल काटो कोई कहता है मेरी बगलो के बाल काटो,पूराने गाने चलते है तो वो गानो मे मगन हो जाते है और मै भी अपना काम आराम से कर लेता हूं। एक बार राधिका ने कह दिया राजु कुछ तो नये गाने बजाओ। तब से वो थोड़े नये गाने बजाने लगा है। राधिका आती है तो मुकद्धर का सिंकदर फिल्म के गाने बजाता। यह राधिका की पसंदीदा फिल्म थी । अब तो सुंदर भी साबुन घोलते यही गाना गुनगुनाता दिल तो है दिल, दिल का एतबार क्या कीजे।यह गाना गुनगुनाते हुए वो बाहर खड़ा होकर उस्तरा पत्थर पर रगड़ता सुबह के टाईम उसी समय राधिका वहां से निकलती। वो उस समय मोपेड पर कालेज जाती थी।  
राजु की शादी नही हुई थी परन्तु शादी के लिए ओवर एज भी नही हुआ था।  उसने युवावस्था मे ही नहीं अपनी अलग दुकान जमा ली थी। शादी की बात पर कहता मै यहां शादी नही करूंगा। मै गुजरात मे शादी करूंगा। गुजरात मे चाचा के साथ रह़ूगा। वहां कमाई अच्छी है। चाचा सूरत मे साड़ियो के व्यापारी है। मै भी यह काम धंधा छोड़कर चाचा के साथ साड़ियो का बिजनेस करूंगा। शादी भी वहीं करूगा।   गुजरात जाने की बात क ई बार करता था। मेरे को कभी कहता कि पंडित मै सोचता हुं यही शादी कर लूं। यहां जमी जमाई दुकान है।फिर मेरे को राधिका के बारे मे पूछता था।  वो किस कालेज मे पढ़ती है,  उसके कितने भाई बहिन है। मै भोलेपन मे उसे बताता रहता।  राजु की दुकान मे राधिका के आने का एक फायदा हुआ कि राजु ने दुकान मे थोड़े नये गाने बजाना शुरू कर दिया था। मै भी अमिताभ के गानो का शौकिन था।उसकी दुकान मे मायापुरी पढ़ने जाता तो अमिताभ की फिल्मो के गाने का आनंद लेता। मै कभी गुनगुनाता इसको क्या कहते है आई लव यू। राजु सुनकर कहता पंडित अब पापा से कह देता हूं । चोखी छोरी देख लो लड़का जवान हो गया है।
मै वापिस सवाल दाग देता - पहले तुम्हारी तो कर लो। मेरी बात सुनकर बाल काटते काटते रूक जाता और आईने मे अपने बालो पर हाथ फेरते हुए अपने होठो भींच कर धीमी आवाज मे कहता अपनी भी जल्दी हो जायेगी।
रविवार के दिन राजु को नजर फेरने की फुरसत नही मिलती थी। उसके सैलून मे बैठने तक की जगह नही होती थी।  रविवार के दिन मै उसके सैलून मे नही जाता । बाकि दिनो मे दोपहर मे वो ग्राहकी न के बराबर होती थी। मै स्कूल से आने के बाद क ई बार दोपहर मे उसकी सैलून पर चला जाता। अप्रेल के शुरू के दिनो की बात है। एक दिन दोपहर यो ही उसकी सैलून गया था।   ऐसे ही बात करते  राजु ने पूछा आजकल राधिका दिखती नही है।  मैने तपपाक से कह दिया- अगले महीने उसकी शादी है। यह सुनते ही वो चुप हो गया। कुछ देर चुप बैठा रहा। फिर उठकर सैलून का सामान ठीक करने लगा। इस दिन के बाद से वो गुम शुम रहने लगा। मैने पूछा भी नही गुमशुम क्यो हो।  
आज राधिका की शादी थी। राधिका हमारे मोहल्ले की थी। इसलिए हम लोगो को भी शादी मे जाना था। सुबह से ही उत्साह था कि शादी मे जाना है।  सुबह दस बजे ही नही थे कि मै राजु की दुकान पहुंज गया।  पहुंचने पर पता चला कि दुकान तो बंद है। ऊपर देखा तो राजु हेयर सैलून का बोर्ड भी नही था। दुकान मामाजी के घर के नीचे ही थी। ऊपर खिड़की मे खड़े मामाजी के लड़के ने मुझे देख लिया तो कहा - दुकान बंद हो गयी है। मैने ईशारा करके पूछा क्यो? तो उसने कहा - वो गुजरात चला गया है, अपने चाचा केपास। मै कुछ देर वही खड़ा रहा।  सामने सड़क पर महिलाओ का झुण्ड शादी के गीत गाते हुए राधिका के घर जा रहा था।

Friday, January 10, 2020

  दादू की एक रोमांचक दास
 रस्किन बॉन्ड
Sep 28, 2012, 11:34 PM IST

मेरे दादू के जीवन से जुड़े अनेक रोमांचक किस्से हैं, जो हमें आज भी याद आते हैं। उन्होंने इंडियन रेलवे ज्वाइन करने से पहले कुछ समय ईस्ट अफ्रीकन रेलवे में भी काम किया था और उसी दौरान उनकी एक बार शुतुरमुर्ग से जबरदस्त मुठभेड़ हुई थी, जिसे वह ताउम्र नहीं भूले। दादू वहां एक छोटे-से कस्बे में रहते थे, जहां से उनका कार्यस्थल तकरीबन 12 मील दूर था। वह एक दुर्गम इलाका था और दादू घोड़े पर सवार होकर वहां तक आना-जाना करते थे। एक दिन दादू का घोड़ा बीमार पड़ गया। उनका कार्यस्थल पहुंचना बहुत जरूरी था, लिहाजा वह पैदल ही एक शॉर्टकट रास्ते से वहां के लिए निकल पड़े। यह रास्ता एक शुतुरमुर्ग के बाड़े से होकर जाता था, जहां से गुजरना खतरे से खाली नहीं था। ऐसा इसलिए क्योंकि उस वक्त शुतुरमुर्ग का प्रजननकाल चल रहा था और ऐसे में नर शुतुरमुर्ग बेहद उग्र हो जाते हैं। दादू इस बात से वाकिफ थे, लिहाजा उन्होंने अपने प्यारे डॉगी को भी साथ ले लिया था। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि बड़े से बड़ा शुतुरमुर्ग भी छोटे-से कुत्ते को देखते ही दुम दबाकर भाग लेता है। बहरहाल, बाड़े के नजदीक पहुंचने पर दादू ने इसके भीतर नजर दौड़ाई। वहां थोड़ी दूर पर ही कुछ शुतुरमुर्ग नजर आए। चूंकि उनका प्यारा डॉगी भी साथ था, लिहाजा वह बेखौफ बाड़े के भीतर चले गए। वह तकरीबन आधा मील ही चले होंगे कि उन्हें एक खरगोश दिखाई दिया। खरगोश को देखते ही डॉगी ने भौंकते हुए उसके पीछे दौड़ लगा दी। उन्होंने उसे वापस बुलाने की काफी कोशिश की, लेकिन सब फिजूल। डॉगी की आवाज से शुतुरमुर्गो में खलबली मच गई और वे इधर-उधर भागने लगे। अचानक दादू को तकरीबन 100 गज की दूरी पर एक विशाल नर शुतुरमुर्ग नजर आया, जो लगातार उन्हें घूर रहा था। अचानक उसने अपने पंख फैलाए, पूंछ ऊपर उठाई और दादू की ओर दौड़ लगा दी। यह देखकर दादू तुरंत पलटे और बाहर की ओर भागने लगे। लेकिन यह तो मानो खरगोश और कछुए की रेस थी। दादू के सोलह-सत्रह कदम उस विशाल प्राणी के दो-तीन कदमों के बराबर थे। बचने का सिर्फ एक ही रास्ता था- किसी झाड़ के पीछे छुप शुतुरमुर्ग को झांसा दिया जाए। लिहाजा दादू तुरंत अपनी दिशा बदलते हुए पास ही स्थित झाड़ियों के पीछे जाकर दुबक गए और अपनी उखड़ी सांसों को संभालने लगे। शुतुरमुर्ग से बचने के लिए बहुत सावधानी की जरूरत थी। उन्हें किसी भी सूरत में शुतुरमुर्ग की घातक किक के आगे नहीं आना था। शुतुरमुर्ग आगे की ओर कुंग-फू स्टाइल में इतनी जोर से किक मारता है कि व्यक्ति की हड्डी-पसली एक हो जाए और उसके पैने नाखून आपको लहूलुहान कर सकते हैं। बुरी तरह थके मेरे दादू मन ही मन ऊपरवाले से मदद की गुहार लगा रहे थे, तभी उस शुतुरमुर्ग ने उन्हें देख लिया। उन्हें वहां दुबका देख शुतुरमुर्ग दोगुनी शक्ति से भर गया और उनकी ओर छलांग लगा दी। दादू ने किसी तरह बाजू में हटते हुए अपना बचाव किया। तभी न जाने कहां से दादू में नई जान आ गई और उन्होंने उछलकर उसका एक पंख पकड़ लिया। अब डरने की बारी शुतुरमुर्ग की थी। वह बचने के लिए तेजी से गोल-गोल घूमने लगा। उसकी रफ्तार इतनी तेज थी कि दादू के पैर जमीन से उखड़ने लगे। लेकिन उन्होंने शुतुरमुर्ग का पंख नहीं छोड़ा। शुतुरमुर्ग गोल-गोल घूमते हुए तेजी से पंख फड़फड़ा रहा था। दादू की हालत बहुत खराब हो चुकी थी। लगातार खिंचाव पड़ने की वजह से उनकी बांह में तेज दर्द उठने लगा था और लगातार घूमने की वजह से उनका सिर भी चकराने लगा था। लेकिन वह जानते थे कि पकड़ ढीली करते ही उनकी शामत आ जाएगी। शुतुरमुर्ग लगातार चक्करघिन्नी बना हुआ था और उसे देखकर लगता था, मानो वह कभी थकेगा ही नहीं। तभी अचानक शुतुरमुर्ग एक पल के लिए रुका और उल्टी दिशा में घूमने लगा। इस अप्रत्याशित पलटी से न सिर्फ दादू की उसके पंखों से पकड़ छूट गई, वरन वह छिटककर जमीन पर लुढ़क गए। उनकी आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा था। वह कुछ समझ पाते, इससे पहले ही शुतुरमुर्ग उनके सिर के पास आकर खड़ा हो गया। दादू को अपना अंत निकट नजर आने लगा। उन्होंने डर के मारे चेहरे को हथेलियों से ढंक लिया। लेकिन आश्चर्य, शुतुरमुर्ग ने हमला नहीं किया। उन्होंने चेहरे से हाथ हटाकर देखा तो पाया कि शुतुरमुर्ग अपना एक पैर उठाकर उन्हें जोरदार किक लगाने की पोजीशन में है। दादू की डर से घिग्घी बंध गई। वह उस वक्त कुछ करने की स्थिति में नहीं थे। तभी अचानक एक आश्चर्यजनक घटना घटी। शुतुरमुर्ग ने दादू के ऊपर ताना हुआ अपना पैर हौले-से नीचे किया और तेजी से पलटकर वहां से भाग गया। दादू की हैरानी का ठिकाना नहीं था। तभी उन्होंने अपने प्यारे डॉगी के भौंकने की आवाज सुनाई दी और अगले ही पल वह उनके सामने हाजिर था। कहने की जरूरत नहीं, दादू ने उसे गोद में उठाकर खूब लाड़-दुलार किया। उस वक्त उनके लिए वह डॉगी किसी देवदूत से कम नहीं था। इसके बाद दादू ने शुतुरमुर्ग के बाड़े को पार करने तक एक पल के लिए भी डॉगी को खुद से अलग नहीं किया।रस्किन बॉन्ड पद्मश्री से सम्मानित ब्रिटिश मूल

Tuesday, January 7, 2020

 मेरे शहर की औरते


मेरे शहर की औरते
अपने घर की दहलीज
पर खड़े होकर
देखती है
स्कूल जाती शिक्षिकाओ को
जो जाती हुई बाते करती है
अपनी तनख्हो की।
अपने गिरे हुए पल्लू को
उठाकर अपना सिर ढकते हुए
देखती है
अंग्रेजी मे बाते करते हुए
पार्लर जाती औरतो को।
देखती है
अंग्रेजी मे अपने बच्चो को
डांटते हुए बाजार जाती औरतो को।
देखती है
कोई फिल्मी गीत गुनगुनाते
हुए जाती औरतो को।
देखती है
हाथ जोड़कर
वोट मांगती औरतो को।
घर की ओर आते
ससुर को देख
अपना पल्लु  से पर्दा कर
दहलीज से
भीतर लौटती  है
मेरे शहर की औरते।

   

Friday, January 3, 2020

जब अटलजी प्रधानमंत्री बने

               जब अटल जी प्रधानमंत्री बने




किस्सा बहुत पूराना है। उस समय का जब मेरे लिऐ बाते कम सपने ज्यादा हुवा करते थे।यह मेरे मुहल्ले का किस्सा है। हमारे मुहल्ले मे रहते थे डागाजी। एक सफेद बनियान और धोती उनका पहनावा था। सर्दी और गर्मी बारह महीने वो बनियान और धोती पहनते थे। सर्दी मे काले रंग का शाल ओढ़ लेते थे। मेरे पड़ोसी थे। हमारे घर के नजदीक एक परचुन की दुकान थी। उनका ज्यादातर समय वहीं बितता था। वो बीजेपी के बड़े समर्थक थे। दुकान पर बैठकर बीजेपी की ही बाते करते। दुकानदार भी बुजुर्गवार ही थे। हम लोग उन्हे जीसा कहकर बुलाते थे। जीसा और डागाजी बीजेपी के भविष्य को लेकर बाते करते। जीसा कहते डागाजी देखना एक दिन बीजेपी का प्रधानमंत्री जरूर बनेगा। इस बात पर डागा जी के झुरियां पड़े चेहरे पर चमक आ जाती। उस समय बीजेपी की लोकसभा मे दो ही सीटे थी।  पर डागा जी को उम्मीद थी। मै उन दिनो छोटा ही था। मै सुबह घर निकलकर बाहर दुकान पर आता तो डागा जी मेरे पैर छुते। मै पीछे हटता तो कहते आप ब्राहम्ण देवता हो। उनके कोई औलाद नही थी। अपनी पत्नि के साथ किराये पर रहते थे। मंदिर जाना और भागवत् कथा सुनने जाना, दिनभर उनका यही काम होता था। वे रामसुखदास जी महाराज के बड़े भक्त थे। महाराज जी जब भी बीकानेर आते रोज उनको सुनने जाते। उनकी आय का क्या जरिया था। इस बारे मे मुझे कुछ पता नही था। मेरा बचपन था तो मुझे इन बातो से कुछ लेना देना नही था। घर के नीचे एक बंद कमरा था जिसमे बड़ा सा काटा लगा था। वहां पांच, दस और बीस किलो के बाट पड़े रहते थे। वो यह कभी कभार ही खोलते थे।  हमारा मुहल्ला बड़ा था। आगे खुला मैदान की तरह चौक था। शाम को चोक मे बच्चो का हुजुम इकट्ठा होता था।  डागाजी को यही पसंद नही था। बच्चो को तो देखना ही पसंद नही करते थे। बच्चो ने उसे क्रिकेट का मैदान बना लिया था। शाम को रोज वहां क्रिकेट होती।  बच्चे जोर से शाट रगाते तो बाल लोगो के घरो मे चली जाती। प्राय
सभी लोग बच्चो को बाल वापिस कर देते।  डागाजी के घर बाल जाती तो वे देने से मना कर देते। बच्चे कुछ देर तो गुहार लगाते फिर नाराज होकर चले जाते। अगले दिन डागाजी वो बाल मेरे को दे देते। मै वह बाल उन बच्चो को दे देता। कुछ दिन यह सिलसिला चला।  फिर एक बार डागाजी को पता चल गया कि मै उन बच्चो को बाल दे देता हुं तो मेरे को बाल देना बंद कर दिया। अब उनके घर बाल गिरती तो वो उसे दो टुकड़ो मे काटकर फेंक देते।  बच्चे कुछ देर शोर करते फिर चले जाते। डागाजी की और बच्चो की लड़ाई ऐसे ही चलती रहती। कोई दूसरा इनके बीच मे नही आता। कोई किसी से डागा जी को समझाने की गुहार लगाता तो वो इनकार कर देते। मुझे बच्चो के लिए क्रूर लगते थे लेकिन मेरे प्रति  सह्दय थे।मैने उनसे ज्यादा बात नही करता था। मै समझता था कि उनके औलाद नही होने से वे दूसरे बच्चो के लिए इतने कठोर है लेकिन जीसा ने मुझे बताया कि वो बरसो से मुहल्ले की स्कूल मे एक हजार रूपये हर महीने देते है ताकि कोई बच्चा फीस नही भर पाये तो इन पैसो से उसकी पूर्ति कर ली जावे तब से उनके प्रति मेरी राय बदल गयी। हमने अपना वो घर छोड़ दिया और शहर के किसी दूसरे कोने मे रहने लग गये। मै डागाजी को भूल गया था। मै कालेज मे पढ़ने लगा था। उसी समय अटल बिहारी देश के प्रधानमंत्री बने। टीवी पर अटल बिहारी का शपथ ग्रहण समारोह चल रहा था मुझे डागाजी की याद आ गयी। मै उसी समय उन्हे बधाई देने निकल पड़ा। मेरा पूराना मुहल्ला बीजेपी विचारधारा का समर्थक था। मुहल्ले मे भीड़ थी। नारे लग रहे थे। मै सीधा जीसा के पास गया। जीसा और डागाजी की बहुत बनती थी। दोनो सगे भाई की तरह थे।  जीसा भी नारे लगाते और नाचते युवाओ को देख रहे थे। मैने जीसा को डागा जी के  बारे मे पूछा। वो कुछ नही बोले। अपनी गर्दन घुमाकर डागाजी के घर की ओर देखा और मेरी तरफ चेहरा किया। उनकी आंखो मे पानी की पतली लहर झिलमिलाने लगी।