Friday, January 10, 2020

  दादू की एक रोमांचक दास
 रस्किन बॉन्ड
Sep 28, 2012, 11:34 PM IST

मेरे दादू के जीवन से जुड़े अनेक रोमांचक किस्से हैं, जो हमें आज भी याद आते हैं। उन्होंने इंडियन रेलवे ज्वाइन करने से पहले कुछ समय ईस्ट अफ्रीकन रेलवे में भी काम किया था और उसी दौरान उनकी एक बार शुतुरमुर्ग से जबरदस्त मुठभेड़ हुई थी, जिसे वह ताउम्र नहीं भूले। दादू वहां एक छोटे-से कस्बे में रहते थे, जहां से उनका कार्यस्थल तकरीबन 12 मील दूर था। वह एक दुर्गम इलाका था और दादू घोड़े पर सवार होकर वहां तक आना-जाना करते थे। एक दिन दादू का घोड़ा बीमार पड़ गया। उनका कार्यस्थल पहुंचना बहुत जरूरी था, लिहाजा वह पैदल ही एक शॉर्टकट रास्ते से वहां के लिए निकल पड़े। यह रास्ता एक शुतुरमुर्ग के बाड़े से होकर जाता था, जहां से गुजरना खतरे से खाली नहीं था। ऐसा इसलिए क्योंकि उस वक्त शुतुरमुर्ग का प्रजननकाल चल रहा था और ऐसे में नर शुतुरमुर्ग बेहद उग्र हो जाते हैं। दादू इस बात से वाकिफ थे, लिहाजा उन्होंने अपने प्यारे डॉगी को भी साथ ले लिया था। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि बड़े से बड़ा शुतुरमुर्ग भी छोटे-से कुत्ते को देखते ही दुम दबाकर भाग लेता है। बहरहाल, बाड़े के नजदीक पहुंचने पर दादू ने इसके भीतर नजर दौड़ाई। वहां थोड़ी दूर पर ही कुछ शुतुरमुर्ग नजर आए। चूंकि उनका प्यारा डॉगी भी साथ था, लिहाजा वह बेखौफ बाड़े के भीतर चले गए। वह तकरीबन आधा मील ही चले होंगे कि उन्हें एक खरगोश दिखाई दिया। खरगोश को देखते ही डॉगी ने भौंकते हुए उसके पीछे दौड़ लगा दी। उन्होंने उसे वापस बुलाने की काफी कोशिश की, लेकिन सब फिजूल। डॉगी की आवाज से शुतुरमुर्गो में खलबली मच गई और वे इधर-उधर भागने लगे। अचानक दादू को तकरीबन 100 गज की दूरी पर एक विशाल नर शुतुरमुर्ग नजर आया, जो लगातार उन्हें घूर रहा था। अचानक उसने अपने पंख फैलाए, पूंछ ऊपर उठाई और दादू की ओर दौड़ लगा दी। यह देखकर दादू तुरंत पलटे और बाहर की ओर भागने लगे। लेकिन यह तो मानो खरगोश और कछुए की रेस थी। दादू के सोलह-सत्रह कदम उस विशाल प्राणी के दो-तीन कदमों के बराबर थे। बचने का सिर्फ एक ही रास्ता था- किसी झाड़ के पीछे छुप शुतुरमुर्ग को झांसा दिया जाए। लिहाजा दादू तुरंत अपनी दिशा बदलते हुए पास ही स्थित झाड़ियों के पीछे जाकर दुबक गए और अपनी उखड़ी सांसों को संभालने लगे। शुतुरमुर्ग से बचने के लिए बहुत सावधानी की जरूरत थी। उन्हें किसी भी सूरत में शुतुरमुर्ग की घातक किक के आगे नहीं आना था। शुतुरमुर्ग आगे की ओर कुंग-फू स्टाइल में इतनी जोर से किक मारता है कि व्यक्ति की हड्डी-पसली एक हो जाए और उसके पैने नाखून आपको लहूलुहान कर सकते हैं। बुरी तरह थके मेरे दादू मन ही मन ऊपरवाले से मदद की गुहार लगा रहे थे, तभी उस शुतुरमुर्ग ने उन्हें देख लिया। उन्हें वहां दुबका देख शुतुरमुर्ग दोगुनी शक्ति से भर गया और उनकी ओर छलांग लगा दी। दादू ने किसी तरह बाजू में हटते हुए अपना बचाव किया। तभी न जाने कहां से दादू में नई जान आ गई और उन्होंने उछलकर उसका एक पंख पकड़ लिया। अब डरने की बारी शुतुरमुर्ग की थी। वह बचने के लिए तेजी से गोल-गोल घूमने लगा। उसकी रफ्तार इतनी तेज थी कि दादू के पैर जमीन से उखड़ने लगे। लेकिन उन्होंने शुतुरमुर्ग का पंख नहीं छोड़ा। शुतुरमुर्ग गोल-गोल घूमते हुए तेजी से पंख फड़फड़ा रहा था। दादू की हालत बहुत खराब हो चुकी थी। लगातार खिंचाव पड़ने की वजह से उनकी बांह में तेज दर्द उठने लगा था और लगातार घूमने की वजह से उनका सिर भी चकराने लगा था। लेकिन वह जानते थे कि पकड़ ढीली करते ही उनकी शामत आ जाएगी। शुतुरमुर्ग लगातार चक्करघिन्नी बना हुआ था और उसे देखकर लगता था, मानो वह कभी थकेगा ही नहीं। तभी अचानक शुतुरमुर्ग एक पल के लिए रुका और उल्टी दिशा में घूमने लगा। इस अप्रत्याशित पलटी से न सिर्फ दादू की उसके पंखों से पकड़ छूट गई, वरन वह छिटककर जमीन पर लुढ़क गए। उनकी आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा था। वह कुछ समझ पाते, इससे पहले ही शुतुरमुर्ग उनके सिर के पास आकर खड़ा हो गया। दादू को अपना अंत निकट नजर आने लगा। उन्होंने डर के मारे चेहरे को हथेलियों से ढंक लिया। लेकिन आश्चर्य, शुतुरमुर्ग ने हमला नहीं किया। उन्होंने चेहरे से हाथ हटाकर देखा तो पाया कि शुतुरमुर्ग अपना एक पैर उठाकर उन्हें जोरदार किक लगाने की पोजीशन में है। दादू की डर से घिग्घी बंध गई। वह उस वक्त कुछ करने की स्थिति में नहीं थे। तभी अचानक एक आश्चर्यजनक घटना घटी। शुतुरमुर्ग ने दादू के ऊपर ताना हुआ अपना पैर हौले-से नीचे किया और तेजी से पलटकर वहां से भाग गया। दादू की हैरानी का ठिकाना नहीं था। तभी उन्होंने अपने प्यारे डॉगी के भौंकने की आवाज सुनाई दी और अगले ही पल वह उनके सामने हाजिर था। कहने की जरूरत नहीं, दादू ने उसे गोद में उठाकर खूब लाड़-दुलार किया। उस वक्त उनके लिए वह डॉगी किसी देवदूत से कम नहीं था। इसके बाद दादू ने शुतुरमुर्ग के बाड़े को पार करने तक एक पल के लिए भी डॉगी को खुद से अलग नहीं किया।रस्किन बॉन्ड पद्मश्री से सम्मानित ब्रिटिश मूल

Tuesday, January 7, 2020

 मेरे शहर की औरते


मेरे शहर की औरते
अपने घर की दहलीज
पर खड़े होकर
देखती है
स्कूल जाती शिक्षिकाओ को
जो जाती हुई बाते करती है
अपनी तनख्हो की।
अपने गिरे हुए पल्लू को
उठाकर अपना सिर ढकते हुए
देखती है
अंग्रेजी मे बाते करते हुए
पार्लर जाती औरतो को।
देखती है
अंग्रेजी मे अपने बच्चो को
डांटते हुए बाजार जाती औरतो को।
देखती है
कोई फिल्मी गीत गुनगुनाते
हुए जाती औरतो को।
देखती है
हाथ जोड़कर
वोट मांगती औरतो को।
घर की ओर आते
ससुर को देख
अपना पल्लु  से पर्दा कर
दहलीज से
भीतर लौटती  है
मेरे शहर की औरते।

   

Friday, January 3, 2020

जब अटलजी प्रधानमंत्री बने

               जब अटल जी प्रधानमंत्री बने




किस्सा बहुत पूराना है। उस समय का जब मेरे लिऐ बाते कम सपने ज्यादा हुवा करते थे।यह मेरे मुहल्ले का किस्सा है। हमारे मुहल्ले मे रहते थे डागाजी। एक सफेद बनियान और धोती उनका पहनावा था। सर्दी और गर्मी बारह महीने वो बनियान और धोती पहनते थे। सर्दी मे काले रंग का शाल ओढ़ लेते थे। मेरे पड़ोसी थे। हमारे घर के नजदीक एक परचुन की दुकान थी। उनका ज्यादातर समय वहीं बितता था। वो बीजेपी के बड़े समर्थक थे। दुकान पर बैठकर बीजेपी की ही बाते करते। दुकानदार भी बुजुर्गवार ही थे। हम लोग उन्हे जीसा कहकर बुलाते थे। जीसा और डागाजी बीजेपी के भविष्य को लेकर बाते करते। जीसा कहते डागाजी देखना एक दिन बीजेपी का प्रधानमंत्री जरूर बनेगा। इस बात पर डागा जी के झुरियां पड़े चेहरे पर चमक आ जाती। उस समय बीजेपी की लोकसभा मे दो ही सीटे थी।  पर डागा जी को उम्मीद थी। मै उन दिनो छोटा ही था। मै सुबह घर निकलकर बाहर दुकान पर आता तो डागा जी मेरे पैर छुते। मै पीछे हटता तो कहते आप ब्राहम्ण देवता हो। उनके कोई औलाद नही थी। अपनी पत्नि के साथ किराये पर रहते थे। मंदिर जाना और भागवत् कथा सुनने जाना, दिनभर उनका यही काम होता था। वे रामसुखदास जी महाराज के बड़े भक्त थे। महाराज जी जब भी बीकानेर आते रोज उनको सुनने जाते। उनकी आय का क्या जरिया था। इस बारे मे मुझे कुछ पता नही था। मेरा बचपन था तो मुझे इन बातो से कुछ लेना देना नही था। घर के नीचे एक बंद कमरा था जिसमे बड़ा सा काटा लगा था। वहां पांच, दस और बीस किलो के बाट पड़े रहते थे। वो यह कभी कभार ही खोलते थे।  हमारा मुहल्ला बड़ा था। आगे खुला मैदान की तरह चौक था। शाम को चोक मे बच्चो का हुजुम इकट्ठा होता था।  डागाजी को यही पसंद नही था। बच्चो को तो देखना ही पसंद नही करते थे। बच्चो ने उसे क्रिकेट का मैदान बना लिया था। शाम को रोज वहां क्रिकेट होती।  बच्चे जोर से शाट रगाते तो बाल लोगो के घरो मे चली जाती। प्राय
सभी लोग बच्चो को बाल वापिस कर देते।  डागाजी के घर बाल जाती तो वे देने से मना कर देते। बच्चे कुछ देर तो गुहार लगाते फिर नाराज होकर चले जाते। अगले दिन डागाजी वो बाल मेरे को दे देते। मै वह बाल उन बच्चो को दे देता। कुछ दिन यह सिलसिला चला।  फिर एक बार डागाजी को पता चल गया कि मै उन बच्चो को बाल दे देता हुं तो मेरे को बाल देना बंद कर दिया। अब उनके घर बाल गिरती तो वो उसे दो टुकड़ो मे काटकर फेंक देते।  बच्चे कुछ देर शोर करते फिर चले जाते। डागाजी की और बच्चो की लड़ाई ऐसे ही चलती रहती। कोई दूसरा इनके बीच मे नही आता। कोई किसी से डागा जी को समझाने की गुहार लगाता तो वो इनकार कर देते। मुझे बच्चो के लिए क्रूर लगते थे लेकिन मेरे प्रति  सह्दय थे।मैने उनसे ज्यादा बात नही करता था। मै समझता था कि उनके औलाद नही होने से वे दूसरे बच्चो के लिए इतने कठोर है लेकिन जीसा ने मुझे बताया कि वो बरसो से मुहल्ले की स्कूल मे एक हजार रूपये हर महीने देते है ताकि कोई बच्चा फीस नही भर पाये तो इन पैसो से उसकी पूर्ति कर ली जावे तब से उनके प्रति मेरी राय बदल गयी। हमने अपना वो घर छोड़ दिया और शहर के किसी दूसरे कोने मे रहने लग गये। मै डागाजी को भूल गया था। मै कालेज मे पढ़ने लगा था। उसी समय अटल बिहारी देश के प्रधानमंत्री बने। टीवी पर अटल बिहारी का शपथ ग्रहण समारोह चल रहा था मुझे डागाजी की याद आ गयी। मै उसी समय उन्हे बधाई देने निकल पड़ा। मेरा पूराना मुहल्ला बीजेपी विचारधारा का समर्थक था। मुहल्ले मे भीड़ थी। नारे लग रहे थे। मै सीधा जीसा के पास गया। जीसा और डागाजी की बहुत बनती थी। दोनो सगे भाई की तरह थे।  जीसा भी नारे लगाते और नाचते युवाओ को देख रहे थे। मैने जीसा को डागा जी के  बारे मे पूछा। वो कुछ नही बोले। अपनी गर्दन घुमाकर डागाजी के घर की ओर देखा और मेरी तरफ चेहरा किया। उनकी आंखो मे पानी की पतली लहर झिलमिलाने लगी।

Monday, December 30, 2019

लिखना सबसे बड़ा सुख
रस्किन बॉन्ड

Jul 03, 2012, 01:15 AM IST

मैं अपने आपको खुशकिस्मत समझता हूं, क्योंकि पिछली लगभग आधी सदी से मैं वह काम करके अपनी आजीविका कमा रहा हूं, जिससे मुझे प्यार है। जी हां, यह काम है लेखन। कभी-कभी मैं सोचता हूं कि शायद मैंने कुछ ज्यादा ही लिख दिया है। हां, ऐसा हो जाता है कि आपका लेखन एक आदत में ढल जाए और एक सीमा के बाद आप खुद को दोहराने लगें। यह भी संभव है कि कहने का तरीका बदल जाए, लेकिन विचार, स्मृतियां, चरित्र, परिवेश, घटनाएं लगभग वही या वैसी ही रहें। यूं भी कलाकारों और संगीतकारों की तुलना में लेखकों पर खुद को दोहराए जाने का आरोप कुछ ज्यादा ही लगाया जाता है। टर्नर से कभी किसी ने नहीं कहा कि उन्होंने सूर्यास्तों के इतने सारे चित्र क्यों बनाए, या गोगां को किसी ने नहीं टोका कि वे सुंदर ताहिशियन महिलाओं के चित्र ही क्यों बनाते रहे, या हुसेन से ही किसी ने नहीं कहा कि इतने सारे घोड़ों के चित्र बनाने की भला क्या जरूरत आन पड़ी थी। संगीत की दुनिया में भी अगर देखें तो पाएंगे कि पुचिनी का एक ऑपेरा दूसरे से बहुत भिन्न नहीं है। शोपां के नॉक्चर्न एक जैसी थीम पर रचे गए हैं। आधुनिक सुगम संगीत में भी एक ही किस्म की मेलोडी जरा से वेरिएशन के साथ बार-बार दोहराई जाती है। लेकिन लेखकों को इतनी रियायत नहीं मिलती। शायद वे जिस विधा में काम कर रहे होते हैं, यह उसकी भी एक सीमा है। लेखकों पर अपने चरित्रों को दोहराने का आरोप इसलिए लगता है, क्योंकि वे व्यक्तियों के बारे में लिख रहे होते हैं, रंगों या ध्वनियों पर काम नहीं कर रहे होते हैं। हेमिंग्वे की दुनिया जेन ऑस्टन की दुनिया से बहुत भिन्न है, लेकिन इसके बावजूद लेखन के प्रति उनके रवैये में यह बात समान मिलेगी कि उनके द्वारा रचे गए चरित्र उनके ही मनोभावों का विस्तार थे। फर्क इतना ही है कि जेन ऑस्टन ने अपना पूरा जीवन एक छोटी-सी जगह पर बिता दिया, जबकि हेमिंग्वे किसी घुमंतू यायावर की तरह पूरी दुनिया का चक्कर काटते रहे। किसी भी लेखक के लंबे कॅरिअर में यह लगभग तय है कि कभी न कभी वह खुद को दोहराएगा। लेखक के दिमाग में नए विचार आने के बावजूद पुरानी विषयवस्तुएं भी बनी रहती हैं। लेकिन सबसे जरूरी यही है कि लिखते रहा जाए। दुनिया को सतर्क नजरों से देखा व सुना जाए और शब्दों तथा उनके विन्यास की सुंदरता को निहारा जाए। और जैसाकि लेखकों के साथ ही कलाकारों और संगीतकारों पर लागू होता है कि हम अपने कौशल पर जितना काम करेंगे, उतनी ही हमारी प्रतिभा निखरती चली जाएगी। मेरे लिए लिखना दुनिया का सबसे सरल काम और सबसे बड़ा सुख है। किसी मनोभाव या विचार को शब्दों में व्यक्त कर पाना एक ऐसा हुनर है, जिससे मैं बहुत प्यार करता हूं। मैं अपने दिन की योजना कुछ इस तरह बनाता हूं कि उसमें कुछ न कुछ लिखने की गुंजाइश बनी रहे, फिर चाहे वह कोई छोटी-सी कविता, कोई एक पैराग्राफ, कहानी का एक हिस्सा, निबंध या कोई बड़ा लेख ही क्यों न हो। इसकी वजह यह नहीं है कि लेखन मेरा पेशा है, बल्कि यह है कि मुझे इससे बहुत खुशी मिलती है। मेरे आसपास की दुनिया (चाहे पहाड़ हो या मेरी खिड़की से नजर आने वाली चहल-पहल भरी सड़क) लोगों, दृश्यों, विचारों से भरी पड़ी है और मैं उस गुजरते हुए लम्हे को हमेशा के लिए थाम लेने के लिए उसे लिख लेता हूं। मेरे लेखन में मेरी जिंदगी की मुस्कराहटें और आंसू समाए हुए हैं। यदि मुझे रोज लिखने की आजादी नहीं होती तो जीवन मेरे लिए असहनीय हो जाता। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि मेरे द्वारा लिखी गई हर चीज सहेजने लायक होती है। मेरी पांडुलिपियों के अनेक पृष्ठ छपने से पहले ही मेरे कूड़ेदान में समा चुके होते हैं। मैं हमेशा अपनी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता, जाहिर है मैं हमेशा दूसरों की उम्मीदों पर भी खरा नहीं उतर सकता। लेखन की मेरी थ्योरी यह है कि हमारे विचार एकदम स्पष्ट होने चाहिए और शब्द साफ पानी की धारा की तरह बहने चाहिए। और यदि शब्द किसी पहाड़ी झरने की तरह बहते हों तो कहने ही क्या। निश्चित ही हमें अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ता है, लेकिन इसी तरह हम उनसे जूझना सीखते हैं। यदि लेखन के दौरान हमारी गति किसी गंदली नदी की तरह सुस्त पड़ जाए, तो यही बेहतर होगा कि हम वहीं रुक जाएं। लेखक को बार-बार अपने स्रोत, अपने उद्गम की ओर लौटकर जाना पड़ता है, ताकि वह अपने स्पष्ट विचारों को फिर से पा सके। मैं एक दिन में एक या दो घंटे से अधिक नहीं लिखता। यदि मैं लेखन को इससे ज्यादा समय दूं तो मेरे शब्द बोझिल होने लगते हैं और मैं यह कतई नहीं चाहता। मुझे अपने लिए एक साफ नदी चाहिए। लेकिन लेखन के लिए स्पष्ट विचार और शब्द संपदा के साथ ही अच्छे मूड की भी जरूरत होती है। मुझे यकीन है कि जब स्टर्न ने ‘शैंडी’ लिखा होगा, तब वे खुशी से उछल रहे होंगे। ‘वुदरिंग हाइट्स’ पढ़कर पता चलता है कि एमिली ब्रोंते जिंदगी को कितनी शिद्दत से प्यार करती थीं। डिकेंस हर शब्द को इस तरह लिखते थे, जैसे यह उनका आखिरी शब्द हो। कॉनराड के लेखन में समुद्र का-सा विस्तार और बेचैनी है। महान लेखक वही होते हैं, जिन्हें अपने अहसासों को शब्दों में पिरोने का हुनर आता है। एक बार एक स्कूली लड़के ने मुझसे पूछा : ‘क्या आप गंभीर लेखक हैं?’ मैंने जवाब दिया : ‘मैं गंभीर होने की पूरी कोशिश करता हूं, लेकिन लिखने की खुशी बार-बार मुझे गंभीर होने से रोक देती है।’ फिर मैं सोचता हूं कि क्या एक खुशमिजाज लेखक को गंभीरता से लिया जा सकता है? पता नहीं। लेकिन यह तो तय है कि जिस दिन मैंने लेखन को ही अपनी जिंदगी माना था, तब वह एक बेहद गंभीर फैसला था। लेकिन इसके लिए नौकरी, सुरक्षा, सहूलियत, घर-परिवार जैसी कुर्बानियां देनी पड़ती हैं। यदि मैंने पच्चीस वर्ष की उम्र में ब्याह कर लिया होता तो क्या तब मुझे मिला एक बहुत अच्छी नौकरी का प्रस्ताव इतनी आसानी से ठुकरा पाता? यदि मैं वह नौकरी कर लेता तो आज मुझे पेंशन मिल रही होती, लेकिन पेंशन की किसे टेंशन है? सबसे जरूरी बात यह है कि मैंने अपनी जिंदगी आजादी के साथ बिताई है और लगातार लेखन किया है, चाहे आजीविका के लिए ही सही। लेखक की जिंदगी पर पकड़ कभी ढीली नहीं होनी चाहिए। बहुत-से लेखक एक सुरक्षित भविष्य की चिंता में जीवन में समझौते कर लेते हैं। मुझे खुशी है कि मैंने ऐसा नहीं किया और यही कारण है कि मैं अपने आपको खुशकिस्मत समझता हूं।

Saturday, November 30, 2019

कोहरा

                             कोहरा

मुझे याद है ठंड के दिनो मे उन दिनो 8 बजे तक गहरी धुंध रहती थी। घर से बाहर निकलते ही हमे बाहर खडी साईकिल के अलावा कुछ भी दिखाई नही देता था। हमारी मां हमे स्कूल के लिए तैयार करती । मै और मेरा छोटा भाई दोनो गहरे कोहरे मे स्कूल के लिए घर से निकलते। दोनो के  हाफ पेंट पहनी हुई होती थी। मुझे याद नही हम हाफ पेंट क्यो पहनते थे। उस समय चलन था या पैसो की तंगी। शर्ट पर एक स्वेटर डाला रहता था। पैरो मे रबड़ की चप्पल। कोहरे मे कुछ भी दिखाई नही देता था। ठंड मे हम दोनो भाईयो के पैरो और हथो पर लालासी छा जाती थी। मुंह से धुंध का धुआं निकलता था। छोटे जोर से मुंह से सांसे छोड़ता तो धुऐं की तरह तरह धुंध निकलती। कुछ देर हम दोनो मुंह से धुंध का धुआं छोड़ते और एक दूसरे को देखकर खिलखिलाकर हंसते। ठंड इतनी थी कि नाखूनो मे खून जमने लगता। हमे इससे कोई फर्क नही पड़ता। छोटे आगे भागकर कोहरे मे गायब हो जाता तो मै दौड़कर उसे पकड़ लेता। कभी मै भागकर कोहरे मे छिप जाता तो वो मुझे पकड़ लेता। ठंड से  पूरी टांगे लाल हो जाती। छोटे कहता ठंड लग रही हे तो मै बताता कि मम्मी ने कहा है कि जिस दिन कोहरा होता है उस दिन धूप जरूर निकलती है। हम स्कूल पहुंचते तब तक धूप नही निकलती थी। हमारा स्कूल खुले मे ही था। एक मैदान मे कमरे बने हुए थे। मेरे और छोटे कि क्लासे आमने सामने थी। हम आसमान मे दूखते फिर एक दूसरे को। धूप अभी भी नही निकली थी। कोहरा क्लासो के अंदर तक था। हाथ से पेंसिल भी पकड़ नही पा रहे थे। टांगो को ठंड से बचाने के लिए एक टांग को दूसरी टांग पर रख लेते थे। इतनी ठंड मे एक ही बात गरमी देती थी कि मां ने कहा है कि कोहरे वाले दिन धूप जरूर निकलती है।  आधी छुट्टी हो गयी। कोहरा अभी भी था। छोटा अपना टिफिन लेकर मेरे पास दौड़ता आया। ठंड से कंपकंपा रहा था। उसने कहा धूप तो निकली नही। मैने कहा मां ने कहा है कोहरे वाले दिन धूप जरूर निकलती है। हम टिफिन लिए कोई कोना खोज रहे थे कि मैदान मे धूप आ गयी। मेरे ओर छोटे के होठ फैल गये। मैने कहा था ना कि मां ने कहा है कोहरे के दिन धूप जरूर निकलती है।  हम दोनो धूप मे बैठकर दोपहरी करने लग गये। आज भी कोहरा होता है तो मां की बात जरूर आती है कि जिस दिन कोहरा होता है उस दिन धूप जरूर निकलती है।





Thursday, October 31, 2019

बड़े जोर की पड़ी थी नाना की बेंत

मैने अपना बचपन नानी के पास ही बिताया है। नानी से इतना लगाव था कि मेरे ज्यातर समय नानी के घर पर ही बितता था।  मेरी शादी होने तक रात को मै नानी के घर ही सोता था।मैने मेरे बचपन की सारी बदमाशिया नानी के घर ही करी है। ये नही है कि नानी के घर हमे डाटने वाला नही था इसलिए दुनियाभर की ऊधम हम वहां कर लेते थे। एक बार मैने अपने एक दोस्त के कहने से बीड़ी के सुट्टे का कस लगा लिया थाः जिस समय मे सुट्टे का कस लगा रहा था उसी समय नाना वहां से गुजर रहे थे। उन्होने मुझे देख लिया। मै उन्हे देख नही पाया और सुट्टे के जोर से कस लगा रहा था। सुट्टे के कस लगाने से नाक से धुंआ निकलता देख हम बच्चे लोग हंस रहे थे। शाम को मैं नानी के घर पहुंचा तो नाना आंगन के बीच मे कुर्सी लगाकर बैठे थे। नाना को देखते ही मै तो पत्थर की मूर्ति हो गया न पांव आगे खिसक रहा था और न पीछे सरक रहा था। दिल जोर जोर से धड़क रहा था। रोना भी आ रहा था लेकिन नाना की गुस्से से भरी आंखे देखकर मेरी आंखो के आंसू ठहर गये। अभ मै मन ही मन.प्रार्थना कर.रहा था कि कही से नानी आ जाये। नानाजी ने भी मौका देखकर अदालत लगायी थीः नानी आज महाराज जी की कथा सुनने गयी हुई थी। अब मै भागने की कोशिश करू तो ऐसा लग रहा था मानो मेरे पैर जमीन पर चिपक गये हो। नाना.बोल कुछ नही रहे थे। उनके नथुने फुले हुए थे। वो खड़े हुए। चलकर मेरे पास आये। उनके काले रंग की जूतियां पहने हुए थी। वो जब चलकर मेरे पास आ रहे थे मुझे लग रहा था जैसे गब्बरसिंह अपना बेल्ट हाथ मे लिए मेरे पास आ रहा है। मेरे नजदीक आकर हाथ मे पकड़ी हुई छड़ी से मेरी ठुडी ऊपर उठाकर पूछा- क्यों बड़ा मजा रहा था।? खूब कस लगाये जा रहे थे। छड़ी मेरी ठुडी पर अटकी हुई थी। छड़ी जोर की चुभ रही थी। मैने अपनी आंखो के गोलो को ऊपर की ओर घूमा कर देखना चाहा। मुझे केवल नाना की दाढ़ी दिखाई दे रही थी। मै कुछ बोलना चाह रहा था परन्तु आवाज गले मे ही आकर रह गयी। मै बोलने के लिए अपने होठ खोलता उससे पहले ही सड़ाक से एक बेंत मेरे पिछवाड़े पर पड़ी। मैं अपनी हथेली से पिछवाड़े को रगड़ने लगा। बेंत की बड़ी जोर से लगी थी। मै कुछ ओर बोलता इससे पहले एक बेंत और पड़ी।  मेरे ठीक पीछे दरवाजा था। जोर की दो बेंत पड़ने के बाद और खाने की हिम्मत नही थी। मै दरवाजे से बाहर निकल गया। नाना मेरे पीछे आ गये। मै आगे चल रहा था पीछे नाना। बेंत पिछवाड़े पर पड़ रही  थी। नाना के डर से भाग नही पा रहा था। अब मेरी चिल्लाहट निकलने लगी थी। मै रोता हुआ चल रहा था पीछे नाना बेंत मारते हुए चल रहे थे। रोते हुए.मै आंसू पोंछते हुए चल रहा था। कुछ दूर चलने के बाद बेंत पड़नी बंद हो गयी। मैने नजर उठाकर देखा सामने नानी खड़ी थी। मै दौड़कर नानी से लिपट गया। अब नाना पत्थवरवत खड़े हो गये। नानी ने मेरे माथे पर हाथ फेराः फिर अपने पल्लू से अपने होठ के निचले हिस्से से पोंछते हुए बोली- जल्लाद हो गये हो क्या। छोरे की जान लेओगे क्या। ऐसा क्या कर दिया इसने। कुछ किया भी है तो ये कौनसा तरीका है समझाने का। नानी मुझे घर ले गयी। बाद मे नानी को मेरी बदमाशी का पता चला तो बहुत जोर से डांटा और कहा असकी बार ऐसा किया तो मै तेरे नाना को सजा देने से नही रोकूंगी। आज भी मै किसी बुरी चीज की ओर हाथ बढ़ाता हुं नाना की बेंत और नानी की डांट का स्मरण हो जाता है और मै बुरा काम करने से रूक जाता हुं।